Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#बांका में बापू
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महात्मा गांधी आज के दिन ही सन 1925 में बांका आए थे। वो यहाँ एक रात और 2 दिन रुके थे। यहाँ उन्होंने 2 और 3 अक्तूबर को आयोजित कांग्रेस के जिला अधिवेशन को संबोधित किया था। तब भागलपुर जिले के अंदर ही बांका एक सब-डिवीजन था। यह जिला कांग्रेस की सालाना बैठक थी जो जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में तब आयोजित की जाती थी जिसमें इस बार बारी बांका की थी। इस दौरान वे बांका के समीप ककवारा स्टेट में ठहरे थे जहां उनके साथ तत्कालीन जिला कांग्रेस अध्यक्ष बाबू कमलेश्वरी सहाय भी थे। इस आवभगत का श्रेय उन्होंने बांका की जनता को दिया था और खिलाफ़त आंदोलन को सफल बनाने के लिए हर स्तर से मदद का आह्वान किया था। तब कांग्रेस का बांका कार्यालय वर्तमान में जिलाधिकारी आवास के आसपास हुआ करता था। गांधीजी के आगमन के बाद इस कार्यालय को ‘गांधी आश्रम’ कहा जाने लगा।

बापू यहाँ भागलपुर के 2 दिनों के प्रवास के बाद बांका आए थे। भागलपुर में 1 अक्तूबर 1925 को उन्होंने प्रोविंसियल मारवाड़ी कान्फ्रेंस में शिरकत की थी इसके बाद ‘बंगाली समाज’ के कार्यालय में गए थे। यात्रा के दूसरे दिन उन्होंने यहाँ महिलाओं को संबोधित किया और सक्रिय भागीदारी की प्रार्थना की।  

बापू अमरपुर होते हुए बांका आए थे। अमरपुर में उनका भव्य स्वागत हुआ था लेकिन वे वहाँ रुके नहीं।

3 अक्तूबर को ही बांका से वे देवघर के लिए प्रस्थान कर गए। यहाँ भी उन्होंने एक सभा को संबोधित किया। इस दिन उन्होंने रात्रि विश्राम टाऊन हाल में किया। वहाँ से वे 4 अक्तूबर को मधुपुर होते हुए गिरिडीह निकल गए।

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ચમત્કારો તો પહાડ જેવા જૂના છે !

યુનિવર્સિટીના ઉપકુલપતિ જ્ઞાનેન્દ્રનાથ ચક્રવર્તીના નિમંત્રણથી હું  એમને ત્યાં મહેમાન હતો. ત્યાં એક અતિથિગૃહ પણ હતું. 

રોનાલ્ડ નિક્સન પણ ત્યાં  રહેતો. તે  યુનિવર્સિટીનો પ્રિય પ્રોફેસર હતો. આ નિકસન એ જ કૃષ્ણપ્રેમ.

મારો ને નિકસનનો રૂમ જોડાજોડ હતો. રોજ સવારે અમે સાથે નાસ્તો લેતા;  ઘણી વાર યજમાનો મને ગાવાનું કહેતાં, અને હું  ગાતો. કૃષ્ણપ્રેમ તે વખતે હાજર હોય જ. તેને પણ મારાં કીર્તન ખૂબ ગમતાં.

તેમના કમરામાં જ્યાં નજર કરો ત્યાં  ચોપડીઓ જ વેરાયેલી પડી હોય. ચર્ચાઓમાં તે પોતાની બુદ્ધિ-તર્કથી  પ્રતિસ્પર્ધીની દલીલોનાં છોતરાં કાઢી નાખતા.

કૃષ્ણપ્રેમના બે અંતરંગ મિત્રો હતા. બંને પૂરેપૂરા બુદ્ધિવાદી, તર્ક વાદી  !

એક દિવસ અમે બધા ચા પીતા હતા, ત્યાં તેના મિત્રે ‘દૈવી ચમત્કારો’ની સામે યુદ્ધ પોકાર્યું. તે મેજ પર હાથ પછાડી કહે : ‘ચમત્કારો બમત્કારો કાંઈ નથી ! વિજ્ઞાને એમનું પોલ પકડી પાડ્યું ત્યારથી ચમત્કારો બનતા જ અટકી ગયા છે !’

આ સાંભળી કૃષ્ણપ્રેમ હસ્યા, તેમણે પડકાર ઉપાડી લીધા, કહે : ‘આટલા દિવસ તમારું વિજ્ઞાન હતું કયાં ? હજી ગઈ કાલે તો એનો જન્મ થયો છે; એ ધાવણું છોકરું વયોવૃદ્ધનું પોલ શું પકડી પાડવાનું હતું ? અને આ તે કંઈ જેવો તેવો વયોવૃદ્ધ છે ? યુગોના યુગો થયાં હજી એ નિત્યયુવાન છે; ચમત્કારો તો પહાડ જેવા જૂના છે !

આટલું કહી તેમણે  સ્વાનુભવનો એક પ્રસંગ વર્ણવ્યો.

કહ્યું : ‘પ્રથમ વિશ્વયુદ્ધ વખતે હું પાઇલોટ હતો. મારું કામ દુશ્મન પ્રદેશ પર બોમ્બ ઝીંકવાનું હતું.

એક દિવસ હું દુશ્મનોની હિલચાલનું નિરીક્ષણ કરવા ઊડતો હતો, ત્યાં મેં પાંચસાત ફાઈટર વિમાનોને ઉડતા જોયાં. હું સમજ્યો કે એ અમારા પક્ષનાં  વિમાનો છે, તેથી એમની તરફ જવા હું મારા વિમાનને જમણી બાજુ વાળવા ગયો, ત્યાં તો કોઈ અદશ્ય શક્તિએ જોરથી મારું કાંડું પકડયું, વિમાનને  ડાબી બાજુએ વાળી દેવડાવ્યું. હું તો મૂઢ જ બની ગયો, શક્તિ એટલી બધી ચોક્કસ હતી, કે એના વિષે શંકા કરી જ ન શકાય. માન્યામાં ન આવે એવું  સત્ય હતું.

થોડી પળમાં તો હું હતો ત્યાં પાછો આવી પહોંચ્યો. મારા સાથીદારો કહેવા લાગ્યા કે સારું થયું, તું તરત  પાછો આવી ગયો ! એ દુશ્મનોનાં વિમાનો હતાં ! હવે મને ભાન થયું કે હું ચમત્કારી રીતે બચી ગયો.

દોસ્ત, આ વાત માનો કે ન માનો, પણ ધારણા બહારની કોઇ શક્તિએ જ આ ચમત્કાર સરજ્યો હતો એ વિષે મને કોઈ શંકા નથી. મુસીબત માત્ર એ છે કે નજરે દીઠું મનાય, સાંભળ્યું મનાય નહિ. જેઓ પોતાનાં વહેંતિયાં મગજથી બધું માપવા માગે છે અને માપી શકતા નથી ત્યારે એની ઠેકડી ઉડાડે છે !

