एक बार एक छोटा सा लड़का एक होटल में गया ।कुछ ही देर में वहां वेटर आया और पुछा आपको क्या चाहिए सर ? छोटे बच्चे ने उल्टा पुछा ! वैनिला आइसक्रीम(vanilla ice-cream) कितने रूपए का है ? उस वेटर वाले ने जवाब दिया 50 रुपये का ।
यह सुन कर उस छोटे लड़के ने अपने जेब में हाँथ डाल कर कुछ निकला और हिसाब किया । उसने दुबारा पुछा कि संतरा फ्लेवर आइसक्रीम(orange flavor ice-cream) कितने का है । वेटर ने दुबारा जवाब दिया और कहा 35 रुपये का सर ।
यह सुने के बाद उस लड़के ने कहा ! मेरे लिए एक संतरा फ्लेवर आइसक्रीम(orange flavor ice-cream) ले आईये ।
कुछ ही देर में वेटर आइसक्रीम की प्लेट और साथ में बिल लेकर आया और उस बच्चे के टेबल पर रखकर चले गया । उस लड़के ने उस आइसक्रीम को खाने के बाद पैसे दिए और वह चले गया ।
जब वह वेटर वापस आया तो वह दंग रहे गया यह देखकर कि उस लड़के नें खाए हुए आइसक्रीम प्लेट के बगल में उसके लिए 15 रुपय का टिप छोड़ गया था ।
उस लड़के पास 50 रुपये होने पर भी उसने उस वेटर के टिप के बारे में पहले सोचा न की अपने आइसक्रीम के बारे में । उसी प्रकार हमें अपने फायदे के बारे में सोचने से पहले दूसरों के बारे में भी सोचना चाहिए ।
Month: May 2025
ચંડોળા તળાવ
કેટલાક મૂર્ખ લોકો કહી રહ્યા છે કે જ્યારે ભાજપ 35 વર્ષથી ગુજરાતમાં છે તો ચંડોળા તળાવ પર પહેલા કેમ કાર્યવાહી ન કરવામાં આવી?
સત્ય એ છે, જ્યારે કોંગ્રેસ કેન્દ્રમાં સત્તામાં હતી અને ભાજપ એટલું શક્તિશાળી નહોતું, ત્યારે કોંગ્રેસનું ઇસ્લામિક જેહાદી ઇકોસિસ્ટમ ભારતની બધી અદાલતોમાં હતું,
અને ગુજરાત હાઈકોર્ટમાં, મોદી અને અમિત શાહને જેલ માં નાખવા માટે નક્સલવાદી ડાબેરી જેહાદી ન્યાયાધીશોની પસંદગી કરવામાં આવી હતી.
જેમાં જસ્ટિસ માથુર, જસ્ટિસ આફતાબ આલમ અને હિમાચલ પ્રદેશના કોંગ્રેસના નેતા ભૂતપૂર્વ મુખ્યમંત્રી વીરભદ્ર સિંહની પુત્રી જસ્ટિસ અભિલાષા કુમારી જેવા અગ્રણી લોકો હતા.
૨૦૧૦ માં, મોદી સરકારે પણ બુલડોઝર મોકલીને તળાવ તોડી પાડવાનો પ્રયાસ કર્યો હતો પરંતુ જસ્ટિસ આફતાબ આલમ તરત જ મેદાનમાં આવ્યા અને કહ્યું તે એક કુદરતી તળાવ છે અને તેના પર કોઈ અતિક્રમણ થઈ શકે નહીં પરંતુ તે જ સમયે તેમણે એમ પણ કહ્યું કે લોકોને રહેવાનો અધિકાર છે, લોકોને ઘરોનો અધિકાર છે, તેથી જ સરકાર ચંડોળા તળાવમાંથી એક પણ અતિક્રમણ દૂર કરી શકતી નથી.
2010 ના આ આદેશ પછી, આ બાંગ્લાદેશીઓની હિંમત વધી ગઈ અને તેઓએ વધુ મોટા પાયે અતિક્રમણ કરવાનું શરૂ કર્યું, પરંતુ સરકાર લાચાર હતી કારણ કે હાઇકોર્ટ તેમની સાથે હતી.
પછી ન્યાયાધીશોની વ્યવસ્થા બદલાઈ, કેટલાક સુધારા કરવામાં આવ્યા, જેહાદ વિચારધારા ધરાવતા કેટલાક ન્યાયાધીશોને દૂર કરવામાં આવ્યા, તે પછી તે જ હાઇકોર્ટે સ્વીકાર્યું કે તમે કોઈપણ કુદરતી તળાવને સંપૂર્ણપણે નાશ કરી શકતા નથી, તમે કુદરતી તળાવની ઇકોસિસ્ટમનો નાશ કરી શકતા નથી, તમે શહેર ની જમીનો પર ગેર કાયદેસર દબાણ કરી શકતા નથી.
આ એમની ઇકોસિસ્ટમ છે.
अक्टूबर 1947 के शुरुआती कुछ दिनों में ही पाकिस्तानी कबाइली हमलावरों ने मुजफ्फराबाद समेत कई इलाके कब्जा लिए थे. कश्मीर रियासत के महाराज हरि सिंह की सेना कुछ खास तैयार नहीं थी और बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी से भी कोई समर्थन नहीं मिल रहा था, ऐसे में हमलों का खामियाजा सबसे ज्यादा हिंदू और सिखों को भुगतना पड़ रहा था.
सेना और पुलिस के कश्मीर रियासत के कई मुस्लिम अफसर और जवान दुश्मनों से मिल गए. अक्टूबर 1947 से शुरू होकर कबाइली हमलावर मुजफ्फराबाद और मीरपुर समेत कई इलाके कब्जाते हुए 1948 में श्रीनगर के दरवाजे पर खड़े थे.
कोई उपाय न देख महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए और जब भारतीय सेना उतरी तब जाकर श्रीनगर बचाया जा सका और कबाइली हमलावर पीछे धकेले गए. लेकिन इससे पहले जो कत्लेआम मचा उसमें हजारों जानें गईं, बड़ी संख्या में हिंदू-सिख या तो धर्म बदलने को मजबूर किए गए, या मार दिए गए या लूटमार कर भागने को मजबूर कर दिए गए.
अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी कबाइलियों के पहले हमले में मुजफ्फराबाद के तत्कालीन वजीर दुनी चंद मेहता समेत कई अफसरों ने बलिदान दिया और हमलावरों के चंगुल में फंसे उनके परिवारों ने काफी कष्ट झेला. दुनी चंद मेहता की पत्नी कृष्णा मेहता ने अपनी आपबीतियों को अपनी किताब में डिटेल से बयां किया था. अपने दो छोटे-छोटे बेटों, दो बेटियों और एक भतीजी के साथ कृष्णा मेहता कबाइली कब्जे वाले इलाके में स्थानीय लोगों के घरों में शरण लेकर खुद को बचाए हुए थीं, फिर कबाइली लोग उन लोगों को पकड़ कर ले गए लेकिन पुराने जानकारों के कारण उनके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचा, बाद में तनाव कम होने पर रेड क्रॉस की मदद से वे लोग जम्मू तक पहुंचने में कामयाब हो पाए.
