Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#बुद्ध के जीवन में उल्लेख है अंगुलीमाल का। एक आदमी जो नाराज हो गया सम्राट से और उसने घोषणा कर दी कि वह एक हजार आदमियों की गर्दन काटकर उनकी अंगुलियों की माला बनाकर पहनेगा। उसका नाम ही अंगुलमाल हो गया। उसका असली नाम ही भूल गया। उसने लोगों को मारना शुरू कर दिया। वह बड़ा मजबूत आदमी था, खूंखार आदमी था। वह राजधानी के बाहर ही एक पहाड़ी पर अड्डा जमाकर बैठ गया। जो वहां से गुजरता उसको काट देता, उसकी अंगुलियों की माला बना लेता। वह रास्ता चलना बंद हो गया। औरों की तो बात छोड़ो राजा के सैनिक और सिपाही भी उस रास्ते से जाने को राजी नहीं थे। राजा खुद थर-थर कांपता था।

नौ सौ निन्यानबे आदमी उसने मार डाले, वह हजारवें की तलाश कर रहा था। उसकी मां भर उसको मिलने जाती थी, अब तो वह भी डरने लगी। लोगों ने उससे पूछा कि अब तू नहीं जाती अंगुलीमाल को मिलने? उसने कहा : अब खतरा है; अब उसको एक की ही कमी है। अब वह किसी को भी मार सकता है। वह मुझे भी मार सकता है। वह बिलकुल अंधा है। उसको हजार पूरे करने ही हैं। पिछली बार उसकी आंखों में मैंने जो देखा तो मुझे लगा अब यहां आना खतरे से खाली नहीं है। पिछली बार मैंने उसकी आंखों में शुद्ध पशुता देखी। अब मेरी जाने की हिम्मत नहीं पड़ती।

और तभी बुद्ध का आगमन हुआ उस राजधानी में और वे उसी रास्ते से गुजरने वाले थे, लोगों ने रोका कि वहां न जाएं क्योंकि वहां अंगुलीमाल है। आपने सुना होगा, वह हजार आदमियों की गर्दन काटने की कसम खा चुका है। नौ सौ निन्यानबे मार डाले उसने, एक की ही कमी है। उसकी मां तक डरती है। तो वह आपको भी छोड़ेगा नहीं। उसको क्या लेना बुद्ध से और गैर-बुद्ध से।

बुद्ध ने कहा : अगर मुझे पता न होता तो शायद मैं दूसरे रास्ते से भी चला गया होता लेकिन अब जब तुमने मुझे कह ही दिया कि वह ही आदमी की प्रतीक्षा में बैठा है… उसका भी तो कुछ ख्याल करना पड़ेगा। कितना परेशान होगा। जब उसकी मां भी नहीं जा रही और रास्ता बंद हो गया है तो उसकी प्रतिज्ञा का क्या होगा? मुझे जाना ही होगा। और फिर इस आदमी की सम्भावना अनंत है। जिसमें इतना क्रोध है, इतनी प्रज्वलित अग्नि है; जिसमें इतना साहस है, इतना अदम्य साहस है कि सम्राट के सामने, राजधानी के किनारे बैठकर नौ सौ निन्यानबे आदमी मार चुका है और सम्राट बाल बांका नहीं कर सके। वह आदमी साधारण नहीं है, उसके भीतर अपूर्व ऊर्जा है, उसके भीतर बुद्ध होने की सम्भावना है।

बुद्ध के शिष्य भी उस दिन बहुत घबड़ाये हुए थे। रोज तो साथ चलते थे, साथ ही क्यों चलते थे प्रत्येक में होड़ होती थी कि कौन बिलकुल करीब चले, कौन बिलकुल बायें-दायें चले। मगर उस दिन हालत और हो गयी, लोग पीछे—पीछे सरकने लगे। और जैसे-जैसे अंगुलीमाल की पहाड़ी दिखाई शुरू हुई कि शिष्यों और बुद्ध के बीच फलाँगों का फासला हो गया। शिष्य ऐसे घसटने लगे जैसे उनके प्राणों में प्राण ही नहीं रहे, श्वासों में श्वास नहीं रही, पैरों में जाने नहीं रही।

बुद्ध अकेले ही पहुंचे। अंगुलीमाल तो बहुत प्रसन्न हुआ कि कोई आ रहा है। लेकिन जैसे-जैसे बुद्ध करीब आये, बुद्ध की आभा करीब आयी…गुरु-परताप साध की संगति…वह सद्गुरु की आभा करीब आयी वैसे-वैसे अंगुलीमाल के मन में एक चमत्कृत कर देने वाला भाव उठने लगा कि नहीं इस आदमी को नहीं मारना। अंगुलीमाल चौंका; ऐसा उसे कभी नहीं हुआ था। उसने गौर से देखा, देखा भिक्षु है, पीत वस्त्रों में। सुंदर है, अद्वितीय है। उसके चलने में भी एक प्रसाद है। नहीं-नहीं, इसको नहीं मारना। मगर अंगुलीमाल का पशु भी बल मारा। उसने कहा : ऐसे छोड़ते चलोगे तो हजार कैसे पूरे होंगे? द्वंद्व उठा भारी, चिंता उठी भारी–क्या करूं, क्या न करूं? मगर जैसे बुद्ध करीब आने लगे, वैसे अंगुलीमाल की अंतरात्मा से एक आवाज उठने लगी कि नहीं-नहीं, यह आदमी मारने योग्य नहीं है। यह आदमी सत्संग करने योग्य है। यह आदमी पास बैठने योग्य है।

