700 साल पुराना शाप जो आज भी कूच बिहार को डराता है
केंदु कलि जी की भक्ति,श्राप और पुनर्जन्म “कामेश्वर की वापसी” में हुआ
जानिए कामाख्या मंदिर की रहस्यमयी कहानी
आखिर क्यों मां कामाख्या ने अपने ही
पुजारी का मस्तक छेद कर दिया होगा ?
ऐसा कौन सा श्राप था जिसके श्राप के कारण कामाख्या के जो राज परिवार है वे आज भी जय सालों के उपरांत के बाद भी मां कामाख्या के दर्शन नहीं कर पाते हैं आखिर क्यों मां कामाख्या ने सदैव लिए नीलांचल क्षेत्र को छोड़ दिया था ?
कामाख्या मंदिर से जुड़ी कई महान तांत्रिक, मंत्र और अघोरी साधकों की कथाएँ हैं। उन्हीं में से एक कथा जुड़ी है केन्दुगलि जी से। केन्दुगलि मां कामाख्या के मुख्य पुजारी थे और गर्भगृह में पूजा-अर्चना करते थे। वे मां के महान उपासक थे।
अब हुआ यह कि वहां के जो राजा थे नर नारायण वे भी मां कामाख्या के परम भक्त थे। वे कूच बिहार राजवंश से थे, जिसे कोच बहार वंश के नाम से भी जाना जाता है। राजा नर नारायण मां के अत्यंत भक्त होने के कारण प्रतिदिन दर्शन हेतु नीलांचल क्षेत्र में आया करते थे। नीलांचल, वह पर्वत है जहाँ मां कामाख्या निवास करती हैं, इसलिए उन्हें ‘नीलांचलवासिनी’ भी कहा जाता है।
जब राजा दर्शन हेतु नीलांचल आते, तो उनकी भेंट केन्दुगलि जी से होती। वे उन्हीं के माध्यम से मां की पूजा-अर्चना करवाते थे। केन्दुगलि जी मां के इतने बड़े भक्त थे कि उनके पास आई, वे (केंदुगली जी) ऐसे महान भक्त थे जो भक्तों की हर समस्या का समाधान करने में सक्षम थे।
एक बार एक माता उनके पास आई, जिसके हाथों में उसकी मृत बच्ची थी। वह रो-रोकर कहने लगी ‘आप ही मेरी अंतिम आशा हैं। मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि मां की कृपा और आशीर्वाद से मेरी बेटी को फिर से जीवन मिले।
केंदुगली जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया माता, यह संभव नहीं है। क्योंकि एक बार जिसकी मृत्यु हो जाती है, वह जीवित नहीं हो सकता। लेकिन उस माता को केंदुगली जी पर अपार विश्वास और श्रद्धा थी। उसने कहा मुझे विश्वास है, अगर आप एक बार मां से कहेंगे, तो वह आपकी बात को मना नहीं कर पाएंगी।
केंदुगली जी बोले आपकी श्रद्धा को प्रणाम। मैं मां से आपके लिए प्रार्थना अवश्य करूँगा, बाकी सब मां की इच्छा पर निर्भर करेगा।
इसके बाद उन्होंने उस मृत बच्ची को गोद में उठाया और मां की पाषाण प्रतिमा, अर्थात ब्रह्मांड-योनि पर जाकर उसे रख दिया। जैसे ही केंदुगली जी ने आंखें मूंदकर मां से प्रार्थना की
“हे मां! यदि मेरे हृदय में सच्ची भक्ति है, यदि आप मेरे साथ हैं, तो इस नन्ही जान को फिर से जीवनदान दीजिए…”
तभी चमत्कार हुआ। मां की शक्ति प्रकट हुई और वह मृत बच्ची धीरे-धीरे अपने आप हिलने लगी… उसके शरीर में फिर से प्राण लौट आए…”
केंदुगली जी की इस विनम्र प्रार्थना पर मां ने कृपा की। मृत बच्ची को जीवनदान मिला वह फिर से जीवित हो गई।
यह चमत्कारी घटना धीरे-धीरे पूरे नगर में फैल गई। अंततः इसकी खबर राजा नरनारायण तक भी पहुँची। जब राजा ने सुना कि केंदुगली जी इतने सिद्ध महायोगी हैं कि उनके माध्यम से मां स्वयं किसी को जीवनदान दे सकती हैं तब उनके मन में भी गहरी श्रद्धा जाग उठी। राजा ने इच्छा व्यक्त की कि वे भी मां के साक्षात दर्शन करना चाहते हैं।
उधर उस क्षेत्र के लोगों को यह भलीभांति ज्ञात था कि जब मंदिर के पट रात्रि में बंद हो जाते हैं, तब केंदुगली जी अपनी आँखों पर पट्टी बांध लेते हैं और मां की पूजा-अर्चना करते हैं। उस समय मां कामाख्या स्वयं प्रकट होती थीं।
