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एक सुबह एक सज्जन मुझसे मिलने आए, झुककर चरण स्पर्श किया और पूछा, ‘सर, मुझे पहचाने?’
‘नहीं, याद नहीं आ रहा है, आप बताइए.’ मैंने कहा.
‘मैं संजय हूँ, संजय पाटिल. आपने मुझे २३ वर्ष पूर्व हिरमी के एल एंड टी सीमेंट संयंत्र में प्रशिक्षण दिया था.’
‘अरे वाह, बहुत ख़ुशी हो रही है मुझे आपसे मिलकर.’ मैंने मुदित भाव से कहा.

उसके बाद प्रशिक्षण की बातें चली, उन्होंने मुझे वे उद्धरण सुनाए जो मुझे खुद याद नहीं रह गए हैं कि मैंने वे बातें कभी की थी.
संजय ने बताया, ‘मैं दसवीं पास हूँ और मेरी पत्नी ग्यारहवीं. मेरी नौकरी एल एंड टी सीमेंट संयंत्र में श्रमिक (लेबर) के रूप में लगी. वहां नौकरी करते-करते मैं मेकेनिक बन गया. मेरे दो बच्चे हैं, एक लड़की नेहा और एक लड़का लोकेश. दोनों नर्सरी से लेकर दसवीं तक हिरमी में संयंत्र के स्कूल में पढ़े. उसके बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और मुंबई से प्राइवेट काम करने लग गया. भारत के लगभग सभी संयंत्रों में मुझे सलाह देने के लिए बुलाया जाता है जब क्रेन, बुलडोजर काम नहीं करते तो लिफ्टिंग का काम कैसे होगा मैं बताता हूँ. अपने काम में व्यस्त रहने और देश भर में दौरों के कारण मैं अपने परिवार को बहुत कम समय दे पाता हूँ.

एक दिन पत्नी का फोन आया, “नेहा तो पढ़ने में तेज है लेकिन लोकेश पढ़ाई में बिलकुल ध्यान नहीं देता. उसका ध्यान बस दौड़ में लगा रहता है. जितनी मेहनत वह दौड़ने में करता है उतनी मेहनत पढ़ाई में करे तो बारहवीं पास कर लेगा, नहीं तो फेल होना तय है.” मैंने कहा कि घर पहुँच कर उससे बात करूंगा.
जब मैं घर पहुंचा तो उससे बात की. उसने बताया कि उसे पढ़ाई पसंद नहीं है, दौड़ना पसंद है.’ ‘फिर क्या हुआ?’ मैंने पूछा.
‘मुझे प्रशिक्षण कार्यक्रम में आपकी कही गई बात याद आई जिसमें आपने आपने पुत्र को संन्यास का रास्ता चुनने की अनुमति दी थी और यह कहा था, “इंसान जो करना चाहता है, उसे करने देना चाहिए क्योंकि यदि वह अपनी रूचि के अनुसार काम करता है तो उसका रिजल्ट अच्छा आता है.”
मैंने उसे दौड़ में अधिक ध्यान देने की बात कही और यह भी कहा “यदि तुम बारहवीं में सभी विषय में फेल होते हो तो मैं पूरी बिल्डिंग के लोगों को डिनर दूंगा.”
उसके बाद लोकेश ने दौड़ पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया और ४२ किलोमीटर की मेराथन दौड़ में भाग लेने वाला देश का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी घोषित हुआ. टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे अखबार में उसकी फोटो के साथ समाचार प्रकाशित हुआ. इस समय वह दक्षिण अफ्रीका गया हुआ है ९० किलोमीटर की मेराथन दौड़ में भाग लेने के लिए. वह अभी २० वर्ष का है और उसने इस उम्र में मुंबई में एक अकादमी शुरू की है जिसका नाम है, “गेट फिट विद पाटिल”. मेरी बेटी नेहा अभी अमेरिका में पढ़ाई की और वहीं रह रही है.
मेरे दोनों बच्चे आपकी सलाह पर इतनी तरक्की किए जबकि हम दोनों कितना कम पढ़े-लिखे हैं.’

सम्प्रेषण में दो छोर होते हैं, एक छोर पर सन्देश देने वाला अर्थात वक्ता और दूसरे छोर पर सन्देश ग्रहण करने वाला अर्थात श्रोता. सन्देश एक तरफ से चला, दूसरी तरफ पहुंचा, उसके बाद यह जानना जरूरी होता है कि सन्देश कितना पहुंचा और उसका श्रोता पर क्या प्रभाव पड़ा? इसे ‘फीडबेक’ कहते हैं. हम प्रशिक्षक प्रशिक्षण तो देते हैं लेकिन यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि हमने जो बताया उसका असर क्या हुआ?
संजय पाटिल ने २३ वर्ष पुरानी बात के असर को बताकर प्रशिक्षण का मान बढ़ाया.

(लिखी जा रही पुस्तक ‘याद न जाए बीते दिनों की’ का अंश)

**प्रस्तुत फोटो में संजय पाटिल जब ‘लेबर’ के रूप में एल एंड टी में कार्यरत थे और दूसरा फोटो मैं उनके साथ.

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तीन, कॉलेज के लड़के छुट्टियों में घर आए और मज़े के लिए पड़ोसी के कुत्ते को बीबी गन से निशाना बनाया। उन्होंने उसे 40 से भी ज़्यादा बार गोली मारी। लेकिन उन्हें सज़ा के तौर पर सिर्फ़ जुर्माना और थोड़ी-सी कम्युनिटी सर्विस मिली।

कुत्ते का मालिक ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाया। गुस्से में वह उनके घर पहुँचा और बोला –
“कुत्ते पर हाथ उठाना आसान है, अब अपने बराबर के इंसान से लड़ो।”

लड़कों को नहीं पता था कि वह आदमी जूजुत्सु में ब्लैक बेल्ट है। देखते ही देखते उसने तीनों को बुरी तरह से धूल चटा दी। जब तक पुलिस पहुँची, तीनों लड़के लहूलुहान और टूटे-फूटे पड़े थे। आदमी को पुलिस ने हथकड़ी लगाकर ले जाया, लेकिन उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।

अब उस आदमी को 30 दिन की जेल होगी। उसका कुत्ता उसकी माँ के घर पर धीरे-धीरे ठीक हो रहा है।
जब उससे पूछा गया कि उसने ऐसा क्यों किया, तो उसने सिर्फ़ इतना कहा –
“बच्चों को समझना चाहिए कि हर काम का नतीजा होता है।”

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मैंने सुना है, सिकंदर जब हिंदुस्तान आता था, तो रास्ते में एक फकीर से मिल लिया था। एक फकीर था डायोजनीज। एक नंगा फकीर। गांव के किनारे पड़ा रहता था। खबर की थी किसी ने सिकंदर को, कि रास्ते में जाते हुए एक अदभुत फकीर है डायोजनीज उससे मिल लेना।

सिकंदर मिलने गया है। फकीर लेटा है नंगा। सुबह सर्द आकाश के नीचे। धूप पड़ रही है, सूरज की धूप ले रहा है। सिकंदर खड़ा हो गया है, सिकंदर की छाया पड़ने लगी है। डायोजनीज पर। सिकंदर ने कहा कि शायद आप जानते न हों, मैं हूं महान सिकंदर, अलक्जंडर द ग्रेट।

