Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

“भिंडरावाला को संत बनाने वाली इंदिरा खालिस्तान के कारण नहीं मरी”👇

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि इंदिरा गाँधी,
करपात्री जी महाराज के पास पीएम बनने का आशीर्वाद लेने गई थी,
क्योंकि करपात्री जी महाराज का आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं जाता था।
तब करपात्री जी ने इस शर्त पर आशीर्वाद दिया था कि पीएम बनते ही सबसे पहले गौ हत्या के विरुद्ध कानून बना कर गौ हत्या बंद करनी होगी,
इंदिरा जी ने वादा किया कि PM बनने पर पहला काम यही करूंगी।

करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गाँधी पीएम बनी।
इसके करीब दो महीने बाद करपात्री जी महाराज इंदिरा जी से मिले और उनका वादा याद दिला कर गौ हत्या के विरुद्ध कानून बनाने के लिए कहा तो इंदिरा जी ने कहा कि महाराज जी अभी तो मैं नई नई हूँ, कुछ समय दीजिए।
कुछ समय बाद करपात्री जी फिर गए और कानून की मांग की लेकिन इंदिरा ने फिर टाल दिया।
कई बार मिलने और वादा याद दिलाने के बाद भी जब इंदिरा ने गौ हत्या बंद नहीं की,
कानून नहीं बनाया तो 7 नवम्बर 1966, उस दिन कार्तिक मास, शुक्‍ल पक्ष की अष्‍टमी तिथि थी, जिसे हम-आप

#गोपाष्टमी 🥢 नाम से जानते हैं,

को देश का संत समाज, शंकराचार्य, अपने छत्र आदि छोड़ कर पैदल ही, ने आम जनता के साथ, गायों को आगे आगे करके संसद कूच किया, करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में जगन्नाथपुरी, ज्योतिष पीठ व द्वारका पीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय के सातों पीठों के पीठाधिपति, रामानुज संप्रदाय, मध्व संप्रदाय, रामानंदाचार्य, आर्य समाज, नाथ संप्रदाय, जैन, बौद्ध व सिख समाज के प्रतिनिधि, सिखों के निहंग व हजारों की संख्या में मौजूद नागा साधुओं को पंडित लक्ष्मीनारायण जी चंदन तिलक लगाकर विदा कर रहे थे।

लालकिला मैदान से आरंभ होकर नई सड़क व चावड़ी बाजार से होते हुए पटेल चौक के पास से संसद भवन पहुंचने के लिए इस विशाल जुलूस ने पैदल चलना आरंभ किया।
रास्ते में अपने घरों से लोग फूलों की वर्षा कर रहे थे।
हर गली फूलों का बिछौना बन गया था।

यह हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ा ऐतिहासिक दिन था।
इतने विवाद और अहं की लड़ाई होते हुए भी सभी शंकराचार्य और पीठाधिपतियों ने अपने छत्र, सिंहासन आदि का त्याग किया और पैदल चलते हुए संसद भवन के पास मंच पर समान कतार में बैठे।

उसके बाद से आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ।
नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था।
संसद गेट से लेकर चांदनी चौक तक सिर ही सिर दिखाई दे रहा था।
कम से कम 10 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी,
जिसमें 10 से 20 हजार तो केवल महिलाएं ही शामिल थीं।
जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गो हत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे।
उस वक्त इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी और गुलजारी लाल नंदा गृहमंत्री थे।

इस सिंहनाद को देख कर इंदिरा ने सत्ता के मद में चूर होकर संतों, साधुओं, गायों और जनता पर अंधाधुंध गोलियों की बारिश करवा दी, हजारों गाय, साधु, संत और आमजन मारे गए।
गोरक्षा महाभियान समिति के तत्कालीन मंत्रियों में से एक मंत्री और पूरी घटना के गवाह, प्रसिद्ध इतिहासकार एवं लेखक आचार्य सोहनलाल रामरंग के अनुसार इस गोलीबारी में कम से कम 10 हजार लोग मारे गए थे।

ट्रक बुलाकर मृत, घायल, जिंदा-सभी को उसमें ठूंसा जाने लगा।
जिन घायलों के बचने की संभावना थी,
उनकी भी ट्रक में लाशों के नीचे दबकर मौत हो गई।
आखिरी समय तक पता ही नहीं चला कि सरकार ने उन लाशों को कहां ले जाकर फूंक डाला या जमीन में दबा डाला।
पूरे शहर में कर्फ्यू लागू कर दिया,

