Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मैं कालेज में अरस्तू पढ़ाता था…
फिर बताता कि वह गलत था।
छात्र चकित रहते, कहते: “सर, परीक्षा में क्या लिखें?”

मैं कहता:
“अगर अरस्तू को सही मानते हो, तो वही लिखो।
अगर मुझे सही मानते हो, तो मेरी बात लिखो।
और अगर हमें दोनों को गलत मानते हो, तो अपनी बात लिखो।
सोचो, चुनो, जागो।”

लेकिन यह तरीका विश्वविद्यालय को रास नहीं आया।
कुलपति ने कहा: “छात्र सच्चाई जानने नहीं, डिग्री लेने आते हैं।”
मैंने जवाब दिया:
“तो मेरा इस्तीफा स्वीकार कीजिए — मैं क्लर्क, स्टेशन मास्टर, पोस्टमास्टर बनाने नहीं आया।
मैं सोचने वाले इंसान बनाना चाहता हूँ।”

और मैंने इस्तीफा दे दिया।

फिर बीस वर्षों तक देशभर में घूमता रहा —
अब बीस छात्रों की क्लास नहीं, पचास हज़ार का सभागार मेरी कक्षा बन गया।
विश्वविद्यालय से निकला… तो ब्रह्मांड मेरा स्कूल बन गया।
अब मैं ब्रह्माण्ड का शिक्षक हूँ!

Osho

Posted in काश्मीर - Kashmir, हिन्दू पतन

मीरपुर


#मीरपुर_की_दर्दनाक_कहानी
सन 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हो रहा था, तब मीरपुर भी तत्कालीन कश्मीर रियासत का एक हिस्सा था। इस दौरान पाकिस्तान वाले पंजाब से हजारों की संख्या में हिन्दू मीरपुर पहुंचे रहे थे, वहीं मीरपुर के मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे।

जम्मू-कश्मीर सरकार के रिटायर्ड डिप्टी सेक्रेटरी सीपी गुप्ता बताते हैं कि वर्ष 1947 को हुई घटना में मीरपुर निवासियों का केवल इतना ही दोष था कि उन्होंने एक दृढ़ संकल्प कर रखा था कि जब तक उनके पास बंदूक की आखिरी गोली है, तब तक वे पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को मीरपुर शहर के अंदर प्रवेश नहीं करने देंगे, इसी प्रतीज्ञा के वशीभूत मीरपुर निवासियों ने अंतिम सांस तक आक्रमणकारियों का डट कर मुकाबला किया।
दुर्भाग्यवश युद्ध खत्म होते ही आक्रमणकारियों ने 25 नवंबर 1947 के हत्याकांड में 18 हजार से भी ज्यादा बूढ़े, युवक- युवतियां तथा अल्प आयु वाले बच्चों को भी क्रूरता से मृत्यु के घाट उतार कर हमेशा की नींद सुला दिया।

24 नवंबर 1947 के दिन मीरपुर के 25 हजार लोगों ने उनके पास मौजूद बारुद को खत्म होते देख खुद को असहाय महसूस किया । यह स्थिति इसलिए हुई, क्योंकि उस समय की भारत सरकार और रियासत जम्मू व कश्मीर सरकार के बीच मतभेद के कारण फौजों को मीरपुर से दूर रखा।

पाकिस्तानी सेना के सामने स्थानीय मदद के अभाव में उनका स्वप्न अधूरा रह गया । मीरपुर शहर के अंदर शुरू में रियासती सरकार के केवल 800 सिपाही थे, जिन में लगभग आधे अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ पाकिस्तानी आक्रमणकारियों के साथ जा मिले। बाकी लगभग 400 सिपाहियों ने अपने अल्प संख्या में अस्त्रों के साथ चारों ओर से घिरे हुए मीरपुर नगर की चौकसी की।

ऐसे मौके पर मीरपुर के लगभग एक हजार युवकों ने रक्षा चौकियों पर सिपाहियों के कंधे से कंधा मिलाकर पूरा सहयोग दिया । 6,10 तथा 11 नवंबर 1947 को शत्रुओं द्वारा किए गए हमलों का डटकर मुकाबला किया और शत्रुओं को बहुत हानि पहुंचाई, किंतु अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित बढ़ती हुई पाकिस्तानी सेना के सामने स्थानीय मदद के अभाव में उनका स्वप्न अधूरा रह गया।

17 नवंबर 1947 के दिन मीरपुर के पुलिस कैंप में रखे हुए वायरलेस सेट में अचानक खराबी हो जाने के कारण जम्मू-कश्मीर रियासत तथा भारत सरकार के साथ रेडियो संपर्क पूरी तरह से टूट गया। मौके का फायदा उठाते हुए पाकिस्तानी सेना ने शहर की पूर्वी दिशा की ओर से आक्रमण किया।
सात पठान आधी रात को शहर के भीतर प्रवेश करने में सफल हो गए। मीरपुर के आत्मघाती टोलों ने मिलकर पांच पठानों को मार गिराया और दो पठान भागने में सफल हो गए और बाकी शत्रु सेना को खदेड़ने में नगरवासी सफल हो गए।

हमलावरों ने एक भूखे भेड़िए की तरह धावा बोल दिया
इस भयानक स्थिति में जिला मीरपुर के वजीर बजारत राव रतन सिंह ने मीरपुर से जम्मू की ओर भागने का फैसला किया। मीरपुर के शासनिक हुक्मरान मीरपुर निवासियों को मौत के मुंह में छोड़कर स्वयं सुबह चार बजे कुछ पुलिस अफसरों के साथ घोड़ों पर बैठकर जम्मू की ओर भाग निकले। चौकियों पर तैनात बचे-खुचे सिपाहियों ने भी पुलिस अधिकारियों के भागने की सूचना पाकर चौकियों को छोड़ दिया।

हमलावरों ने मचाया कत्लेआम
पुलिस के भागने का समाचार मिलते ही शत्रु ने एक भूखे भेड़िए की तरह सुबह आठ बजे शहर के अंदर प्रवेश कर धावा बोल दिया और घरों को आग लगा दी। उन्होंने नागरिकों को शहर के एक कोने में धकेल दिया।  लोग भागने लगे तो शत्रु ने पैदल चलते हुए लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं, जिसके कारण लगभग 18 हजार से भी ज्यादा लोग मर गए। कुछ युवतियों ने तो शहर के गहरे कुओं में छलांग लगाई और कुछ ने अपने पुरुष वर्गों को विवश किया कि वे अपने ही हाथों से उनको मार दें, ताकि वे आक्रमणकारियों के हाथों में न पड़ें।

कुछ लोगों को तो जिंदा ही आग में जला दिया गया। लगभग 3500 नागरिक जो कि गंभीर रूप से घायल हो गए थे, उनको बंदी बना लिया गया। शेष लगभग 3500 लोग जीर्ण-हीन अवस्था में ठोकर खाते हुए सात दिन भूखे और प्यासे पैदल चलकर जम्मू पहुंचे, जिनकी दर्दनाक कहानी को शब्दों में आज भी वर्णन करना असंभव है। मीरपुर शहर जो 650 सालों तक एकता और शांति का प्रतीक रहा, 25 नवंबर 1947 को कुछ ही घंटों में लाशों का मरघट बनकर रह गया।

मीरपुर डे – कभी न भूलने वाली दास्तान
आज से 77 वर्ष पूर्व 25 नवंबर 1947 को जम्मू कश्मीर के मीरपुर जिले पर पाकिस्तान ने आक्रमण किया था और वहां रहने वाले 20,000 निहत्थे हिन्दू और सिखों का नरसंहार कर दिया, वहां से बचकर केवल 2500 मीरपुर के निवासी किसी तरह से भूखे प्यासे कई दिनों तक पैदल चलकर जम्मू पहुंच सके थे ।

यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि पाकिस्तान ने मीरपुर के रहने वाले हिन्दुओं व सिखों को चेतावनी दी थी कि यदि बचना चाहते हो तो अपने घर पर सफेद झंडा आत्मसमर्पण के चिन्ह के रूप में लगा देना, परंतु मीरपुर के निवासी हिन्दुओं व सिखों ने अपने घरों पर लाल झंडा फहरा कर यह संदेश दिया कि हम आत्मसमर्पण नहीं, अपितु लड़कर अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे।

मीरपुर पर आक्रमण के लिए पाकिस्तान सरकार ने कबायलियों और पठानों के साथ एक समझौता किया था, जिसका नाम था “ज़ेन और जार” समझौता । जिसका अर्थ था मीरपुर पर कब्जा करने के बाद वहां रहने वाले हिन्दुओं और सिखों की सारी संपत्ति जमीन और धन दौलत पाकिस्तान सरकार की होगी और वहां रहने वाली सभी हिन्दू व सिख महिलाएं पठानों की सम्पत्ति होंगी ।

आप जानते हैं हिन्दुओं और सिखों को धोखा किसने दिया ?
मीरपुर निवासी हिन्दुओं और सिखों के मुस्लिम पड़ोसियों ने । जो उसी वर्ष अगस्त में बंटवारे के बाद मीरपुर छोड़कर पाकिस्तान चले गए और पाकिस्तान आर्मी को मीरपुर की भूगौलिक स्थिति, स्थानीय आबादी की पूरी जानकारी उपलब्ध करवाई, जिससे पाक आर्मी सफलतापूर्वक मीरपुर पर कब्जा कर उसे पाकिस्तान में मिला सके ।

क्या आप जानते हैं कि उस आक्रमण के समय हमारे देश के महान स्टेट्समैन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी कांग्रेस सरकार ने क्या किया ?

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार ने मीरपुर के निवासियों की सहायता करने से मना कर दिया । नेहरू ने 20,000 हिन्दुओं-सिखों को पाकिस्तानी सेना और कबायलियों द्वारा मारे लूटे जाने के लिए छोड़ दिया । कबायलियों और पठानों द्वारा हजारों हिन्दू और सिख बच्चियों, लड़कियों, औरतों को अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उन्हें उठा उठाकर पाकिस्तान ले जाने दिया । पाकिस्तानियों और कबायली पठानों से बचने के लिए मीरपुर में कई हिन्दू व सिख महिलाओं ने आत्महत्या तक कर ली थी।

तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार यदि चाहते तो मीरपुर को पाकिस्तानियों और कबायलियों से बचाने के लिए और वहां के नागरिकों की रक्षा के लिए इंडियन आर्मी को भेज सकते थे, किंतु नेहरू की कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर ऐसा कुछ नहीं किया । जबकि उस समय मीरपुर से कुछ ही मील दूर झांगर में भारतीय सेना तैनात थी ‌। परंतु भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मीरपुर के हिन्दू व सिखों को उनके हाल पर पाकिस्तानियों के हाथों मरने के लिए छोड़ दिया ।

भारत देश के एक पूरे शहर पर कब्जा कर लिया गया । भारत के इस शहर मीरपुर की सम्पूर्ण पुरुष आबादी को पाकिस्तानियों द्वारा 1 दिन में कत्ल कर दिया गया । उस शहर की सभी महिलाओं को अगवा कर लिया गया ।‌ उनके संग यौन अपराध हुए । उन हजारों महिलाओं को उठाकर ले जाया गया, परंतु भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार चटखारे लेकर मीरपुर के 20,000 हिन्दू, सिख पुरुषों के जनसंहार और हजारों हिन्दू व सिख महिलाओं के बलात्कार और अपहरण का दृश्य मजे ले लेकर देखकर आनंदित होते रहे, मौन साध कर बैठे रहे, और उनकी सहायता हेतु सेना नहीं भेजी।

1 दिन के अंदर ही पूरा मीरपुर कब्रिस्तान में बदल गया, सभी हिन्दू व सिख पुरुषों को मार दिया गया, पुरुषों के सामने उनकी बेटियों, बहुओं, बहनों, मांओं, पत्नियों का बलात्कार किया गया, और फिर उन महिलाओं के सामने ही उनके पुरुषों को मार दिया गया, इसके बाद सभी बच्चियों, लड़कियों, औरतों को उठाकर पाकिस्तान ले जाया गया । केवल कुछ वृद्ध महिलाओं को जीवित छोड़ा गया ।

यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि नेहरू के नेतृत्व वाली तत्कालीन भारत सरकार ने जानबूझकर हिन्दुओं व सिखों को मरने दिया । जबकि वहां के निवासी यह सोचकर बैठे थे कि भारत सरकार उनकी सुरक्षा हेतु सेना अवश्य भेजेगी और वे भारतीय सेना के संग कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ते हुए अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे । इसीलिए मीरपुर के हिन्दुओं व सिखों ने आत्मसमर्पण के बदले अपनी मातृभूमि के लिए लड़ने का निर्णय किया ।

विडंबना देखिए कि पाकिस्तान द्वारा मीरपुर में अंजाम दिए गए 20,000 निर्दोष हिन्दुओं और सिखों के उस नरसंहार का आज तक कहीं कोई उल्लेख नहीं होता । ना तो आज तक पाकिस्तान सरकार, पाकिस्तानी सेना के मानवाधिकार उल्लंघनों और अपराधों की बात होती है, ना ही तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस सरकार की भूमिका पर प्रश्न उठाए जाते हैं…..मीरपुर आज भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है और कभी वहां रहने वाले बहुसंख्यक हिन्दुओं और सिखों का अब वहां 100% जातीय सफाया पाकिस्तान द्वारा किया जा चुका है।

संकलन – सव्यसाची
रविवार, ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी २०८२

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किरण, एक छोटी सी लड़की, जिसकी उम्र मुश्किल से आठ साल की होगी, अनाथालय के उदास गलियारों में एक अकेली कली की तरह थी। उसकी बड़ी-बड़ी, उदास आँखें, जैसे गहरे समुद्र हों, उनमें एक ऐसी कहानी छिपी थी जो उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा बड़ी थी। किरण ने अपने माता-पिता को कभी नहीं जाना था। उसे अनाथालय के दरवाज़े पर छोड़ दिया गया था, उसकी पहचान एक कागज के टुकड़े पर लिखे उसके नाम के सिवा और कुछ नहीं थी।

अनाथालय में जीवन बेरंग था। हर दिन एक जैसा, मशीनी सा था। बच्चों को कतार में लगना होता, खाना खाना होता और सोने जाना होता। प्यार और स्नेह की कोई गर्माहट नहीं थी, सिर्फ़ सख्त नियम और अनुशासन थे। किरण, अपनी कमजोर काया के बावजूद, एक मजबूत इरादे वाली लड़की थी। उसने हार मानने से इनकार कर दिया था।

किरण को किताबें बहुत पसंद थीं। वह अनाथालय की छोटी सी लाइब्रेरी में घंटों बिताती, परियों की कहानियों और रोमांचक कहानियों में खो जाती। किताबों में उसे एक अलग दुनिया मिलती थी, एक ऐसी दुनिया जहाँ प्यार, खुशी और आशा का वास था। वह अक्सर कल्पना करती कि उसके माता-पिता राजकुमार और राजकुमारी होंगे, और उसे छोड़कर जाने की उनकी कोई मजबूर वजह रही होगी।