~ પુસ્તક – ઉત્તર વૃંદાવનના મહાયોગી

Posted in हिन्दू पतन, PM Narendra Modi

बाबरी गिरते ही शाम तक UP सरकार गिरी और 2017 तक UP मे बहुमत नहीं मिला और उसी दिन 4 BJP शासित राज्यों मे कॉंग्रेस ने राष्ट्रपति शासन लगाया।

मोदी जी और योगी जी खुल कर क्यों नहीं बोलते आज उसका उत्तर इस पोस्ट से मिल जाएगा। जिसके लिए हम उनके आभारी हैं।
हिन्दुओं की कायरता और दोगलापंथी के कारण ही मोदी जी और योगी जी खुल कर नहीं बोलते हैं वो जानते हैं कि हिन्दू पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारता बल्कि कुल्हाड़ी पर अपना सिर ही मार लेता है।

नब्बे के दशक में कल्याण सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बने, भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर को लेकर पूरे भारत में रथ यात्राएं निकाली थी।
उत्तर प्रदेश की जनता ने पूर्ण बहुमत के साथ कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश की सत्ता दी; यानी खुल के कहा की जाओ मंदिर बनाओ।

कल्याण सिंह बहुत भावुक नेता थे, सरकार बनने के बाद तुरन्त विश्व हिन्दू परिषद को बाबरी मस्जिद से सटी जमीन कार सेवा के लिए दे दी, संघ के हज़ारों कार सेवक साधू संत दिन रात उस जमीन को समतल बनाने में लगे रहते थे।

सुप्रीम कोर्ट ये सब देख के बहुत परेशान था, सर्वोच्च न्यायालय ने कल्याण सिंह से साफ़ कह दिया की आपको पक्का यकीन हैं ना की ये हाफ पैंट पहने लोग सिर्फ यहाँ की जमीन समतल करने आये हैं ?
मतलब की अगर आपके लोगों ने बाबरी मस्जिद को हाथ लगाया तो अच्छा नहीं होगा।

कल्याण सिंह ने मियालार्ड को समझाया और बाकायदा लिख के एक हलफनामा दिया की हम लोग सब कुछ करेंगे लेकिन मस्जिद को हाथ नहीं लगायेंगे।

तो साहब अयोध्या में कार सेवा के लिए दिन रखा गया 6 दिसंबर 1992 और केंद्र की कांग्रेसी सरकार से कहा कि केवल 2 लाख लोग आयेंगे कार सेवा के लिए लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने 5 लाख लोगों को कार सेवा के लिए बुला लिया प्रशासन को ख़ास हिदायत थी की भीड़ कितनी भी उग्र हो कोई गोली लाठी नहीं चलाएगा।
5 लाख लोग एक जगह जुट गए जय श्री राम और मदिर वहीं बनायेंगे के नारे लगने लगे । लोगों को जोश आ गया और लोग गुम्बद पर चढ़ गए 5 घंटे में उस 400 साल पुरानी मस्जिद का अता पता नहीं था, ऐसा काम कर दिया एक एक ईंट कार सेवकों ने उखाड़ दी। केंद्र सरकार के गृह मंत्री का फोन कल्याण सिंह के C.M. ऑफिस में आया।

गृह मंत्री ने कल्याण सिंह से पूछा ये सब कैसे हुआ ?
कल्याण सिंह ने कहा की “जो होना था वो हो गया अब क्या कर सकते हैं” ?
एक गुम्बद और बचा है कार सेवक उसी को तोड़ रहे हैं, लेकिन आप जान लीजिये कि मै गोली नहीं चलाऊंगा (ये वाकया खुद कल्याण सिंह ने एक भाषण में बताया है) उधर सुप्रीम कोर्ट में मिलॉर्ड कल्याण सिंह से बहुत नाराज थे।

6 दिसंबर की शाम कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया और उधर काँग्रेस ने भाजपा की 4 राज्य की सरकार को बर्खास्त कर दिया, कल्याण सिंह को एक दिन की जेल हो गयी, केंद्र में नरसिम्हा राव जी सरकार थी; तुरंत में एक झटके से देश के 4 राज्यों में बीजेपी की सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया।

उत्तर प्रदेश में दुबारा चुनाव हुए, बीजेपी को यही लगा की हिन्दुओं के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी देने के बाद उत्तर प्रदेश की जनता उन्हें फिर से चुनेगी लेकिन हुआ उलटा।

बीजेपी उत्तर प्रदेश चुनाव हार गयी और फिर 2017 तक उसे पूर्ण बहुमत ही नहीं मिला। कल्याण सिंह जैसे बड़े और साहसिक फैसले लेने वाले नेता का कैरियर बाबरी मस्जिद विध्वंश ने खत्म कर दिया ।

400 साल से खड़ी किसी मस्जिद को 5 लाख की भीड़ से गिरवाने के लिए 56 इंच का सीना चाहिए होता है जो वाकई में कल्याण सिंह के पास था।
आज हम कहते हैं की मोदी और योगी हिंदुओं के पक्ष में खुल के नहीं बोलते ना ही खुल के मुसलमानों का विरोध करते हैं।
क्यों करें वो ये सब खुल के ? ताकि उनका भी राजनैतिक कैरियर खत्म हो जाये।

आप बताइये की ऐसे स्वार्थी हिन्दू समाज के पक्ष में मोदी जी और योगी जी जैसे लोग खुल के कैसे बोलें क्या बोले और कहाँ तक इनके लिए लड़े ?

अब किसान आंदोलन को ही देख लीजिए किस तरह से अंतरराष्ट्रीय साजिश के हाथों में कब्जे में था जिसको कोई हल नहीं चाहिये था।
कोई धारा 370 खत्म कर सकता था नहीं बिलकुल भी नहीं।
मोदी जी ने कर दिखाया।
उसके बाद तो हिन्दू समाज को ऋणी होना चाहिए था लेकिन देख लो किस प्रकार से मोदी जी का विरोध हो रहा है। किन्तु ये लोग नहीं जानते कि ऐसा करके और मजबूत हो रहे है मोदी जी ।

क्योंकि देश अब इतना जागरूक हो चुका है कि सारा खेल समझ रहा है।
ये फैसला हमें करना है, हिन्दू समाज को करना है, अगले 50 सालों तक 2014 एवं 2019 जैसी राजनीतिक स्थिति को बरकरार रखना होगा तभी देश बचेगा। क्योंकि जब देश ही नहीं बचेगा तो क्या करोगे इन कानूनों का।
तभी आठ सौ सालों की गुलामी के दाग धब्बे धुल पाएंगे।

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🚩🙏🙏🙏 🚩
🙏 जय श्री राम 🙏

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कछुआ-कांड: 16वीं सदी में कैरिबियाई कछुओं की यूरोपीय सूप-यात्रा

