Posted in खान्ग्रेस, नहेरु परिवार - Nehru Family

पटेल के करीबी पुरुषोत्तम दास टण्डन को कांग्रेस अध्यक्ष से हटाना हो, हिन्दुराष्ट्र की बात हो, गौहत्या प्रतिबन्ध की बात हो, मुस्लिमों को पाकिस्तान भेजने की बात हो.. हर चीज पर नेहड़ु का एक ही ट्रम्प कार्ड था “मैं इस्तीफा दे दूंगा”। इससे पहले भी गांधी के कंधे पर बंदूक रखकर बोस से लेकर पटेल को हटवाना भी आप सब जानते हैं। आज नेहड़ु की औलादें जिस लोकतंत्र की दुहाई देती हैं उसने हमेशा लोकतंत्र को अपनी जेब मे रखा। यहां तक कि अपना खानदान कैसे स्थापित हो इसके जुगाड़ भी वो इंदिरा को अध्यक्ष बना कर गए थे।

ये वही नेहड़ु थे जो अपने को दुर्भाग्य से हिन्दू कहते थे लेकिन अपने आगे इन्होंने पंडित लगा रखा था ताकि इनका नाम सुन विद्वता छलके। आज बहुत से लोग इसी तरह अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाना पसन्द करते हैं। वामपंथ से इतना लगाव था कि पूरे देश मे रूसी मॉडल थोप दिया जिसमें सबसे प्रमुख था हर चीज का सरकारीकरन करना। वामपंथ का इतना बड़ा कीड़ा था कि एक व्यक्ति को देश का रक्षामंत्री इसलिए बना दिया गया क्योंकि न सिर्फ वो इनका दोस्त था बल्कि इनसे ज्यादा नही तो इनके ही बराबर का वामपन्थी था। उसका नाम था कृष्णा मेनन। इन दोनों की ही जोड़ी ने भारत को चीन से 1962 के युद्ध मे हरवाया था और यही जोड़ी थी जिसने देश का पहला घोटाला किया था जिसका नाम था जीप घोटाला।

यही वो नेहड़ु थे जिन्होंने इस देश से सेना को ही खत्म करने की कोशिश की थी। अंग्रेजो के समय की सेना जो 25 लाख थी उसे घटाकर 3 लाख कर दिया और इससे भी मन नही भरा तो कहा कि भारत अब आजाद है और हमारा कोई दुश्मन नही तो सेना की क्या जरूरत है। आंतरिक मामलों के लिए पुलिस ही काफी है। सेना को बस नाम मात्र के लिए रख दो जो झांकी वगेरह में काम आएगी बस। बाद में जब चीन ने हमला किया तो जाकर सेना को पुनः मजबूत करने का काम हुआ था।

यही नही, इन्ही नेहड़ु ने भारत की ऑर्डिनेंस फेक्ट्री भी बन्द करवानी चाही जो उस समय इतने गोला बारूद बनाती थी कि विदेशों में भी निर्यात हुआ करते थे। कारण वही था कि जब हम  अहिंसक देश हैं तो न सेना की जरूरत है और न हथियारों की। इसकी जहग इन फक्ट्रियों मे बर्तन भांडे बनाने की सलाह दी गयी। यही वो अदूरदर्शी नेहड़ु भी थे जिन्होंने जब चीन तिब्बत पर हमला कर रहा था तो भारत पर खतरा देखना छोड़ो उल्टा चीनी सैनिकों को यहां से चावल भिजवाए ताकि वो भूखे न रहें और तिब्बत पर कब्जा कर सकें जबकि तिब्बत उस समय भारत की ओर देख रहा था कि भारत रक्षा करने आएगा। आज उसी वजह से भारत की सीमा चीन से लगती है और 1962 के बाद चीन ने भारत के अक्साई चीन पर कब्जा किया हुआ है जिसे फिर संसद में नेहड़ु ने बंजर जमीन बताया था।

अदूरदर्शी नेहड़ु के किस्से यहां तक हैं कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी इन्हें चीन की मंशा से अवगत रहे थे तो इनका ध्यान राष्ट्रीय सुरक्षा पर नही बल्कि केनेडी की पत्नी जैकलीन पर था। नेहड़ु जैकलीन से इतने मंत्रमुग्ध थे कि उसकी फोटो इन्होंने अपने घर पर लगा रखी थी। कैनेडी इस बात से हैरान थे कि कोई राष्ट्राध्यक्ष इस स्तर का कैसे हो सकता है क्योंकि केनेडी न सिर्फ चीनी हरकतों से नेहड़ु को आगाह करवा रहे थे बल्कि उन्होंने भारत को परमाणु सम्पन्न देश बनवाने का प्रस्ताव भी दिया था ताकि चीन से पहले भारत यह हासिल कर दे तो चीन फिर अपनी नापाक मंशा पर लगाम लगा ले।