एक दिन, अनाथालय में एक जोड़ा आया। वे दयालु और विनम्र स्वभाव के थे। उनका नाम था श्री और श्रीमती शर्मा। वे एक बच्ची को गोद लेने आए थे। अनाथालय के सभी बच्चे उत्साहित थे। हर कोई शर्मा दंपत्ति को प्रभावित करने और उन्हें अपना माता-पिता बनाने की उम्मीद कर रहा था। किरण भी उत्साहित थी, लेकिन उसे डर भी लग रहा था। उसे पता नहीं था कि उसे प्यार और परिवार मिलेगा या नहीं।

शर्मा दंपत्ति ने सभी बच्चों से बारी-बारी से बात की। जब उन्होंने किरण से बात की, तो उन्हें लगा कि वह एक खास बच्ची है। उसकी आँखों में एक चमक थी, और उसकी बातों में एक गहराई थी। उन्होंने उससे उसकी पसंदीदा किताबों के बारे में पूछा, और उसने उत्साह से जवाब दिया। उन्होंने उसे कुछ कविताएँ भी सुनाईं, और वह मंत्रमुग्ध होकर सुनती रही।

शर्मा दंपत्ति ने किरण को गोद लेने का फैसला किया। किरण की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसे एक परिवार मिल गया है। वह खुशी से रोने लगी। शर्मा दंपत्ति ने उसे गले लगाया और उसे आश्वासन दिया कि वे हमेशा उसके साथ रहेंगे।

किरण का जीवन बदल गया। उसे एक प्यारा घर, एक प्यारा परिवार और एक बेहतर भविष्य मिला। शर्मा दंपत्ति ने उसे खूब प्यार दिया और उसकी हर जरूरत का ध्यान रखा। उन्होंने उसे अच्छी शिक्षा दी और उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया।

किरण ने कड़ी मेहनत की और एक सफल डॉक्टर बनी। उसने गरीबों और जरूरतमंदों की मदद की। वह कभी नहीं भूली कि वह कहाँ से आई थी। वह अक्सर अनाथालय जाती और बच्चों से मिलती। वह उन्हें किताबें देती और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करती।

किरण की कहानी एक प्रेरणा है। यह बताती है कि प्यार और स्नेह में कितनी ताकत होती है। यह बताती है कि कोई भी बच्चा चाहे कितना भी अनाथ और अकेला क्यों न हो, उसे हमेशा उम्मीद रखनी चाहिए। एक दिन, उसकी जिंदगी में भी खुशियाँ आ सकती हैं।

किरण की कहानी उस दीपक की तरह है जो अंधेरे में रास्ता दिखाता है। यह उन सभी लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो मुश्किलों से जूझ रहे हैं। यह बताती है कि जीवन में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए।

ये कहानी हमें ये भी सिखाती है कि हमें हमेशा दूसरों के प्रति दयालु और सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए। हमें हमेशा जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए। क्योंकि हर कोई प्यार और सम्मान का हकदार है।

Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

आहार के नियम भारतीय 12 महीनों अनुसार
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#चैत्र ( मार्च-अप्रैल) – इस महीने में गुड का सेवन करे क्योकि गुड आपके रक्त संचार और रक्त को शुद्ध करता है एवं कई बीमारियों से भी बचाता है। चैत्र के महीने में नित्य नीम की 4 – 5 कोमल पतियों का उपयोग भी करना चाहिए इससे आप इस महीने के सभी दोषों से बच सकते है। नीम की पतियों को चबाने से शरीर में स्थित दोष शरीर से हटते है।

#वैशाख (अप्रैल – मई)- वैशाख महीने में गर्मी की शुरुआत हो जाती है। बेल पत्र का इस्तेमाल इस महीने में अवश्य करना चाहिए जो आपको स्वस्थ रखेगा। वैशाख के महीने में तेल का उपयोग बिल्कुल न करे क्योकि इससे आपका शरीर अस्वस्थ हो सकता है।

#ज्येष्ठ (मई-जून) – भारत में इस महीने में सबसे अधिक गर्मी होती है। ज्येष्ठ के महीने में दोपहर में सोना स्वास्थ्य वर्द्धक होता है , ठंडी छाछ , लस्सी, ज्यूस और अधिक से अधिक पानी का सेवन करें। बासी खाना, गरिष्ठ भोजन एवं गर्म चीजो का सेवन न करे। इनके प्रयोग से आपका शरीर रोग ग्रस्त हो सकता है।

#अषाढ़ (जून-जुलाई) – आषाढ़ के महीने में आम , पुराने गेंहू, सत्तु , जौ, भात, खीर, ठन्डे पदार्थ , ककड़ी, पलवल, करेला, बथुआ आदि का उपयोग करे व आषाढ़ के महीने में भी गर्म प्रकृति की चीजों का प्रयोग करना आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

#श्रावण (जूलाई-अगस्त) – श्रावण के महीने में हरड का इस्तेमाल करना चाहिए। श्रावण में हरी सब्जियों का त्याग करे एव दूध का इस्तेमाल भी कम करे। भोजन की मात्रा भी कम ले – पुराने चावल, पुराने गेंहू, खिचड़ी, दही एवं हलके सुपाच्य भोजन को अपनाएं।

#भाद्रपद (अगस्त-सितम्बर) – इस महीने में हलके सुपाच्य भोजन का इस्तेमाल कर  वर्षा का मौसम् होने के कारण आपकी जठराग्नि भी मंद होती है इसलिए भोजन सुपाच्य ग्रहण करे।  इस महीने में चिता औषधि का सेवन करना चाहिए।

#आश्विन (सितम्बर-अक्टूबर) – इस महीने में दूध , घी, गुड़ , नारियल, मुन्नका, गोभी आदि का सेवन कर सकते है। ये गरिष्ठ भोजन है लेकिन फिर भी इस महीने में पच जाते है क्योकि इस महीने में हमारी जठराग्नि तेज होती है।

#कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर) – कार्तिक महीने में गरम दूध, गुड, घी, शक्कर, मुली आदि का उपयोग करे।  ठंडे पेय पदार्थो का प्रयोग छोड़ दे। छाछ, लस्सी, ठंडा दही, ठंडा फ्रूट ज्यूस आदि का सेवन न करे , इनसे आपके स्वास्थ्य को हानि हो सकती है।

#अगहन (नवम्बर-दिसम्बर) – इस महीने में ठंडी और अधिक गरम वस्तुओ का प्रयोग न करे।

#पौष (दिसम्बर-जनवरी) – इस ऋतू में दूध, खोया एवं खोये से बने पदार्थ, गौंद के लाडू, गुड़, तिल, घी, आलू, आंवला आदि का प्रयोग करे, ये पदार्थ आपके शरीर को स्वास्थ्य देंगे। ठन्डे पदार्थ, पुराना अन्न, मोठ, कटु और रुक्ष भोजन का उपयोग न करे।

#माघ (जनवरी-फ़रवरी) – इस महीने में भी आप गरम और गरिष्ठ भोजन का इस्तेमाल कर सकते है। घी, नए अन्न, गौंद के लड्डू आदि का प्रयोग कर सकते है।

#फाल्गुन (फरवरी-मार्च) – इस महीने में गुड का उपयोग करे। सुबह के समय योग एवं स्नान का नियम बना ले। चने का उपयोग न करे।

साभार

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ગુજરાતના એક નાના ગામમાં રેખા અને હેમા નામની બે બહેનો રહેતી. રેખા મોટી હતી, ખૂબ જ જવાબદાર અને શાંત સ્વભાવની. હેમા છોકરી તો નાનકડી, પણ ભારે શેતાન અને હંમેશા હસતી રમતી.

