मैंने सुना है, फ्रान्स की क्रांति के समय, वहां का जो सबसे खतरनाक कारागृह था, जहां आजीवन कैदी रखे जाते थे, क्रांतिकारियों ने उसे तोड़ दिया। उस कारागृह में ऐसे लोग बंदी थे, कोई बीस वर्ष से, कोई तीस वर्ष से, कोई पचास वर्ष से भी उस कारागृह की जंजीरें और बेड़ियां, सदा के लिए लगती थी। फिर जब आदमी मरता था, तो उसके हाथ तोड़ कर ही, खोली जाती थी। क्योंकि बीच में खुलने का कोई सवाल नहीं था, वह सिर्फ आजन्म कैदियों के लिए था। क्रांतिकारियों ने जाकर जेल की दीवारें तोड़ दीं, दरवाजे. तोड़ दिये, कारागृह में बंद कैदियों को बाहर निकाला। और जबरजस्ती उनकी जंजीरें तोड़ दीं। कई कैदियों ने इंकार भी किया। उन कैदियों ने कहा कि हम अपनी कोठरियों के बाहर हम नहीं आ सकते हैं। हम अंधेरे के आदि हो गए हैं। रोशनी में आंखों को तकली.फ होती है। लेकिन क्रांतिकारी नहीं माने। उन्होंने उनकी जंजीरें भी तोड़ दी, और उन्हें जेल खाने से बाहर कर दिया। एक चमत्कार घटा, लेकिन यह चमत्कार दुनिया को रहा होगा, हम समझ सकते हैं कि यह चमत्कार नहीं, बड़ा स्वाभाविक है। सांझ होते-होते आधे कैदी वापस लौट आए। और उन्होंने क्रांतिकारियों से कहा हम बाहर जाने से इंकार करते हैं। और बिना जंजीरों के हम जी नहीं सकते, क्योंकि वह हमारे शरीर के हिस्से हो गई हैं। अब जब हम चलते हैं तो हमें ऐसा लगता है हम नंगे-नंगे हैं, कुछ खाली-खाली है। हमारी जंजीरें हमें वापस लौटा दो। स्वाभाविक है, जिनके हाथ-पैरों में, सेरों व.जन की जंजीरे पड़ी रही हों, वर्षों तक जो उनके साथ सोए हों, उठे हों, जागे हों, बैठे हों, वह जंजीरें अब जंजीरें नहीं, उनके शरीर के हिस्से हो गई हैं। उनके बिना अब उन्हें नींद न आ सकेगी। ऐसा ही हमारे देश के साथ हुआ है। हमारा अधूरा अध्यात्म, सच है, लेकिन आधा सच। और हमने भौतिकवाद मैटेरियलिज्म को इंकार पर उसे खड़ा किया है। भारत के जिंदगी के अधिकतम दुर्भाग्य का कारण, भारत का भौतिकवाद को इंकार करना है। क्योंकि जैसे ही हम भौतिकवाद को इंकार करते हैं, पूरा जीवन अस्वीकृत हो जाता है। क्योंकि जीवन के सारे आधार भौतिक हैं। शरीर भी भौतिक है, मस्तिष्क भी भौतिक है, .जमीन भी भौतिक है, वृक्ष, पाधे, पशु-पक्षी यह सारा जीवन भौतिक है। इस भौतिक जीवन में अध्यात्म के फूल लगते हैं जरूर, लेकिन यह भौतिक जीवन जब सम्पन्न हो, समृद्ध हो, यह भौतिक जीवन जब संतृप्त हो, जब यह भौतिक जीवन पूरी तरह भरा-पूरा हो, ओवरलोइंग हो, असल में अध्यात्म भौतिक जीवन की ओवरलोइंग है। ऊपर से बह जाना है। मेरी दृष्टि मे अध्यात्म आखिरी लग्जरी है। आखिरी विलास है जो मनुष्य जाति उपलब्ध कर सकती है। लेकिन जिन्होंने भौतिक जीवन को इंकार कर दिया हो, एक आदमी अपने शरीर को इंकार करे, भोजन बंद कर दे, पानी देना बंद कर दे, श्वांस लेना बंद कर दे, क्योंकि यह सब भौतिक हैं। कितनी देर उसकी आत्मा टिकेगी ? और अगर उसकी आत्मा खो जाए, तो कौन जिम्मेदार होगा? आत्मा को बचाने की कोशिश में हमने आत्मा भी खो दी है। आत्मा की चर्चा हम करते रहे हैं, हमसे आत्महीन लोग खोजने कठिन हैं। क्योंकि एक हजार साल तक अगर लोग गुलाम रह सकते हों तो उनके भीतर आत्मा है, यह मानने में शक होता है। और अगर तीन हजार साल तक दीन, दरिद्र रह सकते हों तो यह मानने में थोड़ी सी हिम्मत जुटानी पड़ती है, कि वह जीवित हैं।
~ओशो