तुम अंगुलीमाल की मुसीबत समझ सकते हो। एक तो उसका व्रत, उसकी प्रतिज्ञा, और एक इस आदमी का आना जिसको देखकर उसके भीतर अपूर्व प्रेम उठने लगा, प्रीति उठने लगी। द्वंद्व तो हुआ होगा वीणा, बहुत द्वंद्व हुआ होगा, महाद्वंद्व हुआ होगा, तुमुलनाद छिड़ गया होगा, महाभारत छिड़ गया होगा उसके भीतर। एक उसके जीवन-भर की आदत, संस्कार और यह एक बिलकुल नयी बात, एक नयी किरण, एक नया फूल खिला, जहां कभी फूल नहीं खिले थे।

जैसे बुद्ध करीब आने लगे कि वह चिल्लाया कि बस रुक जाओ, भिक्षु वहीं रुक जाओ। शायद तुम्हें पता नहीं कि मैं अंगुलीमाल हूं, मैं सचेत कर दूं। मैं आदमी खतरनाक हूं, देखते हो मेरे गले में यह माला, यह नौ सौ निन्यानबे आदमियों की अंगुलियों की माला है! देखते हो मेरा वृक्ष जिसमें मैंने नौ सौ निन्यानबे आदमियों की खोपड़ियां टांग रखी हैं? सिर्फ एक की कमी है, मेरी मां ने भी आना बंद कर दिया है। मैं अपनी मां को भी नहीं छोड़ूंगा अगर वह आएगी तो उसकी गर्दन काट लूंगा मगर मेरी हजार की प्रतिज्ञा मुझे पूरी करनी है, मैं क्षत्रियों हूं।

बुद्ध ने कहा : क्षत्रिय मैं भी हूं। और तुम अगर मार सकते हो तो मैं मर सकता हूं। देखें कौन जीतता है!

ऐसा आदमी अंगुलीमाल ने नहीं देखा था। उसने दो तरह के आदमी देखे थे। एक–जो उसे देखते ही भाग खड़े होते थे, पूंछ दबाकर और एकदम निकल भागते थे; दूसरे–जो उसे देखते ही तलावार तलवार निकाल लेते थे। यह एक तीसरे ही तरह का आदमी था। न इसके पास तलवार है, न यह भाग रहा है। करीब आने लगा। अंगुलीमाल का दिल थरथराने लगा। उसने कहा कि देखो भिक्षु, मैं फिर से कहता हूं रुक जाओ, एक कदम और आगे बढ़े कि मेरा यह फरसा तुम्हें दो टुकड़े कर देगा।

बुद्ध ने कहा : अंगुलीमाल, मुझे रुके तो वर्षों हो गये, अब तू रुक।

अंगुलीमाल ने तो अपना हाथ सिर से मार लिया। उसने कहा : तुम पागल भी मालूम होते हो। मुझ बैठे हुए को कहते हो तू रुक, और अपने को, खुद चलते हुए को, कहते हो मुझे वर्षों हो गये रुके हुए!

बुद्ध ने कहा : शरीर का चलना कोई चलना नहीं, मन का चलना चलना है। मेरा मन चलता नहीं। मन की गति खो गयी है। वासना खो गयी है। मांग खो गयी है। कोई ईच्छा नहीं बची। कोई विचार नहीं रहा है। मन के भीतर कोई तरंगें नहीं उठतीं। इसलिए मैं कहता हूं कि अंगुलीमाल मुझे रुके वर्षों हो गये, अब तू भी रुक।

और कोई बात चोट कर गयी तीर की तरह अंगुलीमाल के भीतर। बुद्ध करीब आये, अंगुलीमाल बड़ी दुविधा में पड़ा करे क्या! मारे बुद्ध को कि न मारे बुद्ध को?

बुद्ध ने कहा : तू चिंता में न पड़, संदेह में न पड़ दुविधा में न पड़; मैं तुझे परेशानी में डालने नहीं आया। तू मुझे मार, तू अपनी हजार की प्रतिज्ञा पूरी कर ले। मुझे तो मरना ही होगा–आज नहीं कल, कल नहीं परसों। आज तू मार लेगा तो तेरी प्रतिज्ञा पूरी हो जाएगी, तेरे काम आ जाऊंगा। और फिर कल तो मरूंगा ही। मरना तो है ही। किसी की प्रतिज्ञा पूरी नहीं होगी, किसी के काम नहीं आऊंगा। जिंदगी काम आ गयी, मौत भी काम आ गयी; इससे ज्यादा शुभ और क्या हो सकता है! तू उठा अपना फरसा, मगर सिर्फ एक शर्त।

अंगुलीमाल ने कहा : वह क्या शर्त?