आपसे मिलने आया हूं। उस फकीर ने जोर से हंसा। और उसने अपने कुत्ते को, जो कि अंदर माद में बैठा हुआ था, उसको जोर से बुलाया कि इधर आ। सुन, एक आदमी आया है, जो अपने मुंह से अपने को महान कहता है। कुत्ते भी ऐसी भूल नहीं कर सकते।

सिकंदर तो चौंक गया। सिकंदर से कोई ऐसी बात कहे, नंगा आदमी, जिसके पास एक वस्त्र भी नहीं है। एक छुरा भोंक दो, तो कपड़ा भी नहीं है, जो बीच में आड़ बन जाए।

सिकंदर का हाथ तो तलवार पर चला गया। उस डायोजनीज ने कहा, तलवार अपनी जगह रहने दे, बेकार मेहनत मत कर। क्योंकि तलवारें उनके लिए है जो मरने से डरते हैं। हम पार हो चुके हैं उस जगह से, जहां मरना हो सकता है। हमने वे सपने छोड़ दिए जिनसे मौत पैदा होती है। हम मर चुके, उन सपनों के प्रति। अब हम वहां हैं, जहां मौत नहीं।

तलवार भीतर रहने दे। बेकार मेहनत मत कर। सिकंदर से कोई ऐसा कहेगा। और सिकंदर इतना बहादुर आदमी, उसकी तलवार भी भीतर चली गई। ऐसे आदमी के सामने तलवार बेमानी है। और ऐसे आदमी के सामने तलवार रखे हुए लोग खिलौनों से खेलते हुए बच्चों से ज्यादा नहीं हैं।

सिकंदर ने कहा, फिर भी मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं?

डायोजनीज ने कहा, क्या कर सकते हो? तुम क्या कर सकोगे। इतना ही कर सकते हो कि थोड़ा जगह छोड़ कर खड़े हो जाओ, धूप पड़ती थी मेरे ऊपर, आड़ बन गए हो। और ध्यान रखना किसी की धूप में कभी आड़ मत बनना।

सिकंदर ने कहा कि जाता हूं, लेकिन एक ऐसे आदमी से मिल कर जा रहा हूं, जिसके सामने छोटा पड़ गया। और लगा कि जैसे पहली दफा ऊंट पहाड़ के पास आ गया हो। अब तक बहुत आदमी देखे थे, बड़े से बड़ी शान के आदमी देखे थे। झुका दिए थे। लेकिन एक आदमी के सामने…अगर भगवान ने फिर जिंदगी दी, तो अब की बार कहूंगा कि डायोजनीज बना दो।

डायोजनीज ने कहा, और यह भी सुन ले कि अगर भगवान हाथ-पैर जोड़े मेरे और मेरे पैरों पर सिर रख दे और कहे कि सिकंदर बन जा। तो मैं कहूंगा कि इससे तो ना बनना अच्छा है। पागल हूं कोई, सिकंदर बनूं।

पूछता हूं जाने के पहले, कि इतनी दौड़-धूप, इतना शोरगुल, इतनी फौज-फांऽटा लेकर कहां जा रहे हो। सिकंदर ने कहा कि अहा, रौनक छा गई, चेहरा खुश हो गया। कहा, पूछते हैं। इस जमाने को जीतने जा रहा हूं।
डायोजनीज बोला फिर, फिर क्या करेंगे?

फिर हिंदुस्तान जीतूंगा!
और फिर?
और फिर चीन जीतूंगा!
और फिर?
फिर सारी दुनिया जीतूंगा!
और डायोजनीज ने पूछा, आखिरी सवाल और, फिर क्या करने के इरादे हैं?

सिकंदर ने कहा, उतने दूर तक नहीं सोचा है, लेकिन आप पूछते हैं, तो मैं सोचता हूं कि फिर आराम करूंगा।

डायोजनीज कहने लगा, ओ कुत्ते फिर वापस आ। यह कैसा पागल आदमी है, हम बिना दुनिया को जीते आराम कर रहे हैं, यह कहता है हम दुनिया जीतेंगे फिर आराम करेंगे। हमारा कुत्ता भी आराम कर रहा है, हम भी आराम कर रहे हैं। तुम्हारा दिमाग खराब है, आराम करना है न आखिर में?

सिकंदर ने कहा, आराम ही करना चाहते हैं।
तो उसने कहा, दुनिया कहां तुम्हारे आराम को खराब कर रही है। आओ हमारे झोपड़े में काफी जगह है, दो भी समा सकते हैं।

गरीब का झोपड़ा हमेशा अमीर के महल से बड़ा है। अमीर के महल में एक ही मुश्किल से समा पाता है। और बड़ा महल चाहिए, और बड़ा महल चाहिए। एक ही नहीं समा पाता, वही नहीं समा पाता। गरीब के झोपड़े में बहुत समा सकते हैं। गरीब का झोपड़ा बहुत बड़ा है।

वह फकीर कहने लगा, बहुत बड़ा है, दो बन जाएंगे, आराम से बन जाएंगे। तुम आ जाओ, कहां परेशान होते हो।

सिकंदर ने कहा, तुम्हारा निमंत्रण मन को आकर्षित करता है। तुम्हारी हिम्मत, तुम्हारी शान–तुम्हारी बात जंचती है मन को। लेकिन आधी यात्रा पर निकल चुका। आधी से कैसे वापस लौट आऊं। जल्दी, जल्दी वापस आ जाऊंगा।

डायोजनीज ने कहा, तुम्हारी मर्जी लेकिन मैंने बहुत लोगों को यात्राओं पर जाते देखा, कोई वापस नहीं लौटता। और गलत यात्राओं से कभी कोई वापस लौटता है। और जब होश आ जाए, तभी अगर वापस नहीं लौट सकते तो फिर मतलब यह हुआ कि होश नहीं आया।

एक आदमी कुएं में गिरने जा रहा हो। रास्ता गलत हो और आगे कुआं हो, उसे पता भी न हो। कोई कहे कि अब मत जाओ, आगे कुआं है। वह कहे, अब तो हम आधे आ चुके, अब कैसे रुक सकते हैं। वह नहीं लौट आएगा तत्क्षण।

एक आदमी सांप के पास जा रहा हो, और कोई कहे कि मत जाओ, अंधेरे में सांप बैठा है। वह आदमी कहे कि हम दस कदम चल चुके हैं, अब हम पीछे कैसे वापस लौट सकते हैं?