हां, तो फिर आते हैं लूट और कत्लेआम के उस दौर पर. कई जेलों से होते हुए कबाइली हमलावर उन्हें मुजफ्फराबाद ले आए, वहां एक कबाइली सरकार ने कहा कि बहन आपको कुछ नहीं होगा हम आपकी रक्षा करेंगे. अब वे हमलावरों की निगरानी में उसी कोठी में रखी गईं जहां कभी वे अपने परिवार के साथ रहा करती थीं, वजीर की कोठी में. लेकिन लूटपाट और आगजनी के बाद वो काफी डरावना हो चुका था. साथ ही उनके पति को उसी घर में गोलियों से भून कर मारकर जला दिया गया था. इसकी याद उन्हें हमेशा परेशान करती थी. लेकिन बच्चों के खातिर वे खुद को बचाए हुए थीं और ढृढता के साथ दुश्मनों का सामना कर रही थीं. उनका सख्त रुख देखकर कई जानकार हिंदू लोग भी अपनी जान बचाने के लिए उनके साथ आकर जुड़ गए थे. उन्हें उम्मीद थी कि शायद ये हमें भी सुरक्षित इलाके में ले जा सकेंगी.
कृष्णा मेहता अपनी किताब ‘कश्मीर पर हमला’ में लिखती हैं- ”अब हम सब मिलकर बारह व्यक्ति हो गए. सात बच्चे और पांच बड़े. कबाइली सरदार के भरोसे के बाद हम वहां रह तो रहे थे लेकिन आते-जाते हमलावरों को देखकर हमेशा खौफ बना रहता था कि पता नहीं कब कौन धोखा कर जाए. हर समय खतरा बना रहता था क्योंकि इन लोगों का कोई भरोसा नहीं था. कोई भी आकर कुछ कर सकता था. लेकिन सरकार रहमदादखान के डर से सब अदब से पेश आते. एक दिन वो सरदार आया और बोलकर गया कि मैं बारामूला जा रहा हूं, तुम्हें कोई कमी नहीं होगी बहन. धीरे-धीरे सारे लड़ाके भी वहां से जाने लगे. सुनने में आया कि बारामूला में जोर की लड़ाई छिड़ी हुई थी.
सुनने में आने लगा कि श्रीनगर समेत कई इलाकों से कबाइली भारतीय सेना के आते ही खदेड़े जाने लगे. हिंदुस्तानी लड़ाके जहाज भी आकाश में मंडराने लगे. इससे कबाइलियों को काफी खौफ होता था. लेकिन हम मुजफ्फराबाद में फंसे हुए थे और वहां अभी भी कबाइलियों का कब्जा था. इन्हीं दिनों नगर में एक दिन बड़ा कोलाहल मचा. बात यह थी कि पाकिस्तानी लोग लड़कियों को घरों से निकाल निकाल कर ले जाने लगे थे. क्योंकि उन्हें डर था कि हिंदुस्तानी फौज आएगी तो ये इलाके उनके हाथ से चले जाएंगे.बाद में खबर आई कि हिंदुस्तानी बहादुरों ने शत्रुओं से बारामूला छीन लिया है. कबाइलियों के पैर उखड़ गए. पाकिस्तानी सेना के अधिकारी उन्हें पीट-पीटकर जबरदस्ती मोर्चे पर ले जाना चाह रहे थे लेकिन हिंदुस्तानी फौज के सामने वे जाना नहीं चाह रहे थे. लेकिन वे हजारों की संख्या में भाग खड़े हुए. लेकिन भागते भागते वे लूटपाट का माल और हिंदुस्तानी लड़कियों-औरतों को उठाकर अपने साथ ले जाते थे.
हमारे जैसे जो लोग उस इलाके में फंसे थे, छुप-छुपकर समय काट रहे थे कि भागते कबाइलियों की नजरों से अपनी बच्चियों को बचाकर रखें. लौटते समय रास्ते में जो कुछ भी मिलता वही वो लूट कर ले जाते. हमने यहां तक सुना कि उनकी जेबों में बहुत से कटे हाथ और कान देखे गए. बात यह थी कि भागते समय उनके पास इतना वक्त नहीं था कि वे तसल्ली से लोगों के गहने निकालकर ले जा पाते इसलिए वे तलवार से गहनों समेत कान और हाथ काट लेते थे. इस वीभत्स दृश्य से मुजफ्फराबाद वासी भी खासा आतंकित थे. पास के मौलवी के कहने पर हम सब उसके घर जाकर शरण लिए ही थे कि सुबह पता चला कि कबाइली कल रात कोठी में घुस आए थे और लूटमार कर गए. एक फैसले से हम सब फिर बच गए.”
आपबीती भले ही 78 साल पुरानी हो लेकिन आप सब भी सोच रहे होंगे कि पाकिस्तान से लाए गए ये कबाइली कश्मीर क्यों आए थे. क्या मकसद था उनका? वहां की सरकार और जिरगे के सरदारों ने उन्हें कैसे कश्मीर पर हमले के लिए तैयार किया था. इसका खुलासा भी हुआ. कृष्णा मेहता लिखती हैं- ”जब मुजफ्फराबाद हमें वे कबाइली ले जा रहे थे तो कई नए लड़ाकों से मैंने हिंसा न करने का वास्ता देकर पूछने की कोशिश की कि तुम लोग इतनी कम उम्र के हो और इस तरह की क्रूरता करने कैसे आ गए? जो शरीफ कबाइली हमारे साथ चल रहा था उसकी उम्र कोई बाइस वर्ष की थी. चलते चलते मैं उससे ऐसे ही बातें करने लगी. मैंने पूछा- तुम इतनी दूर यहां कैसे आए?
वह कहने लगा- पाकिस्तान के हुक्मरानों ने कबाइलियों में इस बात को फैला रखा है कि इस्लाम खतरे में है और कश्मीर रियासत में मुसलमानों पर बहुत जुल्म हो रहे हैं. हमारी बहू-बेटियां महफूज नहीं हैं. अब पठान ये सह नहीं सकते थे कि उनके होते हुए कोई उनकी बहू-बेटियों पर जुल्म करे. यही बोलकर कबाइलियों को यहां लाया गया है.
मैंने जब यह पूछा कि तुम्हें कुछ वेतन वगैरह मिलता है क्या? तो वह बोला- अभी तक कुछ फैसला नहीं हुआ है. उन्होंने हमें सिर्फ यही कहा है कि हिंदुओं को कत्ल कर दो. उनकी जो औरत या लड़की तुम्हे पसंद आवे ले जाओ. जो माल तुम्हे मिले लूट लो. घर जला दो. हमें सिर्फ जमीन चाहिए.