बुद्ध ने कहा: पहले तू यह वृक्ष से एक शाखा तोड़ कर मुझे दे दे। अंगुलीमाल ने फरसा उठाकर वृक्ष से एक शाखा काट दी। बुद्ध ने कहा: बस, आधी शर्त पूरी हो गयी, आधी और पूरी कर दे–इसे वापिस जोड़ दे।

अंगुलीमाल ने कहा : तुम निश्चित पागल हो। तुम अद्भुत पागल हो। तुम परमहंस हो मगर पागल हो। टूटी शाखा को कैसे मैं जोड़ सकता हूं

तो बुद्ध ने कहा : तोड़ना तो बच्चे भी कर सकते हैं, जोड़ने में कुछ कला है। अब तू मेरी गर्दन काट मगर गर्दन जोड़ सकेगा एकाध की? नौ सौ निन्यानबे गर्दनें काटीं, एकाध जोड़ सका? काटने में क्या रखा है अंगुलीमाल, यह तो कोई भी कर दे, कोई भी पागल कर दे। मेरे साथ आ, मैं तुझे जोड़ना सिखाऊं। मौत में क्या रखा है, मैं तुझे जिंदगी सिखाऊं। देह में क्या रखा है, मैं तुझे आत्मा सिखाऊं। ये छोटी–मोटी प्रतिज्ञाओं में, अहंकारों में क्या रखा है, मैं तुझे महा प्रतिज्ञा का पूरा होना सिखाऊं। मैं तुझे बनाऊं। मैं आया ही इसलिए हूं कि या तो तू मुझे मारेगा या मैं तुझे मारूंगा। निर्णय होना है, या तो तू मुझे मार या मैं तुझे मारूं।

वीणा, यही मैं तुझसे कहता हूं। मेरे पास जो आये हैं, निर्णय होना है: या तो मैं उन्हें समाप्त करूंगा या वे मुझे समाप्त करेंगे। इस से कम में कुछ हल होने वाला नहीं है। और मुझे समाप्त वे नहीं कर सकेंगे, क्योंकि समाप्त हुए को क्या समाप्त करोगे!

अंगुलीमाल बुद्ध पर हाथ नहीं उठा सका। उसका फरसा गिर गया। वह बुद्ध के चरणों में गिर गया। उसने कहा: मुझे दीक्षा दें। आदमी मैंने बहुत देखे मगर तुम जैसा आदमी नहीं देखा। मुझे दीक्षा दें। बुद्ध ने उसे तत्क्षण दीक्षा दी। और कहा आज से तेरा व्रत हुआ–करुणा। उसने कहा : आप भी मजाक करते हैं, मुझ क्रोधी को करुणा! बुद्ध ने कहा: तुझ जैसा क्रोधी जितना बड़ा करुणावान हो सकता है उतना कोई और नहीं।

गांव भर में खबर फैल गयी, दूर-दूर तक खबरें उड़ गयीं कि अंगुलीमाल भिक्षु हो गया है। खुद सम्राट प्रसेनजित, बुद्ध के दर्शन को तो नहीं आया था लेकिन यह देखने आया कि अंगुलीमाल भिक्षु हो गया है तो बुद्ध के दर्शन भी कर आऊं और अंगुलीमाल को भी देख आऊं कि यह आदमी है कैसा, जिसने थर्रा रखा था राज्य को! उसने बुद्ध के चरण छुए और उसने फिर बुद्ध को पूछा कि मैंने सुना है भन्ते कि वह दुष्ट अंगुलीमाल, वह महाहत्यारा अंगुलीमाल, आपका भिक्षु हो गया, मुझे भरोसा नहीं आता। वह आदमी और संन्यासी हो जाए, मुझे भरोसा नहीं आता।

बुद्ध ने कहा : भरोसा, नहीं भरोसे का सवाल नहीं। यह मेरे दायें हाथ जो व्यक्ति बैठा है जानते हो यह कौन है? अंगुलीमाल है। अंगुलीमाल पीत वस्त्रों में बुद्ध के दायें हाथ पर बैठा था। जैसे ही बुद्ध ने यह कहा कि अंगुलीमाल है, प्रसेनजित ने अपनी तलवार निकाल ली घबड़ाहट के कारण।

बुद्ध ने कहा : अब तलवार भीतर रखों; यह वह अंगुलीमाल नहीं जिससे तुम परिचित हो, तलवार की कोई जरूरत नहीं है। तुम घबड़ाओ मत, कंपो मत, डरो मत; अब यह चींटी भी नहीं मारेगा; इसने करुणा का व्रत लिया है।

