साल 1964 – अमेरिका के न्यू जर्सी की बैल लेब्रोटरी में रॉबर्ट विल्सन तथा अर्नो पंजिया नामक दो युवा वैज्ञानिक अंतरिक्ष से पृथ्वी पर आने वाली क्षीण ऊर्जा तरंगों (माइक्रो वेव्स) का अध्ययन कर रहे थे। आश्चर्यजनक तौर पर दोनों वैज्ञानिकों ने पाया कि जितनी ऊर्जा की उन्हें उम्मीद थी, उससे कहीं ज्यादा एनर्जी डिस्टर्बेंस उनके एंटीना डिटेक्टर्स को प्राप्त हो रही थी। यह अनपेक्षित एनर्जी डिस्टर्बेंस, चाहें दिन हो अथवा रात, हर मौसम में आकाश के हर हिस्से से प्राप्त हो रही थी।
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परेशान और हैरान दोनों वैज्ञानिकों के पास इस गुत्थी को सुलझाने का एकमात्र क्लू इस “एनर्जी डिस्टर्बेंस की तीव्रता अर्थात वेवलेंथ” थी, जिसकी वैल्यू 1.015 सेंटीमीटर थी। इस वेवलेंथ का समकक्ष तापमान लगभग 3.5 केल्विन होता है। अर्थात आप कह सकते हैं कि – पंजिया और विल्सन को अंतरिक्ष में व्याप्त 3.5 केल्विन का एक ऐसा रहस्यमयी ऊर्जा का नाद सुनाई दे रहा था – जिसकी उत्पत्ति और उद्गम का कोई ओर-छोर प्रतीत नहीं हो रहा था।
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जब पंजिया और विल्सन इस समस्या से जूझ रहे थे, उन्ही दिनों एक अन्य वैज्ञानिक “पी.जे पेबल्स” ने एक शोध प्रकाशित किया था, जिसमें यह सवाल उठाया गया था कि आज भी ब्रह्मांड में पदार्थ की कुल मात्रा का 99% हिस्सा हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्व ही क्यों हैं? जबकि ब्रह्मांड के शुरुआती समय में इन दोनों तत्वों को न्यूक्लियर रिएक्शन्स के बदौलत भारी तत्वों में बदल जाना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ, इसका निहितार्थ यह है कि – ब्रह्मांड की बेहद शुरुआती सघन अवस्था में कोई चीज थी, जो स्थिर परमाणुओं के निर्माण को रोक रही थी। वो चीज क्या है? उत्तर है – तापमान
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ब्रह्मांड निर्माण के पश्चात काफी लंबे समय तक, मतलब लाखों वर्षों तक, ब्रह्मांड हाई एनर्जी रेडिएशन (प्रकाश) तथा मूलभूत कणों (प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन्स इत्यादि) से भरा हुआ एक सघन पिंड था, ऐसा पिंड जो हर समय आकार में बड़ा भी हो रहा था।
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इस अवस्था के दौरान बेहद अधिक तापमान के कारण इलेक्ट्रॉन्स इतने वेगवान हो गए थे कि प्रोटॉन्स उन्हें अपने आकर्षण बल से खींच कर स्थिर परमाणु बनाने में सक्षम नहीं थे। इस अवस्था के दौरान ब्रह्मांड रूपी पिंड इतना सघन था कि प्रकाश को मुक्त गति करने का मौका ही न मिलता और फोटॉन्स इस सघन पिंड में मौजूद इलेक्ट्रॉन्स-प्रोटॉन्स से टकरा कर टप्पा खाके पिंड के अंदर ही अंदर विचरण कर रहे थे। मने उस समय किसी युक्ति से आप इस पिंड के बाहर खड़े होकर पिंड के भीतर देखते तो आपको कुछ दिखता ही नहीं। दिखता तो तब, जब यह पिंड प्रकाश को मुक्त गति करने देता।
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बहरहाल, जैसा हमनें ऊपर कहा कि इस दौरान ब्रह्मांड निरंतर बड़ा हो रहा था और जब कोई चीज बड़ी होती है, तो उसका एवरेज टेम्परेचर भी ड्राप होता है। निरंतर प्रसारित होते ब्रह्मांड में अंततः लगभग 380000 वर्ष बाद वह समय आया, जब ब्रह्मांड का तत्कालीन आकार 8.45 करोड़ प्रकाशवर्ष और औसत तापमान ड्राप हो कर 3000 केल्विन पर आ गया था। इस तापमान पर प्रोटॉन्स इलेक्ट्रान को कैप्चर कर के स्टेबल परमाणु बनाने में सक्षम हुए और अंततः पिंड में कैद प्रकाश अपने मुक्त सफर पर कूच कर सका।
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ब्रह्मांड की अवस्था के इस युग अर्थात जन्म के 380000 वर्ष बाद के समय को रिकॉम्बिनेशन एरा कहते हैं। यह सबसे प्राचीन समय है, जिसे हम डायरेक्टली प्रकाश के सहारे देख सकते हैं। ब्रह्मांड की इससे प्राचीन अवस्था देख पाना संभव नहीं, कम से कम प्रकाश के सहारे तो बिल्कुल नहीं।
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लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व रिकॉम्बिनेशन एरा में 3000 केल्विन का जो प्रकाश मुक्त हुआ था, उसे ही वैज्ञानिक भाषा में “कॉस्मिक बैकग्राउंड रेडिएशन” कहते हैं, जिसकी खोज का श्रेय विल्सन, पंजिया और पेबल्स जैसे वैज्ञानिकों को जाता है।
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14 अरब वर्ष पहले मुक्त हुई वह प्राचीन प्रदीप्ति आज क्षीण हो कर लगभग 2.7 केल्विन स्तर (Updated Value) की वैल्यू पर ब्रह्मांड में हर जगह व्याप्त है, चाहें भूलोक हो अथवा अंतरिक्षलोक। आप इस प्रकाश से हर समय घिरे हुए हैं। अगर आप अभी रेडियो खोल कर दो चैनल्स के बीच कोई भी रैंडम वेवलेंथ पर रेडियो सुनने का प्रयास करें तो आपको सुनाई देने वाले “शोर” में लगभग 10% हिस्सा कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन का होगा।
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So in a way, if you ever want to hear the birth of the Universe – just turn your radio on.
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And As Always
Thanks For Reading!
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– झकझकिया
(चित्र – अर्नो पंजिया और रॉबर्ट विल्सन)