मां के प्रकट हो जाने के बाद भी केंदुगली जी की स्तुति, उनका भजन, उनका मंत्रोच्चार कुछ भी नहीं रुकता था। वे पूरी भक्ति में लीन हो जाते थे और मां के लिए भावविभोर होकर श्लोकों का गान करते थे।
माना जाता है कि उस समय मां स्वयं नृत्य करती थीं वह भी नग्न रूप में। क्योंकि मां कामाख्या ब्रह्मांड योनि की अधिष्ठात्री देवी हैं।
मां कामाख्या का संबंध स्वयं ब्रह्मांड योनि से है।
यह वही स्थान है जहाँ देवी सती का योन भाग स्थापित हुआ था यानी वह शक्ति-केन्द्र, जहाँ से संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति मानी जाती है। यही वह नीलांचल क्षेत्र है, जिसे आज कामाख्या धाम के रूप में जाना जाता है।
केंदुगली जी, जो मां के परम भक्त और गर्भगृह के प्रधान पुजारी थे, उन्हीं के पास एक दिन राजा नरनारायण आए जो कोच बिहार वंश के महान शासक और मां के अनन्य उपासक थे।
राजा ने विनती की “मैं भी मां के दिव्य दर्शन करना चाहता हूं। कृपया मुझे गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दीजिए।”
केंदुगली जी ने स्पष्ट कहा
“राजन, यह मैं नहीं कर सकता। क्योंकि जब मैं स्वयं मां की पूजा करता हूं तो रात्रि में, मंदिर के कपाट बंद होने के बाद मैं भी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर मां का पूजन करता हूं। बिना मां की अनुमति के गर्भगृह में कोई भी उपस्थित नहीं रह सकता।
लेकिन राजा नरनारायण अपनी जिद पर अड़े रहे।
उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद सभी उपाय अपनाकर केंदुगली जी को विवश कर दिया।
विवश होकर केंदुगली जी ने कहा
“ठीक है राजन, मैं आपको गर्भगृह में तो नहीं ला सकता, लेकिन वहां एक छेद है एक छोटा सा छिद्र जहां से आप मां को दर्शन करते हुए देख सकते हैं।
“मैं जब स्तुति गाना आरंभ करूंगा, तभी आप झांक सकते हैं। लेकिन ध्यान रहे यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप उस मर्यादा का उल्लंघन न करें।
आप उस छिद्र से बस एक नज़र कीजिएगा जैसे ही आपकी दृष्टि जाएगी मां साक्षात प्रकट हो चुकी होंगी…”यही वादा किया था केंदुगली जी ने राजा नरनारायण से।
रात्रि का समय हुआ और मंदिर के कपाट बंद किए गए। केंदुगली जी ने आंखों पर पट्टी बांधी और स्तुति गाना प्रारंभ किया। जैसे ही उनका भजन आरंभ हुआ मां कामाख्या गर्भगृह में प्रकट हो गईं। लेकिन नृत्य शुरू होने से पहले ही मां को यह आभास हो गया कि उनके साथ छल हुआ है। किसी ने उनकी मर्यादा को भंग करने का प्रयास किया है।
मां ने क्रोधित होकर सर्वप्रथम केंदुगली जी का सिर धड़ से अलग कर दिया क्योंकि उन्होंने ही गुप्त रूप से राजा को दर्शन देने की छूट दी थी। इसके बाद मां ने राजा नरनारायण को श्राप दिया
“अब से तुम्हारा वंश कूच बिहार राजवंश यदि इस पवित्र क्षेत्र में भटकने की भी कोशिश करेगा, तो मैं उसका नाश कर दूंगी। इस राजवंश का अंत निश्चित है।
यह श्राप इतना शक्तिशाली और अनुल्लंघनीय था कि राजा नरनारायण ने उसी क्षण नीलांचल पर्वत क्षेत्र को सदा के लिए छोड़ दिया।
आज भी जब कूच बिहार वंश के कोई वंशज ट्रेन, बस या किसी अन्य साधन से कामाख्या क्षेत्र से गुजरते हैं तो वे मौन हो जाते हैं, सिर झुका लेते हैं। वे मां के दर्शन का प्रयास तक नहीं करते। ऐसा माना जाता है कि यदि उन्होंने मां की ओर आंख उठाकर भी देखा, तो अनिष्ट निश्चित है।
यह कथा केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, अपितु उस दैवी चेतना का प्रमाण है जो मां कामाख्या की ऊर्जा और मर्यादा में आज भी विद्यमान है।