वह बताने लगा- हमारे वतन से बहुत से लोग लूट-मार के लिए आये हैं. हमने सुना है कि कश्मीर में जर (सोना) बहुत है. जब मैंने पूछा कि हमें जेलों में क्यों ठूस रहे हो तो वह बोला- मर्दों को तो हमने तकरीबन खत्म कर दिया है. जो पहले दिन इधर-उधर छिप गए थे वही थोड़े से बच गए हैं. जो औरतें बची हैं वे या तो बड़ी-बूढ़ी हैं या जख्मी हैं. हां कुछ जवान औरतें भी जेल में कैद रखी गई हैं.”
कृष्णा मेहता आगे लिखती हैं- ”इस खौफ और खूनी वातावरण में हम उनकी कैद में थे. हमे अपनी तो नहीं लेकिन बेटे और बेटियों की फिक्र खाए जा रही थी कि पता नहीं अगले क्षण ये लोग क्या करें. राह चलते हमें बराबर स्थानीय मुसलमान मिलते रहे. उनमें से कुछ इस दशा से दुखी थे तो कुछ खुश भी थे. कहीं-कहीं कबाइलियों की टोलियां ही टोलियां दिख जाती थीं. कोई नंगे पैर तो कोई फटा पुराना जूता पहने. कंधों पर बंदूकें और गले में कारतूसों की माला लिए हुए. कहीं कहीं तो वे लोग लूट के माल के लिए आपस में लड़ भी जाते थे.
इन लुटेरों से बचने के लिए कई हिंदू औरतों ने कृष्णागंगा नदी में छलांग लगा दी. मैंने भी अपनी बेटियों को कह रखा था कि मान पर खतरा बन आए तो पीछे मत हटना. मां कृष्णगंगा तुम्हें अपने यहां जरूर शरण देंगी.
इसी बीच दोमेल पुल के पास जब स्त्रियों को शौचादि के लिए कबाइली ले गए तो वहां मैंने अद्भुत दृश्य देखा जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती. कुछ स्त्रियां किनारे पर खड़ी हुई थीं और कुछ पानी के बीच चट्टानों पर. उनमें से अनेक मातायें अपने बच्चों को नदी में फेंक रही थीं. कुछ बच्चे तो निसहाय एकाध डुबकी खाकर बह जाते थे. पर कुछ तट के पास ही अपनी माओं से चिपट जाते थे. वे माताएं अपने ही हृदय के उन टुकड़ों को फिर पानी में फेंक देती थीं. उन देवियों के चेहरे मुर्दों की भांति भावहीन, रक्तहीन और चेष्टाहीन हो रहे थे. देखते ही देखते उन्होंने स्वयं भी नदी में छलांग लगाना शुरू कर दिया.
यह देखकर किनारे खड़े हुए कबाइली दौड़े पर इससे पहले वे कुछ कर सकें चट्टानों पर बैठी नारियां जोर से चीखीं और धम से नदी में कूद पड़ीं. तब कई कबाइली पुल पर बंदूकें तानकर खड़े हो गए और उन बहती हुई लाशों पर फायर करने लगे. उस दृश्य को देखकर हमारे साथ ही कुछ महिलाएं ही बची हुई थीं जो नदी में नहीं कूद सकी थीं. लेकिन हम खतरों के बीच भारत भूमि पर वापसी की एक उम्मीद पाले हुए थीं कि कभी तो जुल्म का ये दौर खत्म होगा और वे वापस अपनी जमीन पर आ सकेंगे.”
एक कश्मीरी हिन्दु की आपबीती
कालिया नाग प्रसंग हमारे भागवत पुराण के दसवें स्कंध के सोलहवें अध्याय में वर्णित है.
कथा के अनुसार, कालिया नाम का नाग पक्षीराज गरुड़ से दुश्मनी होने कारण गोकुल के पास बहने वाली यमुना नदी में आकर रहने लगा था.
जिससे पूरी यमुना नदी में कालिया का विष फैल गया.
जिससे नदी में रहने वाले जलीय जीव मरने लगे.
इतना ही नहीं.. बल्कि नदी का जहरीला पानी पीकर पशु-पक्षी और गांव वाले की भी मृत्यु होने लगी.
इस समस्या को निपटाने हेतु , भगवान श्री कृष्ण अपने बाल्यकाल में ही एक गेंद लेने के बहाने यमुना नदी में कूद पड़े.
और, यमुना में कालिया नाग की पत्नियों के समझाने के बावजूद भी उन्होंने कालिया नाग से युद्ध किया और उसे परास्त कर यमुना छोड़ने पर विवश कर दिया.
कथा के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने उसे पाताल लोक के रमणीक द्वीप पर जाकर रहने को कह दिया.
इस तरह, भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल वासियों को कालिया नाग के आतंक से सदा-सदा के मुक्त कर दिया.
हालांकि, यह एक पौराणिक (पुराणों में वर्णित) कथा है और बहुत से सो कॉल्ड एजुकेटेड लोगों को ये सब कथा एक माइथोलोजी लगती है..
लेकिन, वास्तव में ऐसा है नहीं…
क्योंकि, मुझे तो ये पूर्णतया वास्तविक कथा लगती है.
जिसमें सिर्फ अलंकृत शब्दों का प्रयोग किया गया है.
उदाहरण के लिए अभी वर्तमान समय (ऑपरेशन सिंदूर) की ही घटना को ले लेते हैं..
क्योंकि, अगर कभी भविष्य में इस पर कोई कथा-कहानी लिखी जाएगी तो वो भी शायद ऐसा ही होगा कि…
अमेरिका नामक एक कालिया नाग रूस से अपनी दुश्मनी के कारण दक्षिण एशिया में अपना वर्चस्व स्थापित रखने हेतु अपना एक डेरा (परमाणु बम का जखीरा) पिग्गिस्तान में बना रखा था.
जिस कारण, उसके विष से दक्षिण एशिया का पूरा क्षेत्र विषाक्त हो गया था और आये दिन इस क्षेत्र में आतंकवाद, सत्ता-पलट जैसी घटनाएँ होती रहती थी.
फिर, एक दिन नरेंद्र मोदी नामक आदमी अपना गेंद निकालने के बहाने (आतंकवादी हेडक्वार्टर नष्ट करने के बहाने) उस यमुना नदी (पिग्गिस्तान) में कूद पड़ा…
और, उसने कालिया नाग (अमेरिका) के उस विष दंत (परमाणु बम) को तोड़ दिया.
परिणामस्वरूप… लाख प्रयास के बाद भी वो कालिया नाग (अमेरिका), गोकुल निवासी (भारत) को डस नहीं पाया.
हालांकि, उस कालिया नाग ने श्री कृष्ण और गोकुल निवासियों को क्षति पहुंचाने का भरपूर प्रयास किया लेकिन श्रीकृष्ण के बाहुबल और चातुर्य के कारण कालिया बेबस हो गया और उसके पास हार स्वीकार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा.
अंततः , श्रीकृष्ण ने उस कालिया नाग को पाताल लोक के रमणीक द्वीप पर अर्थात अमरीका और अपने आसपास के क्षेत्रों ने ही जाकर रहने को कह दिया.