और जब पहले दिन अंगुलीमाल भिक्षा मांगने गया गांव में तो जैसे लोग सदा से रहे हैं-*छोटे, ओछे, निम्न; जैसी भीड़ सदा से रही है–मूढ़, जो अंगुलीमाल से थर-थर कांपते थे उन सबने अपने द्वार बंद कर लिए, उसे कोई भिक्षा देने को तैयार नहीं। नहीं इतना, लोगों ने अपनी छतों पर, छप्परों पर पत्थरों पर पत्थरों के ढेर लगा लिए और वहां से पत्थर मारे अंगुलीमाल को। इतने पत्थर मारे कि यह राजपथ पर लहूलुहान होकर गिर पड़ा लेकिन उसके मुंह से एक बद्दुआ न निकली।

बुद्ध पहुंचे, लहूलुहान अंगुलीमाल के माथे पर उन्होंने हाथ रखा। अंगुलीमाल ने आंख खोली और बुद्ध ने कहा: अंगुलीमाल लोग तुझे पत्थर मारते थे, तेरे सिर से खून बहता था, तेरे हाथ-पैर में चोट लगती थी, तेरे मन को क्या हुआ?

अंगुलीमाल ने कहा : आपके पास जाकर मन नहीं बचा। मैं देखता रहा साक्षीभाव से। जैसा आपने कहा था हर चीज साक्षीभाव से देखना, मैं देखता रहा साक्षीभाव से।

बुद्ध ने उसे गले लगाया और कहा: ब्राह्मण अंगुलीमाल, अब से तू क्षत्रिय न रहा, ब्राह्मण हुआ। ऐसों को ही मैं ब्राह्मण कहता हूं। अब तेरा ब्रह्म–कुल में जन्म हुआ। अब तूने ब्रह्म को जाना।

ओशो
गुरू प्रताप साध की संगति

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ओशो कहते है ,उस समय मैं केवल दस साल का था।  मेरी नानी ने मुझे तीन रूपये देते हुए कहा कि स्टेशन बहुत दूर है और तुम भोजन के समय तक शायद वापस घर न पहुच सको। और इन गाड़ियों का कोई भरोसा नहीं है। बारह-तेरह घंटे देर से आना तो इनके लिए आम बात है। इसलिए ये तीन रूपये अपने पास रख लो। भारत में उन दिनों तीन रुपयों को  तो एक अच्छा  खासा खजाना माना जाता था। #तीन_रुपयों में तो एक आदमी तीन महीने तक अच्छी  तरह से रह सकता था।

मेरी नानी ने मुझसे कहा कि अगर मैं महात्मा गांधी को देखना चाहता हूं तो मुझे वहां जाना चाहिए। और उन्हों ने बहुत पतले मलमल का बड़ा कुर्ता बनवाया। उन्हों ने बहुत अच्छा  मलमल लिया। वह बहुत ही पतला और पारदर्शी था।

गाड़ी हमेशा की तरह तेरह घंटे लेट आई। बाकी सभी लोग चले गए थे। सिवाय मेरे। तूम तो जानते है कि मैं कितना जिद्दी हूं। स्टेशन मास्टर ने भी मुझसे कहा: बेटा तुम्हारा तो कोई जवाब नहीं है। सब लोग चले गए हैं किंतु तुम तो शायद रात को भी यहीं पर ठहरने के लिए तैयार हो। और अभी भी गाड़ी के आने को कुछ पता नहीं है। और तुम सुबह चार बजे से उसका इंतजार कर रहे हो।

      स्‍टेशन पर चार बजे पहुंचने के लिए मुझे अपने घर से आधीरात को ही चलना पडा था। फिर भी मुझे अपने उन तीन रुपयों को खर्च ने की जरूरत नहीं पड़ी थी क्योंकि स्टेशन पर जितने लोग थे सब कुछ न कुछ लाए थे और वे सब इस छोटे लड़के की देखभाल कर रहे थे। वे मुझे फल, मिठाइयों और मेवा खिला रहे थे। सो मुझे भूख लगने का कोई सवाल ही नहीं था। आखिर जब गाड़ी आई तो अकेला मैं ही वहां खड़ा था। बस एक दस बरस का लड़का स्टेशन मास्टर के साथ वहां खड़ा था।

      स्टेशन मास्टर ने महात्मा गांधी से मुझे मिलवाते हुए कहा: इसे केवल छोटा सा लड़का ही मत समझिए। दिन भर मैंने इसे देखा है और कई विषयों पर इससे चर्चा की है, क्यों कि और कोई काम तो था नहीं। बहुत लोग आए थे और बहुत पहले चले गए, किंतु यह लड़का कहीं गया नहीं। सुबह से आपकी गाड़ी का इंतजार कर रहा है। मैं इसका आदर करता हूं, क्योंकि मुझे पता है कि अगर गाड़ी न आती तो यह यहां से जानेवाला नहीं था। यह यहीं पर रहता। अस्तित्व के अंत तक यह यहीं रहता। अगर ट्रेन न आती तो यह कभी नहीं जाता।

      महात्मा गांधी बूढे आदमी थे। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मुझे देखा। परंतु वे मेरी और देखने के बजाए मेरी जेब की और देख रहे थे। बस उनकी इसी बात ने मुझे उनसे हमेशा के लिए #विरक्त_कर_दिया।

उन्होंने कहा: यह क्या है ? 