और फिर वह डायोजनीज कहने लगा कि सिकंदर सपने बड़े होते हैं, आदमी की जिंदगी छोटी होती है। जिंदगी चुक जाती है, सपने पूरे नहीं होते। फिर तुम्हारी मर्जी। खैर, कभी भी तुम आओ, हमारा घर खुला रहेगा। इसमें कोई दरवाजा वगैरह नहीं है। अगर हम सोए भी हों, तो तुम आ जाना और विश्राम कर लेना।

या अगर हमें ना भी पाओ, क्योंकि कोई भरोसा नहीं कल का। आज सुबह सूरज उगा है, कल न भी उगे। हम न हो, तो भी झोपड़े पर हमारी कोई मालकियत नहीं है। तुम आ जाओ, तो तुम ठहरना। झोपड़ा रहेगा।

सिकंदर को ऐसा कभी लगा होगा। असल में जो लोग सपने देखते हैं, अगर वह सच देखने वाले आदमी के पास पहुंच जाएं, तो बहुत कठिनाई होती है। क्योंकि दोनों की भाषाएं अलग हैं।

अब सिकंदर लेकिन बेचैन हो गया होगा। वापस लौटता था, हिंदुस्तान से तो बीच में मर गया, लौट नहीं पाया। असल में, अंधी यात्राएं कभी पूरी नहीं होती, आदमी पूरा हो जाता है। और सच तो यह है कि न मालूम कितने-कितने जन्मों से हमने अंधी यात्राएं की हैं।

हम पूरे होते गए हैं बार-बार। और फिर उन्हीं अधूरे सपनों को फिर से शुरू कर देते हैं। अगर एक आदमी को एक बार पता चल जाए कि उसने पिछली जिंदगी में किया था, तो यह जिंदगी उसकी आज ही ठप्प हो जाए।

क्योंकि यही सब उसने पहले भी किया था। यही नासमझियां, यही दुश्मनियां, यही दोस्तियां, यही दंभ, यही यश, यही पद, यही दौड़। न मालूम कितनी बार एक-एक आदमी कर चुका है। इसलिए प्रकृति ने व्यवस्था की है कि पिछले जन्म को भुला देती है। ताकि आप फिर उसी चक्कर में सम्मिलित हो सकें, जिसमें आप कई बार हो चुके हैं।

अगर पता चल जाए कि यह चक्कर तो बहुत बार हुआ है। यह सब तो मैंने बहुत बार किया है। तो फिर एकदम सब व्यर्थ हो जाएगा।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

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कर्ण ही पूर्वजन्म में दंभोद्भवा नामक असुर थे।

महाभारत ऐसी छोटी-छोटी कथाओं का समूह भी है जो हमें आश्चर्यचकित कर देती है। जी सुंदरता के साथ वेदव्यास ने सहस्त्रों छोटी-छोटी घटनाओं को एक साथ पिरोया है वो निश्चय ही अद्वितीय है।

ऐसी ही एक कथा दंबोधव दानव की है जो सीधे तौर पर कर्ण से जुडी है और अर्जुन एवं श्रीकृष्ण भी उसका हिस्सा हैं। ये कथा वास्तव में कर्ण के पूर्वजन्म की कथा है जिसके कारण उसे अगले जन्म में भी इतना दुःख भोगना पड़ा।

ये कथा महाभारत से बहुत पहले, रामायण से भी बहुत पहले, त्रेतायुग की है। दंबोधव नाम का एक प्रतापी असुर था जिसने भगवान सूर्यनारायण की १००० वर्षों तक तपस्या की।

उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे दर्शन दिए और वर माँगने को कहा। वर में उसने अमरत्व का वरदान माँगा जिस पर सूर्यदेव ने उसे कहा कि “भक्त! अमरत्व का वरदान देना संभव नहीं है क्यूँकि सृष्टि के नियम के रचयिता स्वयं परमपिता ब्रह्मा भी अपने विधान को नहीं बदलते।

तब उस दानव ने बहुत सोच कर कहा – “हे देव! अगर ऐसा है तो मैंने सहस्त्र वर्षों तक आपकी तपस्या की है इसी कारण मुझे प्रत्येक वर्ष के लिए एक दिव्य कवच प्रदान करें।

उन १००० कवचों में मैं पूर्णतः सुरक्षित रहूँ। प्रत्येक कवच को केवल एक मानव ही नष्ट कर सके और वो भी वही जिसने मेरी तरह १००० वर्षों तक तप किया हो। साथ ही जैसे ही वो मेरा कवच तोड़े, वो तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाये।

वर्षों तक दोनों का युद्ध चलता रहा। उधर जैसे ही नारायण ने अपनी तपस्या के १००० वर्ष पूरे किये, नर ने दंबोधव का एक कवच तोड़ डाला। कवच टूटते ही वरदान के कारण नर की मृत्यु हो गयी। दंबोधव प्रसन्न हुआ कि एक कवच भले ही नष्ट हो गया किन्तु उसका शत्रु भी नष्ट हो गया। वो विजयनाद करते हुए अपने नगर लौट गया।

उधर नारायण की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे दर्शन दिए। नारायण ने वर के रूप में उनसे “मृतसञ्जीवनी” माँगी, जिसे महादेव ने उन्हें प्रदान किया।

वो विद्या लेकर नारायण तत्काल नर के मृत शरीर के पास पहुँचा और उसे जीवित कर दिया। अब नर तपस्या को गया और नारायण ने दंबोधव को ललकारा।

दोनों के रूप-गुण में कोई भेद ना था इसी कारण दंबोधव को लगा कि नर लौट आया है। दोनों में पुनः युद्ध प्रारम्भ हुआ और जैसे ही नर ने १००० वर्षों की तपस्या पूर्ण की, नारायण ने दंबोधव का एक और कवच तोड़ डाला।

कवच टूटते ही नारायण मृत हो गए किन्तु नर ने नारायण को मृतसञ्जीवनी विद्या से जीवित कर दिया। अब फिर नारायण तप को गए और नर ने दंबोधव को पुनः युद्ध के लिए ललकारा। ये क्रम चलता ही रहा और तबतक चलता रहा जबतक उस असुर के ९९९ कवच नष्ट नहीं हो गए।

जब अंतिम कवच शेष रहा तो दंबोधव भयभीत हो सूर्यदेव की शरण में चला गया जिन्होंने उसे अपने तेज का एक भाग बना कर स्वयं में समा लिया।

उधर तपस्या पूर्ण कर नर और नारायण उसे ढूँढ़ते हुए सूर्यदेव के पास पहुँचे और उनसे कहा कि वे दंबोधव को उनके सुपुर्द कर दें। किन्तु शरणागत की रक्षा करने के लिए सूर्यदेव ने ऐसा नहीं किया।

तब नर-नारायण ने सूर्यदेव की भर्त्सना करते हुए कहा – “हे सूर्यदेव! आपने ही अविवेक के कारण इस असुर को ऐसा वरदान दिया जिससे पृथ्वी त्रस्त हो गयी। आपके वरदान के कारण हम दोनों भाई ९९९ बार मृत्यु का कष्ट भोग चुके हैं।

ये जानते हुए कि इसका वध अनिवार्य है, आप इसकी रक्षा कर रहे हैं। अतः अब आपको भी इसका दंड भोगना पड़ेगा। जाइये हम आपको श्राप देते हैं कि इस असुर को अगला जन्म आपके ही तेज से मिलेगा और इसे जीवन भर संघर्ष करना होगा। यही नहीं, अगले जन्म में भी इसके वध के लिए हम दोनों भाई पुनः जन्म लेंगे।