इस तरह… श्री श्वेत वराह कल्प के, वैवस्वत मन्वन्तर के, कलयुग के प्रथम चरण में, जम्बूद्वीप क्षेत्र के भारतवर्ष के भरत खंड के इलाके में एक बार फिर से श्री कृष्ण के वंशजों द्वारा… अमेरिका रूपी कालिया नाग को परास्त कर उसे पाताल लोक भागने पर विवश कर दिया गया…!
“एतस्मिन् एव कलियुगे कालियानागदमन कथा समाप्ता भवति।”
जय श्री कृष्ण…!!
जय महाकाल…!!!
मुफ्ती मोहम्मद सईद कश्मीर की सियासत में एक अलग पहचान रखते थे. तीखी नाक, घने सफेद बाल, भारी भौंहें और गहरी आंखों वाले सईद, बिल्कुल वैसे ही दिखते थे जैसे एक वकील का चेहरा होता है और वो एक समय में वकील भी रह चुके थे.
अपने लंबे राजनीतिक करियर में उन्हें कई नामों से पुकारा गया. कुछ तारीफ में, तो कुछ तंज में. वजह थी उनकी तेज महत्वाकांक्षा और बार-बार पाला बदलने की आदत.
कभी नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता रहे सईद ने कई बार पार्टी बदली और आखिर में कांग्रेस में पहुंचे. उनके इन यूटर्न्स पर कई मज़ेदार नारे भी बने. लेकिन शिया मौलवी के बेटे सईद को सिद्धांतों से ज़्यादा अपनी महत्वाकांक्षा प्यारी थी. 1987 में जब वो कांग्रेस में थे, तब उन पर मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) का अंदर से समर्थन करने का आरोप लगा- ऐसा माना गया कि वो कश्मीर की सियासत में किंगमेकर बनना चाहते थे. जब ये मौका नहीं मिला, तो उन्होंने 1989 के लोकसभा चुनावों से पहले वीपी सिंह की अगुवाई वाले ‘जन मोर्चा’ का दामन थाम लिया. यही फैसला बाद में उन घटनाओं की शुरुआत बना, जिसने सरकार को घुटनों पर ला दिया.
मूल रूप से अनंतनाग के बिजबेहड़ा इलाके से आने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस से इस्तीफा देने की सीधी वजह 1987 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुए दंगे को बताया. लेकिन असल में ये एक सोची-समझी रणनीति थी- वो पास के मुज़फ्फरनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे. 1989 में जब वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने सबको चौंका दिया. उन्होंने सईद को गृहमंत्री बनाया- आज़ाद भारत के इतिहास में ये पहली बार हुआ जब कोई मुसलमान इस पद पर पहुंचा.
जब दिसंबर के पहले हफ्ते में दिल्ली में नई सरकार ने शपथ ली, तब कश्मीर पहले से ही बेकाबू हालात की कगार पर था. टारगेट किलिंग की कई घटनाओं ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं, सरकारी कर्मचारियों और कश्मीरी पंडितों के बीच खौफ फैला दिया था (पार्ट 3 देखें). श्रीनगर की सड़कों पर कई आतंकी संगठन, खासकर जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF), खुलेआम हमले कर रहे थे.
8 दिसंबर को भारत के गृहमंत्री की बेटी रुबैया सईद लाल डेड मेडिकल कॉलेज (जो 14वीं सदी की संत लल्लेश्वरी के नाम पर है) से अपनी क्लास के बाद नौगाम स्थित अपने घर के लिए निकलीं. जैसे ही वो मिनी बस में चढ़ीं, JKLF के पांच आतंकी भी उसी बस में सवार हो गए. उन्होंने बस को हाईजैक किया और उसे पंपोर के पास नटिपोरा इलाके में ले गए, जो केसर के खेतों के लिए जाना जाता है.
वहां रुबैया को बस से नीचे उतरने को कहा गया और फिर उसे एक नीली मारुति कार में बिठा लिया गया. उसके बगल की सीट पर बैठा था JKLF का कमांडर-इन-चीफ यासीन मलिक (देखें पार्ट 2) और अशफाक माजिद वानी. आखिर में रुबैया को सोपोर के एक उद्योगपति के घर में ले जाकर छुपाया गया.
सरकार ने रुबैया की रिहाई के लिए नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (NSG) के पूर्व प्रमुख वेद मारवाह को जिम्मेदारी सौंपी. अपनी किताब Uncivil Wars: Pathology of Terrorism in India में मारवाह लिखते हैं, ‘गृहमंत्री की बेटी के साथ कोई सुरक्षा नहीं थी. जब तक आ”तंकियों ने एक लोकल अखबार के ऑफिस में फोन करके अपनी मांगें नहीं बताईं, तब तक किसी को- यहां तक कि उसके परिवारवालों को भी- कुछ पता नहीं था. राज्य में ऐसा कोई मामला पहले कभी नहीं हुआ था और सब लोग हैरान थे.’
राज्य के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने अपनी किताब My Frozen Turbulence in Kashmir में उस वक्त के हालात का जिक्र करते हुए लिखा, ‘पांच दिन तक देश पर डर और बेचैनी का माहौल छाया रहा. राज्य और केंद्र की सरकारें अंधेरे में टटोल रही थीं… करीब 20 मुस्लिम संगठनों ने इस किडनैपिंग की निंदा की. पाकिस्तान के कुछ नेताओं ने भी इसे गैर-इस्लामिक बताया… लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.’
12 दिसंबर को JKLF ने फिर धमकी दी कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे बंधक की जान ले लेंगे. आखिरकार, सरकार ने उनकी शर्त मान ली और पांच खतरनाक आ”तंकि”यों को रिहा कर दिया गया. कुछ ही घंटों बाद रुबैया सईद भी घर लौट आईं. वेद मारवाह लिखते हैं, ‘आ”तंकि”यों ने शहर पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया था, इसमें कोई शक नहीं था. उन्होंने ताकतवर भारतीय सरकार को घुटनों पर ला दिया था और उन्हें अपनी जीत का जश्न मनाने से कोई नहीं रोक सकता था.’
खुशी का शहर, बगावत का दिन
13 दिसंबर 1989 को श्रीनगर की सड़कों पर मानो उबाल आ गया. राजौरी कदल में हज़ारों नौजवान जमा हुए और ‘हम क्या चाहते? आजादी!’ और ‘जो करे खुदा का खौफ, उठा ले कलाशनिकोव!’ जैसे नारे गूंजने लगे. रिहा किए गए आतंकी, जिन्हें जस्टिस एम. एल. भट के घर से चुपचाप निकाला गया था, हीरो की तरह जुलूस में ले जाए गए. कुछ ही समय में ये आ”तंकी गायब हो गए- माना गया कि वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की तरफ निकल गए. ये वो पल था जिसने आतं’क को और हौसला दिया और रूबैया सईद की किडनैपिंग को कश्मीर के आ”तंक”वाद की दिशा बदलने वाला टर्निंग पॉइंट बना दिया.
