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सच्चा सुख संतोष में है




एक संत को अपना भव्य आश्रम बनाने के लिए धन की जरूरत पड़ी। वह अपने शिष्य को साथ लेकर धन जुटाने के लिए लोगों के पास गए। घूमते-घूमते वह एक गांव में अपनी शिष्या एक बुढ़िया की कुटिया में पहुंचे। कुटिया बहुत साधारण थी। वहां किसी तरह की सुविधा नहीं थी फिर भी रात हो गई तो संत वहीं ठहर गए। बूढ़ी मां ने उनके लिए खाना बनाया।

खाने के बाद संत के सोने के लिए मां ने एक तख्त पर दरी बिछा दी और तकिया दे दिया। खुद वह जमीन पर एक टाट बिछाकर सो गईं। थोड़ी ही देर में वह गहरी नींद सो गईं लेकिन संत को नींद नहीं आ रही थी। वह दरी पर सोने के आदी नहीं थे। अपने आश्रम में सदा मोटे गद्दे पर सोते थे। संत सोचने लगे कि जमीन पर टाट बिछा कर सोने के बावजूद इस को गहरी नींद आ गई और मुझे तख्त पर दरी के बिछोने पर भी नींद क्यों नहीं आई।

मैं तो संत हूँ, सैंकड़ों का मार्गदर्शन करता हूं और यह एक साधारण बुढ़िया। यह बात उन्हें देर तक मथती रही। सोचने लगे, एक दिन यहीं रुकता हूं, देखता हूं कि यह ऐसा कौनसा मंत्र जानती है कि ऐसी अवस्था में भी प्रसन्न है, चैन से सोती है।

सुबह जल्दी उठकर बूढ़ी मां ने अपने हाथ से कुटिया की सफाई की और चिडिय़ों को दाना खिलाया। गाय को चारा दिया। फिर सूर्य को जल अर्पण किया, पौधों को सींचा। गुरु को प्रणाम किया और कुछ देर बैठ कर भगवान नाम का स्मरण। आंगन से तरक़ारी तोड़ कर भोजन पकाया।

गुरु को प्रथम भोजन करवा कर आप ग्रहण किया। दिन में आस पड़ोस की बच्चियों को बुला कर उन्हें हरि कथा सुनाई, हरि भजन का ज्ञान दिया। फिर संध्या पूजन, रात को पुन: सादे भोजन का प्रबंध। सोने की तैयारी। गुरु सोचने लगे आज फिर नींद नहीं आयेगी। पूछ ही लूं कि क्या रहस्य है।

संत ने पूछा, ‘‘मां, तुमने मेरे लिए अच्छा बिछोना बिछाया। फिर भी मुझे नींद नहीं आई जबकि तुम्हें जमीन पर गहरी नींद आ गई। क्या तुम्हें धरती की कठोरता नहीं सताती? क्या यह चिंता नहीं होती कि कैसे अपने लिये अच्छे भोजन का, नरम बिछड़ने का प्रबंध करूं? इसका कारण क्या है?’’ वह बोलीं, ‘‘गुरुदेव जब मैं सोती हूं तो मुझे पता नहीं होता कि मेरी पीठ के नीचे गद्दा है या टाट।

उस समय मुझे आपके वचन अनुसार दिन भर किए गए सत्कर्मों का स्मरण करके ऐसा अद्भुत आनंद मिलता है कि मैं सुख-दुख सब भूल कर परम पिता की गोद में सो जाती हूं इसलिए मुझे गहरी नींद आती है।’’

संत ने कहा, ‘‘मैं अपने सुख के लिए धन एकत्रित करने निकला था। यहां आकर मुझे मालूम हुआ कि सच्चा सुख भव्य आश्रम में नहीं बल्कि संतोष में है, गरीब की इस कुटिया में है।’


कहते है की इस कहानी से ओर भी कई बातें सीखने को मिलती है। 🙏🏻👇🏻

  1. सच्चा सुख संतोष में है – असली आनंद भव्य आश्रमों या ऐशो-आराम में नहीं, बल्कि संतोषपूर्ण जीवन और अच्छे कर्मों में मिलता है।
  2. साधारण जीवन, उच्च विचार – एक साधारण बुढ़िया, जो सादा जीवन जीती थी, फिर भी आत्मिक रूप से संतुष्ट और प्रसन्न थी, जबकि संत होते हुए भी गुरु को चैन नहीं था।
  3. धन और सुविधाएँ शांति की गारंटी नहीं हैं – संत के पास आरामदायक बिछौना था, फिर भी उन्हें नींद नहीं आई, जबकि बुढ़िया टाट पर भी चैन से सो गई। इसका अर्थ है कि बाहरी सुख-सुविधाएँ हमें आंतरिक शांति नहीं दे सकतीं।
  4. सत्कर्म और भक्ति जीवन को सुखद बनाते हैं – बुढ़िया ने अपने दिन को सत्कर्मों, दान-पुण्य और ईश्वर स्मरण में लगाया, जिससे उसे आत्मिक सुख मिला और वह चिंता मुक्त होकर सो सकी।
  5. दूसरों की सेवा सच्ची खुशी देती है – बुढ़िया ने संत की सेवा की, पशु-पक्षियों का ध्यान रखा, पड़ोस की बच्चियों को हरि कथा सुनाई, जिससे उसके मन में संतोष और खुशी बनी रही।
  6. सुख-दुख हमारे विचारों पर निर्भर करते हैं – अगर हमारा मन शुद्ध और संतुष्ट रहेगा, तो हमें बाहरी परिस्थितियाँ परेशान नहीं करेंगी।
  7. सच्ची नींद और शांति अच्छे कर्मों से आती है – बुढ़िया को शांति से नींद आई क्योंकि उसने दिनभर अच्छे कर्म किए थे। जब मन में शांति और संतोष होता है, तब शरीर को भी आराम मिलता है।