नर और नारायण के श्राप के कारण ही दंबोधव द्वापर युग में सूर्यदेव के तेज के साथ उसी एक बचे हुए कवच के साथ कर्ण के रूप में जन्मा।

द्वापर में नर और नारायण अर्जुन एवं कृष्ण के रूप में जन्मे जिनके कारण अंततः कर्ण मृत्यु को प्राप्त हुआ। सूर्य एवं और के मेल के कारण जहाँ कर्ण में सूर्यदेव का तेज और अतुल बल था, वही असुर दंबोधव के प्रभाव से उसने धर्म का मार्ग त्याग कर अधर्म का मार्ग चुना और अंत में उसका पतन हुआ।

कर्ण के पूर्वजन्म के विषय में एक और विवरण पद्मपुराण में मिलता है जहाँ उसका जन्म ब्रह्मा के अंश से हुआ  जिसका नाम स्वेदजा हुआ। उसे नारायण के अंश से जन्मे नर से युद्ध करना पड़ा जिसका नाम रक्त्जा था।

अब तक हमने पढ़ा महारथी कर्ण के पिछले जन्म “दंबोधव” के बारे में पढ़ा। इससे हमें ये जानने को मिलता है कि इन दोनों के बीच की प्रतिस्पर्धा कितनी पुरानी है। जिन्हे दंबोधव के बारे में पता नहीं था उसके लिए ये कथा सुनना वास्तव में आश्चर्यजनक है।

किन्तु उससे भी अधिक आश्चर्यजनक कथा हमें पद्मपुराण में मिलती है जिसमे इन दोनों की प्रतिदंद्विता का विवरण है जो सीधे त्रिदेवों से सम्बंधित है।

कथा उस समय की है जब परमपिता ब्रह्मा पंचमुखी थे। उनके चार मुख चारों वेदों का पाठ करते थे किन्तु उर्ध्वमुखी पाँचवा मुख सदैव महादेव की निंदा करता था।

इससे रुष्ट होकर महादेव ने ब्रह्मदेव से युद्ध किया और उनका वो पाँचवा मुख काट दिया। ब्रह्मदेव युद्ध से अत्यंत श्रमित थे और अपना पाँचवा मुख काटने पर अत्यंत क्रोधित भी। उसी क्रोध एवं श्रम के कारण उनके शरीर के पसीने से एक अत्यंत भयानक दैत्य ने जन्म लिया।

ब्रह्मदेव से उत्पन्न होने के कारण उसका तेज और बल असाधारण था और साथ ही परमपिता के प्रताप से उसे जन्मजात १००० दिव्य कवच प्राप्त हुए। उसने ब्रह्मदेव को प्रणाम किया और उनसे पूछा कि वो कौन है और उसकी उत्पत्ति क्यों हुई है।

तब ब्रह्मदेव ने अपने पसीने (स्वेद) से जन्मे उस असुर का नाम “स्वेदजा” रखा और महादेव से हुए अपमान के कारण उन्होंने उसे भगवान रूद्र से युद्ध करने के लिए कैलाश की ओर जाने की आज्ञा दी। अपने पिता की आज्ञा पाकर स्वेदजा भयानक अट्टहास करता हुआ कैलाश की ओर चला।

उधर कैलाश में भगवान शिव समाधि में जाने वाले थे कि उनके गणों ने उन्हें बताया कि स्वेदजा उनसे युद्ध करने को कैलाश आ रहा है। उन्होंने स्वेदजा के भयानक रूप और बल की भी चर्चा की और महारुद्र से प्रार्थना की कि वे उस महान असुर का वध करें। तब महादेव ने भगवान विष्णु से इसका उपाय खोजने को कहा और स्वयं समाधि में चले गए।

जब श्रीहरि ने स्वेदजा का रौद्र रूप देखा हो उन्होंने अपने खून से एक अन्य असुर की उत्पत्ति की और उसका नाम “रक्त्जा” (रक्त से जन्मा) रखा। रक्त्जा नारायण की शक्ति से जन्मा था और युद्ध कौशल में उन्ही के समान था।

नारायण के आशीर्वाद से उसके १००० हाथ थे और वो ५०० दिव्य धनुषों का स्वामी था। उसने नारायण से पूछा कि उसका जन्म क्यों हुआ है?

तब नारायण ने उसे बताया कि क्रोधवश ब्रह्मदेव ने स्वेदजा नामक एक असुर की उत्पत्ति की है जो महादेव से युद्ध की मूर्खता करने जा रहा है।

वो महाकाल को तो कोई क्षति नहीं पहुंचा सकता किन्तु इससे ब्रह्मा और महादेव में वैमनस्य बढ़ेगा, अतः वो जाये और स्वेदजा को रोके।

नारायण की आज्ञा पाते ही रक्त्जा ने तत्काल कैलाश की ओर जाते हुए स्वेदजा को रोका और उसे युद्ध के लिए ललकारा।

तब उन दोनों असुरों में भयानक युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों ब्रह्मदेव और विष्णुदेव के अंश से जन्मे थे और अतुल बलशाली थे। दोनों के बीच वो युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा।

उस युद्ध में रक्त्जा ने स्वेदजा के ९९९ कवच तोड़ डाले, वहीँ स्वेदजा ने रक्त्जा के ९९८ हाथ काट डाले और ५०० धनुषों का नाश कर दिया। अब रक्तजा के पास को अस्त्र-शस्त्र शेष नहीं था,

किन्तु स्वेदजा के पास उसका एक दिव्य कवच अभी भी बाँकी था। नारायण समझ गए कि उस युद्ध में रक्त्जा स्वेदजा से पराजित हो जाएगा। ये जानकर उन्होंने बीच-बचाव किया और ब्रह्मदेव को समझा-बुझा कर उस युद्ध को रुकवाया।

रक्त्जा को उस युद्ध में स्वेदजा को पराजित ना कर पाने का क्षोभ हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि अगले जन्म में वो अवश्य ही स्वेदजा को पराजित करेगा।

रक्त्जा की इस कामना को देखकर श्रीहरि विष्णु ने उसे आशीर्वाद दिया कि अगले जन्म में रक्त्जा की सहायता के लिए वे भी अवतार लेंगे।

जब तक उन दोनों का युद्ध समाप्त हुआ, भगवान शिव की समाधि भी टूटी। वे वहाँ आये और स्वेदजा और रक्त्जा के पराक्रम को देख कर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने दोनों को ब्रह्मदेव एवं नारायण से माँग लिया और फिर सूर्यनारायण को स्वेदजा और देवराज इंद्र को रक्त्जा के संरक्षण का दायित्व सौंपा।

समय आने पर सूर्यदेव के तेज से स्वेदजा कर्ण और इंद्रदेव के तेज से रक्त्जा अर्जुन के रूप में जन्मे। उसी युग में नारायण श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए। कर्ण अपने बचे हुए उस एक कवच के साथ ही जन्मा किन्तु श्रीकृष्ण और देवराज इंद्र के छल के कारण उसे अपना कवच दान करना पड़ा और अर्जुन ने अपने पूर्वजन्म की प्रतिज्ञा के कारण अंततः कर्ण को पराजित किया और उसका वध किया।

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2 એપ્રિલ, 1954 ના રોજ, લોસ એન્જલસ ટાઇમ્સના ફોટોગ્રાફર જોન ગૌન્ટ કેલિફોર્નિયાના હર્મોસા બીચ પર તેમના ઘરે હતા, ત્યારે તેમણે એક દંપતીને કિનારા પાસે ઉભેલા જોયું. તે ખૂબ જ ટેન્શન માં હતા,  ગૌન્ટે, કંઈક અસામાન્ય લાગતા, તેનો કેમેરો પકડ્યો અને તેની બાલ્કનીમાંથી એક જ ફોટોગ્રાફ લીધો.