हिंसा का एक अंतहीन चक्र
JKLF के सामने भारत सरकार का इस तरह झुकना कश्मीर के इतिहास का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है. इसके बाद दो साल तक कश्मीर में खून-खराबा, विरोध और अराजकता फैली रही, जिसे कई लोग 1980 के दशक के फिलिस्तीनी इंकलाब से जोड़कर देखते हैं. आतंकी संगठनों और अलगाववादी नेताओं ने सड़कों पर कब्जा कर लिया. अ”पहरण और ह”त्या”एं आम हो गईं. जवाब में सरकार ने सख्त तलाशी अभियान, बड़े पैमाने पर गि”रफ्ता”रियां और भारी दमन शुरू किया. इसके चलते मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगे. इस हिंसा और बदले की इस जंग में कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ दी. पाकिस्तान में कई ट्रेनिंग कैंप खुल गए. 1990 में जब आ”तंक चरम पर था, तब ISI ने करीब 10,000 कश्मीरी युवाओं को ट्रेनिंग दी थी.
बेगु”नाहों का खून और कश्मीर में फैली हिंसा
बेगु”नाहों का खू”न बहता रहा. 6 अप्रैल 1990 को कश्मीर विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. मुशीर उल हक और उनके निजी सचिव अब्दुल घनी जारगर को जम्मू और कश्मीर स्टूडेंट्स लिबरेशन फ्रंट (JKSLF) नामक संगठन ने किडनैप कर लिया. चार दिन बाद AK-47 राइफलों से गो”ली मारकर उनकी ह”त्या कर दी गई. जगमोहन के अनुसार, इस पूरी घटना के पीछे कई रहस्यमय थ्योरी थीं, जिनमें ISI के हाथ होने की संभावना भी जताई गई थी.
11 अप्रैल को, HMT (राज्य-स्वामित्व वाली इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्ट्री) के जनरल मैनेजर एचएल खेड़ा की ला”श श्रीनगर के फायर स्टेशन के पास सड़क पर पाई गई. उन्हें JKSLF ने अगवा किया था और उसके नेताओं ने उनकी रिहाई के बदले तीन आ”तंकि”यों की रिहाई की मांग की थी. जब ये मांगें ठुकरा दी गईं, तो खेड़ा को डेडलाइन खत्म होने के एक घंटे बाद मा”र दिया गया. 20वीं सदी के अंतिम दशक की शुरुआत में जो हिंसा का साया कश्मीर पर पड़ा, वह घाटी में कई और सालों तक छाया रहा. कश्मीर पर इतिहास का यह अभि”शाप 21वीं सदी में और भी मजबूत हो गया.
यासीन मलिक को ‘पीएमओ का मेहमान’ बनाने वाला कौन था? नाम है ए.एस. दुलत!
A. S. दुलत – तत्कालीन रॉ चीफ़
ये भारत नहीं कांग्रेस के एजेंट थे।
चौक जाएंगे आप…
भारत की खूफिया एजेंसी रॉ का चीफ रहा यह व्यक्ति आतंकियों को सरकारी पैसा पहुंचाता था। और आतंकी कश्मीर में हिन्दुओं के खून से होली खेलते थे।
शुरुआत में लोगों को लगा कि ये किसी सिस्टम का हिस्सा हैं, लेकिन वक़्त ने साबित कर दिया कि ये सिस्टम के नाम पर मुल्क की जड़ें खोदने वाले लोग थे।
वो शख्स जो एक वक़्त रॉ के चीफ रहे, फिर पीएमओ में कश्मीर मामलों के सलाहकार बने, लेकिन असल में कश्मीर को ‘सॉफ्ट टच’ देकर उसकी आत्मा तक खोखली करने का इंतज़ाम कर बैठे।
1990 में वीपी सिंह सरकार और मुफ्ती मोहम्मद सईद के दौर में इनकी भूमिका सबसे पहले कश्मीर डेस्क में शुरू हुई।
रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) में ऑपरेशन्स का जिम्मा संभाले हुए ये हुर्रियत, अलगाववादी और पूर्व आतंकियों से ‘गुपचुप’ संपर्क में थे।
इनका मानना था कि पैसा देना करप्शन नहीं, ऑपरेशनल मजबूरी है। और इसी मजबूरी में भारत ने हर उस चेहरे को पैसा थमाया जिससे कोई बात करना भी पसंद नहीं करता था।
अब ज़रा सोचिए,
आतंकियों को पैसा देकर क्या मिला?
देश को संसद पर हमला, निर्दोषों की हत्या, और घाटी से पलायन का ज़ख्म।
फिर भी इनका नैरेटिव था –
“हमें उनसे बात करनी थी जिससे कोई बात नहीं करना चाहता।” तो ज़ाहिर है देशहित इनके एजेंडे में नहीं था, एजेंडा कुछ और ही था।
आदित्य धर की फिल्म ‘आर्टिकल 370’ का एक सीन याद कीजिए – जब एक NIA एजेंट खुफिया डीलर से आतंकी सौंपने की मांग करती है और जवाब मिलता है – “वो मेरा एसेट है।”
हकीकत में यही कहानी दुलत साहब की है। उन्होंने जिन ‘एसेट्स’ पर पैसा लुटाया, उन्हीं ने बाद में भारत के खिलाफ AK-47 उठाई।
इनका सबसे बड़ा ‘कारनामा’ था –
1990 में मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया की रिहाई के लिए 5 खूंखार आतंकियों को रिहा करना। जिनमें मुश्ताक जरगर भी शामिल था जो बाद में कंधार हाईजैक में फिर से शामिल हुआ।
1999 में जब IC-814 हाईजैक हुआ तो तीन और भेड़िए – मसूद अजहर, अमर शेख और जरगर छोड़े गए। उस वक़्त रॉ के चीफ थे दुलत साहब।
अब ज़रा गौर कीजिए –
इन्हीं के ‘डिप्लोमैटिक दिमाग़’ से निकली थी लाहौर बस यात्रा। वाजपेयी जी को सलाह दी गई कि पाकिस्तान से बातचीत की नई शुरुआत हो। और नतीजा हुआ संसद हमला, करगिल, और फिर POK में आतंकी कैम्पों की बाढ़।
2000 से 2004 तक ये पीएमओ में विशेष सलाहकार रहे। किताबों में पाकिस्तान के ISI चीफ दुर्रानी से बातचीत करते रहे, और यहाँ आतंकवादी संसद पर हमला करते रहे। क्या इस डील का जवाब मिलेगा?
