कर्म और भाग्य
कहानी:- एक चाट वाला था, जो हमेशा ग्राहकों से घुलमिलकर बातें करता। जब भी उसके पास जाओ, तो ऐसा लगता जैसे वह हमारा ही इंतज़ार कर रहा हो। उसे हर विषय पर चर्चा करना पसंद था, चाहे राजनीति हो, समाज की बातें हों या फिर रोज़मर्रा की ज़िंदगी के मुद्दे। कई बार उससे कहा जाता कि भाई, चाट जल्दी बना दिया करो, देर हो जाती है, मगर उसकी बातचीत कभी खत्म नहीं होती। एक दिन यूँ ही बातों-बातों में कर्म और भाग्य पर चर्चा शुरू हो गई।
मुझे उसकी सोच जानने की उत्सुकता हुई, तो मैंने सीधा सवाल दाग दिया—”आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?” उसने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और बोला, “आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा?” मैंने कहा, “हाँ, है।” फिर उसने जवाब दिया, जिसने मेरे दिमाग़ के सारे भ्रम दूर कर दिए। वह बोला, “लॉकर की चाबियाँ ही इस सवाल का जवाब हैं। हर लॉकर की दो चाबियाँ होती हैं—एक आपके पास और एक बैंक मैनेजर के पास। आपकी चाबी परिश्रम है और मैनेजर की चाबी भाग्य। जब तक दोनों चाबियाँ नहीं लगतीं, तब तक ताला नहीं खुलता।”
फिर वह रुका और ज़रा गंभीर होकर बोला, “आप कर्मयोगी हैं और ऊपर वाला मैनेजर। आपको अपनी चाबी घुमाते रहनी चाहिए, यानी मेहनत करते रहनी चाहिए। कौन जाने भगवान कब अपनी चाबी लगा दे! लेकिन अगर ऊपर वाला अपनी चाबी लगा रहा हो और आपने अपनी मेहनत वाली चाबी न लगाई हो, तो ताला खुलने से रह जाएगा।” उसकी यह बात मेरे मन में गहरी उतर गई। मैंने सोचा कि कितनी साधारण, लेकिन कितनी सटीक बात कही है इस चाट वाले ने।
यह उदाहरण समझाते हुए वह फिर मुस्कुराया और बोला, “इसलिए कर्म करते रहो, क्योंकि भाग्य भरोसे बैठे रहने से कुछ नहीं मिलेगा। अगर ताला खोलना है, तो अपनी चाबी भी सही समय पर लगानी होगी।” उसकी बातों में एक गहरा संदेश था, जिसे सुनकर मैं सोचने लगा कि सच में, मेहनत और भाग्य दोनों की अपनी अहमियत है, लेकिन मेहनत हमारी अपनी चाबी है, जो हमारे हाथ में है।