જોન અને લિલિયન મેકડોનાલ્ડનો 19 મહિનાનો પુત્ર, માઇકલ, બીચના કિનારા પર ગાયબ થઈ ગયો હતો. લિલિયને પોલીસને જણાવ્યું કે માઇકલ પરિવારના આંગણામાંથી ગાયબ  ગયો હતો, જેના કારણે તેણીએ અધિકારીઓને ફોન કર્યો. ઝડપથી શોધખોળ શરૂ કરવામાં આવી.

શોધ દરમિયાન, બેવર્લી મર્ડોક નામની એક મહિલા પોલીસ સ્ટેશનમાં દોડી ગઈ અને જાણ કરી કે તેણે સમુદ્રમાં સીવીડના ટુકડામાં એક બાળક તરતું જોયું છે. તેણીએ જે કપડાં વર્ણવ્યા હતા તે માઇકલના પહેરેલા પોશાક સાથે મેળ ખાતા હતા.

બીચ પર, જોન મેકડોનાલ્ડ પાણીમાં પ્રવેશવા માટે ઉતાવળમાં આગળ પાછળ દોડી ગયો, જ્યારે લિલિયન તેને રોકવાનો પ્રયાસ કર્યો. શોધ પ્રયાસો છતાં, તે દિવસે માઇકલ મળ્યો ન હતો, અને રાત પડતાં, શોધ બંધ કરવામાં આવી.  જોન અને લિલિયને કિનારા છોડવાનો ઇનકાર કર્યો, અંધારા પછી પણ ત્યાં જ રહ્યા, જ્યારે અંધારાથી શોધ ચાલુ રાખવી અશક્ય બની ગઈ.

ગાઉન્ટે લીધેલો ફોટોગ્રાફ, જેને પાછળથી ટ્રેજેડી બાય ધ સી નામ આપવામાં આવ્યું, તે બીજા દિવસે લોસ એન્જલસ ટાઇમ્સમાં પ્રકાશિત થયો, જે નુકસાન અને નાજુકતાનું ,ટેન્શન નું પ્રતીક બની ગયો.

દસ દિવસ પછી માઈકલનો મૃતદેહ મળી આવ્યો. ગાઉન્ટના ફોટોગ્રાફને ફોટોગ્રાફી માટે 1955નો પુલિત્ઝર પુરસ્કાર મળ્યો, જેની કરુણતા અને સંયમ માટે પ્રશંસા કરવામાં આવી.

દાયકાઓ પછી, તે ફિલ્મમાં કેદ કરાયેલા વ્યક્તિગત દુઃખના સૌથી ભયાનક ચિત્રોમાંનું એક છે. 🥺

Posted in गणेश देवा

🙏🎊 गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं 🎊🙏

आप भागलपुर संग्रहालय जाएं तो लगभग 4 फीट लंबे गणेश की प्रतिमा का केवल सिर का खंड सबसे पहले बरामदे पर बाहर ही नजर आएगा। ये मन्दार पर्वत से उठाकर ले जाए गए हैं। ये संख्या में दो हैं जो सम्पूर्ण विशाल प्रतिमा का हिस्सा हैं। प्रतिमा विज्ञान के अनुसार केवल सिर सम्पूर्ण शरीर के आकार का 8वां हिस्सा होता है। तो समझा जा सकता है कि प्रस्तर की वह प्रतिमा जब मन्दार पर सम्पूर्ण अवस्था में रही होगी तो कितनी विशाल होगी! क्या सौंदर्य रहा होगा उसका!! (इसकी छवि कमेंट में है।)

नीचे संलग्न प्रतिमा मंदार पर्वत पर है। यह प्रतिमा गुप्तकाल से पहले की है। यहां गुप्तकाल की भी एक अन्य प्रतिमा है। वैसे, इस प्रतिमा की कथा एक दंपति; ऋषि धौम्य के पुत्र #मंदार और ऋषि औरव की पुत्री #शमी से जुड़ी है, जब वे ऋषि भुशुंडी से शापित हो गए थे तो इन्हीं गणेश की कृपा से वे शापमुक्त हुए। कहा गया है कि इनके दर्शन के बाद ही पर्वत पर आरोहण करना फलदायी है।

आजकल तो, रोप-वे से “यूँ गया; यूँ आया, देखा सबकुछ पर कुछ न भाया” हो गया है। आप अगर कभी मन्दार पर्वत पर चढ़ें तो इस मूर्ति का दर्शन अवश्य करें। यह गणपति आम्र वृक्ष के नीचे बैठे हैं। कहा गया है कि किन्हीं की बड़ी आकांक्षा पूरी होती है तो इन्हीं गणपति की मूर्ति स्थापित कराते हैं। यानी, यह गणपति असंभव वैभव के प्रदाता हैं। किन्तु, पुरुषार्थ तो आवश्यक है। अतएव, आइये हम भी अपना पुरुषार्थ करें।

(लाइक और कमेंट वाला पुरुषार्थ; केवल नहीं 😜🙆😝🙋🤣)

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अमिताभ बच्चन का बंगला मुंबई के जुहू स्थित तारा रोड पर स्थित है – यह एक बड़ा बंगला है।

अमिताभ बच्चन के बंगले के बाद, यहाँ सिर्फ़ 2-3 बड़े उद्योगपतियों के बंगले हैं।

उस रोड पर एक भव्य बंगला है। उस बंगले का नाम “निरंतर” है।

यह बंगला अमिताभ बच्चन के बंगले से तीन गुना बड़ा है। इस बंगले में लगभग 3 एकड़ का लॉन है और यह बेहद आलीशान है।

मुंबई के जुहू जैसे संभ्रांत इलाके में इतना आलीशान बंगला है, यह सुनकर कोई भी हैरान हो जाएगा!

लेकिन यह बंगला किसी सुपरस्टार या उद्योगपति का नहीं है।

क्या आप जानते हैं कि इस बंगले का मालिक कौन है?

*तिस्ता जावेद सीतलवाड़* – सिर्फ़ एक सामाजिक कार्यकर्ता!

2004 से 2012 के बीच, उन्हें विदेशों से करोड़ों डॉलर का फंड मिला।

किसलिए?

गरीबों के उत्थान के लिए?

लेकिन एक बात और है…

ये लोग इतने भारत विरोधी क्यों हैं?

