Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बंगाल में एक बहुत अनूठे संन्यासी हुए, युक्तेश्वर गिरि। वे योगानंद के गुरु थे। योगानंद ने पश्चिम में फिर बहुत ख्याति पाई। गिरि अदभुत आदमी थे। ऐसा हुआ एक दिन कि गिरि का एक शिष्य गांव में गया। किसी शैतान आदमी ने उसको परेशान किया, पत्थर मारा, मार-पीट भी कर दी। वह यह सोचकर कि मैं संन्यासी हूं क्या उत्तर देना, चुपचाप वापस लौट आया। और फिर उसने सोचा कि जो होने वाला है, वह हुआ होगा, मैं क्यों अकारण बीच में आऊं। तो वह अपने को सम्हाल लिया। सिर पर चोट आ गई थी। खून भी थोड़ा निकल आया था। खरोंच भी लग गई थी। लेकिन यह मानकर कि जो होना है, होगा। जो होना था, वह हो गया है। वह भूल ही गया।

जब वह वापस लौटा आश्रम कहीं से भिक्षा मांगकर, तो वह भूल ही चुका था कि रास्ते में क्या हुआ। गिरि ने देखा कि उसके चेहरे पर चोट है, तो उन्होंने पूछा, यह चोट कहां लगी? तो उसे एकदम से खयाल ही नहीं आया उसे कि क्या हुआ। फिर उसे खयाल आया। उसने कहा कि आपने अच्छी याद दिलाई। रास्ते में एक आदमी ने मुझे मारा। तो गिरि ने पूछा, लेकिन तू भूल गया इतनी जल्दी! तो उसने कहा कि मैंने सोचा कि जो होना था, वह हो गया। और जो होना ही था, वह हो गया, अब उसको याद भी क्या रखना! अतीत भी निश्चिंतता से भर जाता है, भविष्य भी। लेकिन एक और बड़ी बात इस घटना में है आगे।

गिरि ने उसको कहा, लेकिन तूने अपने को रोका तो नहीं था? जब वह तुझे मार रहा था, तूने क्या किया? तो उसने कहा कि एक क्षण तो मुझे खयाल आया था कि एक मैं भी लगा दूं। फिर मैंने अपने को रोका कि जो हो रहा है, होने दो। तो गिरि ने कहा कि फिर तूने ठीक नहीं किया। फिर तूने थोड़ा रोका। जो हो रहा था, वह पूरा नहीं होने दिया। तूने थोड़ी बाधा डाली। उस आदमी के कर्म में तूने बाधा डाली, गिरि ने कहा।

उसने कहा, मैंने बाधा डाली! मैंने उसको मारा नहीं, और तो मैंने कुछ किया नहीं। क्या आप कहते हैं, मुझे मारना था! गिरि ने कहा, मैं यह कुछ नहीं कहता। मैं यह कहता हूं जो होना था, वह होने देना था। और तू वापस जा, क्योंकि तू तो निमित्त था। कोई और उसको मार रहा होगा।

और बड़े मजे की बात है कि वह संन्यासी वापस गया। वह आदमी बाजार में पिट रहा था। लौटकर वह गिरि के पैरों में पड़ गया। और उसने कहा कि यह क्या मामला है?

गिरि ने कहा कि जो तू नहीं कर पाया, वह कोई और कर रहा है। तू क्या सोचता है, तेरे बिना नाटक बंद हो जाएगा!

तू निमित्त था।

बड़ी अजीब बात है यह। और सामान्य नीति के नियमों के बड़े पार चली जाती है।

कृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि जो होता है, तू होने दे। तू मत कह कि ऐसा करूं, वैसा करूं, संन्यासी हो जाऊं, छोड़ जाऊं। कृष्‍ण उसको रोक नहीं रहे हैं संन्यास लेने से। क्योंकि अगर संन्यास होना ही होगा, तो कोई नहीं रोक सकता, वह हो जाएगा।

इस बात को ठीक से समझ लें।

अगर संन्यास ही घटित होने को हो अर्जुन के लिए, तो कृष्ण रोकने वाले नहीं हैं। वे सिर्फ इतना कह रहे हैं कि तू चेष्टा करके कुछ मत कर। तू निश्चेष्ट भाव से, निमित्त मात्र हो जा और जो होता है, वह हो जाने दे। अगर युद्ध हो, तो ठीक। और अगर तू भाग जाए और संन्यास ले ले, तो वह भी ठीक। तू बीच में मत आ, तू स्रष्टा मत बन। तू केवल निमित्त हो!

ओशो ❤️❤️

गीता दर्शन

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नेहरू संसद में बैठे होते थे, सामने की पंक्ति में PMO कार्यालय का एक ख़ास अधिकारी बैठा होता था, नेहरू की तरफ से एक ख़ास इशारा मिलते ही वो तेजी से उठता और प्रधानमंत्री के लिए आरक्षित पार्किंग से अपनी बुलेटप्रूफ अम्बेसडर कार निकलवाता, उसके साथ 2 सुरक्षाकर्मी तेजी से आगे की सीट पर बैठ जाते । ड्राइवर इशारा समझ कर गाड़ी तेजी से ITO जाने वाले मार्ग पर दौड़ा देता ।
गाड़ी बंगाली मार्किट पहुंचती और वहां बैठे फूल वालों में से एक खास फूलवाले की दुकान पर रुकती । एक डॉक्टर टाइप व्यक्ति तेजी से PMO अधिकारी के पास आता और एक छोटी नक्काशीदार टोकरी जिसमें अंदर गुलाब की पंखुड़ियों के ऊपर गुलाब का एक सुंदर फूल रखा होता था थमा देता था ।
PMO अधिकारी उस डॉक्टर टाइप व्यक्ति से पूछता ” चैक” और वो कहता “यस” । इसके बाद गाड़ी तेजी से संसद भवन को निकल जाती ।
संसद भवन में गाड़ी मुख्य द्वार पर रुकती अधिकारी तेजी से निकल कर नेहरू के पास पहुंच जाता और नेहरू अपनी अचकन से हल्का मुरझाया हुआ गुलाब निकाल कर नया गुलाब टोकरी से निकाल कर अपनी अचकन में लगा लेते । नेहरू का यह गुलाब भी 1 से डेढ़ घण्टे में अपनी चमक खोने लगता नेहरू का पुनः इशारा अधिकारी को मिलता और पुनः प्रक्रिया आरम्भ हो जाती देश के प्रथम प्रधानमंत्री की अचकन में गुलाब लगाने के लिए जनता के खून पसीने से कमाए गए पैसे के दुरुप्रयोग की ।
जानकार बताते है कि सिर्फ गुलाब बदलने में नेहरू के सुबह उठने से रात को सोने तक प्रति दिन उस समय मे 18 से 20 हज़ार प्रतिदिन खर्च होता था । जिसमे गुलाब अधिकतम 100 रुपये के होते थे । सोचिये अपने प्रधानमंत्री काल के दौरान नेहरू ने देश की जनता का देश की संपत्ति का कितना दुरुपयोग किया ।
साभार