वो भी नेहड़ु ही थे जब चीन में माओ के कब्जे करने के बाद भारत को यह प्रस्ताव दिया गया कि आप संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता ले लीजिए तो नेहड़ु ने इसे मना कर चीन को ही देने को कहा। आज भी हम कितनी बार उसी चीनी वीटो के शिकार होते हैं। यही वो नेहड़ु थे जब माओ ने हमला कर दिया तो इन्होंने सेना को असम तक से पीछे हटने को कह दिया था जिसका मतलब होता कि आज असम तक चीन का कब्जा होता।

हुआ ये कि एक अदूरदर्शी प्रधानमंत्री के रहते जब चीन ने हमला कर दिया तो हमारी सेना तैयार ही नही थी। नेहड़ु और उसके मित्र मेनन जिन दोनों को युद्ध का अता पता नही था उन्होंने सेनाध्यक्ष के भारत को डिफेंसिव मोड की सलाह को इग्नोर कर सेना को फॉरवर्ड पालिसी अपनाने को कह दिया। सेनाप्रमुख इसके लिए तैयार नही थे तो इन्होंने उनकी जगह दूसरे नम्बर के अधिकारी को जिम्मा दे दिया जो भी सेना में रसद कार्य देखा करता था। हालत यह थी कि भारत की सेना के दो प्रमुख अधिकारी ही आपस मे लड़ा दिए गए। जब फॉरवर्ड पालिसी के तहत सेना आगे बढ़ी तो जिन नक्शो को उन्हें दिया गया वहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर था ही नही बल्कि वो पूरा जंगल था। परिणाम यह हुआ कि उस समय नेतृत्व सम्भाल रहे सेकेंड लेफ्टिनेंट को चीनियों ने बन्दी बना लिया जो 7 महीने तक चीन के कब्जे में रहे थे। ये लोग इतने बड़े वामपंथ परस्त थे कि ये खुद कहते थे कि अंग्रेजो ने जो मैकमोहन रेखा बनाई है वो गलत है और चीन का जो अरुणांचल में दावा है वो सही है। वो तो इन सब हरकतों के बाद भी सेना का शौर्य था कि इतने अभाव के बाद भी उन्होंने लड़ने का जज्बा रखा और आज भी हार के दंश के बाद भी नार्थ ईस्ट हमारे पास ही है।

इन सब हरकतों के बाद जब इसपर संसद में इनसे हार का कारण पूछा गया तो इन्होंने तरह तरह के बहाने बनाये। बहाना बनाया गया कि भारत के पास धन का अभाव था जबकि हकीकत ये थी भारत की महिलाओं ने अपने जेवर सेना को दिए थे ताकि किसी तरह की कमी न हो लेकिन उनमें से अधिकांश जेवर सरकारी खजाने तक पहुंचे ही नही बल्कि अधिकारियों ने गायब कर अपनी पत्नियों को दे दिए। इन सब के बाद हंगामा बढ़ता देख नेहड़ु ने अपने दोस्त मेनन को बलि का बकरा बनाया और उसका इस्तीफा ले लिए और इन सब कुकर्मों से खुद को बचा लिया।

इससे पहले भी नेहड़ु ही थे जो भारतीयों पर विश्वास नही करते थे। या यूं कहें कि सत्ता के हस्तांतरण की कीमत चुकाई जा रही थी। यही वजह थी कि आजादी के बाद भारत का वायसराय अंग्रेज को ही रहने दिया। सेना के अध्यक्ष भी अंग्रेज ही रहे। इंटेलिजेंस की रिपोर्ट भी लण्डन ही जाया करती थी। अधिकतर प्रशासनिक अधिकारी भी अंग्रेज ही थे। अंग्रेजो की ही नीति थी जिसके कारण कश्मीर पर माउंटबेटन की सलाह से काम किया गया और फिर उसे UN में फंसा दिया गया जो आज भी समस्या है। वो तो भला हुआ जो बाकी रियासतें सरदार पटेल ने संभाली जिसकी वजह से भारत आज जैसा दिखता है वो सम्भव हुआ क्योंकि नेहड़ु तो पुर्तगालियों से गोवा छुड़ाने के पक्ष में भी नही थे।