उनके पूर्वजों ने यह बीज बोया था।

हंटर आयोग – यह वह जाँच समिति थी जिसने जनरल डायर को क्लीन चिट दी थी। वही डायर जिसने जलियाँवाला बाग हत्याकांड में गोलीबारी का आदेश दिया था।

इस आयोग के सदस्य हरिलाल चिमनलाल सीतलवाड़, यानी तीस्ता सीतलवाड़ के परदादा थे।

यह हरिलाल के पुत्र – मोतीलाल चिमनलाल सीतलवाड़, यानी तीस्ता के दादा – थे जिन्होंने जनरल डायर को बरी किया था।

स्वतंत्रता के बाद, पंडित नेहरू ने इन्हीं मोतीलाल सीतलवाड़ को भारत का अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया।

यह नेहरू की अंग्रेजों के प्रति निष्ठा का जीता जागता प्रमाण है।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती…

जब जनरल डायर पर मुकदमा चल रहा था, तब दीवान बहादुर कुंज बिहारी थापर ने अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी दिखाते हुए जनरल डायर के लिए डेढ़ लाख रुपये इकट्ठा किए और उन्हें कृपाण और पगड़ी पहनाकर सम्मानित भी किया।

यही कुंज बिहारी थापर हैं – *करण थापर* के परदादा।

थापर परिवार ब्रिटिश काल में, खासकर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, सैनिकों और सामग्री की आपूर्ति करके अमीर बना।

आज, जब थापर परिवार अपनी वफ़ादारी दिखाता है, तो यह आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए कि कृपाण और पगड़ी कहाँ से आई।

यह सब स्वर्ण मंदिर के प्रबंधन में हुआ, जहाँ *सुजान सिंह* और *शोभा सिंह* नाम के दो ठेकेदार मुख्य ठेकेदार थे।

जब अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की, तो इन दोनों ने सभी निर्माण ठेके संभाले।

शोभा सिंह के पुत्र *खुशवंत सिंह* एक प्रसिद्ध लेखक और इंदिरा गांधी के समर्थक थे। उन्होंने आपातकाल के पक्ष में लेख लिखे।

खुशवंत सिंह के पुत्र – *राहुल सिंह* – एनडीटीवी पर तीस्ता सीतलवाड़ और अरुंधति रॉय जैसी हस्तियों का महिमामंडन करके भारत विरोधी विचारों को बढ़ावा देते रहते हैं।

थापर परिवार की बात करें तो…

करण थापर के पिता *प्राणनाथ थापर* 1962 के चीन युद्ध के कमांडर थे – एक ऐसा युद्ध जिसमें भारत हार गया था।

इससे पहले, जनरल के.एस. थिमय्या ने लेफ्टिनेंट जनरल एस.पी.पी. थोराट को अपना उत्तराधिकारी बनाने की सिफ़ारिश की थी।

लेकिन नेहरू ने उस सिफ़ारिश को अस्वीकार कर दिया और प्राणनाथ थापर को नियुक्त किया।
– ब्रिटिश विचारधारा का एक और उदाहरण।

इतना ही नहीं – प्राणनाथ थापर के भाई *मायादास थापर, बेटी* का नाम *रोमिला थापर* है, जिनके नाम पर भारतीय स्कूली इतिहास की किताबों का नाम रखा गया है।

यह नियुक्ति भी नेहरू ने ही की थी।

हैरानी की बात है कि 1962 के युद्ध में हारने वालों के नाम इन इतिहास की किताबों में नहीं मिलते।

सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ये किताबें उनकी भतीजियों ने लिखी थीं!

यह वही अमीर परिवार है – जो ब्रिटिश काल में रिश्वत लेकर अमीर बना था – आज भी भारत के इतिहास और पहचान पर कब्ज़ा जमाए हुए है।

ये वही लोग हैं जो खुद को प्रगति का एकाधिकार मानते हैं।

ये वही लोग हैं जो झूठ फैलाते हैं और भारत की असली पहचान को उभरने से रोकते हैं।

आज़ादी के बाद, नेहरू और कांग्रेस ने इन्हीं लोगों को महत्वपूर्ण पद देकर ब्रिटिश हितों का ध्यान रखा।

तीस्ता सीतलवाड़ जेल गईं, यह सिर्फ़ एक धोखेबाज़ का पतन नहीं था… बल्कि एक पूरी परजीवी व्यवस्था का पतन था – जिसकी जड़ें कई पीढ़ियों पहले जमी थीं।

आज भी, यह व्यवस्था भारतीय जनता का खून चूस रही है।
साभार

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Copy ❣️🙏Just Checking the Price સાચી કિંમત – આપણી સર્વિસ કે પ્રોડક્ટનું મુલ્યાંકન કોણ કરશે?

1991 માં સોફ્ટવેર ડેવલપમેન્ટના વ્યવસાયની શરૂઆત કરી અને પ્રથમ ક્લાયન્ટ એક આંખની હોસ્પિટલ હતી. પહેલું જ એસાઇનમેન્ટ હતું એટલે કોઈ કિંમત નક્કી નહોતી કરી.

શરૂઆતમાં ફ્રન્ટ ડેસ્ક અને એકાઉન્ટ મોડ્યુલ બનાવવાનું કામ પૂર્ણ કરીને હોસ્પિટલના સંચાલક કહે કે બિલ આપો, કેટલા થયા?

એ પ્રશ્નનો જવાબ આપતાં એક જ ક્ષણમાં અનેક વિચારો આવી ગયા. અને જણાવ્યું કે 6900/- થયા છે. અને પ્રીન્ટ કરેલ બિલ આપું એ પહેલાં કહે કે આ તો બાટા પ્રાઇસ રાખ્યો તમે. એક કામ કરો 7000/- લઇ જાવ.

અને બેગમાંથી 7000/- વાળું જ બીલ બહાર કાઢ્યું. ત્યારે જીવનનો પહેલો ઓર્ડર અને પહેલો પદાર્થ પાઠ શીખવા મળ્યો.

મને કહે કે તમારા કામના મુલ્યમાં બાંધછોડ ક્યારેય ન કરશો.

એ પછી એમણે મને એક બનાવ વિશે માહિતી આપી હતી એ પ્રસંગ પ્રસ્તુત છે

વ્યાજબી કિંમત અને કામના મુલ્યાંકન મુદ્દે નિર્ણાયકતા

આ વર્ષ 1900ના અરસાની વાત છે. ન્યુયોર્કમાં પ્રખ્યાત ઝવેરી ચાર્લ્સ લેવિસ ટિફની પાસે એક બેહદ કિંમતી અને સુંદર હીરો હાથમાં આવ્યો. એ સમયે એ હીરાથી જો કોઈ ઘરેણું કે વસ્તુ બનાવવામાં આવે તો સંભવિત ગ્રાહક કોણ બની શકે એ સંભાવના ચકાસતા હતા ત્યારે એક નામ એમના વિચારમાં ઉભરીને આવ્યું.

એ હતા જ્હોન પિઅરપોન્ટ મોર્ગન (જેપી મોર્ગન) એમને નેકટાઈ પિનનો બહુ શોખ હતો અને આ શોખને પાળી શકે એવી સમૃદ્ધિ અને સમજ પણ ધરાવતા હતા.