कुछ लोग कहते हैं कि जब भी कूच बिहार वंश के राजा या उनके वंशज कामाख्या क्षेत्र से गुजरते हैं चाहे ट्रेन से, चाहे कार से, वे सदैव अपने बाजू में एक छतरी (अंब्रेला) खोल देते हैं। इसका उद्देश्य होता है कि गलती से भी उनकी दृष्टि मां कामाख्या की ओर न चली जाए।
दूसरी ओर, केंदु कलि जी के संबंध में दो रहस्यमयी कथाएं मिलती हैं।
🔹 पहली कथा यह कहती है कि जब मां ने क्रोध में आकर राजा नरनारायण को श्राप दिया, तब मां ने केंदु कलि जी का शिर भी धड़ से अलग कर दिया क्योंकि उन्होंने मां की अनुमति के बिना राजा को दर्शन की युक्ति बताई थी।
🔹 वहीं दूसरी कथा के अनुसार, मां ने क्रोध में आकर उन्हें पत्थर की मूर्ति में परिवर्तित कर दिया था। आज भी कहा जाता है कि कामाख्या के गुप्त गर्भगृह में एक विशेष पत्थर की आकृति है, जिसे कुछ साधक केंदु कलि जी का अवशेष मानते हैं।
राजा नरनारायण और उनके वंशजों (कूच बिहार राजवंश) के विषय में यह भी कहा जाता है कि वे मां के उस श्राप के भय से आज भी उस क्षेत्र में सीधे नहीं आते। कुछ लोग कहते हैं कि इस वंश के किसी भी सदस्य को कामाख्या क्षेत्र से गुजरते समय भी माँ के मंदिर की ओर देखने की अनुमति नहीं है।
एक लोक कथा के अनुसार, कथा है केंदु कलि जी का पुनर्जन्म “कामेश्वर की वापसी” में हुआ
मां कामाख्या के परम उपासक, तांत्रिक केंदु कलि जी, जब राजा नरनारायण की छलबल का शिकार बने और मां के क्रोध से उनका सिर धड़ से अलग हो गया तो मां के करुण रूप ने उस क्षण ही उन्हें एक वचन दिया।
“हे तांत्रिक! तुमने भले ही मुझसे धोखे में राजा को छिद्र दर्शन की छूट दी, परंतु तुम्हारी भक्ति निष्कलंक है। मैं तुम्हें पुनर्जन्म दूंगी तुम फिर लौटोगे, और इस बार तुम मेरे लिए ‘कामेश्वर’ रूप में मेरे तंत्र को संवारोगे।”
यह वचन केवल एक आशीर्वाद नहीं था, बल्कि मां का आदेश था।
पुनर्जन्म की भविष्यवाणी और संकेत
कहते हैं, मां कामाख्या ने भविष्यवाणी की थी कि
“मेरी महाशक्ति की जब तीसरी लहर जागेगी, तब तुम पश्चिम से लौटोगे — तुम्हारे मस्तक पर त्रिशूल की आकृति होगी, और बाल्यकाल से ही तुम्हें मृत आत्माओं के साथ संवाद की क्षमता होगी। तुम पुनः मेरे प्रांगण में तांत्रिक महामंडल की स्थापना करोगे।
केंदु कलि जी का पुनर्जन्म बंगाल में
कई लोककथाओं के अनुसार, मां का यह वचन सत्य हुआ।
17वीं शताब्दी के अंत में बंगाल के नवद्वीप क्षेत्र में एक बालक जन्मा जो बचपन से ही शव साधना की ओर आकर्षित था। उसे लोग “महाश्मशानी बालक” कहकर बुलाते थे। बालक का नाम इतिहास में नहीं मिलता, लेकिन तांत्रिक ग्रंथों और साधकों के अनुसार वह ही केंदु कलि जी का पुनर्जन्म था।
इस बालक ने बाद में
मां तारा पीठ, तारापीठ (बीरभूम, बंगाल) में तपस्या की
13 वर्षों तक शव साधना की
कामाख्या पीठ में लौटकर “कामेश्वरानंद” नाम से फिर से मां के पूजा स्थल का तांत्रिक शुद्धिकरण किया
महाअग्नि यज्ञ और तृतीय चक्र स्थापना
यह भी कहा जाता है कि उन्हीं के प्रयास से कामाख्या मंदिर में
तृतीय यंत्र चक्र (गुप्त योनि चक्र) की स्थापना हुई
64 योगिनियों की छाया साधना की पुनः स्थापना हुई
और नागा साधुओं व अघोरियों को अलग-अलग दीक्षा पद्धति में बांटा गया
इस कथा का रहस्य और सीमाएँ
यह कथा तांत्रिक ग्रंथों या प्रमाणिक शास्त्रों में नहीं मिलती
कामाख्या मंदिर के पुरातन पुजारियों द्वारा सुनाई जाती है
अघोरपंथ, वामाचार साधकों व बंगाल के तांत्रिक अखाड़ों में इसे “गुप्त कथा” माना जाता है
साधकों के अनुसार “केंदु कलि का पुनर्जन्म” ही कामाख्या की दूसरी आध्यात्मिक क्रांति का कारण बना था