16वीं सदी की बात है। यूरोपीय समुद्रों में घूम रहे थे — मसाले, सोना और हिंदुस्थान की तलाश में। चाहे वास्को डा गामा हो या फिर कोलंबस- सब समुद्री मार्ग से हिन्द पहुँचने का मार्ग तलाश रहे थे।

जब ये यूरोपीय लुटेरे या खोजक अमेरिका और केरेबियन आइलैंड पहुँचे तो उन्होंने इस स्थान को वेस्ट इंडिया कह दिया- इसी चक्कर में वेस्ट इंडीज टीम बन गई जबकि वेस्ट इंडीज कोई देश ही नहीं है। इन लंबी समुद्री यात्राओं में सबसे बड़ी दिक्कत थी- खाने की। क्या ऐसा जहाज़ में रख के चले जिस से मार्ग में क्षुब्धा शांत हो सकें। और इसका हल मिला केरेबियन आइलैंड में।

वहाँ क्या मिला? कछुए। वो भी मोटे-ताज़े, हरे, और इतने धीमे कि खुदा की कसम — भूखे यूरोपीय को सीधे “सूप” नज़र आने लगे।

🐢 सूप के लिए शुरू हुआ कछुआ-कारोबार

जैसे ही यूरोपीय जहाज़ कैरिबियन में पहुंचे, दो बातें साफ़ हो गईं:
1. यहाँ के लोग आराम से रहते हैं और उन्हें स्कर्वी नाम की बीमारी नहीं है।
2. और ज़मीन-समंदर पर फैले हैं हरे-भरे, मंद-मंद चलते हुए कछुए।

🏴‍☠️ कैरिबियाई ‘कछुआपती’ व्यापारी

कैरिबियाई व्यापारी समझ गए कि उनके पास सोने की खान नहीं, पर सूप की दुकान ज़रूर है। जल्द ही टापुओं पर कछुए बेचने वाले ठेले खुल गए:
• “शेल एंड लडल” (Jamaica में)
• “द स्लो एंड डिलीशियस” (Barbados में)
• “सूप ऑफ द शेल डे” (Tortuga में – नाम ही काफी है)

यूरोपीय कप्तान बंदरगाह पर ऐसे आते जैसे Michelin Star का रिव्यू देने आए हों:
“अरे भई, सूप वाला कछुआ है क्या? महारानी ने आदेश दिया है – आज रात कछुए की बोटी परोसनी है।”

कैरिबियाई व्यापारी बहुत चतुर भी थे, उन्होंने समझ लिया कि इन अंग्रेज़, फ़्रेंच , पुर्तगाली, स्पेनिश जहाज़ियों को मूर्ख बनाना बहुत आसान है। इन्होंने इन यूरोपियन लोगों को बताना शुरू किया की कछुए का मांस खाने में मज़ेदार है और कछुए के फिन और खोल का सूप पीने से आदमी हट्टा कट्टा और बुद्धिमान बन जाता है। बस इन लोगों ने इसी चक्कर में कैरिबियाई व्यापारी से कछुआ ख़रीदना शुरू कर दिया।



🛳️ कछुओं की अटलांटिक यात्रा

समस्या ये थी कि कछुए खराब न हो जाएँ। हल?
उन्हें ज़िंदा ही जहाज़ पर लाद दिया जाता!
कछुए लाइन में बैठे होते — जैसे हरे नारियलों की परेड हो रही हो। 16वीं सदी में यही था “इंस्टेंट नूडल”।

लंदन या पेरिस पहुँचते-पहुँचते, कछुए थके हुए, डरे हुए, और… सूप के लिए तैयार मिलते।



🍲 कछुआ-सूप: रईसों का टॉनिक

कछुए का सूप बना शाही भोज का ताज। कहा जाता था — इससे ताकत मिलती है, गठिया ठीक होता है, और मेहमानों पर “खुशबूदार” असर पड़ता है।

एक फ़्रांसीसी नवाब ने चखा और कहा:
“ओह ला ला! ये स्वाद? ये जादू? ये अमरता!”
रसोइया बोला: “सर, इसमें थोड़ी कमी है… और ऊपर से हरा धनिया डालो, आनंद आ जाएगा!”

कछुए की डिमांड यूरोप में अत्यधिक थी। ब्रिटिश हाई सोसाइटी में कछुआ सूप पार्टी की शान होने लगी। चीनी लोग भी कछुए को अंग्रेजी स्टाइल से पकाने लगे। अमेरिका में भी कछुआ उच्च सोसाइटी की पसंद था। अब्राहम लिंकन तक इसके दीवाने थे। किंतु इसकी डिमांड इतनी थी कि कछुए धड़ाधड़ ख़त्म होने लगे- विप्लुप्त होने के कगार पे आ गए। फिर अमेरिका में सत्तर के दशक में कछुए का शिकार और खाने पे पाबंदी लगा दी गई ताकि कछुआ गायब ही ना हो जाये।

जैसे-जैसे सदी बदली, कछुए कम होते गए, और लोगों का स्वाद भी।
कुछ कहते हैं — कछुए छुप गए।
कुछ कहते हैं — उन्होंने बदला लिया।
असल में शायद वो बस थोड़ा होशियार हो गए।



📝 सूप की सीख

तो अगली बार जब आप सूप पी रहे हों, सोचिए — एक हरे समुद्री जीव ने एक बार यूरोपीय भूख का शिकार होकर शाही सूप में जगह पाई थी।

और सब कुछ बस इसलिए हुआ, क्योंकि 1500 के आसपास किसी यूरोपी ने कहा:
“इस धीमे प्राणी को थोड़ा लहसुन और दो ब्रेड के साथ परोसना चाहिए!”

यदि आप सोच रहे है कि ये लेख को लिखने का क्या तात्पर्य है तो अब वो भी समझ लीजिए।

जब लुटेरों ने मसालों और स्वर्ण की खोज में हिन्दुस्थान तक पहुँचने के मार्ग ढूँढने शुरू किये तो भोजन एक बड़ी समस्या थी। कछुआ खाना इसी समस्या का एक समाधान था। जब बाबर आदि घोड़ों पर इधर आए थे- तो ये तातार, उजबेज़ी आदि गुंडे घोड़ों का मांस खाकर गुजारा करते थे, उनका लहू पी अपनी प्यास बुझाते थे। ये सब इतिहास में दर्ज है। अनेकों रिफरेन्स है।

तो यदि कोई कहें कि मुगल अपने साथ खाने पीने की सभ्यता लायें तो वो हरामज़ादगी की एक ऐसी मिसाल पैदा कर रहा है जिसका तोड़ मिलना मुश्किल है। सोच कर देखिए- हज़ारों मील से दूर कोई डाकू लुटेरा हिन्द को लूटने आयेगा तो क्या अपने साथ चाट पकौड़ी मुग़लिया खाने की कुकबुक बाँध कर लायेगा? उज़्बेकिस्तान में आज भी घोड़े को चाव से खाया जाता है- वहाँ जलेबी बनाने वाले हलवाई नहीं है। पहले भी नहीं थे।

याद रखिए दुर्दांत बर्बर लुटेरों का- चाहे वो मुग़ल हो अंग्रेज- कोई इरादा ना था कि हिन्दुस्थान जाकर उन्हें खाना बनाना सिखायेंगे। जो देश सदियों से छप्पन भोग अपने इष्ट देवों को चढ़ा रहा हो- उस देश को भला कौन पकवान आदि बनाना सिखाएगा!