निष्कर्ष:
“सच्चा सुख बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि मन की शांति, संतोष और सत्कर्मों में है।”
इसलिए हमें धन और ऐशो-आराम की जगह अच्छे कर्मों, सेवा और भक्ति पर ध्यान देना चाहिए, जिससे हमें वास्तविक सुख और मानसिक शांति मिले।

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धन, पुत्र, वही जो परमार्थ में लगे




एक सेठ बड़ा साधु सेवा भावी था। जो भी सन्त महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा किया करता था।

एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये। सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार गये हुए थे।

भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये।

पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारा बच्चे कितने हैं ?
सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं।
महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है?
उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं।
महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये।

मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे।
पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं?

सेठ जी ने कहा महाराज! मेरा एक पुत्र है। महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता है सेठ जी झूठ बोल रहे हैं। इसकी पत्नी तो कहती थी कि हमारे चार बच्चे हैं और हमने स्वयं भी तीन-चार बच्चे आते-जाते देखे हैं और यह कहता है कि मेरा एक ही पुत्र है।

महात्मा जी ने दुबारा वही प्रश्न किया, सेठ जी तुम्हारा धन कितना है?

सेठ जी ने उत्तर दिया कि मेरा धन पच्चीस हज़ार रूपया है।

महात्मा जी फिर चकित हुए इसकी सेठानी कहती थी कि लोग हमें लखपति कहते हैं। इतने इनके कारखाने और कारोबार चल रहे हैं और यह कहता है मेरा धन पच्चीस हज़ार रुपये है।

महात्मा जी ने तीसरा प्रश्न किया कि सेठ जी! तुम्हारी आयु कितनी है?

सेठ ने कहा-महाराज मेरी आयु चालीस वर्ष की है महात्मा जी यह उत्तर सुन कर हैरान हुए सफेद इसके बाल हैं, देखने में यह सत्तर-पचहत्तर वर्ष का वृद्ध प्रतीत होता है और यह अपनी आयु चालीस वर्ष बताता है। सोचने लगे कि सेठ अपने बच्चों और धन को छुपाये परन्तु आयु को कैसे छुपा सकता है?

महात्मा जी रह न सके और बोले-सेठ जी! ऐसा लगता है कि तुम झूठ बोल रहे हो?

सेठ जी ने हाथ जोड़कर विनय की महाराज!

झूठ बोलना तो वैसे ही पाप है और विशेषकर सन्तोंं के साथ झूठ बोलना और भी बड़ा पाप है।

आपका पहला प्रश्न मेरे बच्चों के विषय में था। वस्तुतः मेरे चार पुत्र हैं किन्तु मेरा आज्ञाकारी पुत्र एक ही है। भक्ति भाव पूजा पाठ में लगा हुआ है मैं उसी एक को ही अपना पुत्र मानता हूँ। जो मेरी आज्ञा में नहीं रहते कुसंग के साथ रहते हैं वे मेरे पुत्र कैसे?

दूसरा प्रश्न आपका मेरा धन के विषय में था। महाराज! मैं उसी को अपना धन समझता हूँ जो परमार्थ की राह में लगे। मैने जीवन भर में पच्चीस हज़ार रुपये ही परमार्थ की राह में लगाये हैं वही मेरी असली पूँजी है। जो धन मेरे मरने के बाद मेरे पुत्र बन्धु-सम्बन्धी ले जावेंगे वह मेरा क्यों कर हुआ?

तीसरे प्रश्न में आपने मेरी आयु पूछी है। चालीस वर्ष पूर्व मेरा मिलाप एक
संत जी से हुआ था। उनकी सेवा चरण-शरण ग्रहण करके गुरु धारण किए मैं तब से भजन-अभ्यास और साधु सेवा कर रहा हूँ। इसलिये मैं इसी चालीस वर्ष की अवधि को ही अपनी आयु समझता हूँ।।

          कबीर संगत साध की, साहिब आवे याद।
          लेखे में सोई घड़ी, बाकी दे दिन बाद। ।

जब कभी सन्त महापुरुषों का मिलाप होता है-
उनकी संगति में जाकर मालिक की याद आती है,
वास्तव में वही घड़ी सफल है। शेष दिन जीवन के निरर्थक हैं।