जब मोदी सरकार ने आर्टिकल 370 हटाया, तब दुलत साहब ने इसे ‘एकतरफा फैसला’ बताया। बोले, “लोगों को विश्वास में लेना चाहिए था।”
मतलब जो 30 सालों में खून-खराबा हुआ, वो शायद इनके लिए कोई मसला ही नहीं। अब जब टूरिज्म बढ़ा, घाटी में चैन लौटा तो ये साहब बोले – “ये परेशानी है।” यानि शांति भी इन्हें चुभती है।
अब असलियत देखिए –
ये लोग यासीन मलिक जैसे दुर्दांत आतंकियों को पीएमओ के मेहमान बना चुके हैं। इन्हीं की वजह से आज कश्मीर को लेकर सालों की कन्फ्यूजन रही।
न आतंकी मरे, न उनका नैरेटिव टूटा –
उल्टा उन्हें सिस्टम से ‘सम्मान’ मिला।
जिन्होंने कभी देश को 370 की जंजीर में जकड़ा, वही आज अपने प्रोपेगेंडा के खिलाफ बौखलाए बैठे हैं। बीजेपी की नीतियों को गालियां दे रहे हैं, अपने राजनीतिक झुकाव को छुपा नहीं पा रहे।
असल में देश ने कश्मीर को ‘आतंक के पैरों में बिठाने’ वाली सोच को बहुत झेला है। अब वो दौर नहीं रहा। अब यासीन मलिक सज़ा भुगत रहा है, और ए.एस. दुलत जैसे चेहरे इतिहास के कटघरे में खड़े हैं।
जय हिंद 🇮🇳
वह जो कभी हिन्दू मंदिर थे …
अगर आप सच्चे हिन्दू योद्धाओं का सम्मान ही करना चाहते है तो
बंगाल सल्तनत ( 1200-1592)
गुजरात सल्तनत ( 1200-1576)
मालवा सल्तनत ( 1200 – 1564 )
का भी अध्यनन करें । केवल दिल्ली और राजस्थान में ना अटके रहें ।। दिल्ली और राजस्थान तो पूरे भारत के आगे ऐसे है, जैसे भूसे के ढेर में राई ।। आपको पता लग जायेगा कि भारत का असली रक्षक कौन है, ओर कागजी रक्षक कौन ??
आप कहते तो है, वामपंथियो ने आपका इतिहास बिगाड़ दिया । प्रथम शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने आपका इतिहास बिगाड़ दिया । यह पहला शिक्षामंत्री इन्ही सल्तनत की नस्ल का था, जिसको अपना साम्राज्य जाने का हमेशा दुःख रहा ।।
इन्हीं लोगो ने राममंदिर से लेकर काशी तक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था, इन्ही लोगो ने अहमदाबाद-गुजरात में भद्रकाली मंदिर समेत हजारो मंदिरो को मस्जिद बना दिया था ।। इन तीनो सल्तनत के अगर मंदिर से मस्जिद – मदरसों में परिवर्तित भवनो की सही संख्या आपको सरकार देगी, तो वह 5 लाख से ज़्यादा होगी, कम नही होगी ।। इन तीनो सल्तनतों को मिलाया जाए, तो भारत के आजके 20 राज्य बनेंगे ।। ओर इनमे से गुजरात और बंगाल सल्तनत का नाश किया था, आमेर के राजा #मानसिंहजी ने ।। अपने असली धर्मरक्षक का अपमान करके अपनी आंखों में धूल मत झोंको । अगर आपको अपना इतिहास सही से पता होगा, तो वर्तमान सुधार पाओगे ।। यह तो अजित डोवाल जैसे ज्ञानी पुरुष ने भी कहा है ” इतिहास ही भविष्य की अदालत है ” ।।
मेने जो तीन सल्तनत के नाम दिए है, बस इन्हें नेट पर ही सर्च कर लो … पूरा नही लेकिन कुछ तो ज्ञान आपको हो जाएगा !!!
मेने यह सिर्फ अहमदाबाद की तीन जामिया मस्जिद की फ़ोटो डाली है, जो कभी मंदिर थे । अगर बंगाल ,पूर्वी UP इन सबकी फ़ोटो डालूँगा, तो शायद आपकी आत्मा रो पड़े …. तुम्हारी सभ्यता संस्कृति के साथ हुए अन्याय को जानकर
संकलित




पहलगाम
भारत की खुफिया एजेंसियों ने पता लगा लिया है कि घोड़े वालों से लेकर भेलपूरी बेचने वालों तक सारे आतंकियों के ही स्लीपर सेल्स थे।
वहां जो भी था चाहे विडियो बना रहा हो या मदद करने का नाटक कर रहा हो सभी आतंकियों के ही स्लीपर सेल्स थे। हमला पूरा होते ही सारे गायब हो गये हैं। वहां एक भी छोटी दुकान लगाकर बेचने वाला नहीं मिलेगा। करीब 35 आतंकी घटनास्थल पर मौजूद थे। और सारे आसपास के घरों में लगभग एक महीने से रह रहे थे। और समझ लिजिए किसी भी घरवाले ने सूचना लीक नहीं होने दी। एक महीने तक आतंकी यदि आपके घर में मेहमान बनकर रहे वो भी एक नहीं दो नहीं 35आतंकी तो क्या मतलब निकलता है। लेकिन किसी भी घर वाले ने पुलिस या फोर्सेज को नहीं बताया। आदरणीय अमित शाह ने बताया है की उस पर्टिकुलर जगह पर कभी भी बिना पुलिस की इजाजत के टूर ट्रेवेल्स सर्विस वालों द्वारा टुरिस्टों को नहीं लाया जाता है लेकिन उस दिन बिना पुलिस को सूचित किए टूर ट्रेवेल्स की बसें सैलानियों को लेकर वहां आ गई थीं। काफी सारे सैलानी पहुँच चुके थे।
PLAN A था कि 35 आतंकी एक साथ फायरिंग करके बहुत सारे हिन्दुओं को मार डालेंगे। AK47 बंदूकों का ज़खीरा हो सकता है ड्रोन के द्वारा पाकिस्तान से आया उसको लेने चार लोग गए। बाकी लोग घटनास्थल पर इंतजार कर रहे थे। एक गाड़ी से ला रहे थे लेकिन इनकी गाड़ी का ब्रेक फेल हो गया इस वजह से इन चारों को गाड़ी छोड़कर खच्चरों पर और मोटर साईकिल पर चढ़कर आना पड़ा। इसकारण सारी बंदूकें पहुँच नहीं सकी। और PLAN A सफल नहीं हो सका।
तब इन आतंकियों ने PLAN B पर काम किया ।
इस प्लान के मुताबिक एक खच्चर वाला सारी बंदूकों को गाड़ी से निकालकर घास के नीचे छुपा देगा और दो लोग खच्चर पर और दो लोग बिना नंबर वाली मोटरसाइकिल जो घटनास्थल के पास से बरामद हुई है ,से जगह पर पहुंचेंगे।
बाकी आतंकी पहले से ही भेष बदलकर घटनास्थल पर छुपे हुए थे। फिर चार आतंकियों ने ही घटनास्थल पर फायरिंग कर लोगों को मारना शुरू किया। बाकी सारे बंदूकों के आभाव में चारों तरफ ध्यान रख रहे थे।
अब कल्पना कीजिए अगर वे सारी बंदूकें वहां पहुंच गई होतीं तो क्या क्या हो सकता था?