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वे मालदा तक आए, आप चुप रहे। टोंक में उन्होंने बवाल किया, आप चुप रहे। इंदौर से लेकर जयपुर तक वे सड़कों पर उतरे, आप खामोश थे। मुंबई के मैदान में उन्होंने शहीदों के स्मारकों को क्षति पहुंचायी, आप चुप रहे।

आपकी चुप्पी से मुझे कोई हर्ज नहीं, कोई दिक्कत नहीं। आखिर, मेरे पास आपकी 1200 वर्षों की चुप्पी का इतिहास है। बस, अपनी नाकामी को intellect, art, liberalism, etc का चोला न पहनाइए।

आपको धकेलने का सिलसिला भी पुराना है। वह तभी तय हो गया, जब आपके लिए कानून सरकार ने बनाए, लेकिन ‘उनके’ शरिया को कानून का दर्जा दे दिया गया।

धारा 370 से 1990 के दशक में कश्मीर में हुए जनसंहार तक, आपको दीवार से सटाने का ही काम किया गया।

आपकी देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें कला में दर्ज हो गयीं, उन पर बहस और तकरीरें हुईं, Alternate Discourse के नाम से आपको अपमानित करने का पूरा दौर चला, लेकिन Satanic Verses से लेकर “लज्जा” तक को प्रतिबंधित किया गया, उनके लेखकों के पीछे से सरकार तक ने हाथ हटा लिया।

एक अखबार अगर सोशल मीडिया में हुई बहस (उनके पैगंबर के बारे में) को छाप देता है, तो उसकी प्रतियां जलती हैं, दफ्तर पर हमले होते हैं, आखिरकार उसे माफी मांगनी होती है।

यह पूरे देश में एक जैसा है- मलयालम अखबार हो या मराठी पत्रिका। मुसलमानों के खिलाफ तो छोड़िए, उनकी सच्चाई ही छापकर कोई दिखा दे।
यह सब क्यों है…क्योंकि वे एक हैं। वे कितने भी पढ़े-लिखे हों, कुछ मामलों पर वे समझौता नहीं करते। आप अपनी आस्था और श्रद्धा के प्रश्नों पर भी debate एंड discussions के लिए तैयार रहते हैं….

बुद्धि का अजीर्ण मत कीजिए, हमलावर बनिए, अपने नाखून और दांत पैने कीजिए….

और हां, secularism और गंगा-जमनी तहज़ीब कहीं मिले, तो बताइएगा…।
मुझे भी 25 ग्राम खरीदना है….

Posted in हिन्दू पतन

15 अगस्त 1947 को रात के 12 बजे स्वतंत्रता और देश विभाजन की घोषणा होते ही भारत में रहने वाले सभी मुसलमान पाकिस्तानी नागरिक हो गये थे। देश का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था। मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनाया गया था और बाकी हिन्दुस्तान हिन्दुओं के लिए माना गया। मुसलमानों की जनसंख्या के आधार पर एक तिहाई भूभाग और एक तिहाई खजाना दिया गया और पाकिस्तान के लिए और उपरोक्त भूभाग और खजाना प्राप्त करने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट ऐक्शन द्वारा बीस लाख हिन्दुओ का नरसंहार कराया था।

बनाये गये पाकिस्तान को छोड़कर केवल 72 लाख मुसलमान भारतीय भूभाग से गयेे थे और लगभग तीन करोड़ मुसलमान अपने जमीन मकान आदि बेचकर पाकिस्तान जाने की तैयारी कर रहे थे कि गांधी महात्मा ने अपने मुस्लिम प्रेम के वश प्रोपेगेंडा फैलाया जो मुसलमान पाकिस्तान जाना चाहे वे पाकिस्तान जा सकते हैं और जो भारत में रहना चाहे वे भारत में रह सकते हैं।

श्री बी. आर. अम्बेडकर ने भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Pakistan Or partition of India में भी कहीं नहीं लिखा है कि धार्मिक आधार पर हो रहे देश विभाजन के बाद किसी भी मुसलमान को अपनी चॉइस का यह अधिकार होगा कि वह चाहे तो पाकिस्तान जाये और चाहे तो भारत में रुके रहे। श्री अम्बेडकर ने तो यहाँ तक कहा था कि यदि एक भी मुसलमान भारत में रहता है तो यह पार्टीसन के नियमों का उल्लंघन होगा।

नेहरू की लोकप्रियता उस समय शून्य हो गयी थी और सरदार पटेल के प्रधानमंत्रित्व के अधिकार को गांधी से मिलीभगत करके धूर्तता से हडप लिया था। इसलिए उसे लग रहा था कि हिन्दू उसे वोट नहीं देंगे और प्रधानमंत्रित्व कायम रखना मुश्किल हो जायेगा। इसलिए मुसलमानों को अपना वोटबैंक बनाकर देश में रोकना सही कूटनीति समझी। सरदार पटेल ने मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने के लिए बारबार उकसाया, यहाँ तक कि जिन्ना ने भी सभी मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने के लिए कई बार सन्देश भेजा, लेकिन नेहरू ने अपने निहित स्वार्थ के वश किसी की भी बात पर ध्यान नहीं दिया और तीन करोड़ मुसलमानों को भारत में रोके रखा।
जब सम्विधान का लिखना पूरा होने को आया और चुनाव होना निकट आ गया, तब नेहरू को ध्यान आया कि मेरे मुसलमान वोटर तो भारत के नागरिक ही नहीं रहे हैं, तो ये वोट कैसे कर पाएंगे? कोई भी विपक्षी पार्टी या चुनाव आयोग मुसलमानों के वोट करने पर अडंगा डाल सकते हैं तो फिर क्या होगा?
तो फिर उसने कूटनीति का आश्रय लिया।उस समय तक सरदार पटेल और जिन्ना का देहावसान हो चुका था।इसलिए उसकी कूटनीति की सफलता में कोई रुकावट नहीं रही थी।उसने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाक़त अली खान से फोन पर मंत्रणा की और उसे दिल्ली बुलाया। 8 अप्रैल 1950 को दोनों ने एक समझौता किया, जिसे “नेहरू लियाकत अली खान पैक्ट” के नाम से इतिहास में दर्ज किया गया है। उस पैक्ट में सबसे पहली टर्म है कि दोनों देशों में विभाजन के बाद जो अल्पसंख्यक रुके रह गए हैं उन्हें नागरिकता देने और उनकी जानमाल की रक्षा अपने अपने देश में दोनों देश करेंगे।
देखिए एक्जैक्ट वर्डिंग क्या है
“The governments of India and Pakistan solmanly agree that each shall ensure, to the minorities throughout it’s territory compelet equality of citizenship irrespective of religion, a full sense of security in respective of life culture…”
इस प्रथम टर्म से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि विभाजन के बाद से 08-04-1950 तक मुसलमान भारत के नागरिक नहीं थे, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह बात है कि इस पैक्ट के बाद भारत सरकार के द्वारा मुसलमानों को विधिवत नागरिकता दी गयी हो इस का कोई ऐतिहासिक रिकार्ड या प्रमाण नहीं मिलता है, न तो किसी आर्डीनैन्स के द्वारा मुसलमानों को सामूहिक नागरिकता दी गई और न ही व्यक्तिगत रूप से मुसलमानों को नागरिकता दी गयी।

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परमात्मा से शिकायत क्यों?


