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जीने की कला सीखये और टालिये हर तनाव*


बदलते वक्त के साथ किशोरों के मनोभाव भी बदल रहे हैं। कम उम्र के बच्चे भी स्वच्छंद रहने की चाह रखने लगे हैं। वे अपने ऊपर किसी तरह का दबाव और सख्ती नहीं चाहते। तभी तो छोटी-छोटी बात पर ये जिंदगी खत्म कर लेते हैं और यह भी नहीं सोचते कि माता-पिता पर क्या बीतेगी! हालिया तीन ऐसी घटनाएं इस प्रवृत्ति का संकेत हैं।

पहली घटना बिहार के बगहा की है जहां मां ने 13 वर्षीय बेटी को खाना बनाने को कहा, तो उसने फांसी लगा ली। दूसरी घटना धनबाद की है जहां एक किशोर के पिता ने जबरन बाल कटवा दिए, तो उसने मौत को गले लगा लिया। वहीं कोलकाता में मां ने उसे मोबाइल पर गेम खेलने से मना किया तो किशोर ने जिंदगी खत्म कर ली।

ऐसी घटनाएं बच्चों की मानसिकता में आयी नकारात्मकता दर्शाती हैं। यह भी कि परिजन बच्चों के साथ किस तरह का व्यवहार करें कि वे अतिवादी कदम न उठायें।

मानसिक तनाव के चलते व्यक्ति चिंता में रहता है और कई बार खुद की जिंदगी खत्म कर लेता है, लेकिन 13-14 साल के बच्चों को आखिर कौन सी बड़ी चिंता या तनाव है? सुनने में आता था कि पढ़ाई के दबाव और माता-पिता की महत्वाकांक्षा की भेंट बच्चे चढ़ रहे हैं, लेकिन अगर केवल किसी काम से घर वाले रोकें या करने को कहें और इसी वज़ह से मौत प्यारी लगने लगे तो फिर वास्तव में स्थिति विकट है। किशोरों में ऐसी निगेटिविटी कई सवाल खड़े करती है और मनोवैज्ञानिकों को इस दिशा में शोध करने को प्रेरित भी करती है। जिंदगी एक खूबसूरत अहसास है, इसे जीने की कला आनी चाहिए- आख़िर ये बात हमारे बच्चे क्यों नहीं समझ पा रहे हैं। वहीं बच्चों के मन में क्या चल रहा है, इसे जानने के लिए माता-पिता को भी उनका दोस्त बनना होगा, ताकि बच्चे अपनी बातें उनसे साझा कर सकें।

पेरेंट्स का समय और सीख

आधुनिक जीवनशैली का भी बच्चों के कोमल मन पर गहरा असर हो रहा है। एकल परिवार का बढ़ता चलन और अभिभावकों की व्यस्तता ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है। बच्चे एकाकी हो रहे हैं, और अधिकतर समय सोशल मीडिया पर बिता रहे है। यहां उन्हें कोई रोकने टोकने वाला नहीं होता है। क्या देख-सीख रहे हैं इसकी समझ उन्हें नहीं होती है। इससे बाल मन भी दूषित हो जाता है, हिंसक प्रवृत्ति बढ़ती है। इन दुष्प्रभावों से बचाने के लिए उन्हें पर्याप्त समय दिया जाए। सही सीख देकर उनका भविष्य अंधकारमय होने से बचाया जा सकता है।

बच्चे अपनी संस्कृति भूल रहे हैं। कोमल मन में सीखने की चाह होती है। जो संगति मिलती है वह उसी से सीखने का प्रयास करते हैं। बच्चे व्यावहारिक शिक्षा से दूर हो रहे हैं। नित नयी टेक्नोलॉजी से दुनिया हथेली में सिमट रही है, जिसने मासूमियत को छीन लिया। समय से पहले बड़े हो रहे हैं। मामूली रोका-टोकी रास नहीं आ रही। जरा-जरा सी बात पर हिंसक हो खुद को जानी नुकसान तक पहुंचाने लगे हैं।

बच्चे किसी घटना के चलते कई बार इस दुनिया में खुद को एडजस्ट नहीं कर पाते हैं।

छोटी-छोटी बातें कोमल मन को कचोटती हैं। वे अंदर से टूट जाते हैं और अपना दर्द किसी से साझा नहीं कर पाना अतिवादी कदम उठाने की वजह बन जाता है। आजकल बच्चों में जरा सी उदासी से ही सब कुछ समाप्त कर लेने की इच्छा प्रबल हो रही है। परीक्षा में कम अंकों या बड़ों की रोकटोक जैसी छोटी बातों पर जिंदगी समाप्त कर लेना सहज हो चला है। ऐसे में माता-पिता को संबल बनने की जरूरत है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों की मानें तो साल 2017 से 2019 के बीच 24000 बच्चों ने आत्महत्या की। यदि बच्चे ही ग़लत राह पर चलने लगें तो फिर देश-समाज के विकास की रफ़्तार भी थम जाती है।

माता-पिता को कभी दोस्त तो कभी मार्गदर्शक बन उन्हें बेहतर इंसान बनाने के लिए ढालना होगा।

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