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1 )महमूद ग़ज़नवी —वर्ष 997 से 1030 तक 2000000 , बीस लाख सिर्फ बीस लाख लोगों को महमूद ग़ज़नवी ने तो क़त्ल किया था और 750000 सात लाख पचास हज़ार लोगों को गुलाम बना कर भारत से ले गया था 17 बार के आक्रमण के दौरान (997 -1030). —- जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया , वे शूद्र बना कर इस्लाम में शामिल कर लिए गए। इनमे ब्राह्मण भी थे क्षत्रिय भी वैश्य भी और शूद्र भी थे ।
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2 ) दिल्ली सल्तनत –1206 से 1210 —- कुतुबुद्दीन ऐबक — सिर्फ 20000 गुलाम राजा भीम से लिए थे और 50000 गुलाम कालिंजर के राजा से लिए थे। जो नहीं माना उनकी बस्तियों की बस्तियां उजाड़ दीं। गुलामों की उस समय यह हालत हो गयी कि गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी सैंकड़ों हिन्दू गुलाम हुआ करते थे ।
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3) इल्ल्तुत्मिश —1236– जो भी मिलता उसे गुलाम बना कर, उस पर इस्लाम थोप देता था।
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4) बलबन —-1250-60 — ने एक राजाज्ञा निकल दी थी , 8 वर्ष से ऊपर का कोई भी आदमी मिले उसे मौत के घाट उत्तर दो। महिलाओं और लड़कियों वो गुलाम बना लिया करता था। उसने भी शहर के शहर खाली कर दिए।
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5) अलाउद्दीन ख़िलजी —- 1296 -1316 — अपने सोमनाथ की लूट के दौरान उसने कम उम्र की 20000 हज़ार लड़कियों को दासी बनाया, और अपने शासन में इतने लड़के और लड़कियों को गुलाम बनाया कि गिनती
कलम से लिखी नहीं जा सकती। उसने हज़ारों क़त्ल करे थे और उसके गुलमखाने में 50000 लड़के थे और 70000 गुलाम लगातार उसके लिए इमारतें बनाने का काम करते थे। इस समय का ज़िक्र आमिर खुसरो के लफ़्ज़ों में इस प्रकार है ” तुर्क जहाँ चाहे से हिंदुओं को उठा लेते थे और जहाँचाहे बेच देते थे।.
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6) मोहम्मद तुगलक —1325 -1351 —इसके समय पर तने कैदी हो गए थे की हज़ारों की संख्या मेंरोज़ कौड़ियों के दाम पर बेचे जाते थे।
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7) फ़िरोज़ शाह तुगलक — 1351 -1388 — इसकेपास 180000 गुलाम थे जिसमे से 40000 इसके महल की सुरक्षा में लगे हुए थे। इसी समय “इब्न बतूता ” लिखते हैं की क़त्ल करने और गुलाम बनाने की वज़ह से गांव के गांव खाली हो गए थे। गुलाम खरीदने और बेचने के लिए खुरासान ,गज़नी,कंधार,काबुल और समरकंद मुख्य मंडियां
हुआ करती थीं। वहां पर इस्तांबुल,इराक और चीन से से भी गुलाम ल कर बेचे जाते थे।
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8) तैमूर लंग –1398/99 — इसने दिल्ली पर हमले के दौरान 100000 गुलामों को मौत के घाट उतरने के पश्चात ,2 से ढ़ाई लाख कारीगर गुलाम बना कर समरकंद और मध्य एशिया ले गया।
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9) सैय्यद वंश –1400-1451 — हिन्दुओं के लिए कुछ नहीं बदला, इसने कटिहार ,मालवा और अलवर को लूटा और जो पकड़ में आया उसे या तो मार दिया या गुलाम बना लिया। .
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10) लोधी वंश-1451–1525 —- इसके सुल्तान बहलूल ने नीमसार से हिन्दुओं का पूरी तरह से वंशनाश कर दिया और उसके बेटे सिकंदर लोधी ने यही हाल रीवां और ग्वालियर का किया।
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11 ) मुग़ल राज्य –1525 -1707 — बाबर — इतिहास में ,क़ुरान की कंठस्थ आयतों ,कत्लेआम और गुलाम बनाने के लिए ही जाना जाता है।
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12 ) अकबर —1556 -1605 —- बहुत महान थे यह अकबर महाशय , चित्तोड़ ने जब इनकी सत्ता मानाने से इंकार कर दिया तो इन्होने 30000 काश्तकारों और 8000 राजपूतों को या तो मार दिया या गुलाम बना लिया और, एक दिन भरी दोपहर में 2000 कैदियों का सर कलम किया था। कहते हैं की इन्होने गुलाम प्रथा रोकने की बहुत कोशिश की फिर भी इसके हरम में 5000 महिलाएं थीं। इनके समय में ज्यादातर लड़कों को खासतौर पर बंगाल की तरफ अपहरण किया जाता था और उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था। इनके मुख्य सेनापति अब्दुल्लाह खान उज़्बेग, की अगर मानी जाये तो उसने 500000 पुरुष और गुलाम बना कर मुसलमान बनाया था और उसके हिसाब से क़यामत के दिन तक वह लोग एक करोड़ हो जायेंगे।
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13 ) जहांगीर 1605 –1627 — इन साहब के हिसाब से इनके और इनके बाप के शासन काल में 5 से 600000 मूर्तिपूजकों का कत्ल किया गया था औरसिर्फ 1619-20 में ही इसने 200000 हिन्दू गुलामों को ईरान में बेचा
था।
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14) शाहजहाँ 1628 –1658 —-इसके राज में इस्लाम बस ही कानून था, या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उत्तर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतरा था। जवान लड़कियां इसके हरम भेज दी जाती थीं। इसके हरम में सिर्फ 8000 औरतें थी।
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15) औरंगज़ेब–1658-1707 — इसके बारे में तो बस इतना ही कहा जा सकता है की ,जब तक सवा मन जनेऊ नहीं तुलवा लेता था पानी नहीं पीता था। बाकि काशी मथुरा और अयोध्या इसी की देन हैं। मथुरा के मंदिर
200 सालों में बने थे इसने अपने 50 साल के शासन में मिट्टी में मिला दिए। गोलकुंडा में 1659 सिर्फ 22000 लड़कों को हिजड़ा बनाया था।
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16)फर्रुख्सियार — 1713 -1719 ,यही शख्स है जो नेहरू परिवार को कश्मीर से दिल्ली ले कर आया था, और गुरदासपुर में हजारों सिखों को मार और गुलाम बनाया था।
