1975 मे आपातकाल लगाते ही इंदिरा गाँधी का कहर दो महिलाओ पर टूट पड़ा।
एक ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया और दूसरी जयपुर की राजमाता गायत्री देवी, बड़े घर की महिलाओ के विरुद्ध हत्या या अपहरण के मामले तो मिलने नहीं थे।
इसलिए एक नया आरोप लगाया कि इनके पास विदेशी मुद्रा शेष है जिसका हिसाब नहीं दिया गया। शुरुआत गायत्री देवी से हुई, दोष बाद मे जेल पहले। गायत्री देवी को बिना किसी दोष के तिहाड़ जेल मे डाल दिया गया।
उन्हें एक दुर्गन्ध से भरा छोटा सा सेल दिया गया, महाराज भवानी सिंह को भी कैद किया गया जबकि वे सेना मे सेवा दें चुके थे। हालांकि माँ बेटे शाम को मिल सकते थे, गायत्री देवी को सूचित किया गया कि उनके कक्ष मे विजया राजे को भी रखा जाएगा।
कक्ष मे दो पलंग रखने की जगह ही नहीं थी। विजया राजे सिंधिया को बगल वाला कक्ष दिया गया, शाम के समय भवानी सिंह ज़ब गायत्री देवी से मिलने आये तो विजयाराजे को देख उनके पैर छुए।
भवानी सिंह सिंधिया के बेटे माधवराव के बारे मे पूछना चाहते थे मगर सुरक्षा कर्मियों के डर से कुछ नहीं कहा। दोनों राजमाताये सम्पन्न राजघरानो की राजकुमारिया थी, सम्पन्न घरानो की महारानी बनी और अब राजमाताये थी।
दोनों के कक्ष के सामने एक नाली बहती थी, खाना खाते समय उनका एक हाथ मच्छर भगाने मे व्यस्त होता था। उन्हें खूंखार महिलाओ के बीच रखा गया था, जिनमे से एक उन्हें ब्लेड दिखाकर डराया करती थी।
ब्रिटेन मे लॉर्ड माउंटबेटन ने महारानी एलिजाबेथ से गायत्री देवी की रिहाई के लिये अनुरोध करने को निवेदन किया। भारतीय उच्चायुक्त ने इसका विरोध किया, भारतीय सेना ने भी भवानी सिंह के लिये अनुरोध किया।
दूसरी ओर राजमाता विजयाराजे पर जो विदेशी मुद्रा के आरोप लगे थे वे गलत पाए गए। राजमाता की बेटियों को नहीं पता था कि उन्हें किस अपराध मे और किस जेल मे रखा गया है।
विजया राजे को परेशान करने के लिये 5 डॉलर की हेराफेरी का मुकदमा भी डाल दिया गया, दोनों राजमाताओ के स्वास्थ्य मे भयावह गिरावट हुई। मध्यप्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखनी पड़ी।
गायत्री देवी को अस्पताल मे उस वार्ड मे शिफ्ट किया गया जिसमे चूहें थे, वही विजयाराजे को तुलना मे थोड़ा अच्छा सेटअप मिल गया। गायत्री देवी को लिखित मे देना पड़ा कि वे इंदिरा गाँधी के प्रति वफादारी रखेगी तब जाकर उन्हें रिहा किया गया।
वही इंदिरा गाँधी जिनका पौता आजकल लोकतंत्र का स्वघोषित वकील है, विजयाराजे से किसी को मिलने नहीं दिया जाता। लेकिन एक दिन अस्पताल मे एक अन्य मरीज जबरदस्ती उनके कमरे मे घुस गया।
ये आगंतुक कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला थे, राजमाता को प्रणाम किया तो उन्होंने पास वाले स्टूल पर बैठने का इशारा किया लेकिन अब्दुल्ला शिष्टाचार वश बराबरी मे नहीं बैठे।
अब्दुल्ला स्तब्ध थे, विजयाराजे बहुत कमजोर हो चुकी थी। उसी बीच एक सिपाही आ गया जिसने अब्दुल्ला को बाहर कर दिया। खैर 5 डॉलर का मुकदमा भी कितने ही दिन चलता।
विजयाराजे को जमानत पर रिहा किया गया, ज़ब राजमाता जेल से बाहर आयी तो महिला कैदियो ने फूलो से स्वागत किया। जेल के बाहर उनकी तीनो बेटियां वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे और उषा राजे उनकी प्रतीक्षा कर रही थी।
भवानी सिंह और माधवराव दोनों भविष्य मे कांग्रेस मे आये, भवानी सिंह का करियर असफल रहा लेकिन माधवराव का सितारा खूब चमका।
आज भवानी सिंह की बेटी दिया कुमारी राजस्थान की उपमुख्यमंत्री है जबकि माधवराव के बेटे ज्योतिरादित्य केंद्रीय दूरसंचार मंत्री।
समय का फेर देखिए राजमाताओ के पौते पौती मंत्री बने बैठे है जबकि इंदिरा का पौता जमानत पर आवारा घूम रहा है।
एंटी इनकमबेंसी बन जायेगी अन्यथा अमित शाह से गुजारिश होती कि इंदिरा गाँधी तो चली गयी मगर सोनिया गाँधी को भी 6 महीने ना सही 2 महीने के लिये तो तिहाड़ के दर्शन करा देते।
जमानत पर बाहर है गृहमंत्री ज़ब चाहे पिंजरे मे डाल सकते है, मगर जनता भावुक होती है, कांग्रेस के लिये सहानुभूति की लहर बनने का खतरा है। ये माँ बेटे बीजेपी की जीत की गारंटी है।
वही राजमाताओ की इस गाथा से इतना तो साफ है कि जेल का डर भी जेल से कम भयावह नहीं होता।