ચાર્લ્સ ટિફનીએ એ હીરાને જડીને એક બેહદ સુંદર ટાઈપિન તૈયાર કરી. એ ટાઈપિન શ્રી મોર્ગનની ઓફિસમાં એક વિશ્વાસુ વ્યક્તિ સાથે મોકલી. એ પિનને સુંદર અને આકર્ષક રીતે પેક કરી હતી. સાથે વ્યક્તિગત પત્ર‌ લખ્યો.

“પ્રિય શ્રી મોર્ગન, મારી માહિતી મુજબ, આપને નેકટાઈ પિન ખુબ પસંદ છે અને આપની પાસે આનું જબરદસ્ત કલેક્શન પણ છે. આપના આ કનેલેક્શન માટે અદભૂત કહી શકાય એવી આ ટાઈપિન મોકલી રહ્યો છું.

આપને સુક્ષ્મ કારીગરી, હિરાની કિંમત આ બન્ને પર ઘણી સમજ છે. આ હીરો એકદમ દુર્લભ ગણાય એવો છે. તો આ દુર્લભ ગણાય એવી ટાઈપિનની કિંમત $5,000 રાખી છે. આપને એક પ્રસ્તાવ રજૂ કરૂં છું કે જો આપને આ પિન પસંદ આવે અને તેને સ્વીકારવાનું નક્કી કરો, તો કૃપા કરીને, તમારા $5,000ના ચેક સાથે આવતીકાલે મારી ઓફિસમાં તમારા કોઈ વિશ્વાસુ વ્યક્તિ સાથે મોકલી આપશો, અને જો તમે તેને સ્વીકારવાનું પસંદ નથી કરતા,  તો તમે તમારા કોઈ વિશ્વાસુ વ્યક્તિ સાથે એ પિન પરત મોકલી શકો છો.”

બીજા દિવસે, મિસ્ટર મોર્ગનનો વ્યક્તિ એ જ બોક્સ અને કવર સાથે સાથે ટિફનીના શોરૂમ પર પહોંચ્યો. એ કવરમાં એક પત્ર હતો.

“પ્રિય શ્રી ટિફની, પિન ખરેખર ભવ્ય છે. જો કે, $5,000 મને થોડું વધારે જણાય છે. મારા મત મુજબ આ  $4,000 બરાબર છે. આ સાથે $4000 ચેક જોડાયેલ છે. જો તમને મારો નક્કી કરેલો ભાવ બરાબર લાગે તો ચેક સ્વીકારી બોક્સ પરત મોકલી આપશો. નહિતર ચેક પરત મોકલી બોક્સ સ્વિકારી લેશો.”

ટિફની માટે આ દુવિધાની પળ હતી. ગણતરીની ક્ષણોમાં નિર્ણય લેવાનો હતો.

ટિફનીએ થોડીવાર સુધી ચેક તરફ જોયું. $4,000 પણ બહુ મોટી રકમ હતી. પણ એ ખુદ માનતા હતા કે આ પિન માંગેલા $5,000 ની કિંમતની હતી. અંતે, તેણે મોર્ગનના વ્યક્તિને  કહ્યું: “તમે શ્રી મોર્ગનને ચેક પરત કરી શકો છો. મારી કિંમત ફિક્સ છે.” $4,000નો ચેક પાછો મોકલ્યો. ટિફનીને પોતાના મક્કમ નિર્ણય પર વિચારતાં વિચારતાં પિન બહાર કાઢવા માટે બોક્સ ખોલ્યું.

બોક્સ ખોલીને જોયું તો અંદર પિન ન હતી. એમાં મોર્ગન દ્વારા મોકલવામાં આવેલો $5,000 નો ચેક હતો.

અને માત્ર એક વાક્ય સાથેની નોંધ: “જસ્ટ ચેકીંગ ધ પ્રાઈસ”

ખુદની પ્રોડક્ટના મુલ્યાંકન કે પ્રાઈસીંગ  પર અડગ રહેવાનો ફરક એ સમજી શક્યા.

નોંધ: આ આખી વાતનો અને જે પી મોર્ગનના ફોટાનો સોર્સ: ઈન્ટરનેટ

#આ_તો_એક_વાત #મજ્જાની_લાઇફ #અનુભવોક્તિ #મિતેષપાઠક #d202508  #entrepreneurship  #valuation #negotiationskills #business

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सुनीता विलियम्स के चौंकाने वाले खुलासे

अंतरिक्ष में नौ महीने बिताने के बाद अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स द्वारा पत्रकारों से किया गया वक्तव्य इस समय पूरे विश्व में चर्चा का विषय बना हुआ है।

“मुझे अंतरिक्ष में फँस जाना ईश्वर की इच्छा जैसा लग रहा था। जब मुझे अंतरिक्ष में 20 दिन हो गए थे, तब मैं मानो मृत्यु से सामना कर रही थी। भोजन और पानी का भंडार कम होने लगा तो मुझे लगा कि अब आगे कैसे जिया जाए? उसी समय मुझे सनातन धर्म में चैत्र नवरात्रि के उपवास की याद आई। उस दिन से मैं शाम को थोड़ा भोजन और पानी लेती और सुबह केवल थोड़ा पानी। एक महीना इस प्रकार बीत गया और मैं स्वस्थ और प्रसन्न थी। मुझे लगने लगा कि मैं और कुछ समय तक जीवित रह सकती हूँ।

“मृत्यु की प्रतीक्षा करते समय मैंने कंप्यूटर खोला और सोचा कि बाइबल पढ़ूँ। उसे मैं पहले कई बार पढ़ चुकी थी, इसलिए एक पन्ने के बाद मुझे ऊब हो गई। तब मुझे फिर से रामायण और भगवद्गीता पढ़ने की इच्छा हुई (अब लगता है कि उससे मुझे किसी शक्ति का अनुभव हुआ)। मैंने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद डाउनलोड किया और पढ़ना शुरू किया। 10–15 पन्ने पढ़ने के बाद मैं दंग रह गई। उसमें भ्रूण विज्ञान, गहरे समुद्र और आकाश के बारे में वर्णन अद्भुत था। मुझे लगा कि यह दुनिया को बताना चाहिए।

“अंतरिक्ष से देखने पर सूर्य की आकृति मानो किसी कीचड़ के तालाब में बैठी हो, ऐसी प्रतीत होती है। कभी-कभी मुझे ऊपर से कुछ आवाज़ें आतीं, मानो कोई मंत्रोच्चार चल रहा हो, और मुझे लगा कि ये संस्कृत या हिंदी में हैं। मेरे सहयात्री बैरी विलमोर ने कहा कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि मैं रोज़ रामायण और भगवद्गीता पढ़ती हूँ। उसके बाद मैंने रामायण और गीता का गहन अध्ययन करने का निश्चय किया। वह एक अद्वितीय अनुभव था। मैंने तुरंत एलन मस्क को फोन करके यह बताया।