     मैंने कहा: तीन रूपये।

      इस पर तुरंत उन्होंने मुझसे कहा, इनको दान कर दो। उनके पास एक दान पेटी होती थी, जिसमें सूराख बना हुआ था। दान में दिए जाने वाले पैसों को उस सूराख से पेटी के भीतर डाल दिया जाता था। चाबी तो उनके पास रहती थी। बाद में वे उसे खोल कर उसमें से पैसे निकाल लेते थे।

      मैंने कहा: अगर आप में हिम्मत है तो आप इन्हें  ले लीजिए,जेब भी यहां है रूपये भी यहां है, लेकिन क्या  मैं आप से पूछ सकता हूं कि ये रूपये आप किस लिए इक्कठा कर रहे है।
      उन्होंने कहा: गरीबों के लिए।
      मैंने कहा: तब यह बिलकुल ठीक है। तब मैंने स्वयं उन तीन रुपयों को उस पेटी में डाल दिया, लेकिन आश्चंर्य तो उन्हें होना था क्योंकि जब मै वहां से चला तो उस पेटी को उठा कर चल पडा।
      उन्होंने कहा: अरे, यह तुम क्या कर रहे हो। यह तो गरीबों के लिए हे।
      मैंने उत्तर दिया: हां, मैंने सुन लिया है, आपको फिर से कहने की जरूरत नहीं है। मैं भी तो गरीबों के लिए ही ले जा रहा हूं। मेरे गांव में बहुत से गरीब है। अब मेहरबानी करके मुझे इसकी चाबी दे दीजिए, नहीं तो इसको खोलने के लिए मुझे किसी चोर को बुलाना पड़ेगा। क्योंकि चोर ही बंद ताले को खोलने की कला जानते है।

      उन्होंने कहा: यह अजीब बात है….उन्होंने अपने सैक्रेटरी की और देखा। वह गूंगा बना था जैसे की सैक्रेटरी होते है। अन्यथा वे सैक्रेटरी ही क्यो बने
?
उन्होंने कस्तूरबा, अपनी पत्नी  की और देखा। कस्तूरबा ने उनसे कहा: अच्छा हुआ, अब आपको अपने बराबरी का व्यक्ति मिला। आप सबको बेवकूफ बनाते हो, अब यह लड़का आपका बक्सा ही उठा कर ले जा रहा है। अच्छा हुआ। बहुत अच्छा हुआ, मैं इस बक्से को देख-देख कर तंग आ गई हूं।

      परंतु मुझे उन पर दया आ गई और मैंने उस पेटी को वहीं पर छोड़ते हुए कहा: आप सबसे गरीब मालूम होते है। आपके सैक्रेटरी को तो कोई अक्ल नहीं है। न आपकी पत्नी  का आपसे कोई प्रेम दिखाई देता है। मैं यह बक्सा  नहीं ले जा सकता,इसे आप अपने पास ही रखिए। परंतु इतना याद रखिए कि मैं तो आया था एक महात्मा से मिलने परंतु मुझे मिला एक बनिया।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मैं कहता हूं पत्नी को छोड्कर मत भाग जाना। पत्नी की मान्यता गिर जाए, बस काफी है। पत्नी के प्रति पत्नी— भाव गिर जाए, बस काफी है। पत्नी में भी परमात्मा दिखायी पड़ने लगे, बस काफी है। मेरा—तेरा गिर जाए, वही झूठ है। लेकिन वह झूठ तो नहीं छोड़ते। अगर तुम हिमालय भी भाग गए, तो भी तुम्हारी पत्नी तुम्हारी है, यह झूठ तो तुम्हारे साथ जाता है, पत्नी छोड़ जाते हो।

स्वामी राम के जीवन में एक उल्लेख है, वह अमरीका से लौटे हैं। सरदार पूर्णसिंह उनके शिष्य थे और उनके पास हिमालय में रहते थे। एक दिन उनकी पत्नी दूर पंजाब से मिलने आयी। पत्नी बड़ी गरीब हालत में थी। स्वामी राम छोड्कर घर भाग गए, पत्नी किसी तरह पाल रही थी बच्चों को, किसी तरह अपना जीवन चला रही थी। किसी तरह थोड़े पैसे इकट्ठे करके कि स्वामी राम वापस आए हैं, उनके दर्शन कर आए, वह हिमालय गयी।

स्वामी राम को पता चला तो उन्होंने सरदार पूर्णसिंह को कहा कि यह झंझट कहां से आ गयी। मैं इससे मिलना नहीं चाहता। तुम किसी तरह इसको टालो। सरदार पूर्णसिंह तो बहुत हैरान हुए, क्योंकि स्वामी राम ने कभी किसी से मिलने से इनकार नहीं किया। कोई भी आया, पुरुष हो कि स्त्री। इस स्त्री से मिलने के इनकार का तो मतलब ही यही होता है कि इसके प्रति अभी भी पत्नी— भाव है। और तो क्या अर्थ होता है! अगर पत्नी— भाव गिर गया तो यह भी वैसी स्त्री है जैसी और स्त्रियां हैं। जब किसी और से मिलने में कोई रुकावट नहीं, तो इससे मिलने में क्या रुकावट है? इस बिचारी का क्या कसूर है?