तब करपात्री जी महाराज ने मारी हुई गायों के गले से लिपट कर रोते हुए कहा था कि “हम तो साधु हैं,
किसी का बुरा नहीं करते लेकिन तूने माता समान निरपराध गायों को मारा है,
जा इसका फल तुझे भुगतना पड़ेगा,

मैं श्राप देता हूँ कि एक दिन तेरी देह भी इसी प्रकार गोलियों से छलनी होगी और तेरे कुल और दल का विनाश करने के लिए मैं हिमालय से एक ऐसा तपस्वी भेजूँगा जो तेरे दल और कुल का नाश करेगा”।

आम जनमानस इंदिरा के इस दुष्कृत्य पर दुःखी मन से यही दुआ कर रहा था कि  भगवान करे ये भी इसी प्रकार मरे।

अब इसे संयोग कहेंगे या करपात्री जी महाराज का श्राप कि इंदिरा का शरीर ठीक #गोपाष्टमी🥢
के दिन उसी प्रकार गोलियों से छलनी हुआ जैसे करपात्री जी महाराज ने श्राप दिया था और अब हिमालय में 6 साल तपस्या करने वाले नरेंद्र मोदी के रूप में वह तपस्वी कांग्रेस के विनाश “कांग्रेस मुक्त भारत” अभियान में जुटा है।
जैसे करपात्री जी का आशीर्वाद सदा सफल ही होता था वैसे ही श्राप भी फलीभूत होता था।

अब आप खुद सोचिए क्या ये संयोग है ?
1- संजय गांधी मरा>आकाश में -तिथि थी  #गोपाष्टमी🥢
2- इन्दिरा गाँधी मरी>आवास- में तिथि थी  #गोपाष्टमी🥢
3- राजीव गाँधी मरा> मद्रास में -तिथि थी  #गोपाष्टमी🥢
4- ?????

Posted in रामायण - Ramayan

વિશાલા નગરી ક્યાં આવેલી હતી, તેની સ્થાપના કોણે કરી હતી અને આજે આ શહેર કયા નામે ઓળખાય છે?

જવાબ:—
જ્યારે મહર્ષિ વિશ્વામિત્ર રામ અને લક્ષ્મણ સાથે સિદ્ધક્ષેત્ર (બક્સર) થી જનકપુર ગયા, ત્યારે તેમણે બક્સરની પૂર્વમાં પાટલીપુત્રથી ગંગા નદી પાર કરીને ગંગા, સરયુ અને પુત્રના સંગમ પર બીજી બાજુ વિશાલા નગરી પહોંચ્યા. તે શહેર ખૂબ જ સુંદર અને મનોહર હતું. તેની સુંદરતા જોઈને ભગવાન શ્રી રામે મહર્ષિ વિશ્વામિત્રને પૂછ્યું કે હે મહાન ઋષિ! આ ખૂબ જ સુંદર શહેર મનને મોહિત કરે છે. કૃપા કરીને મને કહો કે આ શહેરનું નામ શું છે અને કોણે તેની સ્થાપના કરી હતી? મુનીશ્વર વિશ્વામિત્રે કહ્યું કે હે રામ! આ શહેરનું નામ વિશાલા નગરી છે અને તે તમારા પૂર્વજ મહારાજ ઇક્ષ્વાકુના પુત્ર વિશાલે સ્થાપિત કર્યું હતું અને આ શહેરનું નામ તેમના નામ પરથી વિશાલા નગરી રાખવામાં આવ્યું હતું. હાલમાં, મહાન સદ્ગુણી દુર્જય વીર મહારાજ સુમતિ આ શહેર પર શાસન કરી રહ્યા છે. ઇક્ષ્વાકુના પુત્ર મહારાજ વિશાલનો જન્મ અલંબુષાના ગર્ભમાંથી થયો હતો. વિશાલના પુત્ર હેમચંદ્ર, હેમચંદ્રના પુત્ર સુચન્દ્ર, સુચન્દ્રના પુત્ર ધુમ્રશ્વ, ધુમ્રશ્વના પુત્ર શ્રીંજય, શ્રીંજયના પુત્ર સહદેવ, સહદેવના પુત્ર કુશાશ્વ, કુશાશ્વના પુત્ર સોમદત્ત, સોમદત્તના પુત્ર કકુત્સ્થ અને કકુત્સ્થના પ્રપૌત્ર સુમતિ આજે આ નગરીના રાજા છે. હે રામ! મહારાજા ઇક્ષ્વાકુના આશીર્વાદથી વિશાલ નગરીના બધા રાજાઓ દીર્ઘાયુષ્યવાન, મહાત્મા, પરાક્રમી અને અત્યંત ધાર્મિક બન્યા છે. ઋષિના શબ્દો સાંભળીને ભગવાન શ્રી રામ અને લક્ષ્મણ અત્યંત ખુશ થયા.
આ વિશાળ નગરી પાછળથી વૈશાલીના નામથી પ્રખ્યાત થઈ.
જય શ્રી રામ 🚩
લેખ
બ્રહ્મેશ્વર નાથ મિશ્ર
સૌજન્ય વાલ્મીકિ રામાયણ