कहते है की इस कहानी से ओर भी कई बातें सीखने को मिलती है। 🙏🏻👇🏻

  1. सच्चा पुत्र वही जो सही राह पर चले – केवल जन्म देने से कोई पुत्र नहीं होता, बल्कि जो माता-पिता की आज्ञा माने, अच्छे संस्कार अपनाए और धर्म के मार्ग पर चले, वही असली संतान कहलाने योग्य है।
  2. धन वही जो परमार्थ में लगे – जो धन दूसरों की सेवा, धर्म और भलाई के कार्यों में लगाया जाए, वही असली धन है। सांसारिक धन तो मृत्यु के बाद पीछे छूट जाता है, लेकिन नेक कार्यों में लगाया गया धन हमारे साथ जाता है।
  3. जीवन की वास्तविक आयु वही है जो भक्ति और सत्कर्म में बीती हो – असली उम्र वह नहीं जो जन्म से लेकर अब तक बीती हो, बल्कि वह समय मूल्यवान है जो भगवान की भक्ति, साधु संगति और अच्छे कर्मों में लगा हो।
  4. संतों और महापुरुषों की संगति जीवन को सार्थक बनाती है – जब हम संतों के साथ रहते हैं, तो हमें सही मार्गदर्शन मिलता है और हमारे जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होता है।
  5. संसार की मोह-माया में फँसकर असली धन और असली रिश्तों को मत भूलो – यह संसार नश्वर है, लेकिन परोपकार, धर्म, और भक्ति अमर रहती है। इसलिए इनका महत्व समझना चाहिए।

  1. सच्चा सुख सेवा और भक्ति में है – जीवन का वास्तविक आनंद धन, परिवार और भौतिक सुखों में नहीं, बल्कि सेवा, संतोष और भक्ति में है।

निष्कर्ष:
“धन, पुत्र, और उम्र की असली परिभाषा वही है जो परमार्थ, सेवा और भक्ति से जुड़ी हो।”
हमें अपने जीवन को अच्छे कर्मों, सेवा और भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए, क्योंकि यही सच्चा धन और असली पूँजी है।

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धैर्य और सकारात्मकता की सीख




एक लड़का घर-परिवार, धन और पढ़ाई संबंधी समस्याओं से बहुत परेशान था। घर में रोज विवाद होता ।उम्र ज्यादा नहीं थी, लेकिन रोज़-रोज़ के विवादों ने उसे अंदर से तोड़ दिया था। निराशा में डूबा हुआ, उसे लगने लगा कि उसकी ज़िंदगी में कोई रास्ता नहीं बचा है।

समाधान की तलाश में परेशानी में वह एक घने जंगल में पहुंच गया। जंगल में दूर दूर तक भटकने के बावजूद उसके मन को शांति नहीं मिली। चारों ओर अंधेरा था, और जंगली जानवरों का खतरा भी था। तभी उसकी नजर एक छोटी-सी झोपड़ी पर पड़ी।

उसके मन में सवाल उठा—”इस सुनसान जंगल में भी ऐसे कौन रह सकता है?” जिज्ञासा से भरा, वह झोपड़ी की ओर बढ़ने लगा।

झोपड़ी के पास पहुँचते ही उसने एक संत को ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए देखा। संत के चेहरे पर शांति और प्रसन्नता झलक रही थी। लड़का उनके पास जाकर बैठ गया।

संत ने स्नेहपूर्वक उसका परिचय पूछा। लड़के ने भारी मन से उत्तर दिया, “मैं जीवन में बहुत परेशान हूं और समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं। इसीलिए समाधान में
यहाँ आया हूँ।”

संत तो संत थे ज्ञानी पुरुष, लड़के की पीड़ा तुरंत समझ गए। उन्होंने सहानुभूति से कहा, ” बेटा, समस्याएं तो जीवन का हिस्सा हैं। समय एक जैसा नहीं रहता, निराश नहीं होना चाहिए।”

इसके बाद वे लड़के से बोले तुम्हें में एक कहानी सुनाता हूं ध्यान से सुनो और बताओं कि कहानी का सार क्या है? लड़के ने हाँ मै सिर हिलाया!
संत नें कहानी सुनायी ।

“एक छोटे बच्चे ने अपने घर में बांस और कैक्टस के दो पौधे लगाए।”

बच्चा हर दिन दोनों पौधों को एक समान पानी देता और उनकी देखभाल करता। कुछ समय बाद कैक्टस का पौधा तो तेजी से बढ़ने लगा, लेकिन बांस का पौधा जरा भी नहीं बढ़ा।

समय बीतता गया, पर बांस के पौधे में कोई बदलाव नजर नहीं आया। लोलन फिर भी बच्चा निराश नहीं हुआ, उसने लगातार मेहनत जारी रखी।

फिर एक दिन अचानक बांस का पौधा तेजी से बढ़ने लगा और कुछ ही समय में कैक्टस से भी ऊंचा हो गया।

संत ने लड़के से कहा, बेटा जानते हो इसका राज…..
“बांस का पौधा पहले तो अपनी जड़े मजबूत कर रहा था, इसलिए उसे बढ़ने में समय लगा। लेकिन कभी भी निराश नहीं हुआ, उसने प्रयास जारी रखे।”

“हमारे जीवन में भी दो बातें जरूरी हैं—

  1. धैर्य और सकारात्मकता बनाए रखना। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, आशा नहीं छोड़नी चाहिए।
  2. पहले अपनी जड़े मजबूत करें। जब हमारी नींव मजबूत होगी, तो जीवन में सफलता और संतोष भी तेजी से मिलेगा।”