जो बचकर आए लोग आज टीवी पर इंटरव्यू दे रहे हैं की मैं वहां से दस मिनट पहले निकला या बीस मिनट पहले निकल गया । या दूर से ही देखकर हम दौड़ के भाग आए। शायद उनमें से एक भी न बचता।
अब बताईये ये 35 आतंकियों को एक महीने से वहां के लोकल लोग चारों वक़्त का खाना पीना सब सुविधाएं देकर पाल रहे थे लेकिन मजाल है सिक्योरिटी फोर्सेज को या पुलिस को सूचना मिल जाए। इतनी एकता है इनमें।
कई विडियो में यह भी दिखाई पड़ता है कि सैलानियों को वहां के लोकल लोगों ने आसरा देने की कोशिश की है कि हमारे घर पर रूक जाओ ,होटल दूर है तो हमारे घर पर खाना खा लो। आराम कर लो यह सब दिखावटी और हिन्दुओं को धोखा देने बहलाने की कोशिश करने भर की बात है क्योंकि वे ये अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी कमाई का साधन सिर्फ टूरिस्ट हैं। इनको बहला फुसलाकर रखना बहुत जरूरी है। यह मोहब्बत घटना के बाद ही क्यूँ दिखाई पड़ रही है।
इस्लाम में इसे #”अलतकईया” कहते हैं मतलब पहले मारो फिर अपना काम निकालने के लिए इनको बहला फुसलाकर दोस्ती करो।
#pehalgamattack
#jammukashmir
#operationparshuram
#amittchiragsharma
दिलीप कुमार
1, किसी भी जासूस का नाम बहुत अहमियत रखता है…
2, असली जासूस फंस सकता है लेकिन कभी आसानी से पकड़ में नही आता…”युसुफ़ खान” दिलीप कुमार साहब..??
जिहाद एक पुरानी पाकिस्तानी प्रेम कथा…✍
यह 60वें दशक के प्रारम्भिक वर्ष की बात है.. कलकत्ता में खुफिया एजेंसियों और कलकत्ता पुलिस ने पाकिस्तान के जासूस को गिरफ्तार किया था उसके पास बरामद हुई डायरी में एक तत्कालीन फिल्मी सितारे का नाम दर्ज था.
उस जासूस से पूछताछ से मिली जानकारी के बाद कलकत्ता पुलिस हवाई जहाज से बम्बई पहुंच गई थी और सीधे उस सितारे के घर पहुंची थी. लेकिन तब तक इस पुलिस कार्रवाई की खबर दिल्ली की शीर्ष सत्ता के गलियारे तक पहुंच चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप किया था.
परिणामस्वरुप कलकत्ता पुलिस उस फिल्मी सितारे के घर से यह कहते हुए खाली हाथ वापस लौटी थी कि सम्भवतः वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था और फिल्मी सितारे का उससे कोई लेनादेना नहीं.
आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उस जासूस से गहन पूछताछ के बाद आनन फानन में फ्लाईट पहुंची कलकत्ता पुलिस को यह दिव्य ज्ञान उस जासूस से की गई गहन पूछताछ के दौरान नहीं हुआ.
लेकिन बम्बई में उस सितारे के घर पहुंच कर उसे वह दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया था. ज्यादा शोर मचा तो पूरे प्रकरण की जांच के लिए एक सरकारी जांच कमेटी बनी. उस कमेटी ने तथाकथित जांच के बाद वही बात उगली थी, जो बात कलकत्ता पुलिस ने उगली थी, कि वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था.
इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. 1965 के भारत पाक युद्ध के दौरान खुफिया एजेंसियों ने बम्बई में पाकिस्तान से सम्पर्क वाले एक रेडियो ट्रांसमीटर के सिग्नल पकड़े थे. ट्रांसमीटर बम्बई में ही सक्रिय था.
खुफिया एजेंसियों की टीम सिग्नल का पीछा करते हुए जब उस स्थान पर पहुंची थी जहां वह रेडियो ट्रांसमीटर सक्रिय था, तो बुरी तरह चौंक गयी थी. जिस मकान में वह ट्रांसमीटर बरामद हुआ था, वह घर उस समय के बहुत नामी गिरामी उसी फिल्मी सितारे का ही था जिससे पूछताछ करने के लिए उसके घर कुछ वर्ष पूर्व कलकता पुलिस पहुंची थी.
इसबार भी सितारे पर दिल्ली मेहरबान हुई. रेडियो ट्रांसमीटर के विषय में उस फिल्मी सितारे ने बहुत मासूम सफाई दी कि उसे पाकिस्तानी गाने सुनने का शौक है और क्योंकि भारत में समान्य रेडियो पर पाकिस्तान रेडियो प्रतिबंधित है इसलिए उसने यह रेडियो ट्रांसमीटर अपने घर में रखा है ताकि पाकिस्तानी गाने सुनने का अपना शौक पूरा कर सके.
आप यह जानकर आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि इस बार भी उस फिल्मी सितारे की ही बात को शाश्वत सत्य मान लिया गया. एक जांच कमेटी बनी और उसने भी फिल्मी सितारे के उस वक्तव्य को ही सत्य घोषित कर दिया. यह सवाल कभी पूछा ही नहीं गया, देश को कभी यह बताया ही नहीं गया कि सामान्य नागरिक के लिए पूर्णतया प्रतिबंधित और जिसे रखने पर कठोर दंड का प्रावधान था, वह रेडियो ट्रांसमीटर उस फिल्मी सितारे ने कहां से, कैसे और किस से प्राप्त किया था.?
जबकि सत्य यह है कि देश की सुरक्षा और गुप्तचर जांच एजेंसियों में जिम्मेदार पद पर कार्यरत किसी भी व्यक्ति के अतिरिक्त यदि किसी समान्य नागरिक के पास पाकिस्तान तक पहुंच वाला रेडियो ट्रांसमीटर यदि आज भी बरामद हो जाए तो पुलिस की लाठियों की बरसात उसकी हड्डियों का सत्कार पूरी लगन से करेंगी.
क्या आप जानते हैं कि कौन था वह फिल्मी सितारा, क्या नाम था उस फिल्मी सितारे का…?
तो अब जानिए कि उस फिल्मी सितारे का हिन्दू नाम…
“दिलीप कुमार” था
वही दिलीप कुमार साहब जिसने उसे मिले सर्वोच्च पाकिस्तानी एवार्ड को वापस करने से उस समय साफ़ मना कर दिया था, जब #करगिल_युद्ध में पाकिस्तानी फौज द्वारा की गई भारतीय सेना के सैकड़ों सैनिकों की हत्याओं के विरोध में उस फिल्मी सितारे से मांग की गई थी कि… वह पाकिस्तानी एवार्ड को भारतीय विरोध के प्रतीक के रूप में पाकिस्तान को वापस कर दे… (नही किया)
लेकिन इनकी चर्चा कहीं किसी मीडिया में आजतक सुनी आपने.? जो इक्का दुक्का समाचार आप को काफी प्रयास के बाद मिलेंगे वो इसलिए मिलेंगे क्योंकि उनमें इस फिल्मी सितारे की वकालत की गयी है.
प्रश्नों के कठघरे में नहीं खड़ा किया गया है. इसीलिए मैंने प्रारम्भ में ही लिखा है “जिहाद एक पुरानी पाकिस्तानी प्रेम कथा”
बॉलीवुड के चरणों में लोटती मीडिया और चाकरी करती सरकारों की कहानी दशकों पुरानी है..!!
