अहं मुनीनां वचनं शृणोमि गवाशनानां स शृणोति वाक्यम् ।
(श्रुणोत्ययं यत् यवनस्य वाक्यम् । पाठान्तर)
न चास्य दोषो न च मद्गुणो वा संसर्गजाः दोषणुणाः भवन्ति ।
कहीं एक महान तपस्वी थे जो लोक कल्याण के निमित्त सदैव पृथ्वी पर विचरण किया करते थे । एक बार परिभ्रमण करते हुए एक ग्राम में पहुंचे । गाँव में किसी घर में एक शुकपक्षी पल रहा था । वह शुकपक्षी तपस्वी को देखकर “मारो-काटो” ऐसा हिंसक शब्द बार-बार बोलने लगा । डर के मारे तपस्वी वहाँ से चले गए । कुछ समय पश्चात् तपस्वी दूसरे घर पर गए । वहाँ भी एक शुकपक्षी पाला गया था । उस शुकपक्षी ने तपस्वी को देख कर “अतिथि देवो भव । सुस्वागतम्” बोलने लगा । इस प्रकार दोनों पक्षीयों के भिन्न व्यवहार देख तपस्वी आश्चर्य के सागर में डूब गए । वह सोचने लगे कि यद्यपि दोनों शुक एक ही जाति के हैं तो भी उनके आचरण भिन्नभिन्न होने का कारण क्या है? तपस्वी ने समीप स्थित उस पक्षीसे इसका कारण पूछा । तब उस शुकपक्षी ने उत्तर दिया – तपस्वीवर! इसमें उसका कोई दोष नहीं और न ही यह मेरा कोई महान गुण है । मैं यहाँ सब समय मुनियों के नीतिप्रद शान्तिप्रद वचन सुनता हुँ । वह शुकपक्षी वहाँ सब समय गोभक्षकों (यवनों) का नीतिविरुद्ध हिंसक असामाजिक वचन सुनता है । संसर्ग के कारण गुण-दोष संसर्गी में उसी प्रकार से व्याप्त हो जाते हैं । अतः वही गुण हममें भी आ गया है । गुरुकुल तथा अन्य शिक्षणसंस्थानों में यही अन्तर है ।