तो सरदार पूर्णसिंह ने कहा कि अगर आप इस स्त्री से नहीं मिलेंगे, तो मैं आपको छोड्कर जाता हूं। मेरी श्रद्धा डावाडोल हो गयी। क्योंकि आप तो कहते हैं कि सब छोड़ चुके, अगर छोड़ चुके तो यह भाव अब तक मन में क्यों है कि यह झंझट कहां से आ गयी? तो झंझट जरूर कहीं भीतर है।

स्वामी राम को भी समझ में आया—वह बड़े समझदार, बोधवान व्यक्ति थे। उनकी आंख से आंसू गिर गए और उन्होंने कहा, तुम ठीक कहते हो, थोड़ी झंझट मेरे भीतर थी। तुमने मुझे खूब ठीक समय पर चेताया। तुमने मुझे चेता दिया। उसे बुलाओ। वह आयी तो उसके पैर छुए। और उसी दिन उन्होंने संन्यासी का जो पुराना रूप—ढंग था, वह छोड़ दिया। क्योंकि उन्होंने कहा कि उसमें वह जो त्याग की अकड़ है, वही भ्रांत है।

तुम जानकर यह हैरान होओगे कि स्वामी राम गैरिक वस्त्रों में नहीं मरे। जब वह मरे तो वह साधारण वस्त्र पहने हुए थे। पर मैं तुमसे कहता हूं कि वह परम संन्यासी होकर मरे। उनको एक बात समझ में आ गयी कि यह भी अकड़ है मेरी कि मैं त्यागी, कि मैंने सब छोड़ दिया, इसमें भी भ्रांति है। छोड़ने को क्या है, पकड़ने को क्या है!
ओशो

Posted in महाभारत - Mahabharat

Archaeology : “Bhagwan Krishna And Radha Rani Ji.
श्रावण में संपूर्ण हिंदू समाज भगवान कृष्ण और राधारानी जी  को झूले में झुलाते हैं । धारणा यह भी है कि राधारानी जी के साथ भगवान कृष्ण को भगवान शिव स्वयं झूला झुलाते हैं ।  कालीबंगा की यह मुद्रा महत्वपूर्ण और मनमोहक है । भगवान कृष्ण राधारानी जी को कभी नहीं छोड़ते। विष्णु सहस्त्रनाम में “नरसिंह वपु श्रीमान” का पद पाठ मिलती है जिसमें भगवान कृष्ण आधे सिंह और आधे मनुष्य की आकृति में है । उनकी शक्ति राधारानी जी हैं । इस मुद्रा में भगवान कृष्ण के साथ भगवती हैं तो वह राधारानी जी ही हैं। जो स्त्री अंगरक्षकों द्वारा सुरक्षित हैं । भारत के संकेत चित्र ( Symbolism) को समझने के लिए भारत के मूल संस्कृति ग्रंथों को टटोलना आवश्यक है। कालीबंगन में राधारानी जी के साथ भगवान कृष्ण का होना न केवल रोमांचित करती है अपितु यह स्पष्टता के साथ कहती है कि कालीबंगन के पहले द्वारका डूब चुकी है। भगवान और राधारानी जी अब केवल स्मृति में है । इस मुद्रा को समझना तब तक संभव नहीं जब तक राधारानी जी और भगवान स्वयं  आशीर्वाद न दें । सरस्वती सिंधु सभ्यता पर अनेक ऐसे धुन्ध है जो परिष्कृत होनी है । मार्क्सवादियों ने इस चिन्ह को बलि हत्या से जोड़ कर देखा था। जैसा भोजन वैसी बुद्धि।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कहते हैं कि एक बार शैतान का मन ऊब गया। सभी का ऊब जाता है। शैतान का भी ऊब गया हो तो आश्चर्य नहीं। शैतान का तो ऊब ही जाना चाहिए। कब से शैतानी कर रहा है! तो उसने संन्यास लेने का निश्चय कर लिया। तब उसने अपने गुलामों को बेचना शुरूकर दिया : बुराई, झूठ, ईर्ष्या, निरुत्साह, दर्प, हिंसा, परिग्रह आदि—आदि। सब पर तख्तियां लगा दीं। खरीददार तो सदा से मौजूद हैं। शैतान की दुकान पर कब ऐसा हुआ कि भीड़ न रही हो। परमात्मा के मंदिर खाली पड़े रहते हैं। शैतान की दुकान पर तो सदा भीड़ होती है, भारी भीड़ होती। जमघट होता है। क्यू लगे रहते हैं।