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17) नादिर शाह –1738 भारत आया सिर्फ 200000 लोगों को मौत के घाट उत्तर कर हज़ारों सुन्दर लड़कियों को और बेशुमार दौलत ले कर चला गया।
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18) अहमद शाह अब्दाली — 1757-1760 -1761 —-पानीपत की लड़ाई में मराठों युद्ध के दौरान हज़ारों लोग मरे ,और एक बार में यह 22000 लोगों को गुलाम बना कर ले गया था।
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19) टीपू सुल्तान —1750 – 1799 —- त्रावणकोर के युद्ध में इसने 10,000 हिन्दू और ईसाईयों को मारा था एक मुस्लिम किताब के हिसाब से कुर्ग में रहने वाले 70,000 हिन्दुओं को इसने मुसलमान बनाया था। ऐसा नहीं कि हिंदुओं ने डटकर मुकाबला नहीं किया था, बहुत किया था, उसके बाद ही इस संख्या का निर्धारण इतिहासकारों ने किया जो कि उपरोक्त दी गई पुस्तकों एवं लिंक में दिया गया है ।
गुलाम हिन्दू चाहे मुसलमान बने या नहीं ,उन्हें नीचा दिखाने के लिए इनसे अस्तबलों का , हाथियों को रखने का, सिपाहियों के सेवक होने का और इज़्ज़त करने के लिए साफ सफाई करने के काम दिए जाते थे। जो गुलाम नहीं भी बने उच्च वर्ण के लोग वैसे ही सब कुछ लूटा कर, अपना धर्म न छोड़ने के फेर में जजिया और तमाम तरीके के कर चुकाते चुकाते समाज में वैसे ही नीचे की पायदान शूद्रता पर पहुँच गए। जो आतताइयों से जान बचा कर जंगलों में भाग गए जिन्दा रहने के उन्होंने मांसाहार खाना शुरू कर दिया और जैसी की प्रथा थी ,और अछूत घोषित हो गए।
Now come to the valid reason for Rigidity in Indian Caste System——–
वर्ष 497 AD से 1197 AD तक भारत में एक से बढ़ कर एक विश्व विद्यालय हुआ करते थे, जैसे तक्षिला, नालंदा, जगदाला, ओदन्तपुर। नालंदा विश्वविद्यालय में ही 10000 छात्र ,2000 शिक्षक तथा नौ मंज़िल का पुस्तकालय हुआ करता था, जहाँ विश्व के विभिन्न भागों से पड़ने के लिए विद्यार्थी आते थे। ये सारे के सारे मुग़ल आक्रमण कारियों ने ध्वस्त करके जला दिए। न सिर्फ इन विद्या और ज्ञान के मंदिरों को जलाया गया बल्कि पूजा पाठ पर सार्वजानिक और निजी रूप से भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इतना तो सबने पढ़ा है, लेकिन उसके बाद यह नहीं सोचा कि अपने धर्म को ज़िंदा रखने के लिए ज्ञान, धर्मशास्त्रों और संस्कारों को मुंह जुबानी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया गया ।
सबसे पहला खतरा जो धर्म पर मंडराया था ,वो था मलेच्छों का हिन्दू धर्म में अतिक्रमण / प्रवेश रोकना। और जिसका जैसा वर्ण था वो उसी को बचाने लग गया। लड़कियां मुगलों के हरम में न जाएँ ,इसलिए लड़की का जन्म अभिशाप लगा ,छोटी उम्र में उनकी शादी इसलिए कर दी जाती थी की अब इसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी इसका पति संभाले, मुसलमानों की गन्दी निगाह से बचने के लिए पर्दा प्रथा शुरू हो गयी। विवाहित महिलाएं पति के युद्ध में जाते ही दुशमनों के हाथों अपमानित होने से बचने के लिए जौहर करने लगीं ,विधवा स्त्रियों को मालूम था की पति के मरने के बाद उनकी इज़्ज़त बचाने कोई नहीं आएगा इसलिए सती होने लगीं, जिन हिन्दुओं को घर से बेघर कर दिया गया उन्हें भी पेट पालने के लिए ठगी लूटमार का पेशा अख्तिया करना पड़ा। कौन सी विकृति है जो मुसलमानों के अतिक्रमण से पहले इस देश में थी और उनके आने के बाद किसी देश में नहीं है।
हिन्दू धर्म में शूद्र कृत्यों वाले बहरूपिये आवरण ओढ़ कर इसे कुरूप न कर दें इसीलिए वर्णव्यवस्था कट्टर हुई , इसलिए कोई अतिशियोक्ति नहीं कि इस पूरी प्रक्रिया में धर्म रूढ़िवादी हो गया या वर्तमान परिभाषा के हिसाब से उसमे विकृतियाँ आ गयी। मजबूरी थी वर्णों का कछुए की तरह खोल में सिकुड़ना। यहीं से वर्ण व्यवस्था का लचीलापन जो की धर्मसम्मत था ख़त्म हो गया। इसके लिए आज अपने को शूद्र कहने वाले ब्राह्मणो या क्षत्रियों को दोष देकर अपने नए मित्रों को ज़िम्मेदार कभी नहीं हराते हैं .
वैसे जब आप लोग डा. सविता माई(आंबेडकर जी की ब्राह्मण पत्नी) के संस्कारों को ज़बरदस्ती छुपा सकते हैं,जब आप लोग अपने पूर्वजो के बलिदान को याद नहीं रख सकते हैं जिनकी वजह से आप आज भी हिन्दू हैं तो आप आज उन्मुक्त कण्ठ से ब्राह्मणो और क्षत्रिओं को गाली भी दे सकते हैं,जिनके पूर्वजों ने न जाने इस धर्म को ज़िंदा रखने के लिए क्या क्या कष्ट सहे वर्ना आज आप भी अफगानिस्तान , सीरिया और इराक जैसे दिन भोग रहे होते। और आज जिस वर्णव्यवस्था में हम विभाजित हैं उसका श्रेय 1881 एवं 1902 की अंग्रेजों द्वारा कराई गयी जनगणना है जिसमें उन्होंने demographic segmentation को सरल बनाने के लिए हिंदु समाज को इन चार वर्णों में चिपका दिया। वैसे भील, गोंड, सन्थाल और सभी आदिवासियों के पिछड़ेपन के लिए क्या वर्णव्यवस्था जिम्मेदार है?????
कौन ज़िम्मेदार है इस पूरे प्रकरण के लिए अनजाने या भूलवश धर्म में विकृतियाँ लाने वाले पंडित या उन्हें मजबूर करने वाले मुसलमान आक्रांता ?? या आपसे सच्चाई छुपाने वाले इतिहास के लेखक ??
कोई भी ज़िम्मेदार हो पर हिन्दू भाइयो अब तो आपस में लड़ना छोड़ कर भविष्य की तरफ एक सकारात्मक कदम उठाओ। . अगर आज हिन्दू एक होते तो आज कश्मीर घाटी में गिनती के 2984 हिन्दू न बचते और 4.50 लाख कश्मीरी हिंदू 25 साल से अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह न रह रहे होते और 16 दिसंबर के निर्भया काण्ड ,मेरठ काण्ड ,हापुड़ काण्ड …………गिनती बेशुमार है, इस देश में न होते। वैसे सबसे मजे की बात यह है कि जिनके पूर्वजों ने ये सब अत्याचार किए, 800 साल तक राज किया, वो तो पाक साफ हो कर अल्पसंख्यकों के नाम पर आरक्षण भी पा गये और कटघरे में खड़े हैं, कौन?…………………… जवाब आपके पास है .