कहानी:- एक समय की बात है, किसी राज्य में एक प्रतापी राजा शासन करता था। वह जितना वीर और बुद्धिमान था, उतना ही अपने सेवकों के प्रति उदार और प्रेमपूर्ण। किंतु उसके दरबार में एक सेवक ऐसा था जो राजा के हृदय के अत्यंत समीप था। यह सेवक केवल निष्ठावान ही नहीं, अपितु राजा का परम भक्त भी था। राजा भी उस पर अपार स्नेह रखता था और उसे अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के रूप में मानता था।

यह राजा का ही स्नेह था कि वह सेवक अन्य नौकरों की भांति अलग नहीं रहता था, बल्कि राजमहल के भीतर, स्वयं राजा के कक्ष में उसके साथ ही सोता था। राजा को उस पर इतना भरोसा था कि वह अपना हर कार्य पहले उसे सौंपता, अपनी हर बात उससे साझा करता।

एक दिन राजा अपने प्रिय सेवक के साथ शिकार पर गया। दिनभर वन में घूमते रहे, किंतु कोई बड़ा शिकार हाथ न लगा। दोपहर होते-होते वे घने जंगल में काफी भीतर चले गए और दिशा भूल गए। दोनों को तीव्र भूख लगने लगी, परंतु आसपास भोजन का कोई साधन न था।

तभी राजा की दृष्टि एक वृक्ष पर पड़ी, जिसके हरे-भरे पत्तों के बीच कुछ अपरिचित फल लगे थे। राजा ने एक फल तोड़ा, पर उसे पहचान न सका। फिर भी उसने अपनी आदत के अनुसार अपनी कटार निकाली, फल को बीच से चीरकर पहला टुकड़ा अपने सेवक को दिया। यह उसका नियम था—कोई भी चीज खाने से पहले वह अपने सेवक को परोसता था।

सेवक ने फल का टुकड़ा लिया, एक क्षण राजा की ओर देखा और बिना किसी झिझक के उसे अपने मुंह में रख लिया। जैसे ही वह स्वाद उसके जिह्वा से टकराया, उसकी आँखों में प्रसन्नता की एक अनोखी चमक दौड़ गई।

“मालिक! यह कितना मधुर है! कृपया मुझे एक और टुकड़ा दें!” सेवक ने आग्रह किया।

राजा ने प्रसन्नतापूर्वक दूसरा टुकड़ा दे दिया।

“मालिक! एक और…”

राजा मुस्कुराया और तीसरा टुकड़ा भी उसे दे दिया।

परंतु जैसे ही वह अंतिम टुकड़ा लेने लगा, राजा के मन में जिज्ञासा उठी। सेवक ने पहले कभी इस प्रकार किसी चीज के लिए आग्रह नहीं किया था। इस फल में ऐसा क्या विशेष था?

“बस, अब यह टुकड़ा मैं खुद चखूँगा।” राजा ने फल का अंतिम टुकड़ा अपने लिए रख लिया।

परंतु सेवक अचानक व्याकुल हो उठा।

“नहीं, मालिक! कृपया यह टुकड़ा मुझे दे दें!”

राजा ने उसकी यह अधीरता देखी और मन ही मन चकित हुआ। ऐसा तो कभी नहीं हुआ था! उसने संदेहवश टुकड़े को और दृढ़ता से पकड़ लिया।

अब दोनों के बीच छीना-झपटी होने लगी। सेवक ने भरसक प्रयास किया कि राजा उस टुकड़े को न खाए। किंतु राजा भी अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं सका और उसने वह टुकड़ा अपने मुंह में रख लिया।

जैसे ही फल की गंध और स्वाद उसके जिह्वा पर पड़ा, उसके चेहरे का रंग बदल गया। यह तो अत्यंत कटु और विषैला था! इतनी कड़वाहट उसने अपने जीवन में कभी अनुभव नहीं की थी। उसने तुरंत फल को थूका और क्रोध से सेवक की ओर देखा।

“पागल! यह तो जहर था! तूने मुझे बताया क्यों नहीं?”

सेवक की आँखें प्रेम से भरी थीं। वह सिर झुकाकर बोला,

“मालिक! जब तक आपके हाथों से अनगिनत मधुर फल मिले, तब तक मैंने हर बार हर्षपूर्वक उन्हें स्वीकार किया। तो फिर एक कड़वे फल की क्या शिकायत करूँ?”

राजा स्तब्ध रह गया। यह उत्तर उसकी आत्मा को झकझोरने वाला था। उसकी आँखों में अश्रु उमड़ पड़े। इस सेवक ने उसे एक ऐसा पाठ पढ़ा दिया था, जिसे वह अपने जीवन में कभी नहीं भूल सकता था।

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શ્રધ્ધા મિશ્રા—આધુનિક યુગની ઝાંસીની રાણી

કાશી વિદ્યાપીઠ  વિશ્વ વિદ્યાલય પરિષદના પ્રાંગણમાં વિદ્યાર્થીઓનો મોટો મેળાવડો યોજાયો હતો. આ બધાઓએ પોતાનું  ગ્રેડયુંએશન પૂરું કર્યું હતું. આ દિવસ તેમના જીવનનો ટર્નિંગ પોઈન્ટ હતો.

શ્રધ્ધા મિશ્રા એ બધાઓમાની એક હતી. ભણવામાં તેજસ્વી હતી. બુધ્ધિમાન હતી. એની સામેનું લક્ષ્ય ક્લિયર હતું. એણે ઇંડિયન પોલિસ ખાતામાં ઉચ્ચ અધિકારીની પોસ્ટ ઉપર ડાઇરેક્ટ રિક્રૂટ થવું હોઈ  એ યુપીએસસી ની પરિક્ષાની તૈયારી કરવાનું મન મનાવી ચૂકી હતી.  

બીજી તરફ એના પિતાશ્રી ધિરેન્દ્ર મિશ્રા પોતાની દીકરીના લગન કરાવી દઈને પોતાની જવાબદારીનો બોજો હળવો કરવાનું મન મનાવી ચૂક્યા હતા. એમને હજી એક દીકરી અને એક દીકરો હતા . આજીવિકામાં એમની પાસે નાની સરખી જમીન અને ગામમાં એક નાનકડી દુકાન હતી, જેની આવકમાથી એમનું માંડ માંડ ગુજરાન ચાલતું હતું. શ્રધ્ધા એમની મોટી દીકરી હતી. થોડોક સમય સુધી બાપ-દીકરી વચ્ચે સામસામી ખેંચતાણ ચાલી, પણ એક મુદ્દે દીકરીએ એના પિતાની વાત માની લીધી અને લગ્ન માટે તૈયાર થઈ ગઈ. એના પિતા એક એવા યુવકની વાત લઈને આવેલા કે એ યુવક પણ ‘ઇંડિયન પોલિસ સર્વિસ’ ની પરીક્ષા માટે તૈયારી કરી રહ્યો હતો, અત્યાર સુધી એણે બે નિષ્ફળ પ્રયાસો પણ કર્યા હતા. છોકરો બુધ્ધિમાન અને મહેનતુ હતો, વધારામાં બંનેના જીવનના લક્ષ્ય એક જ હતા, તેથી શ્રધ્ધા પિતાની વાત માની ગઈ. પિતાનું કહેવું હતું કે લગ્ન પછી પણ તું તારી પરિક્ષાની તૈયારીઓ કરી શકવાની જ છે, પણ આવો બધી રીતે અનુકૂળ આવે એવો પ્રસ્તાવ આવતો નથી હોતો. આ તક ચૂકવા જેવી નથી.