और जब यह लोगों को पता चला कि शैतान अपने विश्वस्त गुलामों को भी बेच रहा है तो सभी पहुंच गए। धनपति पहुंचे। सभी तरह के उपद्रवी पहुंच गए। क्योंकि शैतान के सुशिक्षित सेवक मिल जाएं तो फिर क्या? फिर तो दुनिया फतह! एक के बाद एक गुलाम बिकने लगे। शैतान के भक्त आते गए और अपनी— अपनी पहचान, अपनी—अपनी पसंद का गुलाम खरीदते गए। पर एक बहुत ही भोंडी और कुरूप औरत खड़ी थी जिसे कोई पहचान ही नहीं पा रहा था कि यह कौन है? और कठिनाई और भी थी कि उसके गले में जो तख्ती लगी थी, सबसे ज्यादा कीमत की थी।

अंतत: एक आदमी ने पूछा कि महानुभाव, बड़ा आश्चर्य है, इस स्त्री को हम पहचान नहीं पा रहे हैं। यह कौन है आपकी सेविका? और ऐसी कुरूप और ऐसी भोंडी कि इसे देख कर ही जी मिचलाता। और सबसे ज्यादा कीमत लगा रखी है। बात क्या है? कोई खरीददार गया भी नहीं इसके पास। यह देवी कौन है? इसके संबंध में कुछ बता दें। शैतान से उस ग्राहक ने पूछा।

शैतान ने कहा, ओह, यह? यह मेरी सबसे प्रिय और वफादार गुलाम है। मैं इसके सहारे बड़ी आसानी से लोगों को अपने शिकंजे में कस लेता हूं। क्यों, पहचाना नहीं इसे? बहुत कम लोग इसे पहचानते हैं इसीलिए तो इसके द्वारा धोखा देना आसान होता है। इसे कोई पहचानता नहीं मगर यह मेरा दाहिना हाथ है।

फिर शैतान अट्टहास कर उठा और बोला, महत्वाकांक्षा है यह। महत्वाकांक्षा! एंबीशन! यह सबसे भोंडी और सबसे कुरूप मेरी सेविका है, लेकिन सबसे कुशल। आदमी जीता महत्वाकांक्षा में। यह पा लूं यह मिल जाए, और मिल जाए, और ज्यादा मिल जाए। तुम उसी महत्वाकांक्षा को धर्म की दिशा में मत फैलाओ।

संन्यास सत्य को पाने की महत्वाकांक्षा नहीं है, संन्यास महत्वाकांक्षा का त्याग है। संन्यास मोक्ष को पाने की नई चाह नहीं है, संन्यास सारी चाह की व्यर्थता को देख लेने का नाम है। अब तुम और मत चाहो। अब तुम चाह को जाने दो। अब इसे विदा कर दो। जिस दिन तुम चाह को विदा कर दोगे उसी दिन तुम शैतान के शिकंजे के बाहर हो गए हो। और जिस क्षण चाह को तुमने विदा कर दिया उसी क्षण तुम पाओगे, जो तुमने सदा चाहा था वह होने लगा। वह चाह के कारण ही नहीं हो पाता था। नहीं, ऐसी आकांक्षा न करो।

ओशो

Posted in खान्ग्रेस

*पुरानी तीन घटनाएं याद दिला दूँ। लेखक यहां पहले ही स्पष्ट कर देना चाहता है कि जो घटनाएं जैसी हुईं, सिर्फ वैसी ही लिखी जा रही हैं।*

1. ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व राष्ट्रपति थे।  उन्हें z security प्राप्त थी। उन्होंने दिल्ली में घोषणा की – “कल मैं चंडीगढ़ पहुंचने के बाद बोफोर्स के सारे राज खोलने वाला हूँ।” तो साहब हुआ ये कि दिल्ली-चंडीगढ़ मार्ग पर सामने से एक ट्रक दनदनाता हुआ आया और जैलसिंह की कार को कुचल दिया। वे वहीं मृत्यु को प्राप्त हुए। कोई जांच नहीं हुई।

2. राजेश पायलट ने कांग्रेस नेत्री की सलाह नहीं मानी। उन्होंने घोषणा की – “कल मैं कांग्रेस अध्यक्ष पद हेतु नामांकन भरूँगा।” बस फिर क्या था, सामने से एक बस आई और उनकी कार को कुचल दिया। वो वहीं मृत्यु को प्राप्त हुए। कोई जांच नहीं हुई।

इन दोनों घटनाओं में modus of operandi एक समान थी। तीसरी घटना में modus of operandi अलग थी।