જ્યારે માતા-પિતા ન હતા, ત્યારે રેખાએ માતાની જગ્યાએ ઉભી રહી હેમાનું પાલનપોષણ કર્યું. પોતાને માટે કશું ન માંગીને હંમેશા હેમાની જરૂરિયાતોને પ્રાથમિકતા આપી. રાત્રે ખાવા માટે બે રોટલી હોતી, તો રેખા કહેતીઃ “મારે ભૂખ નથી આજે.” અને હેમાને ખવડાવતી.

હેમા મોટી થઇ, શહેરમાં અભ્યાસ કરવા ગઈ. નવો સંસાર, નવા મિત્રો… અને ધીરે ધીરે રેખા સાથેનો સંપર્ક ઓછો થવા લાગ્યો. રેખા દરેક તહેવાર, જન્મદિવસે ફોન કરતી, પણ હેમા વ્યસ્ત હોય તેમ કહી ટાળી દેતી.

એક દિવસ રેખા hospital માં હતી – સતત બીમાર રહેતી હતી, છતાં હેમાને ન કહેતી. પણ એક પાડોશીએ હેમાને ફોન કરીને વાત કહી. હેમા તરત ઘેર આવી.

બહેનને જોઈ હેમાની આંખો ભરાઈ ગઈ. રેખાની આંખોમાં હંમેશાની જેમ હૂંફ હતી, કોઈ શિકાયત નહીં. હેમા રડી પડી – “દીદી, તું કેમ ન કહ્યું મને?”
રેખાએ નરમાઈથી કહ્યું, “મારા માટે તું હંમેશા ખુશ રહે એ જ જરૂરી છે.”

એ દિવસે હેમા સમજી ગઈ કે સ્નેહ શું હોય છે. તેણે વચન આપ્યું કે હવે એક ક્ષણ પણ દીદીથી દૂર નહીં રહે.

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ગુજરાતના એક નાના ગામમાં રેખા અને હેમા નામની બે બહેનો રહેતી. રેખા મોટી હતી, ખૂબ જ જવાબદાર અને શાંત સ્વભાવની. હેમા છોકરી તો નાનકડી, પણ ભારે શેતાન અને હંમેશા હસતી રમતી.

જ્યારે માતા-પિતા ન હતા, ત્યારે રેખાએ માતાની જગ્યાએ ઉભી રહી હેમાનું પાલનપોષણ કર્યું. પોતાને માટે કશું ન માંગીને હંમેશા હેમાની જરૂરિયાતોને પ્રાથમિકતા આપી. રાત્રે ખાવા માટે બે રોટલી હોતી, તો રેખા કહેતીઃ “મારે ભૂખ નથી આજે.” અને હેમાને ખવડાવતી.

હેમા મોટી થઇ, શહેરમાં અભ્યાસ કરવા ગઈ. નવો સંસાર, નવા મિત્રો… અને ધીરે ધીરે રેખા સાથેનો સંપર્ક ઓછો થવા લાગ્યો. રેખા દરેક તહેવાર, જન્મદિવસે ફોન કરતી, પણ હેમા વ્યસ્ત હોય તેમ કહી ટાળી દેતી.

એક દિવસ રેખા hospital માં હતી – સતત બીમાર રહેતી હતી, છતાં હેમાને ન કહેતી. પણ એક પાડોશીએ હેમાને ફોન કરીને વાત કહી. હેમા તરત ઘેર આવી.

બહેનને જોઈ હેમાની આંખો ભરાઈ ગઈ. રેખાની આંખોમાં હંમેશાની જેમ હૂંફ હતી, કોઈ શિકાયત નહીં. હેમા રડી પડી – “દીદી, તું કેમ ન કહ્યું મને?”
રેખાએ નરમાઈથી કહ્યું, “મારા માટે તું હંમેશા ખુશ રહે એ જ જરૂરી છે.”

એ દિવસે હેમા સમજી ગઈ કે સ્નેહ શું હોય છે. તેણે વચન આપ્યું કે હવે એક ક્ષણ પણ દીદીથી દૂર નહીં રહે.

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પદ, ધન, કિર્તી, રૂપ, વિદ્યા વિગેરે અનેક કારણો માણસમાં અહંકાર પેદા કરવાનું કામ કરે છે. નશો માણસને બરબાદ કરે છે પણ અહંકાર તો સર્વથા સત્યાનાશ નોતરે છે. રામાયણ અને મહાભારતનાં કથાનક એનાં આદર્શ ઉદાહરણ છે. રાવણને દશ માથાં હતાં એમ કહેવાય છે. હું નથી માનતો કે કોઈ મનુષ્યદેહી વ્યક્તિ દશ માથાં સાથે જીવી શકે. રાવણને પણ દશ માથાં હતાં એમ કહ્યું છે તેમાં કદાચ એવું ઈંગીત છે કે રાવણના માથામાં દસ ગણો મદ એટલે કે અહંકાર ભરાયેલો હતો. આ અહંકારે જ છેવટે એને પતન તરફ લઈ જવાનું કામ કર્યું. જ્યારે ભગવાન શ્રીરામની સેના સમુદ્રના સામા તટે પહોંચી ગઈ અને રાવણના ગુપ્તચરો જ્યારે આ સેના સમુદ્ર પર સેતુ બાંધી લંકા ઉપર ચઢી આવી રહી છે તેવા સમાચાર લાવ્યા ત્યારે રાવણે મંત્રી સભામાં આ પરિસ્થિતિમાં ઉચિત સલાહ આપવા કહ્યું. રાવણ જેવા મદોન્મતને કોણ સલાહ આપે ? ઉલટાનું ચાપલુસીમાં એવું કહેવાયું –

“જિતે હુ સૂરાસૂર તબ શ્રમ નાહીં
નર બાનર કે હિ લેખે માહી”

અર્થાત્ આપે દેવતાઓ અને રાક્ષસોને જીતી લીધા છે ત્યારે કંઈ શ્રમ જ નહોતો થયો તો આ વાનર અને મનુષ્ય કઈ ગણતરીમાં છે ? (સુંદરકાંડ ।।૫।।) આ સમયે પણ રાવણને વિભીષણે અને માલ્યવાન નામના એક બુદ્ધિમાન મંત્રીએ ચેતવ્યો હતો. વિભીષણે વેર ત્યાગીને ઈશ્વરના અવતાર એવા શ્રીરામ સમક્ષ મસ્તક નમાવવા સલાહ આપી હતી અને માન, મોહ તેમજ મદનો ત્યાગ કરી વાસ્તવિક પરિસ્થિતિ સ્વીકારવા કહ્યું હતું. આજ વાત માલ્યવાન નામના સચિવે પણ કહેવાની હિંમત કરી હતી.

“માલ્યવંત અતિ સચિવ સયાના । તાસુ બચન સુનિ અતિ સુખ માના ।।
તાત અનુજ તવ નીતિ બિભુષન । સો ઉર ધરહુ જો કહત બિભીષન ।।” (સુંદરકાંડ)

આમ, માલ્યવાને સ્પષ્ટ સલાહ આપી હતી કે આપના ભાઈ વિભીષણ જે કંઈ કહી રહ્યા છે તેને અનુસરો. રાવણે માલ્યવાનને સભામાંથી કાઢી મૂક્યો હતો.