संत की बातें सुनकर लड़के के चेहरे पर संतोष के भाव आ गये उसे बहुत बड़ा समाधान मिल चुका था। उसे अब एहसास हो गया था कि मुश्किलें स्थायी नहीं होतीं और धैर्य से काम लें तो जीवन बदल सकता है।

उसने नई सोच के साथ जीवन में आगे बढ़ने का निश्चय किया और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ अपने घर लौट गया।

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छोड़ो कल की बातें


एक पचपन की स्त्री आयी अपने बेटे, बहु और पति के साथ। समस्या थी, सास-बहू का कलह जो अब बहु को अवसाद में डाल रहा था। बेटा एकलौता था और ना तो घर छोड़ माँ से ही अलग हो पा रहा था नाही अपनी पत्नी के दुख को सम्भाल पा रहा था। पिता का धैर्य भी अब जवाब दे चुका था।

उस स्त्री ने बताया कि कैसे बहु तमाम ऐसी चीजें करती है जो उनके जमाने में स्त्री कभी नहीं किया करती थी। वे तमाम चीजें थी- बहु का  जीन्स पहनना, फ़िल्म देखने जाना, ट्रेकिंग ट्रिप बनाना और ऐसी ही एक हजार एक टुच्ची बातें जो अभी के जमाने में पली-बढ़ी हर सामान्य लड़की करती है। बेटा पर भी बीवी की ऐसी हर बात को पूरा समर्थन देने का इल्जाम था। पति पर बहु की इन हरक़तों पर ध्यान ना देने का इल्जाम था। अतः पूरा परिवार ही  स्त्री के नजर में दोषी था इस बदले समीकरण के लिये।

बेटे और पिता चाह रहे थे कि दोनों तरफ से कुछ compromise हो जाये तो गाड़ी किसी तरह आगे बढ़, इसीलिये family counselling की मांग की । पर psychologist ने साफ मना कर दिया और बोला अगली बार वह स्त्री अकेली आएगी। स्त्री ने विरोध किया कि हरयाणा से दिल्ली तक उसे अकेले ऐसे-कैसे बुलाया जा सकता है। डॉक्टरी चक्कर में तो साथ होना ही चाहिये लोगों को। वहाँ भी नहीं तो कम से कम  कार चलाने के लिए तो पुरुष चाहिए ही होगा। पर Psychologist ने एक नहीं सुनी। हालांकि बेटे को अलग से बता दिया गया था कि अगर माँ का डिसीजन ना बदले तो वह साथ लेकर आ जाये।

पर वह स्त्री अकेली आयी। बेटे ने जबरदस्ती भेजा, बस से। दूसरे सेशन में भी सिर्फ मन का गुब्बार निकालती रही। कैसे उनकी जिंदगी सास-ससुर की सेवा में बीती और कैसे अब बहु उसका एक चौथाई भी नहीं करती जितना उन्होंने किया था। बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं है अब उस बेचारी के लिये। फिर उस काउंसलर ने उसे कुछ होमवर्क दिया, अगली बार आने से पहले फ़िल्म देखने जाना, अपने लिये एक मोबाइल खरीदना( उसके पास नहीं थी, नाही उसे जरूरत लगी कभी), और अपने पसंदीदा गानों की एक लिस्ट डाउनलोड करना खुद से।

जब घर पहुंची तो बेटा इस लिस्ट को देखकर चिढ़ गया। उसकी बीवी दुःखी थी और यहाँ psychologist उसकी परम्परावादी घर बैठने वाली मां को फ़िल्म देखने भेज रही थी। पर उसने भी साथ दिया, मन मार कर ही सही। अगले सप्ताह काउंसलिंग के साथ फिर कुछ ऐसे ही होमवर्क मिले। कुछ सेशन बाद परिवार को बुलाया गया। लड़ाइयां अपने आप कम होती जा रही थी।

सास को कई होमवर्क में बहु ने मदद किया था, पुरूषों के पास समय के अभाव की वजह से अगली फ़िल्म दोनों साथ देखने गए थे और काउंसलर के कहे अनुसार पार्लर भी।

हालांकि काउंसलिंग में और भी कई बातें थी, भावनाओं को समझना और उन्हें सम्भालना भी हुआ, पर बदलाव की मुख्य वजह यह थी कि पहली बार यह स्त्री वो चीजे कर पायी जो उसने अपनी सास की डर से कभी नहीं किया था। उसकी सास तो मर गयी पर परम्पराओ का जकड़न साथ रहा, अब यही जकड़न वह बहु पर लादना चाहती थी।लेकिन ज्यादा ध्यान से देखे तो दुःख बहु की हरकतों का नहीं था, दुःख था अपनी आजादी ना पाने का। मां को हमेशा किचन में देखने का आदि बेटा भी कभी नहीं पूछा फ़िल्म देखने चलने के लिये नाही पति ने कभी कहा जाओ सहेलियों के साथ कोई ट्रिप बनाओ। और सच कहा जाए तो उस स्त्री के दिमाग में भी कभी नहीं आया कि उसकी जिंदगी भी किसी अलग गति से अलग रास्ते पर चल सकती है। पर जब एक बार वह अपनी आजादी पाने लगी तो बहु की आजादी देखकर बुरा लगना भी बंद हो गया। काउंसलर ने सास-बहू के समीकरण के बजाय सास की जिंदगी पर ध्यान दिया, उसकी हॉबी ढूंढी, उसके सपनो पर बात की।