यही वो नेहड़ु थे जिन्होंने नेपाल को भारत मे मिलाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया। बलूचिस्तान को मिलाने से ये कहकर मना कर दिया कि उसकी सीमा भारत से नही मिलती जबकि उस समय पाकिस्तान ने बहुत दूर पूर्वी पाकिस्तान(बंगलादेश) के लिए ऐसा नही सोचा। ओमान हो या ग्वादर उसे भारत को खरीदने को प्रस्ताव हुआ पर उसे मना कर दिया। आज उसी ग्वादर के सहारे चीन अरब सागर में घुस भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा कोको आइलैंड जो बर्मा से 900 किलोमीटर एक महत्वपूर्ण द्वीप है उसे लेने से मना कर दिया जिसे बाद में बर्मा ने चीन को बेच दिया। साथ ही मणिपुर की स्ट्रेटजिक जगह काबू व्हेली दोस्ती के तौर पर बर्मा को गिफ्ट कर दी जिसे बर्मा ने चीन को ऑपरेट करने को दे दिया जहाँ से चीन भारत पर नजर रखता है।

आज भी राष्ट्रीय समस्याएं जो हमें दिखती हैं वो भी नेहड़ु की ही देन हैं। आरक्षण जिसपर आजकल EWS के नाम पर हल्ला है उसे 10 साल के लिए लाया गया था लेकिन राजनीति के चलते वो आज तक नासूर है। भाषाओं के नाम पर जो उत्तर दक्षिण होता है उसमें भी 15 साल के अंदर राष्ट्रीय भाषा हिंदी बनाने का प्रस्ताव था जो आज तक लंबित है। बंटवारे के समय जब सभी मुस्लिमों को पाकिस्तान भेजने की बात हुई तो न सिर्फ उन्हें रोका गया बल्कि उन्हें एकमुश्त बसाये रखा जिसपर राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने चिट्ठी लिखी थी कि ये एक और पाकिस्तान बनाने वाले काम हैं। जो 370 अब जाकर हटा है उसमें भी 35a इस तरह जोड़ दिया गया कि वहां रहने वाला हिन्दू अपने ही देश में पराया कर दिया गया। आज भी CAA का विरोध ऐसे ही हिंदुओं के लिए किया जाता है। आज जो मन्दिरों पर हिन्दू दावों के विरोध में बाते होती हैं उसके बीज भी नेहड़ु के समय के हैं जब सोमनाथ मंदिर के पुनरुत्थान का विरोध नेहड़ु ने किया था। बाद में जब राममन्दिर आंदोलन हुआ तो वरशिप एक्ट लाया गया। नेहड़ु ही थे जिन्होंने हिन्दू कोड बिल लाकर हिंदुओं को तो आधुनिक होने के नाम पर बांध दिया लेकिन ऐसा ही बिल मुस्लिमों के लिए लाने से मना कर दिया। आज भी UCC की लड़ाई जारी है और ऐसा बिल पेंडिंग है। नेहड़ु ही थे जिन्होंने 1954 में वक्फ एक्ट बनाया जिसपर फिर 1964 में वक्फ बोर्ड बनाया गया जिसमें भारत की बेतहाशा जमीन मुसलमानों को दे दी गयी और आज भी मुसलमान कहीं भी मजार आदि बना उसपर इसी वक्फ के तहत दावा कर देते हैं कि ये उनकी जमीन है। भारत मे मन्दिर हो या अम्बानी का घर, हर जमीन पर इसी एक्ट के तहत दावा किया जाता है कि उनकी जमीन है।

ऐसे कितने ही पाप हैं जो भारत के महान प्रधानमंत्री द्वारा जाने अनजाने में किये गए हैं और फिर भी उनकी महानता के ढोल बेशर्मी से इस देश मे बजाए जाते हैं। आप खुद सोचिए कि इसमे से एक भी गलती आज के समय कोई प्रधानमंत्री कर दे तो हम आप ही उसकी कुर्सी छीनने को सड़कों पर आ जाएंगे लेकिन वो तो नेहड़ु थे तो उनके 1000 खून भी माफ बताये जाते हैं भले ही आज की अधिकांश समस्याएं उनकी ही देन हैं। इसके अलावा उनकी वफादारी कब किसके प्रति रही है उसकी बात तो की ही नही गयी है। आजाद से लेकर बोस के समय अंग्रेजों से दोस्ती हो या आजादी के बाद स्टालिन से, वो किस्से भी अपने आप मे बहुत कुछ बता जाते हैं।

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