એનું નામ અવિનાશ શર્મા હતું. અવિનાશ અને શ્રધ્ધા બંનેની રૂબરૂ મુલાકાત કરાવાઈ. બંને એક બીજાને ગમી ગયા  અને લગ્નની તારીખ પણ નિશ્ચિત થઈ ગઈ. બંને પક્ષો તરફથી લગ્નની ખરીદીઓ શરૂ થઈ ગઈ. સગા સંબંધીઓને લગ્ન પ્રસંગના આમંત્રણ પાઠવતી કંકોતરીઓ પણ વહેચાઈ ગઈ.  

લગ્ન થાય તે પહેલા એક ખુશ ખબર  આવી કે અવિનાશે અગાઉ આપેલ પરીક્ષામાં ઉત્તીર્ણ થયો હોઈ,   સબ-ઈન્સ્પેકટરની પોસ્ટિંગનો ઓર્ડર પણ એને  મળી ગયો.   આ સમાચારના કારણે બંને પક્ષોમાં ખુશીની લહેર દોડી ગઈ.

પણ અવિનાશના પક્ષે ખુશીની સાથે અહંકારની આંધી પણ ઉઠી. પોલિસ ખાતામાં અધિકારી તરીકે નિયુક્તિ મળતાની સાથમાં એમને લાગ્યું  કે વરરાજા અવિનાશની દહેજ વેલ્યુપણ વધી ગઈ છે જે એમણે ધિરેન્દ્ર મિશ્રા—શ્રધ્ધા મિશ્રા ના પિતાજી પાસેથી વસૂલવાની થાય છે.

લગ્નને હવે માંડ ત્રણેક દિવસ બાકી હતા, ત્યારે રમાકાંત શર્મા અને અજય શર્મા—બંને ભાઈઓ, શ્રધ્ધાના  પિતાશ્રી ધિરેન્દ્ર મિશ્રાને મળવા એમની દુકાને આવ્યા, અને એમની વચ્ચે વાત-ચિત્ત શરૂ થઈ.

‘તમને ખબર મળી હશે કે આવિનાશને પોલિસ વિભાગમાં અધિકારીની પોસ્ટ ઉપર નિયુક્તિનો ઓર્ડર મળી ગયો છે.’  રમાકાન્ત શર્માએ જણાવ્યુ..

‘હા અમને ખબર મળી, અને અમે સૌ આ વાતે ખુશ છીએ’

‘ખુશીની વાત તો બરોબર પણ, જુઓ તમને કહી રાખીએ છીએ કે અમે કઈ દહેજ ભૂખ્યા નથી, પણ લોકો વાત કરે છે, કે છોકરાનું કોઈ પૈસાદાર ઘરે ગોઠવાયું હોતે તો કાર-બંગલો અને લાખ્ખો રૂપિયા   દહેજ રૂપે મળતે. તેથી અમારી માંગ છે કે તમે અવિનાશને દહેજ રૂપે દશ લાખના મૂલ્યની કાર અને પાંચ લાખ રોકડા દહેજમાં ચૂકવો’

‘પણ આપણે જ્યારે વાત થઈ ત્યારે તો અવિનાશ બેકાર હતો, આપણી વચ્ચે દહેજની કોઈ વાત જ થઈ નહતી. એમ તો મારી પુત્રી પણ પોલિસ અધિકારી માટેની ‘યુપીએસસી’ પરિક્ષાની તૈયારી કરી રહી છે, આજે નહીં ને કાલે એ પણ અધિકારી થવાની જ છે, એનું તમે ધ્યાન રાખો.’

‘જુઓ અમે અમારી વાતે સિરિયસ છે. જુઓ તમે દહેજ ચૂકવવા માંગતા ના હો કે ચૂકવી શકો એમ ના હો તો અમે આ સંબંધ સમાપ્ત કરવા તૈયાર છીએ . દહેજ આપનારા ઘણા માંગઓ અમારી પાસે આવ્યા છે.’

વેવાઈની વાત શંભળીને ધિરેન્દ્ર મિશ્રા ભારે મુઝવણમાં મુકાઇ ગયા. લગ્નની કંકોત્રી સુધ્ધાં વહેચાઈ ગઈ, અને આ લોકો લગ્ન ફોક કરવાની વાત કરે છે, તો છોકરીની તો આબરૂના ધજાગરા જ ઊડી જાયને, ધિરેન્દ્ર મિશ્રા ઢીલા પડી ગયા. તેમ છતાં એમણે ઈમાનદારીથી કહયુકે એમની પાસે અત્યારે તો દહેજ ચૂકવવા જેટલા પૈસા નથી, પણ તેઓ કઈક વ્યવસ્થા કરશે, એવું આશ્વાશન આપ્યું.

‘જુઓ ધિરેન્દ્ર મિશ્રા, અમને શબ્દોના સાથીયા નથી જોઈતા, અમારા દીકરા માટે રોકડા પાંચ લાખ અને દશ લખની મૂલ્ય ધરાવતી કાર જોઈએ, આ તમને કહી રાખ્યું, જો તમે આટલી રકમની જોગઆવાઈ કરી શકો તેમ ના હોય તો અત્યારથી કહીદો, આ લગ્ન રદ કરીને અમે બીજે ધ્યાન આપીએ.’

ધિરેન્દ્ર મિશ્રાના માથે આ આવી પડેલી અણધારી આપત્તિ હતી, તાત્કાલી તેઓ પૈસાની વ્યવસ્થા કરવાના કામમાં લાગ્યા, પણ લગ્નનો દિવસ આવી ગયો, વરરાજા જાન લઈને લગ્નના મંડાપ સુધી આવી ગયો, પણ ધિરેન્દ્ર મિશ્રાથી પૈસાની સગવડ ના થઈ તે ના જ થઈ. એમની હાઇવે પાસે આવેલી જગ્યા સરકારે ખરીદી હતી, એના પૈસા એમણે મળવાના હતા, એના માટે એમણે સરકારી ઓફિસના ઘણા ચક્કર લગાવ્યા પણ ત્યાં પણ કોઈ મેળ પડ્યો નહીં, એમનો એક મિત્ર પૈસા આપવા તૈયાર થયો પણ કમનસીબે એક અકસ્માતમાં એમનો યુવાન પુત્ર મૃત્યુ પામ્યો, આવી હાલતમાં તેઓ પોતાના મિત્ર પાસે કેવી રીતે જાય?

