एक साहूकार अपने पालतू कुत्ते को लेकर बहुत चिंतित था। उसकी परेशानी यह थी कि उसका कुत्ता घर में किसी की बात नहीं सुनता था, जब उसको आवाज़ दो तो दूर भाग जाता, मालिक पर भौंकता, कभी-कभी तो काटने भी दौड़ता था। साहुकार ने अनेक पशु चिकित्सकों को भी दिखाया मगर कोई लाभ न हुआ।
एक दिन गांव में साधु बाबा आए। साहुकार ने साधु को भोजन कराया और अपनी समस्या बताई। साधु ने कहा कि इस (कुत्ते) का मुंह कपड़े से बांध दो और बस आज रात के लिए इसे मुझे दे दो, मैं इसे ठीक करके कल वापस दे दूंगा। साहुकार साधु की बात सुनकर प्रसन्न हुआ और कुत्ते के मुंह को बांधकर उसे साधु के हवाले कर दिया।
साधु अपने आश्रम पहुंचा और कुत्ते को एक खम्भे से बांध दिया। साधु ने अपने शिष्य को आदेश दिया कि इसको रात भर भूखा रखना, सिर्फ पानी देना ताकि प्यास बुझा सके और हर घंटे इसपर चार बेंत बजाना। शिष्य ने रातभर ऐसा ही किया।
अगले दिन साधु कुत्ते को लेकर साहुकार के घर पहुंचा। मालिक को देखते ही दौड़कर उसकी गोद में बैठ गया और दुम हिलाने लगा। साहुकार बहुत खुश था और हैरान भी।
“यह चमत्कार कैसे हुआ महाराज?”- साहुकार ने उत्सुकता से पूछा।
साधु ने उत्तर दिया – ” यह कुत्ता अपनी औकात भूल गया था। उसे वक्त पर खाने को रोटी मिल जाती थी, सहलाने वाले लोग उसके आस-पास रहते थे। इसलिए यह खुद को घर का मालिक समझ बैठा था। मैंने तो बस इसको इसकी औकात याद दिलाया है।”
साधु की बात सुनकर साहुकार को हर्ष हुआ और उसने साधु को धन देकर सम्मानित किया।