Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अहंकार

कहानी:- शादी को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि सुधा और मोहन के बीच किसी छोटी-सी बात पर विवाद हो गया। दोनों ही शिक्षित थे, अपनी-अपनी नौकरियों में व्यस्त और स्वाभिमान से परिपूर्ण। जरा-सी अनबन हुई और दोनों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद हो गई। किसी ने पहल नहीं की, क्योंकि दोनों के मन में एक ही सवाल था—”पहले मैं क्यों झुकूं? मैं क्यों माफी मांगूं।”

तीन दिन बीत गए, पर मौन की दीवार जस की तस खड़ी रही। इस बीच, न जाने कितनी बार दोनों ने चाहा कि एक-दूसरे से बात कर लें, परंतु अपने-अपने अहंकार के कारण रुक गए।

सुधा ने सुबह के नाश्ते में पोहे बनाए, लेकिन गलती से उसमें मिर्च अधिक डाल दी। उसने स्वाद नहीं चखा, इसलिए गलती का आभास भी नहीं हुआ। मोहन ने भी गुस्से में चुपचाप तीखा नाश्ता खा लिया, बिना एक शब्द बोले। मिर्च इतनी ज्यादा थी कि ठंड के मौसम में भी वह पसीने से तर हो गया, पर उसने सुधा को कुछ भी नहीं बताया। जब बाद में सुधा ने पोहे खाए, तब उसे अपनी भूल समझ आई।

एक पल को मन में आया कि मोहन से क्षमा मांग ले, पर तभी उसे अपनी सहेली की सीख याद आ गई—”अगर तुम झुकीं, तो हमेशा तुम्हें ही झुकना पड़ेगा।” यह सोचकर वह चुप रह गई, हालांकि मन ही मन अपराधबोध से भर गई।

अगले दिन रविवार था। मोहन की नींद देर से खुली। घड़ी देखी तो नौ बज चुके थे। उसने सुधा की ओर देखा—वह अभी तक सो रही थी। यह देखकर वह चौंका, क्योंकि सुधा तो रोज़ जल्दी उठकर योग करती थी। उसने सोचा, “शायद नाराजगी के कारण लेटी होगी।”

मोहन खुद उठकर नींबू पानी बनाने चला गया। अख़बार लेकर बैठा, पर सुधा को अब भी सोता देख उसका ध्यान भटक गया। दस बज गए थे, लेकिन सुधा अब भी नहीं उठी। कुछ हिचकते हुए वह उसके पास गया और धीरे से बोला—”सुधा… दस बज गए हैं, अब तो उठो।”

कोई उत्तर नहीं मिला। उसने दो-तीन बार पुकारा, पर सुधा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अब उसका मन बेचैन हो उठा। उसने घबराकर कंबल हटाया और सुधा के गालों को छूकर देखा—उसका शरीर तप रहा था!

वह घबराकर रसोई में गया और अदरक की चाय बनाई। जल्दी से वापस आकर उसने सुधा को सहारा देकर उठाया और पीठ के पीछे तकिया लगा दिया।

“कोई दिक्कत तो नहीं कप पकड़ने में? क्या मैं तुम्हें पिला दूं?” मोहन की आवाज़ में चिंता और स्नेह का अद्भुत मिश्रण था।

सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “नहीं, मैं पी लूंगी।”

मोहन भी वहीं बैठकर चाय पीने लगा। उसके चेहरे पर चिंता स्पष्ट झलक रही थी।

“इसके बाद तुम आराम करो, मैं तुम्हारे लिए दवा लेकर आता हूं।”

सुधा चाय पीते-पीते मोहन को देखती रही। उसे याद आया कि कुछ देर पहले वह मायके जाने का निर्णय ले रही थी, और अब वही मोहन, जिससे वह तीन दिनों से बात भी नहीं कर रही थी, उसकी इतनी परवाह कर रहा था।

“मोहन…” सुधा ने धीमे स्वर में कहा।

“हाँ, क्या हुआ? सिर में बहुत दर्द हो रहा है क्या? आओ, मैं सहला दूं…” मोहन ने तुरंत पूछा।

“नहीं, मैं ठीक हूँ… बस एक बात पूछनी थी।”

“पूछो।”

“इतने दिनों से मैं तुमसे बात भी नहीं कर रही थी, और उस दिन नाश्ते में मिर्च भी ज़्यादा थी। तुम परेशान हुए, फिर भी मेरी इतनी देखभाल कर रहे हो… क्यों?”

मोहन ने गहरी सांस ली और मुस्कुराकर कहा, “परेशान तो मैं बहुत हूँ, क्योंकि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है। रही हमारे झगड़े की बात, तो जब जीवनभर साथ रहना ही है, तो कभी-कभी मतभेद भी होंगे, रूठना-मनाना भी होगा। दो बर्तन साथ होंगे तो खटपट तो होगी ही… समझीं मेरी जीवनसंगिनी?”

सुधा ने हल्की हँसी के साथ सिर हिलाया और मोहन के गले लग गई। मन ही मन उसने अपने आपसे वादा किया—”अब कभी अपने और मोहन के बीच अहंकार को आने नहीं दूंगी।”

Unknown's avatar

Author:

Buy, sell, exchange old books 8369123935

Leave a comment