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क्या आपने कभी उस इंजीनियर की कहानी सुनी है जिसने एक साधारण मरम्मत के लिए 10,000 डॉलर का बिल भेजा था? ये कोई अफ़वाह नहीं, बल्कि सच्ची घटना है—और इसके पीछे थे चार्ल्स प्रोटियस स्टाइनमेट्ज़ (1865–1923), जो इलेक्ट्रिसिटी के सच्चे जादूगर माने जाते हैं।

हुआ यूं कि हेनरी फोर्ड के रिवर रूज प्लांट में एक विशाल जनरेटर अचानक बंद हो गया। फोर्ड की अपनी इंजीनियरों की टीम भी समस्या पकड़ नहीं पाई। तब बुलाया गया स्टाइनमेट्ज़ को। वो केवल एक नोटबुक, पेन और एक फोल्डिंग खाट लेकर पहुंचे। दो दिन और दो रात तक उन्होंने मशीन की हर आवाज़, हर कंपन को महसूस किया और जटिल गणनाएं करते रहे।

आख़िरकार, वो सीढ़ी लेकर जनरेटर के ऊपर चढ़े, एक खास जगह पर चॉक से निशान लगाया और टीम को ठीक उस जगह से 16 तारों की कुंडली खोलने का निर्देश दिया। बस इतना करते ही जनरेटर फिर से चल पड़ा—एकदम सही तरीके से!

कुछ दिन बाद हेनरी फोर्ड को स्टाइनमेट्ज़ का बिल मिला: $10,000। फोर्ड चौंक गए और उन्होंने एक आइटमाइज़्ड बिल मांगा। जवाब आया:

• चॉक का निशान लगाने के लिए: $1
• सही जगह पर निशान लगाने का ज्ञान: $9,999

फोर्ड ने बिना एक शब्द कहे पूरा भुगतान कर दिया—और ये छोटा सा बिल आज भी इस बात की मिसाल है कि विशेषज्ञता की कोई कीमत नहीं होती। 🔧⚡️

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धर्म एव हतो हन्ति धर्मों रक्षति रक्षित:।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मों हतोડवधीत्।।
वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य य: कुरुते ह्यलम्।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद् धर्मं न लोपयेत् ।।

अर्थ– जो पुरूष धर्म का नाश करता है उसी का नाश धर्म कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है उसकी धर्म भी रक्षा करता है । इसलिए मारा हुआ धर्म कहीं हमें भी न मार  डाले,इस भय से धर्म का हनन, अर्थात त्याग
कभी नहीं करना चाहिए।।
जो सुख की वृष्टि करने वाला,सब ऐश्वर्यो का दाता धर्म है ,उसका जो लोप करता है ,उसको विद्वान लोग वृषल अर्थात नीच समझते हैं , इसलिए किसी मनुष्य को धर्म का लोप करना उचित नहीं ।।

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कॉलेज मे एक लडका एक लडकी से प्रेम करता है….
वो उसको प्रेमपत्र लिखता है ….

“अगर तुम्हे मूझसे प्रेम है,  तो कल  *लाल* रंग
का ड्रेस पहन के आना..”

वो प्रेमपत्र वह एक पुस्तक मे रखकर 
वो पुस्तक उसको देता है….

दुसरे  दिन वो *पीले* रंग का ड्रेस पहनकर आती हैं
और उसे उसका पुस्तक वापस करती है….
ये देखकर उस लडके का मन खट्टा हो जाता है…
वो उदास रहने लगता है….

कालांतर मे उस लडकी का विवाह  हो जाता है….
.
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.
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कुछ  वर्ष के बाद……

उस लडकी ने वापस की हुई  उसकी “वो” पुस्तक
घर का कचरा साफ करते समय
उसके हाथ से नीचे गिर जाती है …

और …

उसमे से एक चिठ्ठी बाहर गिरती है …

उस चिठ्ठी मे लिखा था …

” मुझे भी  तुम पसंद हो ❤…
मेरे घरवालो से आकर मिलो…
अगर घर वाले  न माने तो भी मै तुमसे ही शादी करूंगी….और हां … *मै एक गरीब लडकी हूँ  ……*
मेरे पास *लाल* रंग का ड्रेस नही है…
SORRY…!!! 🙏🏼

ये पढकर लडके ने अपना सर पीट लिया….

*तात्पर्य* :  वर्ष मे  कम से कम  *”एक बार “*
कोर्स की पुस्तक खोल कर जरूर देखे …..

अन्यथा…

*”वो आजकल क्या करती है और कहां है …??”*
ऐसा कहने की नौबत आती है.

😃😃😂😂

*नोट* –  अब आप अपनी सारी पुरानी किताबे 
छानने मत बैठ जाना………….

आपका समय कब का निकल चुका है…
अब बच्चों की पढाई पर ध्यान दीजिये…

😂😂 🤣🤣

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જૂનાગઢમાં બાવલા નામનો એક છોકરો હતો. મા બાપ હતા નહીં, બાવલાને એક નાની બેન. બાવલો રોજનું કશુંક કમાઈને લાવે અને ભાઈ બેન રોજ રોજનું ખાય. એક દિવસ કશું કામ ન મળ્યું તો બાવલે વિચાર્યું કે સીમમાંથી લાકડા કાપી લાઉં અને વેંચીશ. પણ ઘરમાંથી દાતરડું કાઢ્યું તો દાતરડું એકદમ બુઠ્ઠું. લુહાર પાસે જઈને બાવલે કહ્યું, ‘મારી પાસે દાંતરડું કકરાવવાના પૈસા નથી. પણ મને જો આની ધાર કકરાવી આપશો તો મારી પાસે પૈસા આવશે ત્યારે તમને આપી દઈશ.’