इन दिनों वह स्त्री बहु के साथ शिमला जाने के प्लान को लेकर बहुत excited है।

पर ऐसी कहानियाँ तो हर घर में है। अक्सर जब हम पुरानी पीढ़ी के कठोरता की शिकायत करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि यह वह पीढ़ी थी जिसके अस्तित्व की रचना ही मानो जिम्मेदारी निभाने के लिये हुई। हम चाहते हैं वो हमारी आजादी समझे पर कभी कोशिश नहीं करते उन्हें ज्यादा आजाद करने की। पर कोई इंसान जो हमेशा अपने सपनों से समझौता करता रहा iहो, उसे दूसरे की आजादी भी क्यों अच्छी लगेगी??

इसीलिये बेहतर है,नयी पीढ़ी को समझौता करने के बजाय पुरानी पीढ़ी की कुछ जिम्मेदारियाँ  छीन लेनी चाहिये, उन्हें भी आजाद कर देना चाहिये।

़ो कल की बातें*

एक पचपन की स्त्री आयी अपने बेटे, बहु और पति के साथ। समस्या थी, सास-बहू का कलह जो अब बहु को अवसाद में डाल रहा था। बेटा एकलौता था और ना तो घर छोड़ माँ से ही अलग हो पा रहा था नाही अपनी पत्नी के दुख को सम्भाल पा रहा था। पिता का धैर्य भी अब जवाब दे चुका था।

उस स्त्री ने बताया कि कैसे बहु तमाम ऐसी चीजें करती है जो उनके जमाने में स्त्री कभी नहीं किया करती थी। वे तमाम चीजें थी- बहु का  जीन्स पहनना, फ़िल्म देखने जाना, ट्रेकिंग ट्रिप बनाना और ऐसी ही एक हजार एक टुच्ची बातें जो अभी के जमाने में पली-बढ़ी हर सामान्य लड़की करती है। बेटा पर भी बीवी की ऐसी हर बात को पूरा समर्थन देने का इल्जाम था। पति पर बहु की इन हरक़तों पर ध्यान ना देने का इल्जाम था। अतः पूरा परिवार ही  स्त्री के नजर में दोषी था इस बदले समीकरण के लिये।

बेटे और पिता चाह रहे थे कि दोनों तरफ से कुछ compromise हो जाये तो गाड़ी किसी तरह आगे बढ़, इसीलिये family counselling की मांग की । पर psychologist ने साफ मना कर दिया और बोला अगली बार वह स्त्री अकेली आएगी। स्त्री ने विरोध किया कि हरयाणा से दिल्ली तक उसे अकेले ऐसे-कैसे बुलाया जा सकता है। डॉक्टरी चक्कर में तो साथ होना ही चाहिये लोगों को। वहाँ भी नहीं तो कम से कम  कार चलाने के लिए तो पुरुष चाहिए ही होगा। पर Psychologist ने एक नहीं सुनी। हालांकि बेटे को अलग से बता दिया गया था कि अगर माँ का डिसीजन ना बदले तो वह साथ लेकर आ जाये।

पर वह स्त्री अकेली आयी। बेटे ने जबरदस्ती भेजा, बस से। दूसरे सेशन में भी सिर्फ मन का गुब्बार निकालती रही। कैसे उनकी जिंदगी सास-ससुर की सेवा में बीती और कैसे अब बहु उसका एक चौथाई भी नहीं करती जितना उन्होंने किया था। बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं है अब उस बेचारी के लिये। फिर उस काउंसलर ने उसे कुछ होमवर्क दिया, अगली बार आने से पहले फ़िल्म देखने जाना, अपने लिये एक मोबाइल खरीदना( उसके पास नहीं थी, नाही उसे जरूरत लगी कभी), और अपने पसंदीदा गानों की एक लिस्ट डाउनलोड करना खुद से।

जब घर पहुंची तो बेटा इस लिस्ट को देखकर चिढ़ गया। उसकी बीवी दुःखी थी और यहाँ psychologist उसकी परम्परावादी घर बैठने वाली मां को फ़िल्म देखने भेज रही थी। पर उसने भी साथ दिया, मन मार कर ही सही। अगले सप्ताह काउंसलिंग के साथ फिर कुछ ऐसे ही होमवर्क मिले। कुछ सेशन बाद परिवार को बुलाया गया। लड़ाइयां अपने आप कम होती जा रही थी।

सास को कई होमवर्क में बहु ने मदद किया था, पुरूषों के पास समय के अभाव की वजह से अगली फ़िल्म दोनों साथ देखने गए थे और काउंसलर के कहे अनुसार पार्लर भी।