છેલ્લે રાવણની પત્નિ મંદોદરીએ રાવણને વિનંતી કરતા કહ્યું હતું –

“નાથ બયરુ કીજે તાહીસોં । બુધિ બલ સકિઅ જીતિ જાહી સોં ।।
તુમહિ રઘુપતિહી અંતર કૈસા । ખલુ ખદ્યોત દિનકરહિ જૈસા ।।” (લંકાકાંડ)

અર્થાત્ હે નાથ ! વેર તેની સાથે જ કરવું જોઈએ જેને બુદ્ધિ અને બળ દ્વારા જીતી શકાય. આપનામાં અને શ્રી રઘુનાથજીમાં આગિયા અને સૂર્ય જેટલું અંતર છે.

પણ રાવણ પોતાના અહંકાર અને મદમાં કોઈને સાંભળવા તૈયાર નહોતો. પરિણામ શું આવ્યું ? મારી મા એક ભજન ગાતી હતી એની પંક્તિઓ –

“રાવણ સરખો રાજીયો, જેની મંદોદરી રાણી
દશ મસ્તક છેદાઈ ગયાં, રૂડી લંકા રોળાણી.”

આમ, અભિમાન એ વિનાશનો પાયો નાંખનાર પરિબળ છે. પોતાની સત્તા અને મદમાં મત્ત એવા દ્રુપદે પોતાના સહાધ્યાયી અને બાળસખા એવા દ્રોણનું હળાહળ અપમાન કર્યું. દ્રોણ કંઈ દ્રુપદનું રાજ્ય માંગવા નહોતો આવ્યો. એની જરૂરીયાત તો માત્ર પોતાના દિકરાને દૂધ પીવરાવવા માટે એક ગાયની હતી. આવડા મોટાં સમ્રાટને ત્યાં આવી માંગણી સાક્ષાત કુબેર પાસે મૂળાનું પતીકુ માંગવા બરાબર હતી. વાતમાં કંઈ માલ નહોતો. દ્રુપદના અભિમાને વાતનું વતેસર કરી નાંખ્યું. દ્રોણનું અપમાન થયું. અપમાનની આગમાં સળગતો દ્રોણ કાળઝાળ ક્રોધ સાથે દ્રુપદના દરબારમાંથી નીકળ્યો. એણે બે પ્રતિજ્ઞા લીધી. એક દિવસ હું દ્રુપદને બંદીવાન બનાવી મારી સામે ઉભો કરીશ. એક દિવસ હું પણ રાજ્યસિંહાસને બેસીશ. વેરના નફા નુક્સાનનું સરવૈયું શ્રી સવા સાથે અહીંયાંથી શરૂ થયું હતું. દ્રુપદ સત્તાના મદમાં છકી ગયો અને મિત્રનું અપમાન કરી બેઠો એ માટે એનો કોઈ બચાવ ન હોઈ શકે. પણ ક્રોધ અને પ્રતિશોધની ભાવનાથી પિડિત દ્રોણ જો પોતે એ જ રસ્તે ન ગયા હોત તો કદાચ મહાભારતમાં એક જુદું પ્રકરણ રચાયું હોત. કદાચ દ્રુપદને અફસોસ અને પશ્ચાતાપ થયો હોત. પોતાના તપ અને વિદ્યાની આરાધનાને આગળ વધારી દ્રોણ કદાચ વશિષ્ઠ, જમદગ્નિ કે એમના પિતા ભરદ્વાજ જેવા ઋષિ તરીકે અક્ષુણ્ણ કિર્તિના અધિકારી બન્યા હોત. દ્રોણે આ ન કર્યું. ક્રોધની એ ક્ષણ અને પુત્ર વાત્સલ્ય એમને પ્રતિશોધના રસ્તે લઈ ગઈ. પરમોચ્ચની સાધના દ્રોણ જેવા શાસ્ત્ર અને શસ્ત્રના વિષારદ ચોક્કસ કરી શક્યા હોત પણ ભવિષ્ય કંઈક જુદું જ લખાયું હતું અને એ ભવિષ્ય દ્રોણને દ્રુપદનું રાજ્ય છોડી ચાલી નીકળવા માટે નિમિત્ત બન્યું. દ્રોણના જીવનમાં હજુ તો બીજા કેટલાય પલટા આવવાના હતા. જેમ સત્તા અને સામર્થ્યનું અભિમાન વિનીપાત તરફ લઈ જાય છે તે જ રીતે વિદ્યા અને ક્ષમતા માટેનું અભિમાન પણ વ્યક્તિને પરમોચ્ચની પ્રાપ્તિના માર્ગમાં બાધક બને છે. દ્રુપદને છોડીને ચાલી નીકળેલ દ્રોણ પોતાની પ્રતિજ્ઞા પૂરી કરી શકશે ખરા ?

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एक देशभक्त जिसने बचाया था कश्मीर को भारत से अलग होने से …!!
कश्मीर में वैष्णोदेवी और अमरनाथ की पवित्र यात्रा करने बाले श्रद्धालुओं साहित कश्मीर में पर्यटन के लिये जाने बालो को भी अहसानमंद होना चाहिए . जगमोहन का ……..
बात है 1989 के दशक की उस समय कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था .. उस समय कश्मीर की पुलिस , ब्यूरोक्रेट , स्थानीय प्रशासन ब कश्मीरी जनता का एक बड़ा वर्ग भारत के खिलाफ विद्रोह पर उतारू था … हालात इतने जादा खतरनाक और संबेदनशील हो चुके थे की स्थितियां हाँथ से लगभग बाहर निकल चुकी थी .. हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन प्रेस नोट जारी कर कश्मीर के उर्दू समाचारपत्रों -आफताब और अल सफा जैसे उर्दू समाचारपत्रों में छपवाया करते थे इन | प्रेस नोट में हिंदुओं को कश्मीर छोड़ कर जाने का आदेश दिया गया था उस दौर में कश्मीरी हिंदुओं की खुले आम हत्याएँ शुरू हो गयी थी कश्मीर की मस्जिदों के लाउडस्पीकर से आवाजे गूंजने लगी थी कि कश्मीर छोड़ कर चले जाओ और अपनी बहू बेटियाँ हमारे लिए छोड़ जाओ | “कश्मीर में रहना है तो अल्लाह-अकबर कहना है”, “असि गाची पाकिस्तान, बताओ रोअस ते बतानेव सन” (हमें पाकिस्तान चाहिए, हिंदू स्त्रियों के साथ, लेकिन पुरुष नहीं”), ये नारे मस्जिदों से लगाये जाने वाले कुछ नारों में से थे |
उस दौर में दीवारों पर पोस्टर लगे हुए थे कि सभी कश्मीर में इस्लामी वेश भूषा पहनें, सिनेमा पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया | कश्मीरी हिंदुओं की दुकानें, मकान और व्यापारिक प्रतिष्ठान चिन्हित कर दिए गए | यहाँ तक कि लोगों की घड़ियों का समय भी भारतीय समय से बदल कर पाकिस्तानी समय पर करने को उन्हें विवश किया गया | 24 घंटे में कश्मीर छोड़ दो या फिर मारे जाओ – काफिरों को क़त्ल करो का सन्देश कश्मीर में गूँज रहा था | इस्लामिक दमन का एक वीभत्स चेहरा जिसे भारत सदियों तक झेलने के बाद भी मिल-जुल कर रहने के लिए भुला चुका था, वो एक बार फिर सामने था …
उस दौर में एक समय ऐसा भी आया जब कश्मीर पुलिस ब स्थानीय प्रशासन की मदद से कश्मीर को एक स्वतंत्र राष्ट बनाने की साजिश रच ली गयी थी .. उस समय हालात ये थे की राज्यपाल के कार्यालय तक में कुछ कर्मचारी पकिस्तान समर्थक तत्वों के साथ मिल चुके थे और जगमोहन के कार्यालय से खबरे लीक होने लगी थी .खैर जगमोहन ने उन स्थितियों की अपनी सूझ बूझ से काबू में करने के साथ जम्मू कश्मीर पुलिस के पकिस्तान समर्थक तत्वों को न्यूट्रलाइज करने के लिये उनके हथिया बापस लेकर सैन्य बलों को तैनात कर दिया था जिसके कारण कश्मीर की स्वतंत्रता की घोषणा के लिये कश्मीर के ईदगाह मैदान में इक्कट्ठा हुए विद्रोहियों की चाल को विफल कर कश्मीर को भारत से अलग होने से बचा लिया था .. अगर जगमोहन उस समय नाक हो गए होते तो आज कश्मीर की यात्रा के लिये भारत की जनता को स्वतंत्र कश्मीर की इस्लामी सरकार अथबा पाकिस्तान की सरकार से वीजा लेने की आवयश्कता पड़ती . इस विषय में जादा विस्तृत विवरण के लिये आप कश्मीर को वचाने बाले तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन की पुस्तक को पढ़ सक्ते है ..हमें ऐसे देशभक्त शख्सियत का शुक्रगुजार और अहसानमंद होना चाहिए जिन्होंने देश के एक हिस्से को भारत से अलग होने से बचा लिया था …….!
जगमोहन की पुस्तक का नाम है ..”” MY FROZEN TURBULENCE IN KASHMIR”…