3. श्रीमन्त माधवराव शिन्दे (सिंधिया)  उस लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय व कर्मठ नेता थे। वे लोकसभा के लिए लगातार नवीं बार चुने गए थे व लोकसभा में विपक्ष के नेता भी थे। कांग्रेस नेत्री ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को कहा – “मैं प्रचार करने आ रही हूँ !” प्रदेश अध्यक्ष निर्भीक था। उसने कहा – “आप मत आइए। माधवराव जी को भेज दीजिए। वे ही वोट दिलवा सकते हैं।”  बस फिर क्या था। माधवराव जी को बोला गया कि आप अपने व्यक्तिगत विमान से नहीं बल्कि इस विमान से जाएंगे। एक चश्मदीद किसान ने बयान दिया – “विमान में पहले बम विस्फोट हुआ, फिर आग लगी।” विमान में सवार आठों लोग मारे गए लेकिन कोई जांच नहीं हुई। अल्प काल के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भी मृत पाए गए। (डॉ. ईश्वर चन्द्र करकरे की कलम से साभार)

*सोनिया गांधी ने देश के लिए क्या-क्या काम किया है?*

■राजीव गांधी अपने पूरे जीवन काल मे कुल 181 रेलिया की थीं। जिसमें 180 में सोनिया गांधी भी उसके साथ थी, बस उस दिन साथ नहीं थी, जिस दिन राजीव गांधी के जीवन की अंतिम रैली हुई।

■राजीव गांधी की हत्या के समय 14 लोगों की भी मौत हुई थी। मगर मजे की बात इन मरने वाले 14 लोगों में एक भी कोंग्रेसी नेता नहीं था, जो भी मरे आम लोग थे। क्या ये सम्भव है कि देश के प्रधानमंत्री की रैली में उनके साथ एक भी बड़ा कोंग्रेसी नेता नहीं हो?

■राजीव गांधी के साथ कोई बड़ा या छोटा कांग्रेसी नेता नहीं मरा, ना सोनिया गांधी जो हर सभा में राजीव गांधी जी के साथ रहतीं थीं। उस दिन होटल में सरदर्द के कारण रुक गईं थी, ये आफिशियल स्टेटमेंट हैं।
तो क्या सबको मालूम था, कि क्या होने वाला है और इस तरह पूरी कांग्रेस विदेशियों द्वारा हाइजैक कर ली गई।

■बाद में खुद प्रियंका गांधी ने अपने बाप के कातिल को कोर्ट में माफ करने की अपील कर दी थी।

■जब से इटली की सोनिया मानियो इस परिवार की बहू बनकर आई हैं जब से अब तक इस गांधी परिवार में एक भी मृत्यु को प्राकृतिक मृत्यु का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है, सब अप्राकृतिक मौत मरे हैं।

■इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के ससुर कर्नल आनंद अपने ही फार्म हाउस से थोड़ी दूरी पर गोली लगने से मरे पाये गये थे ।

■संजय गांधी हवाई जहाज गिर जाने से मारे गये । इंदिरा गांधी अपने ही अंगरक्षकों के द्धारा गोली मारे जाने से मारी जाती है ।

■राजीव गांधी को बम से उड़ा दिया जाता है ।

■प्रियंका गांधी के ससुर राजेन्द्र वाड्रा दिल्ली के एक गेस्ट हाउस मे मरे पाये जाते है। प्रियंका गांधी की ननद जयपुर दिल्ली हाइवे में कार दुर्घटना में मारी जाती है। प्रियंका गांधी का देवर मुरादाबाद के एक होटल में मरा पाया जाता है।

■राजीव गांधी के सबसे खास दो दोस्त माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट यह तीनों उस बीयर बार में एक साथ जाया करते थे जिस बीयर बार में सोनिया शादी के पहले बार डांसर थी।

■राजेश पायलट एक सड़क दुर्घटना में मारा जाता है और माधवराव सिंधिया जहाज दुर्घटना में मारा जाता है।

■ हम खुद देख सकते हैं, केरल में नम्बी नारायण को जेल, गोधरा व मालेगांव कांड में हिन्दुओं को फंसाना व पाकिस्तान आतंकवादियों को छोड़़ना, हिन्दू आंतकवाद शब्द का जन्म, करोड़ों व अरबों के घोटाले, देश को कमज़ोर करना, इमरजेंसी स्टॉक 40 से 7 दिन करना, सेना को गोला बारूद ना देना, बुलेट प्रूफ जैकेट्स न देना, लड़ाकू विमान न खरीदना, कश्मीर से हिन्दू पंडितों से निकालना, 26/ 11 के लिए पाकिस्तान पर एक्शन के लिए मना करना, चीन के अम्बेसडर से मिलना व बाद में इनकार करना, सबूत देने पर सफाई देना, डिफॉल्टर्स को बैंक्स के मना करने के बावजूद अरबों रुपए के लोन देने, अब लंदन कोर्ट की मोहर से जग जाहिर।

विशेष – संसद में हमले के दिन भी सोनिया-राहुल गांधी संसद नहीं गए थे।

*कम से कम पांच ग्रुप मैं जरूर भेजे*
*कुछ लोग नही भेजेंगे*
*लेकिन मुझे यकीन है आप जरूर भेजेंगे*