इस गद्दार का नाम रविंद्र सिंह था। यह रॉ में जॉइंट सेक्रेटरी था।
राजीव गांधी की सरकार से लेकर 2004 तक यह भारत में कार्यरत रहा। फिर एक दिन यह यहां से भाग गया। रॉ ने इसका पता लगाना शुरू किया और पता चला कि यह अमेरिका में बस चुका है। तब स्पष्ट हुआ कि वास्तव में यह सीआईए के लिए काम करता था।
वहां सीआईए ने इसका पूरा उपयोग किया, लेकिन अंत समय आते-आते सीआईए ने भी इसे ठुकरा दिया।
2016 में अमेरिका में यह एक “सड़क दुर्घटना” में मारा गया। कुछ लोगों का कहना है कि सीआईए ने इसे काम निकलवाने के बाद खत्म कर दिया, जबकि कुछ का मानना है कि हमने जाकर इसका अंत किया।
हालांकि, 2016 में जब यह घटना हुई, तब तक मोदी सरकार आ चुकी थी। 2004 से 2016 के बीच यह बेसहारा जीवन व्यतीत कर रहा था, क्योंकि अब अमेरिका को इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। अन्यथा, सीआईए इसे बहुत पहले ही खत्म कर सकती थी, लेकिन इसका अंत 2016 में ही हुआ।
न सिर्फ इसका, बल्कि इसकी पूरी फैमिली का भी अंत हो गया।
मेरा अनुमान है कि रॉ ने ही इसका निबटान किया होगा, जब नई सरकार के आने पर उसे ऐसा करने का आदेश मिला होगा। मुस्लिम लीग ( ह्यूम ) की सरकार में तो इसकी कोई संभावना नहीं थी, क्योंकि उस समय तो हमारे देशभक्त एजेंट्स को ही विदेशों में पकड़वाया जाता था।
विदेश ही क्यों, भारत में भी ऐसा ही किया जाता था। नंबी नारायणन का मामला तो आपको पता ही होगा कि कैसे सीआईए के कहने पर उन्हें जेल में डाल दिया गया, ताकि भारत का रॉकेट प्रोग्राम रुक जाए।
इसी तरह, कभी सीआईए ने होमी भाभा की हत्या करवाई, तो कभी विक्रम साराभाई को मार दिया। और यह कोई काल्पनिक बात नहीं, बल्कि सीआईए के क्लासिफाइड डॉक्यूमेंट्स में लिखित तथ्य हैं, जो सार्वजनिक हुए थे।
इस गद्दार की कहानी से मिलती-जुलती एक सीरीज़ भी है, जो नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है। शायद उसका नाम “खुफ़िया” है, जिसमें तब्बू मुख्य भूमिका में हैं।
यह पूरी कहानी इसलिए बताई जा रही है ताकि आज जो गद्दार मुस्लिम लीग(ह्यूम ) वाले देशभक्त एजेंट्स के पीछे पड़े हैं, उन्हें उनका अपना इतिहास याद दिलाया जा सके।
पाकिस्तान से लेकर ईरान और अमेरिका तक, न जाने कहाँ-कहाँ हमने अपने एजेंट्स को मौत के मुँह में धकेला है, इन जैसे लोगों की वजह से।
और आज, जब हम दुश्मन को उसकी ही ज़मीन पर मार रहे हैं, तो इनकी छाती फट रही है।


