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गुस्से को काबू में रखना मित्रों…!

क्योंकि लेख में कांग्रेस के एक ऐसे कारनामे का जिक्र करुंगा जिसको पढ़कर आपको जोरदार गुस्सा आने वाला है।

लेख पूरा पढ़िए…

ऐसा खुलासा करुंगा दंग रह जाएंगे आप…

क्या आप जानते हैं कि सैयद गुलाम मोहियुद्दीन अहमद बिन खैरूद्दीन अल हुसैनी आखिर कौन था.?

नाम लंबा है इस लिए

आगे से सिर्फ “हुसैनी” लिखूंगा आप समझ लेना।

हुसैनी कांग्रेस के एक बड़े नेता थे।

कांग्रेस ने इसे हिन्दू मुस्लिम एकता का पोस्टर बॉय और सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा ठेकेदार बना रखा था।

1947 में आजादी मिलने के तुरंत बाद हुसैनी उस समय के तत्कालीन गृहमंत्री श्री वल्लभभाई पटेल से भिड़ गए।

कारण यह था कि उस समय दिल्ली में हो रहे भयानक दंगों में लिप्त दंगाइयों से दिल्ली पुलिस सख्ती से क्यों निपट रही थी।

दिल्ली पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर जो कि एक सिक्ख थे, को उनके पद से हटा कर उन्हें दण्डित करने की मांग थी हुसैनी की ।

हुसैनी ने सरदार पटेल से कहा कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से मुसलमान नाराज हैं और उसके खिलाफ आरोप लगा रहे हैं इसलिए उस पुलिस कमिश्नर को तत्काल हटा कर दण्डित किया जाए।

लेकिन सरदार पटेल ने उसकी इस बेहूदी मांग को मानने से इनकार कर दिया ,

क्योंकि दिल्ली के दंगों को नियंत्रित करने के सफल प्रयासों के कारण उस सिक्ख पुलिस कमिश्नर की प्रशंसा पूरे देश में हो रही थी ।

फिर कुछ दिनों बाद फिर से मुंह उठाए पहुंच गए पटेल जी के पास, इस बार इनकी मांग थी कि विभाजन के कारण पाकिस्तान चले गए मुसलमानों की जमीनों और घरों को हिन्दूस्तान में रह गए मुसलमानों को ही दे दी जाए।

हुसैनी की उस मांग का सीधा सा अर्थ यही था कि पाकिस्तान भाग गए गद्दारों की जमीन मकान भी सरकार कब्जा नहीं करे और मुसलमानों को ही दे दे।

उसकी इस बेतुकी बेहूदी मांग पर सरदार पटेल ने उसे जमकर डपटा था।

अब आप यह भी जानिए कि हुसैनी आखिर था कौन.?

ये हुसैनी नाम का नौजवान दरअसल सऊदी अरब में जन्मा था और भारत में आकर बस गया।

भारत में 1919 में शुरू हुए खिलाफत आंदोलन के सबसे बड़े नेताओं में से एक था ये।

हुसैनी की शिक्षा दीक्षा मदरसे में ही हुई थी।

ज्ञान विज्ञान इतिहास भूगोल आदि औपचारिक शिक्षा देने वाले किसी स्कूल में वो नहीं पढ़ा था।

लेकिन जब देश स्वतन्त्र हुआ उस समय देश में कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी और डॉक्टर राधाकृष्णन सरीखे महान विद्वानों के होते हुए भी जवाहरलाल नेहरू ने देश के पहले शिक्षा मंत्री की कुर्सी हुसैनी को दिया।

1958 में हुई उसकी मौत तक हुसैनी देश की शिक्षा व्यवस्था का कर्ताधर्ता बना रहा।

जरा कल्पना करिए कि जिस व्यक्ति ने ज्ञान विज्ञान इतिहास भूगोल आदि की औपचारिक शिक्षा देने वाले किसी स्कूल तक का मुंह नहीं देखा था उसे कांग्रेस ने देश की शिक्षा नीति की कमान सौंप दी थी।

हुसैनी जिस खिलाफत आंदोलन के सबसे बड़े नेताओं में से एक रहा था। उस आंदोलन का एकमात्र मूल उद्देश्य तत्कालीन तुर्की में इस्लाम के खलीफा सुल्तान की गद्दी और उसके कट्टर इस्लामिक साम्राज्य को बचाना था।

हास्यास्पद और शर्मनाक तथ्य यह है कि खुद तुर्की में ही उस इस्लाम के खलीफा सुल्तान की कट्टरपंथी रूढ़िवादी मजहबी सोच के खिलाफ भयंकर जनाक्रोश की आग भड़की हुई थी।

परिणाम स्वरूप 1923 में इस्लाम के उस खलीफा और उसकी कट्टरपंथी रूढ़िवादी मजहबी नीतियों वाले शासन का हमेशा के लिए अंत हो गया।

कमाल अतातुर्क पाशा ने तुर्की की सत्ता सम्भाल ली थी।

लेकिन 1919 से 1923 तक हुसैनी भारत के मुसलमानों को संगठित कर के तुर्की के उस इस्लामी खलीफा के इस्लामिक राज्य को बचाने के लिए हंगामा हुड़दंग कर रहा था।

हुसैनी को आज हम देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम से जानते हैं।sabhar- शनीश आर्य

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