ઘરવાળા તનાવામાં આવી જાય નહીં એ માટે એમણે કોઈને દહેજવાળી વેવાઈ પક્ષની માંગવાળી વાત ઘરમાં કોઈને કહી પણ નહતી. અને હવે, વેવાઈ દહેજની વાતે રાક્ષસી ઉઘરાણી શરૂ કરી. વરરાજાને ઉતરે લઈ જવાયા એની સાથે જ રમકાન્ત અને અજય—બંને ભાઈઓએ ધિરેન્દ્ર મિશ્રા પાસે તકાદો કર્યો, ક્યાં છે કાર? ‘તમે અમને છેતર્યા છે, હવે અમને પણ એનો બદલો લઈશું,.

‘આ લગ્ન નહીં થયા, જાન લગ્ન વગર જ પરત જશે’ ધિરેન્દ્ર મિશ્રાને  આખરી  અલ્ટીમેટમ વેવાઈ પક્ષે શંભળવી દીધું, એની સાથે લગ્નના મંડપમાં સોંપો પડી ગયો. ડીજેની ધૂન ઉપર ડાંસ કરતાં જાનૈયાઓના નાચ અટકી ગયા.  પોતાના માં-બાપની સાથે જ અવિનાશ પણ વગર લગને પરત ફરવા તૈયાર થઈ ગયો.

ધિરેન્દ્ર મિશ્રાએ એમની પાઘડી ઉતારીને અવિનાશના પગ પાસે મૂકી અને વિનંતી કરી કે જુઓ મને સમય આપો, મારુ વચન છે, તમને દહેજની રકમ ચૂકવી આપીશ, પણ અત્યારે તમો અમને બેઆબરૂ ના કરો, આ પ્રસંગની શોભાને બનાવી રાખો.

આવા રિસામણા-મનામણાંની વાતો ચાલતી હતી, અને જ્યા  વરપક્ષને ઉતારો આપ્યો હતો ત્યાં દુલહનના શણગારથી સજ્જ થયેલી  શ્રધ્ધા મિશ્રા આવીને ઊભી રહી ગઈ, એણે પોતાની નજરે પોતાના પિતાને દયાજનક હાલતમાં જોયા, અણે એની સાથે એ સીધી અવિનાશ પાસે પહોંચી ગઈ અણે શાંતિથી એક જ પ્રશ્ન કર્યો…..

‘અવિનાશ,  તમારા વડીલો મારા પિતા પાસે દહેજની ઉઘરાણી કરી રહ્યા છે, તમે એ જોઈ રહ્યા છો, મને  એટલું  જ જણાવો કે તમે કોના પક્ષે છો?’

‘સબ ઇન્સ્પેક્ટર નો ઓર્ડર મેળવી ચૂકેલો અવિનાશ એના અભિમાનમાં  મગરૂર હતો, એણે કહ્યું, ‘ આમાં ચિંતા કરવા જેવુ કઈ જ નથી, અત્યારે માત્ર કારની સગવડ કરી દો, પાંચ લાખનું પછી જોઈશું. આનાથી વધારે છૂટ તો મારાથી આપી શકાય એમ નથી—શ્રધ્ધા’

એની સાથે  અવિનાશના ગાલ ઉપરા શ્રધ્ધા મિશ્રાના હાથની જોરદાર થપ્પડે  પેદા કરેલો …. સ્ટ્ટાક   અવાજ બધાએ શાંભળ્યો  ….મંડપમાં બંને પક્ષોના સંબંધીઓ હતા, ગામના મોભીઓ પણ હતા, તેઓ બધા સ્તબ્ધ થઈ ગયા. શ્રધ્ધાનો અવાજ ગર્જી ઉઠ્યો, ‘આ પળે જ અવિનાશ તું અને તારા બધા જ સગાઓ અહીથી નીકળો, નહીં તો હું હમણાંને હમણાં પોલિસને બોલાવતી કરું છુ, તમારી ઉપર દહેજ પ્રતાડનાનો કેસ કરીશ તો સરકારી નોકરી તો ગઈ એમ સમજો,  પણ સરકારી જેલમાં યુવાનીના દિવસો વિતાવવાના આવશે.

આખી બાજી બદલાઈ ગઈ, અત્યાર સુધી વરપક્ષ જોરમાં હતો અને અવિનાશને પડેલી થપ્પડ અને એની સાથે મળેલી ધમકીએ વરપક્ષને બાવરો બનાવી દીધો,  અવિનાશ અને એના માતા પિતા અને અન્ય સંબંધીઓ ગભરાટ ના માર્યા ભાગવા માંડ્યા.

જોત જોતામાં મંડપ ખાલી થઈ ગયો. બચ્યા હતા માત્ર કન્યપક્ષના સંબંધીઓ પણ તેઓ શ્રદ્ધાની હીમત ઉપર વારી ગયા હતા, બધા જ શ્ર્ધ્ધાની પ્રશંસા કરી રહ્યા હતા, કે એણે દહેજ ભૂખ્યા વરપક્ષને સારો એવો બોધપાઠ આપ્યો. આઘાતમાં ઉતરેલા માતા-પિતાને શ્રધ્ધાએ ધીરજ બંધાવતા કહયુ, ‘ તમો મારા ભાવિની ચિંતા ના કરો, હું મારી પોતાની લાયકાતના બળ ઉપર જ નોકરી મેળવીશ અને ઘર પણ વસાવીશ.  આ પ્રસંગે આપણે બધા ભેગા થયા જ છીએ તો રાંધેલા અન્નને ઉકરડે ના જવા દઈએ, આનંદથી ખાઈએ અને છૂટા પડીએ.

બે વરસ સુધી શ્રધ્ધા એની પરિક્ષાના પુસ્તકોના પ્રગાઢ પ્રેમમાં પડેલી રહી. એણે  ‘યુપીએસસી’ ઇંડિયન પોલિસ સર્વિસની ફર્સ્ટ ગ્રેડની પોસ્ટ સુધી પહોંચવું હતું, એ ત્યારે જ શક્ય બને જ્યારે એ એની પરીક્ષા ફર્સ્ટ ગ્રેડમાં પાસ કરે અને એની મહેનતે એને એજ અપાવ્યું જેને માટે એણે આકરી મહેનત કરી હતી. એણે ડાયરેકટ ‘ડીએસપી’ ની પોસ્ટ ઉપર પોસ્ટિંગ ઓર્ડર મળી ગયો. ટ્રેનિંગ પછી એની નિમણૂક યુપી ના  સિડગઢ જીલ્લામાં થઈ. એની ખ્યાતિ એક પ્રામાણિક અને કડક શિસ્ત ધરાવતી ઓફિસર તરીકેની બંધાઈ હતી.