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

જમાદાર જાન  મોહંમદ

જંગલખતોનો નાનો  કર્મચારી જાન  મોહંમદ  જંગલની  જાન  હતો
ટીલીયો જંગલનો રાજા  
ટીલીયાને બધા  લાડ થી બાપ   લાકાળો      કહેતા
ટીલીયો ગીરમાં રહેતો હતો
જમાદાર પણ ગીરમાં જંગલખાતામાં  નોકરી કરે
ખાખી વરદીનાં  શર્ટમાં  ચાર બટન ખુલા રાખી  બાયું ચડાવેલો
જાન  મોહમ્મદ  પગ નીચે કુવાડો દબાવી  બેઠો હોઈ
એટલે સાસણ ના   મોરલા  ગળાના  ટુકડા કરીને   ગીરને ગાંડુ  કરતો  ટહુકો કરે
માડી  જાયો  ભાય મળ્યો હોઈ  ને બેન    દોડીને જાય  તેમ
વાયરો  વળી વળીને  જાન  મોહમ્મદના વાંકડિયા મેલા વાળમાં  માથું ઘસતો
ભ્રહ્માંડ ના  રહસ્યો  ગોતવા કોઈ જીવ  ભૂલો પડ્યો હોઈ તેવો હતો
ગાંડી  ગીરનો  ડાયો દીકરો   એટલે  જાન મોહમ્મદ
ચાલો  જાણે જાન  મોહમ્મદને  તો ઓળખી લીધો
હવે આગળ વધીયે

જો જો હો કુવાડા થી બીતા   નહી
એતો પગનીચે  દાબીને રાખેલો છે  જંગલના  દુશ્મનો  માટે

વિશ્વનો નકશો જોવોતો
સોમાલિયા તરીખે ઓળખાતો   આફ્રિકાનો  ભૂ ભાગ   વચ્ચે પાણી ના હોઈ તો
કાઠિયાવાડના  કિનારે પડતા  ખૂણામાં  બરછીની જેમ પેસી જાય  તેમ ગોઠવાયેલો છે
હજારો વરસો પહેલા આફ્રિકા અને  ગીર જોડાયેલું હશે
માણસો અને પશુનો આવારો જાવરો  પણ હશે

આફ્રિકામાં ઘણા દેશો છે
સોમાલિયામાં ચાંચીયા છે
તો આપડે સૌરાષ્ટમાં ચાંચ બંદર  છે
ગીરમાં  ઝેબા  નામનો સિંહ છે
તો   અહીં આફ્રિકામાં ઝામ્બિયા નામનો દેશ છે 

સેસિલ  નામનો એક  સિંહ  અફ્રિકાના આ ઝામ્બિયા નામના દેશમાં રહેતો હતો
તેનું નામ સેસિલ    નામના એક  સાહસિક  અંગ્રેજના નામ ઉપરથી પડેલું

ગીરનો ટીલીયો ઘણા વરસ પહેલા ગુજરી ગયો     ઝામ્બિયાના સેસિલને    પાછો થયે પાંચેક  વરસ પણ નહિ થયા હોઈ
આ બંને સિંહોની વાત  છે
બે જંગલોની વાત છે
પણ વાતને   સાંધતું  પાત્ર છે જમાદાર જાન મોહમ્મદ
સાધનામાં અનુસંધાન થાય

મંત્ર સાધનામાં
સાધક સામાન્ય રીતે તાંબાના પાત્રમાં રાખેલું પાણી મંત્ર સાધના પછી પીવે છે
સાધકો માને છેકે પાણી સાંભળે છે .
પાણીને યાદદાસ્ત હોઈ છે
પાણી યાદ પણ રાખે છે મંત્રોનો ધ્વનિ
જોજો  તમે  નદી  કિનારે  ત્રિકાળ  સંધ્યા  કરતા   માનવની છાયા  નદીના પટ ઉપર  સોનેરી  લાગશે 

ગીરમાં હિરણ નામની એક નદી
ગીરને હિરણને ટીલીયાની ડણક આજે પણ યાદ હતી
કારણ
ગીરની હિરણ માં આજે તાજા વરસાદથી પાણી આવ્યું હતું
ને ખળ ખળ થતી હીરણ નદીએ વાત માંડી ….પાણી ને તો બધુજ યાદ હોઈ છે !

વાત એમ હતીકે
જાન મામદ જમાદાર જંગલ વિભાગનો નાનો કર્મચારી
ટીલીયો ગીરનો રાજા
પ્રખ્યાત સાવજ
ટીલીયો તેને એટલે કહેતા કે તેના કપાળમાં ટીલું હતું
હિરણ નું પાણી પીતો ટીલીયો 13 વરસ નો થયો ત્યાં સુધીમાં
શેત્રુંજી શીંગોડા મચ્છુન્દરી અને રાવળનું પાણી પણ ચાખી આવ્યો હતો
એ આંટો મારે ત્યારે નદી કિનારે એક બે જીવ પ્રાણ છોડી દે

શિકાર સિંહનો સ્વભાવ છે . શિકારી છે એટલે તો સન્માન છે
તે ખાનદાન હતો
સાવજ તો ખાનદાનજ હોઈ ને ?
તેને નદીયુંનું પાણી પીધું હતું
તે માલધારીની દેવી જેવી દીકરીયુંએ વીરડા કર્યા હોઈ તેમાં એ લબકારા પણ મારી લેતો
પણ માલધારીના કોઈ માલ નું લોહી એને ચાખ્યું ના હતું
નાની પાડરી પણ નીકળે તો
વિશ્વામિત્રની જેમ મેનકાને જોઈ તે મોઢું ફેરવી લે તેમ મોઢું ફેરવી લેતો