नोट :- ज्योति मल्होत्रा जबतक “हिन्दू ज्योति मल्होत्रा” थी तबतक सब ठीक था.. लेकिन जैसे ही उसने पाकिस्तानी हाई कमीशन में काम करने वाले “दानिश” से , निकाह कर मुस्लिम बनी तब हिन्दुस्तान से गद्दारी की.. शातिर दानिश ने ज्योति का धर्मपरिवर्तन तो कर दिया लेकिन उसे नाम नही बदलने दिया..!!
दिलीप कुमार
1, किसी भी जासूस का नाम बहुत अहमियत रखता है…
2, असली जासूस फंस सकता है लेकिन कभी आसानी से पकड़ में नही आता…”युसुफ़ खान” दिलीप कुमार साहब..??
जिहाद एक पुरानी पाकिस्तानी प्रेम कथा…✍
यह 60वें दशक के प्रारम्भिक वर्ष की बात है.. कलकत्ता में खुफिया एजेंसियों और कलकत्ता पुलिस ने पाकिस्तान के जासूस को गिरफ्तार किया था उसके पास बरामद हुई डायरी में एक तत्कालीन फिल्मी सितारे का नाम दर्ज था.
उस जासूस से पूछताछ से मिली जानकारी के बाद कलकत्ता पुलिस हवाई जहाज से बम्बई पहुंच गई थी और सीधे उस सितारे के घर पहुंची थी. लेकिन तब तक इस पुलिस कार्रवाई की खबर दिल्ली की शीर्ष सत्ता के गलियारे तक पहुंच चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप किया था.
परिणामस्वरुप कलकत्ता पुलिस उस फिल्मी सितारे के घर से यह कहते हुए खाली हाथ वापस लौटी थी कि सम्भवतः वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था और फिल्मी सितारे का उससे कोई लेनादेना नहीं.
आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उस जासूस से गहन पूछताछ के बाद आनन फानन में फ्लाईट पहुंची कलकत्ता पुलिस को यह दिव्य ज्ञान उस जासूस से की गई गहन पूछताछ के दौरान नहीं हुआ.
लेकिन बम्बई में उस सितारे के घर पहुंच कर उसे वह दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया था. ज्यादा शोर मचा तो पूरे प्रकरण की जांच के लिए एक सरकारी जांच कमेटी बनी. उस कमेटी ने तथाकथित जांच के बाद वही बात उगली थी, जो बात कलकत्ता पुलिस ने उगली थी, कि वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था.
इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. 1965 के भारत पाक युद्ध के दौरान खुफिया एजेंसियों ने बम्बई में पाकिस्तान से सम्पर्क वाले एक रेडियो ट्रांसमीटर के सिग्नल पकड़े थे. ट्रांसमीटर बम्बई में ही सक्रिय था.
खुफिया एजेंसियों की टीम सिग्नल का पीछा करते हुए जब उस स्थान पर पहुंची थी जहां वह रेडियो ट्रांसमीटर सक्रिय था, तो बुरी तरह चौंक गयी थी. जिस मकान में वह ट्रांसमीटर बरामद हुआ था, वह घर उस समय के बहुत नामी गिरामी उसी फिल्मी सितारे का ही था जिससे पूछताछ करने के लिए उसके घर कुछ वर्ष पूर्व कलकता पुलिस पहुंची थी.
इसबार भी सितारे पर दिल्ली मेहरबान हुई. रेडियो ट्रांसमीटर के विषय में उस फिल्मी सितारे ने बहुत मासूम सफाई दी कि उसे पाकिस्तानी गाने सुनने का शौक है और क्योंकि भारत में समान्य रेडियो पर पाकिस्तान रेडियो प्रतिबंधित है इसलिए उसने यह रेडियो ट्रांसमीटर अपने घर में रखा है ताकि पाकिस्तानी गाने सुनने का अपना शौक पूरा कर सके.
आप यह जानकर आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि इस बार भी उस फिल्मी सितारे की ही बात को शाश्वत सत्य मान लिया गया. एक जांच कमेटी बनी और उसने भी फिल्मी सितारे के उस वक्तव्य को ही सत्य घोषित कर दिया. यह सवाल कभी पूछा ही नहीं गया, देश को कभी यह बताया ही नहीं गया कि सामान्य नागरिक के लिए पूर्णतया प्रतिबंधित और जिसे रखने पर कठोर दंड का प्रावधान था, वह रेडियो ट्रांसमीटर उस फिल्मी सितारे ने कहां से, कैसे और किस से प्राप्त किया था.?
जबकि सत्य यह है कि देश की सुरक्षा और गुप्तचर जांच एजेंसियों में जिम्मेदार पद पर कार्यरत किसी भी व्यक्ति के अतिरिक्त यदि किसी समान्य नागरिक के पास पाकिस्तान तक पहुंच वाला रेडियो ट्रांसमीटर यदि आज भी बरामद हो जाए तो पुलिस की लाठियों की बरसात उसकी हड्डियों का सत्कार पूरी लगन से करेंगी.
क्या आप जानते हैं कि कौन था वह फिल्मी सितारा, क्या नाम था उस फिल्मी सितारे का…?
तो अब जानिए कि उस फिल्मी सितारे का हिन्दू नाम…
“दिलीप कुमार” था
वही दिलीप कुमार साहब जिसने उसे मिले सर्वोच्च पाकिस्तानी एवार्ड को वापस करने से उस समय साफ़ मना कर दिया था, जब #करगिल_युद्ध में पाकिस्तानी फौज द्वारा की गई भारतीय सेना के सैकड़ों सैनिकों की हत्याओं के विरोध में उस फिल्मी सितारे से मांग की गई थी कि… वह पाकिस्तानी एवार्ड को भारतीय विरोध के प्रतीक के रूप में पाकिस्तान को वापस कर दे… (नही किया)
लेकिन इनकी चर्चा कहीं किसी मीडिया में आजतक सुनी आपने.? जो इक्का दुक्का समाचार आप को काफी प्रयास के बाद मिलेंगे वो इसलिए मिलेंगे क्योंकि उनमें इस फिल्मी सितारे की वकालत की गयी है.
प्रश्नों के कठघरे में नहीं खड़ा किया गया है. इसीलिए मैंने प्रारम्भ में ही लिखा है “जिहाद एक पुरानी पाकिस्तानी प्रेम कथा”
बॉलीवुड के चरणों में लोटती मीडिया और चाकरी करती सरकारों की कहानी दशकों पुरानी है..!!
नोट :- ज्योति मल्होत्रा जबतक “हिन्दू ज्योति मल्होत्रा” थी तबतक सब ठीक था.. लेकिन जैसे ही उसने पाकिस्तानी हाई कमीशन में काम करने वाले “दानिश” से , निकाह कर मुस्लिम बनी तब हिन्दुस्तान से गद्दारी की.. शातिर दानिश ने ज्योति का धर्मपरिवर्तन तो कर दिया लेकिन उसे नाम नही बदलने दिया..!!