Posted in हिन्दू पतन

#मोपला_कांड

हिन्दुओ का नरसंहार दिवस

दिनांक 20 अगस्ट,1921

भारत का इतिहास लिखने वालों ने जब भी हिन्दुओं के नरसंहार वाली किसी घटना के बारे में लिखा तो इसे एक ‘विद्रोह’ या ‘हिन्दू-मुस्लिम दंगे’ करार दिया। महाराष्ट्र में 19वीं शताब्दी के अंत में हिन्दुओं के लिए पूजा-पाठ तक अपराध हो गया था और मुस्लिम अक्सर हिन्दू जुलूसों पर हमले करते थे तो इसे भी ‘हिन्दू-मुस्लिम विवाद’ लिखा गया। उत्तर भारत में तो किसी को केरल के मालाबार में मोपला मुस्लिमों द्वारा हुए हिन्दुओं के नरसंहार के बारे में शायद ही पता हो।

न सिर्फ अंग्रेजों की नीति मुस्लिम तुष्टिकरण की रही थी, बल्कि महात्मा गाँधी जैसे नेता तक ने ‘खिलाफत आंदोलन’ का समर्थन कर के हिन्दुओं के कत्लेआम की तरफ से आँख मूँद लिया। मोपला हिन्दू नरसंहार को अक्सर ‘मालाबार विद्रोह’, या अंग्रेजी में ‘Rebellion‘ कह कर सम्बोधित किया गया। केरल भाजपा के अध्यक्ष रहे कुम्मनम राजशेखरन की मानें तो 1921 में हुई ये घटना राज्य में ‘जिहादी नरसंहार’ की पहली वारदात थी।

आज केरल में मुस्लिमों की जनसंख्या 27% के आसपास है। यहाँ की पार्टी ‘मुस्लिम लीग (IUML)’ के पास 15 विधानसभा सीटें हैं। राज्य से आतंकी संगठन ISIS में जाने वालों की अच्छी-खासी संख्या है। अब तो तालिबान में भी ‘मलयालियों’ के होने की बात खुद कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने कही है। यहाँ के ईसाई भी ‘लव जिहाद’ से पीड़ित हैं। असल में केरल में इस्लामी कट्टरपंथ की जड़ें इतिहास में ही हैं।

मोपला हिन्दू नरसंहार के बारे में वामपंथी इतिहासकार कहते हैं कि ये अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह था। अगर ऐसा था, तो फिर मंदिर क्यों ध्वस्त किए गए थे? अगर ये ‘स्वतंत्रता संग्राम’ था, तो भारत के ही लोगों को अपनी ही धरती छोड़ कर क्यों भागना पड़ा था जिहादियों के डर से? वामपंथी इसे ‘मप्पिला मुस्लिमों का सशस्त्र विद्रोह’ कहते हैं। अगर ये विद्रोह था तो इसमें सिर्फ मुस्लिम ही क्यों थे? बाकी धर्मों के लोग क्यों नहीं?