લુહાર કામ કરી આપ્યું. વાત તો આગળ લાંબી છે…

*પણ કુદરતે જ્યારે ચક્રો ફેરવ્યા ત્યારે આ બાવલો જૂનાગઢનો દિવાન બહાઉદ્દીનભાઈ બન્યો.* અને એક વખત જૂનાગઢની પ્રજા પર બે આના કર વધાર્યો. પ્રજા દિવાનના બંગલા બહાર ભેગી થઈ અને વિરોધ નોંધાવ્યો. દિવાન બહાઉદ્દીન ભાઈ ઝરૂખામાં આવ્યાં અને પ્રજાને કહ્યું કે, “બે આના જ વધારો છે, એટલા કોની પાસે ન હોય?”

ત્યારે પ્રજાના ટોળામાંથી એક અવાજ આવ્યો, “ ન હોય ત્યારે દાતરડું કકરાવવાના પણ ન હોય, બહાઉદ્દીનભાઈ…”

*દીવાને જોયું તો એ અવાજ વૃદ્ધ થઈ ગયેલા પેલા લુહારનો હતો,* જેણે આ બહાઉદ્દીનભાઈ જ્યારે બાવલો હતો ત્યારે વગર પૈસે એનું દાતરડું સજાવી આપેલું.

ન હોય ત્યારે દાતરડું કકરવાના કે પેટ ભરાય એટલા દાળવડાના રૂપિયા પણ ન હોય એવું બને.

*
આજે ગમતા એક્ટર રોનિત રોયનું એક પોડકાસ્ટ સાંભળતો હતો ત્યારે એણે કહ્યું કે, “એક સમય હતો કે મુંબઈમાં એક ઢાબામાં રોજ સાંજે હું જમતો, એક સમય જ જમતો, એમાં એક દિવસ રોટલી અને કાળી દાળ, અને બીજા દિવસે રોટલી અને પાલક પનીર…આ જ ફિક્સ…અને એટલા જ રૂપિયા  મારી પાસે રહેતા. પછી એક દિવસ મેં ઢાબામાં જઈને કહ્યું, ‘બે રોટલી અને કાંદા લઈ આવ…’કેમ કે એ દિવસે દાળના પણ રૂપિયા નહોતા. (કાંદાને એમ જ ગરીબોની કસ્તુરી કહેવામાં નથી આવતા. કાંદા ભીડ પડે ત્યારે સૂકા રોટલાને સ્વાદ આપીને ભૂખ ભાંગે છે.) પણ એ માણસ રોટલી, કાંદા જોડે કાળી દાળ પણ લઈ આવ્યો અને બોલ્યો, ‘મારા તરફથી…’…એ માણસનો ચહેરો આજે ત્રીસ વર્ષ બાદ પણ મને એમનો એમ યાદ છે…”

આટલું કહેતા મર્દાના અવાજ અને કડક ચહેરો ધરાવતા રોનિત રોયનો અવાજ અને આંખ ભીની થઈ ગઈ હતી.

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ભારત માતા ની સ્વતંત્રતા માટે શાહિદ થનાર આપણા સ્વાતંત્ર્ય સેનાનીઓ અને ક્રાંતિકારીઓને યાદ કરવાથી હંમેશા આપણને પ્રેરણા મળે છે.  ક્રાંતિકારી ઓ ની  વાર્તાઓ વારંવાર કહેવી જોઈએ જેથી કરી ને આપણા બાળકો ને યાદ રહે.

દત્ત તેની પત્ની, પુત્રી અને યુવાન દત્ત સાથે
આવી જ એક વાર્તા બટુકેશ્વર દત્તની છે, જે એક ક્રાંતિકારી હતા જે હિન્દુસ્તાન સોશિયાલિસ્ટ રિપબ્લિકન એસોસિએશન (HSRA) ના બોમ્બ નિષ્ણાત હતા જેમાં ચંદર શેખર આઝાદ, સરદાર ભગત સિંહ, રામ પ્રસાદ બિસ્મિલ, અશફાકુલ્લાહ ખાન, રોશન લાલ, સુખદેવ, રાજગુરુ અને અન્ય ઘણા લોકો સભ્ય હતા.

કોણ ભૂલી શકે છે કે 8 એપ્રિલ, 1929 ના રોજ નવી દિલ્હીની સેન્ટ્રલ લેજિસ્લેટિવ એસેમ્બલીમાં સ્મોક  બોમ્બ ફેંકવામાં આવ્યા ત્યારે બટુકેશ્વર દત્ત ભગત સિંહની સાથે હતા. તેઓ સરળતાથી ભાગી  શક્યા હોત પરંતુ તેઓ ત્યાં રહ્યા અને બ્રિટિશ સરકાર વિરુદ્ધ સૂત્રોચ્ચાર કર્યા.

જ્યારે ભગત સિંહ, રાજગુરુ અને સુખદેવને 23 માર્ચ 1931 ના રોજ ફાંસી આપવામાં આવી હતી, ત્યારે દત્તને કાલા પાણી ની સજા મળી. ૧૯૪૨ ની આસપાસ તેમને આઝાદી મળી. ભારતને આઝાદી મળ્યા પછી, દત્ત તેમના માટે સન્માનજનક રોજગાર માટે સરકારનો સંપર્ક કરતા રહ્યા, પરંતુ સરકારે તેમને કોઈ નોકરી આપી નહીં. દિલ્હીના એઈમ્સમાં સંસાધનોના અભાવે તેમનું દુઃખદ અવસાન થયું.

દુઃખ ની વાત એ છે કે દત્તનું મૃત્યુ અજાણ્યા વ્યક્તિ તરીકે થયું અને તેમના સમગ્ર જીવન દરમિયાન, તેમણે કાલા પાણી અને પછી ભારત છોડો ચળવળ દરમિયાન તેમનું સમગ્ર જીવન માં ભારતી ના ચરણો માં ધરી દીધું હતું.

બટુકેશ્વર દત્ત ઉર્ફે બીકે, બટ્ટુ અને મોહનનો જન્મ ૧૮ નવેમ્બર ૧૯૧૦ ના રોજ પૂર્વ બર્ધમાન જિલ્લાના ઓરી ગામમાં ગોષ્ઠ બિહારી દત્તને ત્યાં થયો હતો. તેમણે કાનપુરની પીપીએમ હાઇ સ્કૂલમાંથી સ્નાતક થયા જ્યાં તેઓ આઝાદ અને ભગત સિંહ જેવા ક્રાંતિકારીઓના સંપર્કમાં આવ્યા.

બોમ્બ બનાવવાનું શીખ્યા

HSRA ના સભ્ય હોવાને કારણે, દત્તે ટૂંક સમયમાં વિવિધ ગુપ્ત સ્થળોએ બોમ્બ બનાવવાનું શીખી લીધું જ્યાં HSRA ક્રાંતિકારીઓની સભાઓ રાખતી હતી. તેમણે જ દિલ્હીની વિધાનસભામાં તેમના અને ભગતસિંહ દ્વારા ફેંકવામાં આવેલા બોમ્બ બનાવ્યા હતા.