નારી સશક્તિકારણના કાર્યક્રમ હેઠળ એણે દર સોમવાર દરેક પીડિત મહિલાઑ માટે ફાળવી આપ્યો હતો, આ દિવસે કોઈ પણ મહિલા એની સીધી જ મુલાકાત કરી શકતું હતું. આવા જ એક દિવસે એક ગામની થોડીક મહિલાઓ ડીએસપી શ્રધ્ધા મિશ્રાને મળવા આવી. તેઓ રડતી હતી, એમની આખમાં આસું હતા, એમનું કહેવું હતું કે ગામના કેટલા  ટપોરીઓ એમની  અને એમની દીકરીઑની  પણ  છેડછાડ કરી રહ્યા છે, એને લગતી ફરિયાદ લઈને તેઓ જ્યારે પોલિસ ચોકીએ જાય છે, ત્યારે એમની ફરિયાદો ની નોંધ જ લેવાતી નથી તેથી ટપોરીઓ એ હદે ઉદ્દંગ બની ગયા છે કે હવે તેઓ સીધા ઘરમાં આવીને મહિલાઓ અને એમની બેટીઓની છેડછાડ કરે છે.

‘એ કઈ પોલિસ ચોકી છે? કોણ છે એનો એસપી? ‘અવિનાશ એનું નામ છે.

‘અવિનાશ? આ નામ શાંભળીને શ્રધ્ધા એકદમ સતર્ક બની ગઈ, એ જ પેલો દહેજ ભૂખ્યો અવિનાશ? શ્રધ્ધાએ તરતજ ફરિયાદી મહિલાઓને લઈને અવિનાશની ચોકીએ સરપ્રાઇજ ચેકિંગ માટે ઉપાડી, તો એ ભાઈ રંગે હાથે ઝડપાઇ ગયો, ‘ કેટલાક ટપોરીઓ’ સાથે એ પોતાની કેબિનમાં બિયરની મહેફિલ માણી રહ્યો હતો, બરોબર એજ સમયે ડીએસપી શ્રધ્ધા મિશ્રા ફરિયાદણોને સાથે લઈને સરપ્રાઇજ ચેકિંગ માં આવી, અવિનાશ ડીએસપીને જોઈને ગભરાઈ ગયો.
‘મી. અવિનાશ, અત્યારે તમે કઈ ફરજ બજાવી રહ્યા છો?’
‘મેડમ, અત્યારે હું અપરાધનું ઇન્વેસ્ટિગેશન કરી રહ્યો છુ.’
‘એમ? તમે કોને ઊઠાં ભણાવો છો?’
કહેતાની સાથે જ શ્ર્ધ્ધાએ તાત્કાલિક પોતાના ઉચ્ચ અધિકારીઓને જાણ કરી, તાત્કાલિક એક તપાસ કમિટીની રચના કરી અને અવિનાશને તત્કાળ પ્રભાવથી નોકરીમાઠી સસ્પેંડ કરતો ઓર્ડર આપી દીધો.

પૈસા ભૂખ્યો અવિનાશ સમજી ગયો કે એ હવે બરોબરનો ભેરવાઈ ચૂક્યો છે. એની પાસે પોતાની નોકરી બચાવવાના માર્ગો પણ નહિવત છે. પણ નોકરી બચાવવી જરૂરી હતી તેથી એ સીધો શ્રધ્ધાના પિતા પાસે પહોંચો, એમના પગમાં પડ્યો, રડ્યો અને માફી માંગતા માંગતા પોતાની નોકરીને  બચાવી લેવાની   વિનંતી કરવા લાગ્યો.

અવિનાશની કહાની શંભળીને શ્રાધ્ધના પિતાએ એટલું જ કહ્યું, ‘ હું આમ કઈ પણ કરી શકું એમ નથી. આ તમારો ખાતાકીય મામલો છે, એમાં મારુ શું ચાલે? તે દિવસે તમારું ચાલતું હતું, ત્યારે તમે અમારી પડખે નહતા ઊભા, તમે પૈસો અને સંપતિના પક્ષે હતા, આટલું જ હું તમને યાદ અપાવું છુ. તમે જાઓ, મારાથી આમાં કઈ પણ થઈ શકે એમ નથી.

એ પહેલા કે એની પાસે નોકરીમાથી કાયમી ધોરણે હાથ ધોવા પડે તે પહેલા આખરી પ્રયાસ રૂપે એ સીધો શ્રધ્ધા મિશ્રાને  મળવા એમની કેબિનમાં ગયો અને પોતાની નોકરીને બચાવી લેવાની વિનંતી કરવા લાગ્યો. પણ અહીથી મળેલો જવાબ ઘણો આકરો હતો.

‘તમે દહેજ ભૂખ્યા હતા, એનો અર્થ તમને માણસની અને તેમાં પણ ખાસ સ્ત્રીની આબરૂ ઈજ્જતની કોઈ પરવા નહતી, આ જ વસ્તુએ તમારો આ દિવસ નિર્ધારિત કર્યો છે.  પોલિસ અધિકારી તરીકેની તમારી નોકરી સમાપ્ત થઈ ચૂકી છે, એને લાગતો ઓર્ડર તમારા ઘરે પહોંચી ગયો છે. તમારા કર્મોએ તમારો ન્યાય કર્યો છે, એટલું યાદ રાખજો, એમાં મારી કોઈ ભૂમિકા નહતી પણ મને અને મારા પરિવારને બે આબરૂ કરવામાં તમે અને તમારા વડીલો જવાબદાર હતા એ તમે ભૂલતા નહીં કારણકે એ હું પણ ભૂલી નથી……

સમાપ્ત.

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🚩🇮🇳
प्रिय बापू, आप आज ज़िंदा होते तो शायद मेरे इन प्रश्नो के उत्तर दे पाते।
1. आप एक काले आदमी लंदन में रहकर बिना किसी परेशानी के गोरो के साथ पढ़ते, होस्टल के एक कमरे में रहते हैं, एक मेस में खाते है फिर अचानक ट्रेन में एक साथ सफर करने में फेंक दिए जाते है? क्यूँ? ये बात कतई हजम नही हुई।

2. फिर आप वही काले भारतीय उन्हीं गोरों की सेना में सार्जेंट मेजर बनते हैं और दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश बोर वार में आपकी तैनाती एम्बुलेंस यूनिट में होती है जहां आप लड़ाई में गोरों का कालों के विर्रुध साथ देते हैं। मिलिट्री यूनिफॉर्म में आपकी की फोटो पूरे इंटरनेट उपलब्ध है। सार्जेंट मेजर गांधी लिखकर सर्च कर लीजिए।

3. फिर आप में अचानक 46 वर्ष की उम्र में 1915 में देशप्रेम जागा और मिलिट्री यूनिफार्म उतारकर आपको बैरिस्टर घोषित कर दिया गया। (रानी लक्ष्मी बाई, खुदीराम बोस, बिस्मिल, भगतसिंह और आजाद जैसे अनेकों देशभक्तों की 25 की उम्र आते आते तक शहादत हो गई थी।)

4. फिर आपको महात्मा बुद्ध की तरह शांति अहिंसा का दूत बनाकर दक्षिण अफ्रीका से सीधे चंपारण भेज दिया जाता है जहाँ नील उगाने वाले किसानों के आंदोलन को आप हैक कर लेते हैं। हिंसक होते आंदोलन को अहिंसा शांति के फुस्स आंदोलन में बदल देते हैं। क्यूँ?