हालांकि काउंसलिंग में और भी कई बातें थी, भावनाओं को समझना और उन्हें सम्भालना भी हुआ, पर बदलाव की मुख्य वजह यह थी कि पहली बार यह स्त्री वो चीजे कर पायी जो उसने अपनी सास की डर से कभी नहीं किया था। उसकी सास तो मर गयी पर परम्पराओ का जकड़न साथ रहा, अब यही जकड़न वह बहु पर लादना चाहती थी।लेकिन ज्यादा ध्यान से देखे तो दुःख बहु की हरकतों का नहीं था, दुःख था अपनी आजादी ना पाने का। मां को हमेशा किचन में देखने का आदि बेटा भी कभी नहीं पूछा फ़िल्म देखने चलने के लिये नाही पति ने कभी कहा जाओ सहेलियों के साथ कोई ट्रिप बनाओ। और सच कहा जाए तो उस स्त्री के दिमाग में भी कभी नहीं आया कि उसकी जिंदगी भी किसी अलग गति से अलग रास्ते पर चल सकती है। पर जब एक बार वह अपनी आजादी पाने लगी तो बहु की आजादी देखकर बुरा लगना भी बंद हो गया। काउंसलर ने सास-बहू के समीकरण के बजाय सास की जिंदगी पर ध्यान दिया, उसकी हॉबी ढूंढी, उसके सपनो पर बात की।

इन दिनों वह स्त्री बहु के साथ शिमला जाने के प्लान को लेकर बहुत excited है।

पर ऐसी कहानियाँ तो हर घर में है। अक्सर जब हम पुरानी पीढ़ी के कठोरता की शिकायत करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि यह वह पीढ़ी थी जिसके अस्तित्व की रचना ही मानो जिम्मेदारी निभाने के लिये हुई। हम चाहते हैं वो हमारी आजादी समझे पर कभी कोशिश नहीं करते उन्हें ज्यादा आजाद करने की। पर कोई इंसान जो हमेशा अपने सपनों से समझौता करता रहा iहो, उसे दूसरे की आजादी भी क्यों अच्छी लगेगी??

इसीलिये बेहतर है,नयी पीढ़ी को समझौता करने के बजाय पुरानी पीढ़ी की कुछ जिम्मेदारियाँ  छीन लेनी चाहिये, उन्हें भी आजाद कर देना चाहिये।

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करवाचौथ


करीबन एक दशक पहले हमारी फैक्ट्री से माल लाने ले जाने के लिये हमने कई ऑटो और ट्राली वालों के साथ सम्पर्क कर रखा था।

ऑटो वालों की फेहरिस्त में एक नाम था…..मोहन।
मोहन एक ऐसा शख्स है जो शायद आखरी सांस तक मेरी स्मृतियों में ताज़ा रहेगा। जिसे मैं चाह कर भी नहीं भूल पाऊंगा।

मोहन हद दर्जे का ईमानदार और विश्वसनीय आदमी था।
धुंधला सा याद है……शायद अक्टूबर के महीना शुरु हुआ था।

ऑटो वालों के साथ माल ढुलाई के लिये लेबर आया करती थी। मोहन एक शाम मेरे पास आया। गोडाऊन से माल लोड होने लगा और मैं यह देख कर आश्चर्यचकित हो गया के उसके साथ माल लोड करने वाले व्यक्ति नहीं थे। उसके साथ उसका चचेरा भाई था और वह दोनों मिल कर भारी भरकम बोरे उठा रहे थे।
मैं देख कर आश्चर्यचकित रह गया।
मोहन एक ऑटो ड्राइवर होते हुये स्वयं लेबर का काम कर रहा था।
मैंने उत्सुकतावश उससे पूछा के बंधु आज लेबर वालों को लेकर नहीं आया….. खुद ही भारी भरकम बोरे अपनी कमर पर लाद रहा है।

उसने कहा के शाम का वक्त था….मुझे लेबर वाले नहीं मिल पाये।

बात आयी गयी हो गयी।
एक दिन छोड़ कर वह फिर फैक्ट्री में अपनी कमर पर भारी भरकम बोरे लोड करता दिखाई दिया।

मैंने पुनः उससे पूछा के उसके साथ बोरे लोड करने वाले लेबर के बंधु नहीं आये।

उसने फिर मुझसे कहा के आज लेबरवाले नहीं मिले तो सोचा स्वयं ही माल लोड कर लूं।

एक दो दिन छोड़ कर वह फिर अपनी कमर पर भारी भरकम बोरी उठाता हुआ दिखाई दिया।
मैंने पुनः उससे पूछा तो उसने ठगा हुआ सा जवाब दिया….उसने कहा सेठ “माल मैं लोड करूँ या कोई और आपको तो लोडिंग के पैसे देने हैं।”

मैं उसके जवाब से हतप्रभ रह गया।

भारी भरकम बोरे उठा कर उसने टेम्पू में लोड कर दिये। फिर मेरे आफिस में आया और बोला …..”कुछ पैसे एडवांस दे दीजिये।”

मैंने उसे 500 रुपये एडवांस दे दिये।

वह ऑफिस से बाहर चला गया।
करीबन 10 मिनट बाद वह पुनः लौट कर आया।
बोला …..”आपकी मदद चाहिये।”
मुझे लगा के शायद उसे पैसे की आवश्यकता है।
मैं पर्स से रुपये निकालने ही लगा था के बोला ….”सेठ पैसा नहीं चाहिये”।