ગીરમાં
સિંહ દર્શન હોઈ ત્યારે જમાદાર જાન મોમ્મદ લાંબા સાદે ગાતો
ટીલીયા …..બાપા ટીલીયા ઓ મારા ટીલીયા
ને ટીલીયો ટહેલહતો ટહેલતો વીડીનાં ઘાસ માંથી બહાર આવી બાજુના જાંબુના ઝાડ સાથે કાયા ઘસી
બોરડી અને કારંજ વચ્ચેથી ડોકું કાઢી હવામાં જાન મોમ્મદને સૂંઘી લેતો
પછી સામો ભેટવા જતો હોઈ તેમ ડણક દેતો દોડતો દોડતો આવતો
ટીલીયો ઝાપટ મારી જમાદારની લાકડી ઉપર ટીંગાડેલું ગોસ્ત છીનવી લેતો
ટીલીયાની આ મસ્તી હતી
જમાદારની આ આમતો નોકરી હતી
પણ ગીરનું ઝાડવે ઝાડવું જણાતું હતું કે જાન મહોમદ નોકરીમાં જાન રેડે છે
જાન મોહમ્મદ જેવી નોકરી હજુ સુધી જંગલ ખાતામાં કોઈએ કરી નહતી

ગુજરાત સરકારની  નોકરી  કરવા  સિલેક્ટ થયેલા નવા ડેપ્યુટી કલેક્ટરોને સરકાર ગીરના જંગલમાં
1989 માં લઇ ગયેલી ત્યારે મેં ટીલીયા જેવા સિંહને જોયા હતા
અને ટીલીયા તથા જાન મોહમ્મદની દોસ્તીના કિસ્સા જંગલના ગાર્ડ પાસેથી સાંભળ્યા હતા

એક કિસ્સો એવો  હતો
તેદી ટીલીયાની ભૂલ થઇ ગઈ
બન્યું  એવું  કે   શિકાર પછી વધેલું ગોસ્ત તે બોરડીના ઝાળા સુધી પાછા પગે ઘસડીને લાવ્યો
ધ્યાન ના રહ્યું પાછળ ઉભેલા ઝરખ ના ટોળાનું
ટીલીયાને વડકુ ભરી મોટા ઝરેખે તેના થાપમાં નખથી ઉઝરડો પાડ્યો
હિરણના વેગથી એકાદું ભેખડનું ભેડુ પડી જાય તેમ ટીલીયાના થાપમાંથી ગોસ્ત જુદું થઇ ગયું
બીજા ઝરખ અનુકરણ કરે અને ટીલીયાને ઘાયલ કરે તે પહેલા
જાન મોમ્મદનો ગોબો ઉડતો આવીને ઝરખના મોઢા ને શુન કરી ગયો
ઝરખોનું ટોળું ભાગ્યું
સિંહ ડણકતો ડણકતો તેની પાછળ
જાન મોમ્મદ ગુસ્સાથી થુંકીને બોલ્યો સાલા મફતિયા ટીલીયાનું ગોસ્ત ખાવા આવ્યા છો
તમારીતો……..
બસ તેદી અને આજની ઘડી
જાન મહોમદ ત્રણ દિવસથી ટીલીયાને ગોતે
ટીલીયો દેખાઈ નહિ ટીલીયાના થાપામાં ઝરખે બેસાડેલા નોર વકર્યા હતો
પાકીને દડો થયેલો ઘા અને એના ઉપર બેસતી માખીએ ટીલીયાના મોઢા ઉપરથી નૂર ઉડાડી દીધેલું
ગુંગુંગુંગું   કરતી  અને  ફરતી  માખી   સાવઝ  લાચારીથી  જોઈ  રહ્યો   હતો
ડોબાને  ડોકેથી  પકડી  પછાડી  દેતો  ટીલીયો 
માખી પાસે  લાચાર  હતો 
માત્ર  બેજ  જણ   એને  મદદ  કરી  શકે  તેમ  હતા 
એક  માનવ 
બીજો   દેવ 

જંગલનો  જાન   મોહમ્મદ  ટીલીયાને  ગોતતો  હતો
ત્રણ દિવસે ટીલીયાનો પતો મળ્યો
જાન મોમદે ક્લોરીનથી ઘા ધોયો
કણસતો ટીલીયો બળતરા સહન કરી પડ્યો રહ્યો
તેનો હિંસક સ્વભાવ જાન મોહમ્મદ ના બાપ જેવા વાત્સલ્ય પાસે ઓગાળી ગયો હતો
તે પણ જીબથી ઘા ઉપર લશકોરા કરવાની કોશિશ કરવા લાગ્યો
સારવાર થોડી લાંબી ચાલી ટીલીયો બચી ગયો
સિંહ દર્શન ફરી ચાલ્યું
જંગલનું  જીવન  ટૂંકું  હોઈ  છે  પણ ટીલિયો લાંબુ  જીવ્યો
જાન મોહંમદથી પણ  લાંબું

હિરણ ને આ વાત યાદ હતી
આજે તે ફરી કેવા બેઠી જાન મોમ્મદની અને ટીલીયાની વાત
ગીરની આતો ખૂબી છે
વરસાદ પડે ને વાત ઉગી નીકળે
તમે પૂછશો કે આટલા વરસો પહેલા બનેલી વાત આજે કેમ કરો છો ?
કોઈ હમણાં ની ઘટના હોઈ તો બતાવો
બિલકુલ બિલ કુલ

હમણાં થોડા વારસો પહેલા ઝામ્બીયા  ની વાત છે
ઝામ્બિયા દેશનું નામ પહેલા રોહડેશીયા હતુ
એ રોહડેશીયા માં સેસિલ નામનો મોટો બિઝનેસ મેન રહેતો
તેના નામ ઉપરથી ઝામ્બિયાના  જંગલમાં રહેતા આ સિંહ નું નામ સેસિલ પડેલું

આપડા ગીરના સિંહોને તો માલધારીઓ નામ આપતા
મોટાભાગના નામ તેના દેખાવ અને ખાસિયતોને આધારે આપતા જેમકે  માથે  ટીલું હોઈ તો ટીલીયો
ઉંમરલાયક હોઈ તો બુઢો
ગળામાં પડતી ઝોલ  થોડી લાંબી હોઈ તો ઝબો ઝેબા વિગેરે

સેસીલનું નામ તો મોટા અંગ્રેજ વેપારીના નામથી રખાયેલું અને વળી આફ્રિકન સિંહ એટલે ભારેખમ અને લાંબો ચોડો પણ ખરો
સિંહ તો આફ્રિકામાં ય હોઈ અને ગિરમાંય હોઈ પણ જાન મોહમ્મદ કઈ બધે હોઈ ?

સેસિલ 13સી વરસ નો થયો
ભારે રૂવાબદાર ઝામ્બિયાની વીડી માં દોડે તો લાગે કે આખી વીડી એની હારે દોડે છે
સિંહ દર્શન કરવા આવતા લોકોનું તે પ્રિય પ્રાણી હતું
ઝામ્બિયામાં સરકાર   પૈસા લઈને  સિંહના શિકારની છૂટ આપે
આવી છૂટ લઈને એક જીપ   જંગલમાં દોડતી હતી
જીપની સાથેજ  ગેલ કરતો કરતો  સેસિલ સિંહ દોડતો હતો
ઘડીક આગળ જાય ઘડીક પાછળ જાય

જીપ તરફ  ઊંચી આંખ કરી જોઈ લે 
કે જંગલ ખાતાના જાણીતા કર્મચારીઓ જીપ માં બેઠેલા છે કે નહી
આજે  જંગલખાતાના માણસો સાથે
જીપમાં  એક મશહૂર અમેરિકન શિકારી બેઠો હતો
ઈરાદો હતો  સેસીલનો શિકાર

