एक दिन ऐसा हुआ कि मैं एक ट्रेन में सवार था। एक स्टेशन पर रुकी बहुत देर तक एक आदमी भीख माँगने खिड़की पर आया और उसने कहा कि मैं बड़ी मुसीबत में हूं। मैंने कहा, तुम मुसीबत मत बताओ, क्योंकि मुसीबत बताने में तुम्हारा भी समय जाया होगा, मेरा भी। तुम मुझे यह कहो कि मैं क्या कर सकता हूं? उसने मेरी तरफ देखा, उसको शक हुआ, क्योंकि बिना मुसीबत बताए किसी को फंसाया नहीं जा सकता। क्योंकि जब वह पूरी मुसीबत बता ले और पाच मिनट आप सुन लें, तो फिर इनकार करने में कठिनाई हो जाती है। तो उसने कहा कि नहीं, मेरी मुसीबत……।
मैंने कहा कि तुम मुसीबत की बात ही मत करो। तुम मुझे यह कहो कि क्या कर सकता हूं? उसने बड़ी हिम्मत जुटाकर कहा कि एक रुपया दे दें। मैंने कहा, तुम एक रुपया लो। इतनी सरलता से छूटती है बात! तुम नाहक मुसीबत मुझे बताओ, मैं तुम्हारी मुसीबत सुनूं। तुम यह रुपया लो और जाओ। वह आदमी बड़ी बेचैनी में गया। उसने बार-बार रुपए को देखा भी होगा, फिर लौटकर मुझे भी देखा कि यह आदमी भरोसे का नहीं मालूम पड़ता। क्या गड़बड़ है! कुछ मैंने कहा ही नहीं, कोई मुसीबत नहीं सुनी। होता तो ऐसा है कि मुसीबत पूरी बताओ, तब भी कोई कुछ नहीं देता। और उसने सोचा कि यह आदमी…!
पांच सात मिनट बाद वह वापस आया। टोपी लगाए था, वह उतारकर रख आया। उसने आकर फिर खिड़की पर कहा कि मैं बड़ी मुसीबत में हूं। मैंने कहा, मुसीबत की बात ही मत करो। तुम मुझे यह बताओ कि तुम्हें मैं क्या कर सकता हूं? उसने मुझे पूरी आख से देखा कि मैं पागल तो नहीं हूं! उसने बड़ी हिम्मत जुटाई, उसने। सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता कि यह आदमी भूल ही गया हो, सिर्फ टोपी अलग कर लेने से। और वही की वही बात। उसने बहुत हिम्मत जुटाकर कहा कि मुझे दो रुपए…! मैंने कहा, तुम यह दो। रुपए लो। वह फिर मुझे बार-बार लौटता हुआ देखे, रुपए देखे।
दो-तीन मिनट बाद वह फिर आ गया। कोट पहने था, उसको भी उतार आया। खिड़की पर आया। मैंने उससे पहले ही कहा कि तू शुरू ही मत कर कि तू मुसीबत बता। उसने कहा, आप आदमी कैसे हो? मैं वही आदमी हूं, आपको समझ नहीं आ रहा है! मैंने कहा, मैं तो यह समझ रहा हूं कि तुम नहीं समझ रहे हो कि मैं वही आदमी हूं। मैं तो इस खयाल में हूं। वह मेरे तीन रुपए वापस लौटाने लगा। उसने कहा कि रुपए रख लो आप। रुपए मैं नहीं लूंगा। रुपए तुम ले जाओ। रुपए तुमने कमाए हैं, तुमने मेहनत पूरी की है। वह रुपए रखकर छोड़ गया दरवाजे पर। उसने कहा, रुपए मैं नहीं लूंगा। मैंने कहा, बात क्या है? रुपए क्यों नहीं लेते? उसने कहा कि जिस आदमी ने मुझ पर इतना भरोसा किया, उसे मैं इस तरह धोखा नहीं दे सकता हूं।
गीता-दर्शन – भाग एक, अध्याय—3
प्रवचन 26 : श्रद्धा है द्वार