5. आप महात्मा बुद्ध की तरह दिन में एक धोती लपेट कर शांति अहिंसा के नाम पर भारतीयों के आजादी के लिये होनेवाले हर उग्र आंदोलन की हवा निकाल कर उसे बिना किसी परिणाम के अचानक समाप्त कर देते हैं और अंग्रेज चैन की सांस लेते रहते हैं। क्यूँ?

6. नंगा फकीर बनकर अपने साथ अपनी बेटी भतीजी के अलावा अनेक औरतों के साथ खुद पर परीक्षण करने के लिये नंगे सोते हैं और अपने सेल्फ़-कंट्रोल को टेस्ट करते हैं। कौनसा महात्मा ऐसा करता है?(यह अपनी पुस्तक “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” में उन्होंने खुद स्वीकार किया है।)

7. आप अहिंसा के पुजारी, प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का खुला साथ देते हैं और अपने अहिंसा के सिध्दांतों को दरकिनार करके भारतीयों को कहते हैं सेना में भर्ती हो जाओ और युद्ध करो ताकि ब्रिटिश राज बचा रहे। तब अहिंसा आड़े नहीं आयी?

8. इसी अहिंसा की ख़ातिर नेताजी का कांग्रिस से इस्तीफ़ा दिला दिया? जब अंग्रेजों की तरफ से लड़ना अहिंसा है तो अपने देश के लिये लड़ना क्यों बुरा था?

9. दिल्ली के मंदिर में कुरान पढ़ने की जिद पूरी करने के लिए पुलिस बुला लेते हैं पर कभी मस्जिद में गीता या रामायण नहीं पढ़ने की हिम्मत जुटा पाते। पाकिस्तान को 55 करोड़ और आज के बांग्लादेश जाने 15 KM चौड़ा कॉरिडोर जिसके दोनों तरफ 10 KM तक केवल मुस्लिम ही जमीन खरीद सके उसकी जिद पकड़कर अनशन करने की धमकी देकर ब्लैकमेल करते हैं। यही अनशन आपने पाकिस्तान ना बनने के लिए क्यूँ नहीं किया?

बापूजी सत्य यह है आपके अहिंसा के पाठ सिर्फ़ हिंदुओ के ही लिए थे जिन्होंने हिंदुओ को नपुंसक बना दिया। वहाँ पंजाब, सिंध, केरल में हिंदू मरते रहे, भगत सिंह सूली चड़ गया मगर आपने अनशन नहीं दिए।

शुक्र है आप इज़राइल नहीं गए और वहाँ अपने अहिंसा के भजन नहीं गाए, नहीं तो वहाँ के यहूदियों का अब तक अस्तित्व ख़त्म हो गया होता और वो बंब की जगह चरखे फेंक रहे होते।

सेकुलरिजम का बापू ,,,,,,,

🌹🙏🏻🔥🇮🇳⛳

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मोदी का दूसरा प्रहार आ रहा है, धारा 30 समाप्त हो सकती है !
मोदी ने हिंदुओं के साथ नेहरू द्वारा किए गए विश्वासघात को सुधारने के लिए पूरी तैयारी कर ली है।
क्या आपने “धारा 30” के बारे में सुना है?
क्या आप जानते हैं कि धारा 30 का मतलब क्या है?

‘धारा 30’ एक हिंदू-विरोधी कानून है, जिसे नेहरू ने अन्यायपूर्ण तरीके से संविधान में शामिल किया था!
जब नेहरू ने इस कानून को संविधान में शामिल करने का प्रयास किया, तो सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसका कड़ा विरोध किया।
सरदार पटेल ने कहा था,
“यह कानून हिंदुओं के साथ विश्वासघात है; अगर यह कानून संविधान में लाया गया तो मैं मंत्रिमंडल और कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दूंगा!”

आखिरकार, नेहरू को सरदार पटेल के प्रतिरोध के सामने झुकना पड़ा।
लेकिन दुर्भाग्यवश, इस घटना के कुछ समय बाद ही सरदार वल्लभभाई पटेल का अचानक निधन हो गया…!!
पटेल की मृत्यु के बाद नेहरू ने तुरंत इस कानून को संविधान में शामिल कर दिया!

अब जानिए धारा 30 की विशेषताएँ…
इस कानून के अनुसार, हिंदू अपने ‘सनातन धर्म’ की शिक्षा स्कूलों और कॉलेजों में न तो दे सकते हैं और न ही ले सकते हैं!
क्या यह अजीब नहीं लगता?

“धारा 30” के तहत, मुसलमान और ईसाई अपने धर्म की शिक्षा देने के लिए इस्लामिक (मदरसा) और ईसाई (कॉन्वेंट) स्कूल चला सकते हैं, लेकिन हिंदू अपने गुरुकुल या वैदिक शिक्षा पर आधारित पारंपरिक स्कूल नहीं चला सकते, जो देश के मुख्य धर्म सनातन या हिंदू धर्म और संस्कृति को संरक्षित कर सके। यदि वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें इस कानून के तहत दंडित किया जाएगा!

साथ ही, मस्जिदों और चर्चों में दान से जमा सारा पैसा और सोना केवल उन्हीं का होता है। वे उस संपत्ति का उपयोग अपने अनुयायियों को बढ़ावा देने और अशिक्षित या कम शिक्षित हिंदुओं को धन के लालच में धर्मांतरण के लिए करते हैं। लेकिन हिंदू मंदिरों में जमा धन और सोने पर सरकार का नियंत्रण होता है!
नेहरू ने यह सब उस कुटिल गांधी के साथ मिलकर किया ताकि मुसलमानों और ईसाइयों को हिंदुओं के धर्मांतरण में सुविधा हो सके।

“धारा 30” हिंदुओं के खिलाफ एक जानबूझकर किया गया विश्वासघात है!

मुस्लिम बच्चों के लिए अपनी धार्मिक पुस्तक, कुरान पढ़ना और सीखना अनिवार्य है, और यही नियम ईसाइयों पर लागू होता है! लेकिन हमारे हिंदुओं के बारे में क्या? हमें अपने एकमात्र धर्म, जो इस प्राचीन विज्ञान पर आधारित है, की सही समझ भी नहीं है!
आइए, हम सभी सनातन धर्म की रक्षा करें। इस लेख को पढ़ें, समझें और नेहरू और कुटिल गांधी द्वारा किए गए इस अन्याय के बारे में हर जगह जागरूकता फैलाएँ।

क्योंकि धारा 30 के कारण, हम अपने स्कूलों और कॉलेजों में भगवद गीता नहीं पढ़ा सकते हैं, जबकि यह हमारा सनातन धर्म देश है।

यदि आप इस लेख को पढ़कर इसे पसंद करते हैं और सनातन धर्म में विश्वास और स्नेह रखते हैं, तो कृपया इसे जितना संभव हो सके उतना साझा करें!

