क्या आप जानते हैं? मार्क और ओलिविया, एक कालजयी प्रेम कहानी।
जब मार्क ट्वेन ने ओलिविया लैंगडन से शादी की, तो उन्होंने एक मित्र से कहा, “अगर मुझे पता होता कि वैवाहिक जीवन इतना सुखद हो सकता है, तो मैं 30 साल पहले ही शादी कर लेता, दाँत उगाने में समय बर्बाद करने के बजाय।” उस समय ट्वेन 32 वर्ष के थे।
ट्वेन—जिनका असली नाम सैमुअल क्लेमेंस था—एक साधारण परिवार में पले-बढ़े और छोटी उम्र से ही काम करने लगे। उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस में प्रशिक्षु के रूप में शुरुआत की, फिर नदी पर नाविक (रिवरबोट पायलट) बने, उसके बाद चांदी की खदान में किस्मत आजमाई (और बुरी तरह असफल हुए), फिर आखिरकार उन्हें अपना असली जुनून—लेखन—मिला। उनकी तेज़ बुद्धि और शानदार कहानी कहने की शैली ने उन्हें पूरे अमेरिका में प्रसिद्ध कर दिया।
इसी दौरान उन्हें प्रेम हुआ, लेकिन शुरुआत में ओलिविया से नहीं, बल्कि उनकी तस्वीर से। एक मित्र ने ट्वेन को ओलिविया की छवि वाला एक लॉकेट दिखाया और बाद में उनसे मिलवाने के लिए आमंत्रित किया। दो हफ़्तों के भीतर ही ट्वेन ने ओलिविया को विवाह प्रस्ताव दे दिया। ओलिविया को वे पसंद तो थे, लेकिन संशय था। ट्वेन उनसे दस साल बड़े थे, थोड़ा असभ्य स्वभाव के थे, उनकी संभ्रांत और शिक्षित समाज में कोई पहचान नहीं थी, और उनके पास धन भी नहीं था। हालांकि, वह उनके प्रतिभा से प्रभावित थीं, फिर भी उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया।
ट्वेन ने फिर प्रस्ताव रखा, लेकिन इस बार ओलिविया ने उनके धर्म के प्रति अनास्था को कारण बताते हुए मना कर दिया। ट्वेन ने अपने हास्य और ईमानदारी से जवाब दिया, “अगर यही जरूरी है, तो मैं एक अच्छा ईसाई बन जाऊँगा।” हालांकि ओलिविया ने इंकार कर दिया, परंतु वह पहले ही उनसे प्रेम करने लगी थीं। उधर ट्वेन को लगा कि उनके पास कोई मौका नहीं है, इसलिए वह वहाँ से चले गए।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जब ट्वेन ट्रेन स्टेशन जा रहे थे, तो उनकी गाड़ी पलट गई। इस अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने अपनी चोटों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और उन्हें वापस ओलिविया के घर लाया गया। जब ओलिविया ने उनकी देखभाल की, तो ट्वेन ने एक आखिरी बार प्रस्ताव रखा—इस बार, ओलिविया ने ‘हाँ’ कह दिया।
ट्वेन ने अपनी धार्मिक पत्नी को खुश करने के लिए हर संभव प्रयास किया। वह रोज़ रात को उन्हें बाइबल पढ़कर सुनाते और भोजन से पहले प्रार्थना करते। ओलिविया को उनके कुछ लेख पसंद नहीं थे, इसलिए ट्वेन ने उन्हें कभी प्रकाशित नहीं किया और इस तरह 15,000 से अधिक पन्ने अप्रकाशित रह गए। ओलिविया उनकी पहली संपादक और सबसे कठोर आलोचक थीं। यहाँ तक कि जब उन्होंने हकलबेरी फिन में “धत्त तेरी की!” जैसा शब्द पाया, तो उन्होंने उसे हटाने के लिए कहा।
उनकी बेटी सूज़ी ने एक बार अपने माता-पिता के बारे में कहा: “माँ को नैतिकता से प्रेम है, और पिताजी को बिल्लियों से।”
कई कठिनाइयों—बच्चों को खोने और आर्थिक संकट—के बावजूद, ओलिविया का अटूट विश्वास ट्वेन को ताकत देता रहा। उन्होंने कभी एक-दूसरे के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई—ट्वेन ने ओलिविया पर कभी गुस्सा नहीं किया, और ओलिविया ने उन्हें कभी डाँटा नहीं। ट्वेन ने उन्हें हमेशा सुरक्षित रखा, यहाँ तक कि जब एक करीबी मित्र ने ओलिविया का मज़ाक उड़ाया, तो ट्वेन ने लगभग उससे दोस्ती खत्म कर दी।
जब 60 वर्ष की उम्र में ट्वेन ने विश्व भ्रमण पर जाने का निर्णय लिया, तो ओलिविया, यह जानते हुए कि उन्हें निरंतर देखभाल की जरूरत है, सबकुछ छोड़कर उनके साथ चली गईं।