लगभग 6 महीनों तक हिन्दुओं का नरसंहार चलता रहा था, जिसमें 10,000 से भी अधिक जानें गईं। भारत के कई अन्य क्षेत्रों की तरह ही केरल में भी इस्लाम अरब से ही आया था। अरब के व्यापारी वहाँ आया करते थे और इस तरह 9वीं शताब्दी में वहाँ इस्लाम का पनपना शुरू हुआ। कई गरीब हिन्दुओं का धर्मांतरण हुआ। अरब के जो व्यापारी यहाँ बसे, उनका वंश भी फला-फूला। इस तरह केरल में मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ती चली गई।

ये वही इलाका था, जहाँ हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान ने हमले किए। पहले से ही पुर्तगाली यहाँ जमे हुए थे। ऊपर से मैसूर के आक्रमण ने यहाँ के हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर किया। हिन्दुओं को जम कर लूटा गया था। लोगों को इससे भी हैरानी थी कि यहाँ ‘मप्पिला मुस्लिमों’ की जनसंख्या कैसे अचानक इतनी बढ़ गई कि वो हावी हो गए। दो ही कारण हैं – ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे पैदा करना और गरीब हिन्दुओं का बड़ी संख्या में धर्मांतरण।

1921 में दक्षिण मालाबार में कई जिलों में मुस्लिमों की जनसंख्या सबसे ज्यादा थी। कुल जनसंख्या का वो 60% थे। अब वो समय आया जब महात्मा गाँधी ने मुस्लिमों का ‘विश्वास जीतने’ के लिए ‘खिलाफत आंदोलन’ को कॉन्ग्रेस का समर्थन दिला दिया। ‘खिलाफत’ मतलब क्या? ये आंदोलन ऑटोमन साम्राज्य को पुनः बहाल करने के लिए हो रहा था। तुर्की के खलीफा को पूरी दुनिया में इस्लाम का नेता नियुक्त करने के लिए हो रहा था।

न भारत को तब तुर्की से कोई लेनादेना था और न ही ऑटोमन साम्राज्य से। लेकिन, महात्मा गाँधी ने मुस्लिमों को कॉन्ग्रेस से जोड़ने के लिए उनके एक ऐसे अभियान का समर्थन कर दिया, जिसके दुष्परिणाम हिन्दुओं को भुगतने पड़े। वो 18 अगस्त, 1920 का समय था जब महात्मा गाँधी ‘खिलाफत’ के नेता शौकत अली के साथ मालाबार आए। वो ‘असहयोग आंदोलन और खिलाफत’ के लिए ‘ जागरूक’ करने आए थे।

यहाँ भी महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं को ‘ज्ञान’ दिया। कालीकट में 20,000 की भीड़ के सामने बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर ‘खिलाफत’ के मामले में न्याय के लिए भारत के मुस्लिम ‘असहयोग आंदोलन’ का समर्थन करेंगे तो हिन्दुओं का भी दर्ज बनता है कि वो अपने ‘मुस्लिम भाइयों’ के साथ सहयोग करें। जून 1920 में महात्मा गाँधी के कहने पर ही मालाबार में ‘खिलाफत कमिटी’ बनी। इसके बाद वो काफी सक्रिय हो गई।

महात्मा गाँधी भी इस भुलावे में जीते रहे कि मुस्लिमों ने ‘असहयोग आंदोलन’ का समर्थन कर दिया है। लेकिन, इससे ये ज़रूर हुआ कि ‘खिलाफत’ की आग में मोपला मुस्लिमों ने हिन्दुओं का बहिष्कार शुरू कर दिया। हिन्दुओं को निशाना बनाया गया। उनकी घर-सम्पत्तियों व खेतों को तबाह कर दिया गया। कइयों का जबरन धर्मांतरण करा दिया गया। कॉन्ग्रेस पार्टी ने अंग्रेजों पर दोष मढ़ कर इतिश्री कर ली। हिन्दुओं को बचाने कोई नहीं आया।

हाँ, वामपंथी नेता खासे खुश थे। सौम्येन्द्रनाथ टैगोर जैसे कम्युनिस्ट नेताओं ने इसे ‘जमींदारों के खिलाफ विद्रोह’ बताया। इतिहासकार स्टेफेन फ्रेडरिक डेल ने स्पष्ट लिखा है कि ये ‘जिहाद’ था। उनका कहना है कि यूरोपियनों व हिन्दुओं से लड़ते हुए ‘जिहाद’ की प्रकृति तो मोपला मुस्लिमों में काफी पहले से थी। उनका कहना था कि आर्थिक स्थिति से इस नरसंहार का कोई लेनादेना नहीं था। देश में कई ‘किसान आंदोलन’ हुए, लेकिन ऐसे आंदोलन में धर्मांतरण का क्या काम?