कम से कम 5 लोगों को यह संदेश भेजें।
धन्यवाद

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अद्भुत भारतीय न्यायपालिका का सुनिए एक अविश्वसनीय कारनामा।

साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने एक रेजोल्यूशन पास किया कि सभी जज अपनी संपत्ति सुप्रीम कोर्ट  के चीफ जस्टिस को बताएंगे।

उसके बाद भारत में 2005 में आरटीआई का कानून आ गया जिसके तहत भारतीय नागरिक सरकार से कोई भी सूचना ले सकता है।
तो 2007 में एक आरटीआई  शायद सुभाष चंद्र अग्रवाल नामक एक एक्टिविस्ट ने  लगाई कि सुप्रीम कोर्ट में  जजों की संपत्तियों की जो जानकारी है वह सार्वजनिक की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने जानकारी देने से मना किया तो वह एक्टिविस्ट CIC में चला गया और सीआईसी ने यह निर्णय दिया कि हां,  सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी देनी पड़ेगी

उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने CIC के  इस निर्णय के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक एप्लीकेशन लगाई कि CIC को यह आदेश दिया जाए कि जजों की संपत्ति सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए लेकिन हाई कोर्ट के एकल जज बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की अर्जी को  खारिज कर दिया

सुप्रीम कोर्ट यही नहीं रुकी उसने दिल्ली हाई कोर्ट की तीन सदस्य बेंच के सामने एप्लीकेशन लगाई और कमाल की बात देखिए, हाई कोर्ट की तीन सदस्य बेंच ने भी सुप्रीम कोर्ट की अर्जी को खारिज कर दिया और आदेश दे दिया कि सुप्रीम कोर्ट को जजों की संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ेगी।

उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ  सुप्रीम कोर्ट में ही अर्जी डाल दी और  वर्षों की सुनवाई के बाद 2019 में इसका निर्णय आया  कि जिन जजों ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को अपनी संपत्ति की जानकारी दे दी है उसे सार्वजनिक करना पड़ेगा लेकिन किसी जज को जानकारी देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

मतलब यदि किसी जज ने अपनी ईमानदारी का परिचय देते हुए सुप्रीम कोर्ट के  चीफ जस्टिस को अपनी संपत्ति का ब्योरा दे दिया है तो बस उसी को ही सार्वजनिक कीजिए। जिस बेईमान ने ब्योरा दिया ही नहीं है तो उसको आप यह नहीं कह सकते कि आप ब्योरा चीफ जस्टिस को दीजिए।

मतलब सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा जीत भी गई और हार भी गई और जितना हिस्सा वह हारी थी  सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय का पालन आज तक नहीं किया क्योंकि उसने किसी भी जज की संपत्ति आज तक सार्वजनिक नहीं की है।

इतनी महान न्यायपालिका होने के बाद यदि किसी के घर में नोटों के बंडल जले हुए मिल गए तो हैरान परेशान होने वाली तो कोई बात नहीं है।
हंगामा क्यों है बरपा यदि थोड़ी सी रिश्वत ले ली है। 😂

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, जीवन चरित्र

વલ્લભભાઈએ પોતાનો અભ્યાસ પૂર્ણ કર્યો અને પ્લીડર બન્યા ત્યારે એમના મોટાભાઈ બોરસદમાં ડિસ્ટ્રિક્ટ પ્લીડર તરીકે કામ કરતા હતા. મોટાભાઈ વિઠ્ઠલભાઈની સાથે રહીને બોરસદમાં કામ કરવાને બદલે વતનથી દૂર ગોધરામાં પોતાની પ્રેક્ટિસ શરૂ કરી. પત્ની ઝવેરબાને સાથે લઈને ગોધરા રહેવા માટે આવી ગયા અને અહીં જ વકીલાત શરૂ કરી દીધી હતી. કોઈ જાતની વિશેષ સુવિધા પણ નહોતી. માંડ માંડ થોડી જરૂરિયાતની વસ્તુઓ ભેગી કરીને કામના શ્રીગણેશ કર્યા.
આ અરસામાં ગોધરામાં પ્લેગ ફાટી નીકળ્યો. વલ્લભભાઈના રામજીભાઈ નામના એક મિત્રને પ્લેગનો રોગ લાગુ પડ્યો. પ્લેગ ચેપીરોગ હોવાથી પરિવારના સભ્યો પણ રોગીની સારવારમાં મદદ કરવાને બદલે એનાથી દૂર રહેવાનું પસંદ કરતા; કારણ કે દરેકને પોતાનો જીવ વહાલો હોય. પોતાના મિત્રની સારવાર કરવાની જવાબદારી વલ્લભભાઈએ સંભાળી. પ્લેગગ્રસ્ત મિત્રનું બધું જ કામ કરે. પોતાના કામમાંથી નવરા પડે એટલે તુરત જ આ મિત્ર પાસે દોડી જાય અને એની સારવારમાં લાગી જાય. સગાંવહાલાંઓ પણ જ્યારે અંતર રાખતા હતા, ત્યારે વલ્લભભાઈ એમના આ મિત્રની સારવારમાં ખડેપગે ઊભા હતા સારવારમાં પૂરતું ધ્યાન આપવા છતાં મિત્ર બચી શક્યા નહીં. મિત્રની વિદાયનું દુઃખ હતું એમાં સ્મશાનયાત્રા પૂરી કરીને આવ્યા અને વલ્લભભાઈ પણ બીમાર પડ્યા. લોકોને એમ કે મિત્રના વિયોગની અસર છે, પણ તપાસ કરી તો ખબર પડી કે વલ્લભભાઈને પણ પ્લેગ લાગુ પડ્યો છે. મિત્રની સારવાર દરમિયાન લાગેલા ચેપથી વલ્લભભાઈ પણ ખાટલામાં પટકાયા. પોતાને થયેલા પ્લેગની અસર પત્ની ઝવેરબાને ન થાય એટલા માટે ઝવેરબાને વતનમાં મૂકી આવવાની વાત કરી. ઝવેરબા બહુ સંસ્કારી કુળનાં દીકરી હતાં એટલે બીમાર પતિને એકલા મૂકીને જાય એવાં નહોતાં; પણ વલ્લભભાઈ સરમુખત્યારની જેમ ઝવેરબાને વતન મૂકી આવ્યા અને પોતે એકાંતવાસમાં જતા રહ્યા. સાજા થયા પછી જ પત્ની ઝવેરબાને વતનમાંથી પરત બોલાવ્યાં.
પોતાનો મિત્ર મુશ્કેલીમાં હોય ત્યારે એનો ત્યાગ કરવાના બદલે જીવના જોખમે પણ જે મિત્રની સાથે અડિખમ ઊભો રહે છે, એ જ સાચો મિત્ર છે. જ્યારે દુનિયાના બીજા લોકો કોઈ માણસથી દૂર જતા રહે, ત્યારે એને પરિવારની ખૂબ જરૂર હોય છે. અને પરિવાર પણ જતો રહે, તો જીવનનો એક માત્ર આધાર બાકી રહે છે; અને એ છે મિત્ર.
Unknown
અજ્ઞાત
अज्ञात