બોમ્બ ઘટના
૮ એપ્રિલ, ૧૯૨૯ના રોજ, ભગતસિંહ અને બટુકેશ્વર દત્તે નવી દિલ્હીમાં ખાલી જગ્યામાં સેન્ટ્રલ લેજિસ્લેટિવ એસેમ્બલીમાં બે સ્મોક  બોમ્બ ફેંક્યા હતા,

PTI
૮ એપ્રિલ, ૧૯૨૯ના રોજ, સિંહ અને દત્તે વિઝિટર ગેલેરીમાંથી  એસેમ્બલીની અંદર બે બોમ્બ ફેંક્યા. બોમ્બનો ધુમાડો હોલ ભરાઈ ગયો અને તેઓએ ઇન્કલાબ ઝિંદાબાદના નારા લગાવ્યા. બંને સરળતાથી ભાગી શક્યા હોત, પરંતુ તેમની ધરપકડ થવા દીધી, જેથી ટ્રાયલ તેમને મીડિયાની મદદથી લોકો સાથે જોડાવાની તક આપી શકે.
પત્રિકામાં દાવો કરવામાં આવ્યો હતો કે આ સાહસિક કાર્ય  સેન્ટ્રલ એસેમ્બલીમાં રજૂ થઈ રહેલા ટ્રેડ ડિસ્પ્યુટ્સ અને પબ્લિક સેફ્ટી બિલ અને લાલા લજપત રાયના મૃત્યુનો વિરોધ કરવા માટે કરવામાં આવ્યું હતું.

જેલમાં ભૂખ હડતાળ
ભગતસિંહ, સુખદેવ અને અન્ય ઘણા ક્રાંતિકારીઓ સાથે મળીને દત્તે બ્રિટિશરો દ્વારા રાજકીય કેદીઓ સાથે કરવામાં આવતી ભયાનક યાતના નો વિરોધ કરવા માટે જેલમાં ભૂખ હડતાળ શરૂ કરી હતી. તેઓ તેમના માટે કેટલાક અધિકારો મેળવવામાં પણ સફળ થયા હતા.

“મારા સાથીઓ વિના, હું કેવી રીતે ખાઈ શકું? તેમને પહેલા આવવા દો. હું ત્યાં સુધી મારા પુસ્તકમાં ડૂબી જઈશ. મને ખબર પણ નહીં પડે કે સમય કેવી રીતે પસાર થાય છે,” બટુકેશ્વરે ઇન્ડિયન રિવોલ્યુશનરીઝ એ કોમ્પ્રીહેન્સિવ સ્ટડી, 1757-1961 ના બીજા ખંડમાં તેમની ભૂખ હડતાળ દરમિયાન આ કહેતા ટાંકવામાં આવ્યા હતા.

જ્યારે ભગતસિંહ, રાજગુરુ અને સુખદેવને લાહોર કેસમાં ફાંસી આપવામાં આવી હતી જેમાં એએસપી સોન્ડર્સની રાજગુરુ દ્વારા હત્યા કરવામાં આવી હતી.  ૧૯૨૯માં સેન્ટ્રલ લેજિસ્લેટિવ એસેમ્બલી પર બોમ્બમારો કરવા બદલ દત્તને આંદામાન સેલ્યુલર જેલમાં મોકલવામાં આવ્યા હતા. ૧૯૪૨માં તેમને જેલમાંથી મુક્ત કરવામાં આવ્યા હતા.
દત્ત ને એ વાત નું પણ દુઃખ હતું કે ભગતસિંહ સાથે તેમને કેમ ફસી ન આપવામાં આવી.
પરંતુ તેમણે ભારત છોડો ચળવળમાં ભાગ લીધો હતો અને ફરીથી જેલમાં મોકલવામાં આવ્યા હતા

તેમને બીજા ચાર વર્ષ જેલમાં વિતાવવા પડ્યા હતા.

ભારતને આઝાદી મળી, પરંતુ દત્ત ગુમના રહ્યા.

દત્તને જેલમાં ટીબી થયો હતો અને સ્વતંત્રતા પછી, તેમણે નવેમ્બર ૧૯૪૭માં લગ્ન કર્યા. તેમને સરકાર તરફ થી કોઈ મદદવ મળી ન હતી અને તેમણે રોજગાર મેળવવા માટે સરકારી મદદ મેળવવાનો પ્રયાસ કર્યો હોવા છતાં, તેમને કોઈ નોકરી મળી ન હતી. પરિણામે, તેમને ઘણા વ્યવસાયો શરૂ કરવાની ફરજ પડી હતી પરંતુ બધા નિષ્ફળ ગયા.
એમ્સ, દિલ્હીમાં તેમનું અજાણ્યા વ્યક્તિ તરીકે અવસાન થયું
દત્ત ગુજરાન ચલાવવા માટે સંઘર્ષ કરી રહ્યા હતા અને ટીબીના લાંબા રોગે પરિવાર પાસે ની બધી જ બચત પૂરી થઈ ગયેલ. સંસાધનોની અછતમાં લાંબા સમય સુધી લાંબી બીમારી સામે લડ્યા પછી દત્તનું અજાણ્યા વ્યક્તિ અવસાન થયું.  દત્ત તેમના બધા સાથીઓ કરતાં વધુ જીવ્યા અને 20 જુલાઈ 1965 ના રોજ AIIMS હોસ્પિટલમાં તેમનું અવસાન થયું. પંજાબના ફિરોઝપુર નજીક હુસૈનીવાલામાં તેમના અંતિમ સંસ્કાર કરવામાં આવ્યા હતા જ્યાં ઘણા વર્ષો પહેલા સાથી મિત્રો ભગત, રાજગુરુ અને સુખદેવના મૃતદેહોને અગ્નિસંસ્કાર આપવામાં આવ્યા હતા.

આ એક એવી  વાર્તા છે કે આઝાદ ભારતે તેના સ્વાતંત્ર્ય સેનાનીઓ સાથે કેવું વર્તન કર્યું અને દત્ત પ્રમાણમાં જાણીતા વ્યક્તિ હતા છતાં સ્વતંત્રતા પછી ભારત સરકાર દ્વારા તેમને કોઈ પણ મદદ આપવામાં આવી ન હતી, કોઈ સરળતાથી કલ્પના કરી શકે છે કે કેટલા સ્વાતંત્ર્ય સેનાનીઓએ તેમના યોગદાનને માન્યતા આપવાનો ઇનકાર કર્યો હતો જે માં ભારતી ની સ્વતંત્ર  માટે  લડ્યા હતા.
આ વાર્તા એવા હજારો ક્રાંતિકારી ઓ ની છે.જેમને આઝાદી પછી સરકાર તરફ થી કોઈ પણ મદદ મળી ન હતી હતી. ગુમનામી ,ગરીબી ,આર્થિક તકલીફ માં મૃત્યુ થયું.
જય હિન્દ 🚩
વંદે માતરમ્ 🚩
#Batukeshwar_Dutt
#Bhagat_Singh