इसमें सबसे विवादित नाम आता है वरियामकुननाथ कुंजाहमद हाजी का, जो इस पूरे नरसंहार का सबसे विवादित शख्सियत है। वो मालाबार में ‘मलयाला राज्यम’ नाम से एक इस्लामी सामानांतर सरकार चला रहा था। ‘इस्लामिक स्टेट’ की स्थापना करने वाला कोई व्यक्ति स्वतंत्रता सेनानी कैसे हो सकता है? ‘द हिन्दू’ अख़बार को पत्र लिख कर उसने हिन्दुओं को भला-बुरा कहा था। अंग्रेजों ने उसे मौत की सज़ा दी थी। अब उस पर फिल्म बना कर उसके महिमामंडन की तैयारी हो रही है।

RSS के विचारक जे नंदकुमार कहते हैं कि हाजी एक ऐसे परिवार से आता था, जो हिन्दू प्रतिमाएँ ध्वस्त करने के आदी थे। उसके अब्बा ने भी कई दंगे किए थे, जिसके बाद उसे मक्का में प्रत्यर्पित कर दिया गया था। मोपला दंगे के दौरान कई हिन्दू महिलाओं का रेप भी किया गया था मंदिरों को ध्वस्त किया गया था। बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने ‘Pakistan or The Partition of India’ में लिखा है कि मोपला दंगा दो मुस्लिम संगठनों ने किया था।

इनके नाम हैं – ‘खुद्दम-ए-काबा (मक्का के सेवक)’ और सेन्ट्रल खिलाफत कमिटी। उन्होंने लिखा है कि दंगाइयों ने मुस्लिमों को ये कह कर भड़काना शुरू किया कि अंग्रेजों का राज ‘दारुल हर्ब (ऐसी जमीन जहाँ, अल्लाह की इबादत की इजाजत न हो)’ है और अगर वो इसके खिलाफ लड़ने की ताकत नहीं रखते हैं तो उन्हें ‘हिजरत (पलायन)’ करनी चाहिए। आंबेडकर ने लिखा है कि इससे मोपला मुस्लिम भड़क गए और उन्होंने अंग्रेजों को भगा कर इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए लड़ाई शुरू कर दी।

डॉक्टर आंबेडकर लिखते हैं, “अंग्रेजों के खिलाफ को तो जायज ठहराया जा सकता है, लेकिन मोपला मुस्लिमों ने मालाबार के हिन्दुओं के साथ जो किया वो विस्मित कर देने वाला है। मोपला के हाथों मालाबार के हिन्दुओं का भयानक अंजाम हुआ। नरसंहार, जबरन धर्मांतरण, मंदिरों को ध्वस्त करना, महिलाओं के साथ अपराध, गर्भवती महिलाओं के पेट फाड़े जाने की घटना, ये सब हुआ। हिन्दुओं के साथ सारी क्रूर और असंयमित बर्बरता हुई। मोपला ने हिन्दुओं के साथ ये सब खुलेआम किया, जब तक वहाँ सेना न पहुँच गई।”

दीवान बहादुर सी गोपालन नायर को मोपला नरसंहार के मामले में ‘प्राइमरी सोर्स’ माना जा सकता है, क्योंकि वो अंग्रेजी काल में वहाँ के डिप्टी कलक्टर थे। उन्होंने भी लिखा है कि गर्भवती महिलाओं के शरीर को टुकड़ों में काट कर सड़क पर फेंक दिया गया था। मंदिरों में गोमाँस फेंक दिए गए थे। कई अमीर हिन्दू भी भीख माँगने को मजबूर हो गए। जिन हिन्दू परिवारों ने अपनी बहन-बेटियों को पाल-पोष कर बड़ा किया था, उनके सामने ही उनका जबरन धर्मांतरण कर मुस्लिमों से निकाह करा दिया गया।

बाबासाहब आंबेडकर ने इसे हिन्दू-मुस्लिम दंगा मानने से इनकार करते हुए कहा था कि हिन्दुओं की मौत का कोई आँकड़ा नहीं है, लेकिन ये संख्या बहुत बड़ी है। आप इतिहास में जहाँ भी मोपला के बारे में पढ़ेंगे, आपको बताया जाएगा कि ये एक ‘कृषक विद्रोह था’, अंग्रेजों के खिलाफ था। लेकिन, इसकी आड़ में ये छिपाया जाता है कि किस तरह हजारों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया था।