मैंने उससे पूछा के पैसा नहीं चाहिये तो किस तरह की मदद चाहिये।

उसका चेहरा लाल हो गया। कुछ समय मौन खड़ा रहा। फिर शर्माता सकुचाता हुआ बोला……आपकी भाभी के लिये एक साड़ी खरीदनी है…..अपने को समझ नहीं है। किसी दुकानदार के बारे में बता दीजिये ….जो अच्छी साड़ी दे दे।”

उस समय मुझे ध्यान आया के अगले दिन करवाचौथ था।
ना जाने मेरे मन में क्या आया मैने मोहन को गाड़ी में बिठाया हम शहर की व्यस्ततम मार्किट में गये वहां एक परिचित की दुकान से हमनें एक साड़ी खरीदी।
बगल की दुकान से एक चमचमाते हुये कागज़ में साड़ी को बाकायदा पैक करवाया।

बिल देने के लिये अपनी जेब से पर्स निकाला ही था के मोहन ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

तत्क्षण उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक पालीथिन निकाला। पालीथिन में कई गांठें बंधी हुई थी।
एक एक कर उसने गांठ खोली।

पालीथिन में 10 रुपये से लेकर 100 रुपये तक के नोट मौजूद थे। पॉलीथिन में रखे रुपये ऐसे लग रहे थे जैसे किसी अबोध बच्चे ने अपनी पसंदीदा चीज़ खरीदने के लिये सिक्के जमा किये हों। पालीथिन में वह 500 रुपये भी मौजूद थे जो उसने मुझसे एडवांस लिये थे और वह 10 – 20 रुपये के नोट भी मौजूद थे जो वह भारी भरकम बोरे उठा कर वह कमाता रहा था।

मेरे बारम्बार आग्रह करने के बाद भी उसने साड़ी के बिल के लिये एक पैसा भी लेने से इनकार कर दिया।

उसकी खुद की कमाई से खरीदी हुई साड़ी को जब मैंने उसे हाथ में थमाया तो उसकी आँखों की चमक देखने लायक थी।

सकुचाते हुये उसने बतलाया के यह पहला तोहफा है जो शादी के 5 साल बाद वह अपनी अर्धांगनी को देने जा रहा है।

उस समय मेरी आँखों के आगे अपनी कमर पर भारी भरकम बोरे लाद कर एक एक पाई जमा करते मोहन की छवि सामने आ गयी।

हिंदुस्तान में औरत के मर्द के प्रति प्रेम और समर्पण के विषय में लिखने की मेरे पास शब्द नहीं हैं। हिंदुस्तानी नारी वाकई सब पर भारी है। उनका प्रेम ,उनका त्याग ,उनका समर्पण , अविश्वनीय है, अकल्पनीय है।

परंतु यकीन कीजिये के यह जीवन रूपी रेल अगर सरपट दौड़ रही है तो एक बहुत बड़ा योगदान हिंदुस्तानी पुरूष का भी है।

शायद वह आपसे किसी यूरोपियन , अमेरिकन या आस्ट्रेलियन की तरह आई लव यू स्वीटहार्ट ना कह सके…..लेकिन वह आपके लिये एक साड़ी खरीदने के लिये अपनी कमर पर भारी भरकम बोरी ढोने के लिये एक पल भी नहीं हिचकिचायेगा।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

प्राचीन तेलहारा विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय का प्रतिस्पर्धी था। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग और इत्सिंग ने अपनी यात्रा वृतांतों में तेलहारा विश्वविद्यालय का उल्लेख एक उच्च शोध केंद्र के रूप में किया है।

पुरातत्वविद कनिंघम, जिन्होंने इस स्थल पर छह टीले और अभिलेख खोजे थे, ने इस क्षेत्र को टेल्याधक या तेलाधक कहा था।

यह एक तीन-मंजिला विश्वविद्यालय था, जिसमें एक प्रार्थना कक्ष और 1,000 से अधिक छात्रों/भिक्षुओं के बैठने के लिए एक मंच था। इन इमारतों में आंगन, तीन-मंजिला मंडप, मीनारें, द्वार आदि शामिल थे। कनिंघम ने यहां एक मस्जिद की खोज की, जिसकी छत विशाल पत्थर की पट्टियों से बनी थी, जो पत्थर की बीमों पर टिकी हुई थीं। मस्जिद के निर्माण में उपयोग की गई सामग्री एक मंदिर के अवशेष थे।

खुदाई के दौरान, एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) की टीम को 1.5 फुट मोटी राख की परत मिली, जिससे यह संकेत मिलता है कि तेलहारा विश्वविद्यालय को नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों की तरह नष्ट और जला दिया गया था।

इस प्राचीन विश्वविद्यालय का पूरा विवरण ‘विश्वगुरु भारत: प्रतिध्वनि प्राचीन काल की’ (अध्याय 10) में दिया गया है, जिसमें अन्य प्राचीन विश्वविद्यालयों और गुरुकुलों का भी विवरण है। (लिंक: https://www.amazon.in/gp/product/B0CMCQ5B7G/)

मनोशी सिन्हा; छवि स्रोत: गूगल।


फेसबुक पेज MyIndiaMyGlory की दीवार से।

Posted in हिन्दू पतन

उन जेहादी बलात्कारियों से जब उस माँ ने कहा “अब्दुल अली एक-एक करके करो, नहीं तो वो मर जाएंगी “।