જંગલખાતા  ઉપર  બધા સિંહોને  એક  સરખો  વિશ્વાશ
ગીરનું જંગલ  રખાવટ નું  જંગલ
ઝામ્બિયાનું  જંગલ  સખાવત નુ 
શિકાર માટે  પૈસા આપો  એટલે  સિંહ  મારી શકાય
સેસિલ  સિંહોનો  રાજા હતો
જંગલના ચોકીદારો  અને  અમેરિકન  શિકારી  મિલાપી  હતા
સેસિલ માં રાજવી ની બેફિકરાઈ  હતી
શિકારીમાં  પૈસાની  નફટાઇ દોડતી

એકા એક જીપ પાછી ફરી
અને સિંહે પણ મોઢું ફેરવ્યું
સિંહ ને આ રીતે મોઢું ફેરવતો જોઈ
હિરણ નદી ઝામ્બિયામાં હોત તો જરૂર બોલી હોત

“બાપ લાકાળો “

કમરથી વાળીને પાછળ જોતો સિંહ લાડથી ” લાકાળો ” કહેવાય

પણ આતો ઝામ્બિયા હતું આ ક્યાં ગીર હતું
અહીં હિરણ નદી ના હતી સિંહને લાડ કરે તેવો જાન મોહમ્મદ ના હતો
જીપ ની પાછળ દોડતા આફ્રિકન સિંહ સેસિલનો સોદો થઇ ચુક્યો હતો
જીપ માં અમેરિકન શિકારી સાથે બેઠેલા જંગલના ચોકીદારોએ
શિકારી ડોક્ટરને યાંત્રિક બાણ માંથી કઈ જગ્યાએ નિશાન લેવું તે સમજાવ્યું

શિકાર પછી
સેસિલનો મોરો ઉતારી લઈને સ્ટફ કરી સાગના લાકડા ઉપર માઉન્ટ કરવાનો હતો

તિર છૂટ્યા કુલ ચાર
સિંહ ના પાછળના ના થાપા અને પડખા વીંધી નાખ્યા
સેસિલ ની આંખમાંથી જીવન હસતું બંધ થયું
ફાટી રહેલી આંખોએ જીવનું છેલ્લું દ્રશ્ય જોઈ લીધું
આગળના બન્ને પગ શિથિલ થઇ પ્રાથના કરતા હોઈ તેમ ભેગા થઇ ગયા
છેલ્લો ઘુરકાટ કરી આ સેસિલ નામનો સિંહ જાણે આખા જંગલને કેતો હોઈ તેમ લાગ્યું

“બાપ મુને આવતા જનમે પાછો સાવજ નોજ અવતાર આપજે
પણ કાંઠો હિરણ નો આપજે .  જંગલ ગીરનું આપજે અને સાથ જાન મોહમ્મદનો આપજે “

ને પછી એક તરફ માથું ઢાળીને મરદની જેમ સેસિલ કાયમ માટે સુઈ ગયો

જંગલમાં જીણો જીણો વરસાદ શરુ થયો બરાબર ગીરની જેમ
સેસિલ ના દેહ ઉપર પડતો જીણો જીણો વરસાદ છબી છબીને કહેતો હતો
તથાસ્તુઃ તથાસ્તુઃ
જા  સેસિલ તું ફરીને સાવજ નોજ અવતાર લેજે તને કોઈ જાન મોહમ્મદ કે જગાવર ગીર   સાસણમાં મળશે  મળશે   ને મળશેજ

પાણી બધું યાદ રાખે છે …..પાણી બધું સાંભળે પણ છે
કોક દી હિરણ ને કાંઠે જાવ તો તપાસ કરજો સેસિલ ત્યાં જન્મી ચુક્યો છે કે નહિ
ટીલીયા તો હજુ પણ ફરતો હશે
કોક કોક જાન મોહમ્મદ પણ હશે
અને જાણ મોહમ્મદ ના મળે તો આ જગાવર  ને જરૂર મળજો

આ ફોટો તેમનો છે

Posted in हिन्दू पतन

लालू प्रसाद यादव


12 साल से रिलेशन में होने के बावजूद लालूजी ने बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय दरोगा प्रसाद राय जी के नतिनी व पूर्व मंत्री चंद्रिका राय जी के पुत्री ऐश्वर्या राय यादव से अपने पुत्र तेजप्रताप यादव जी का विवाह कराया।

फिर कोर्ट कचहरी सब हुआ। राबड़ी जी ने बाल खींच कर अपनी बहु को घर से बाहर निकाल दिया। इस संबंध पर एक किताब लिखा जा सकता है।

अब तेजप्रताप यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से अनुष्का संग रिश्ते को स्वीकारा है। एक बार पोस्ट कर डिलीट किए अब पुनः पोस्ट किए हैं।

अब सवाल ये उठता है कि लालू यादव जी दबे कुचलो के मसीहा कहलवाए जाते हैं। दबे कुचलो के मुंह में आवाज डाले हैं, तो फिर अब तेजप्रताप यादव की आवाज को आजतक क्यों दबाए हुए थे? यादव समाज की बात करने वाले लालूजी एक यादव की बेटी को घर से बाल खींच कर बाहर क्यों किए?

दरअसल तेजप्रताप ने अब बोलकर लालूजी का पोल खोल दिया है। झूठ और आडम्बर का घड़ा फूट गया है।

तेजप्रताप यादव की हालिया स्वीकारोक्ति ने लालू परिवार के पाखंड की परतें उधेड़ दी हैं। 12 वर्षों से अनुष्का यादव के साथ संबंध में होने के बावजूद, उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए ऐश्वर्या राय से विवाह करने पर मजबूर किया गया। यह वही ऐश्वर्या हैं, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय की पोती और चंद्रिका राय की बेटी हैं।

शादी के कुछ ही महीनों में यह रिश्ता टूटने लगा। तेजप्रताप ने तलाक की अर्जी दी, जबकि ऐश्वर्या ने घरेलू हिंसा के आरोप लगाए। पटना की फैमिली कोर्ट ने तेजप्रताप को दोषी ठहराते हुए ऐश्वर्या को संरक्षण देने का आदेश दिया। राबड़ी देवी और मीसा भारती पर भी ऐश्वर्या ने मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के आरोप लगाए।

तेजप्रताप की सोशल मीडिया पोस्ट, जिसमें उन्होंने अनुष्का के साथ अपने 12 साल पुराने रिश्ते को सार्वजनिक किया, इस पूरे प्रकरण की सच्चाई को उजागर करती है। यह पोस्ट पहले डिलीट की गई, फिर दोबारा साझा की गई, जो इस बात का संकेत है कि अब वह अपने परिवार के दबाव से मुक्त होकर अपनी सच्चाई सामने लाना चाहते हैं।

यह मामला केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि उस राजनीतिक पाखंड का प्रतीक है, जहां ‘दबे-कुचले’ वर्गों की बात करने वाले नेता अपने ही घर में महिलाओं के अधिकारों का हनन करते हैं। लालू परिवार, जो सामाजिक न्याय का दावा करता है, अब अपने ही कर्मों से बेनकाब हो चुका है।

तेजप्रताप की स्वीकारोक्ति और ऐश्वर्या की पीड़ा इस बात का प्रमाण हैं कि सत्ता के गलियारों में नैतिकता और संवेदनशीलता का कितना अभाव है। यह समय है कि जनता ऐसे नेताओं की असलियत को पहचाने और उनके पाखंड का पर्दाफाश करे।

अंततः ये बताइए कि बिहार में इसी साल विधान सभा चुनाव होने वाले तो ये मुद्दा उठेगा या नहीं ???

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