“अब आप दंग रह जाएँगे – कुछ दिन हम इतने भयभीत हो गए थे क्योंकि हमारे अंतरिक्ष स्टेशन की ओर विशाल उल्काएँ तेजी से आ रही थीं। हमारे पास कोई उपाय नहीं था, इसलिए हमने ईश्वर से प्रार्थना की। और एक चमत्कारी ढंग से कुछ छोटे गोलाकार प्रकाश कण (मानो तारे) नीचे उतरे और उन सभी उल्काओं का नाश कर दिया। हमने जब यह देखा तो ऐसा लगा मानो हम उन पर तारे फेंक रहे हों। यह हमारे लिए आश्चर्यजनक था। नासा ने इस घटना पर और शोध करने का आश्वासन दिया है।

“आठ महीनों में मैंने पूरी रामायण और भगवद्गीता पढ़ ली। मुझे महसूस होने लगा कि अब मैं पृथ्वी पर लौट सकती हूँ। मेरे भीतर एक विलक्षण आत्मविश्वास उत्पन्न हो गया।

“अप्रैल माह में, सूर्यास्त के समय, शेर के समान एक जीव के साथ माताजी और त्रिशूल धारण किए हुए एक आकृति पृथ्वी पर उतरती हुई दिखाई दी। वह आकृति पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के बाद अदृश्य हो गई। वह कहाँ से आई, यह समझ में नहीं आ रहा था, इसलिए मैं और बैरी विलमोर उसका अवलोकन कर रहे थे। ऐसा लगा कि वह आकाश के किसी विशेष स्तर से नीचे आई। इससे मुझे समझ में आया कि आकाश की कई परतें होती हैं। चाहे जितना सोचा, पर यह समझ में नहीं आया कि ये उड़ने वाले घोड़े कहाँ गए? बाद में मुझे न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट दिखाई दी – उसमें हडसन नदी पर चंद्रकला दिखाई देने और 2 मार्च से सनातनी उपवास शुरू होने की खबर थी। उसके बाद नांगल में यह अवलोकन प्रारंभ हुआ था। बाद में हमें महसूस हुआ कि अब पृथ्वी पर उपवास समाप्त करने का समय आ गया है। मुझे लगता है कि वे ईश्वर के आशीर्वाद से आए हुए देवदूत थे।

“अब मुझे लगता है कि सनातन धर्म की भगवद्गीता सत्य है। अब मेरा शोध वेदों के विज्ञान पर आधारित होगा – भ्रूण विज्ञान, गहरे समुद्र का विज्ञान। मुझे खगोल विज्ञान से संबंधित सब कुछ सीखना है। नासा में वेदों की अलौकिक शक्तियों पर शोध करने के लिए एक नए विभाग की स्थापना का प्रस्ताव दिया गया है।”

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यूनान में ऐसा हुआ, एक ज्योतिषी रात आकाश के तारों का अध्ययन करता हुआ चला जा रहा था, एक कुएं में गिर पड़ा। पाट नहीं थी कुएं पर। आंखें आकाश में अटकी थीं। चांद—तारों का अध्ययन हो रहा था। कुएं में गिर पड़ा तो चिल्लाया। पास के ही झोपड़े से एक गरीब बुढ़िया ने उसे बामुश्किल निकाला। वह यूनान का सबसे बड़ा ज्योतिषी था। सम्राट भी उसके द्वार पर आते थे।

उसने बुढ़िया का बहुत—बहुत धन्यवाद किया और कहा कि देख, तुझे पता नहीं कि तुझे सौभाग्य से किसको बचाने का अवसर मिला है! मैं यूनान का सबसे बड़ा ज्योतिषी हूं। तारों, नक्षत्रों, उनकी गतिविधियों, मनुष्य के भाग्य से उनके संबंध में मुझसे बड़ा कोई जानकार पृथ्वी पर नहीं है। बड़े से बड़े सम्राट: मेरे पास आते हैं। मेरी फीस भी बहुत ज्यादा है। लेकिन तूने मुझे बचाया है तो तेरा भाग्य मैं बिना फीस के देख दूंगा, तू कल आ जाना।

वह बुढ़िया हंसने लगी। उस ज्योतिषी ने कहा : तू हंसती क्यों है? उसने कहा. मैं इसलिए हंसती हूं कि जिसे अपने सामने का कुआं नहीं दिखाई पड़ता, उसे चांद—तारों की गतिविधि, नक्षत्र और भविष्य…। तुझे अपने पैर सम्हलते नहीं हैं, तू मेरा भविष्य बतायेगा?

होश में आ!

और कहते हैं यह घटना उस ज्योतिषी के जीवन में क्रांति का कारण बन गयी। उसने ज्योतिष छोड़ दी। यह चोट भारी थी! यह बात भी इतनी सच थी! सामने पैर के कुआं है, नहीं दिखाई पड़ा! मगर उसे क्यों कुआं नहीं दिखाई पड़ा था? नहीं कि उसके पास आंख नहीं थी; आंख थी, मगर आंख दूर के तारों पर अटकी थी!

यही आदर्शवादी की भ्रांति है, उसकी आंख दूर के तारों पर अटकी है। आदर्शवादी कहता है मोक्ष पायेंगे! अभी यह सड़ा—गला क्रोध, इससे छुटकारा नहीं हो रहा है। यह सड़ा—गला काम, इससे छुटकारा नहीं हो रहा है। मोक्ष पायेंगे! बैकुंठ जायेंगे! निर्वाण होगा! आंखें बड़े दूर के आकाश पर लगी हैं। और उसकी वजह से रोज—रोज गड्डों में गिर रहे हो। गड्डे—क्रोध के, काम के, वैमनस्य के, ईर्ष्या के, घृणा के! मैं तुमसे कहता हूं : आंखें लौटा लाओ जमीन पर। जहां चलना है वहीं आंखें होनी चाहिए। इस क्षण में ही आंखें होनी चाहिए, क्योंकि गड्डे यहां हैं। और सारे गड्डों से तुम बच जाओ, तो उसी बचाव का नाम मोक्ष है।

मोक्ष कहीं दूर आकाश में नहीं है। जिसके जीवन में गिरने की संभावना न रही, वही मुक्त है।
[8/19, 10:03 AM] +91 83063 07911: सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस क्षण तुम सुख को पकड़ने की कोशिश करते हो, उसी क्षण दुःख की छाया साथ आ जाती है। यह ऐसे है जैसे दिन के साथ रात भी आती है — तुम केवल दिन को चुन नहीं सकते।

ओशो कहते हैं, जीवन में जो आता है, उसे आने दो; जो जाता है, उसे जाने दो। सुख आए, स्वागत करो; दुःख आए, उसे भी प्रेम से देखो। क्योंकि जब तुम अनुभवों को अच्छा-बुरा कहकर बाँटना बंद कर देते हो, तभी भीतर शांति का द्वार खुलता है।

सुख में अहंकार फूलता है, दुःख में वह टूटता है। दोनों ही तुम्हें सीख देते हैं। सुख बताता है कि जीवन सुंदर है; दुःख याद दिलाता है कि यह क्षणिक है। जो इन दोनों को खेल की तरह जी लेता है, वही मुक्त हो जाता है।

जब तुम यह समझ जाते हो कि सुख और दुःख तुम्हारे बाहर की लहरें हैं — और तुम सागर हो — तब कोई भी लहर तुम्हें डुबो नहीं सकती। तब जीवन न सुख है, न दुःख; वह सिर्फ अस्तित्व का आनंद है।

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