ये सच्ची घटना घटित हुई थी 8 अक्टूबर 2001 को बांग्लादेश में।

अनिल चंद्र और उनका परिवार 2 बेटीयों पूर्णिमा व 6 वर्षीय छोटी बेटी के साथ बांग्लादेश के सिराजगंज में रहता था। उनके पास जीने खाने और रहने के लिए पर्याप्त जमीन थी. बस एक गलती उनसे हो गयी, और ये गलती थी एक हिंदु होकर 14 साल व 6 साल की बेटी के साथ बांग्लादेश में रहना। एक क़ाफिर के पास इतनी जमीन कैसे रह सकती है..? यही सवाल था बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिद ज़िया के पार्टी से सम्बंधित कुछ उन्मादी लोगों का।

8 अक्टूबर के दिन अब्दुल अली, अल्ताफ हुसैन, हुसैन अली, अब्दुर रउफ, यासीन अली, लिटन शेख और 5 अन्य लोगों ने अनिल चंद्र के घर पर धावा बोल दिया, अनिल चंद्र को मारकर डंडो से बाँध दिया, और उनको काफ़िर कहकर गालियां देने लगे।

इसके बाद ये शैतान माँ के सामने ही उस १४ साल की निर्दोष बच्ची पर टूट पड़े और उस वक्त जो शब्द उस बेबस लाचार मां के मुँह से निकले वो पूरी इंसानियत को झंकझोर देने वाले हैं।

अपनी बेटी के साथ होते इस अत्याचार को देखकर उसने कहा “अब्दुल अली, एक एक करके करो, नहीं तो मर जाएगी, वो सिर्फ १४ साल की है।”

वो यहीं नहीं रुके उन माँ बाप के सामने उनकी छोटी 6 वर्षीय बेटी का भी सभी ने मिलकर ब#लात्कार किया ….उनलोगों को वही मरने के लिए छोडकर  जाते जाते आस पड़ोस के लोगों को धमकी देकर गए की कोई इनकी मदद नहीं करेगा।

ये पूरी घटना बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी अपनी किताब “लज्जा” में लिखी जिसके बाद से उनको देश छोड़ना पड़ा, ये पूरी घटना इतनी हैवानियत से भरी है पर आजतक भारत में किसी बुद्धिजीवी ने इसके खिलाफ बोलने की हैसियत तक नहीं दिखाई है, ना ही किसी मीडिया हाउस ने इसपर कोई कार्यक्रम करने की हिम्मत जुटाई।

ये होता है किसी इस्लामिक देश में हिन्दू या कोई अन्य अल्पसंख्यक होने का, चाहे वो बांग्लादेश हो या पाकिस्तान।

पता नहीं कितनी पूर्णिमाओं की ऐसी आहुति दी गयी होगी बांग्लादेश में हिंदुओं की जनसँख्या को 22 प्रतिशत से 5 प्रतिशत और पाकिस्तान में 15 प्रतिशत से 1 प्रतिशत पहुँचाने में।

और हिंदुस्तान में हामिद अंसारी जैसे घिनौने लोग कहते है कि हमें डर लगता है!!!
जहाँ उनकी आबादी आज़ादी के बाद से 24 प्रतिशत अधिक बढ़ी है। अगर आप भी सेक्युलर हिंदु (स्वघोषित बुद्धिजीवी) हैं और आपको भी लगता है कि भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है तो कभी बांग्लादेश या पाकिस्तान की किसी पूर्णिमा को इन्टरनेट पर ढूंढ कर देखिये। मेरा दावा है कि आपका नजरिया बदल जाएगा!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक पिता ने अपने बेटे से कहा, “तुमने सम्मान के साथ स्नातक किया है। यह एक वॉल्क्सवैगन बीटल है, जिसे मैंने कई साल पहले खरीदा था… यह 50 साल से भी पुरानी है, लेकिन इसे तुम्हें देने से पहले, इसे शहर के एक डीलरशिप पर ले जाओ और पूछो कि वे इसे कितने में खरीदेंगे।”

बेटा डीलरशिप पर गया और वापस आकर बोला, “उन्होंने केवल 2,000 पेसो की पेशकश की क्योंकि यह बहुत पुरानी और इस्तेमाल की हुई लगती है।”

पिता ने कहा, “इसे एकpawn shop (गिरवी रखने वाली दुकान) पर ले जाओ।”

बेटा वहां गया और वापस आकर बोला, “उन्होंने सिर्फ 10,000 पेसो की पेशकश की क्योंकि उनका कहना था कि यह बहुत पुरानी है।”

आखिर में, पिता ने बेटे से कहा कि वह इस कार को एक क्लासिक कार क्लब में ले जाकर दिखाए। बेटा क्लब गया और वापस आकर बोला, “वहां कुछ लोगों ने मुझे 10 लाख से 20 लाख पेसो तक की पेशकश की, क्योंकि यह कार बहुत दुर्लभ है और क्लब के सदस्यों के बीच इसकी बहुत मांग है।”

पिता ने मुस्कुराते हुए बेटे से कहा, “मैं चाहता था कि तुम यह समझो कि सही जगह पर ही तुम्हारी सही कद्र होती है। यदि कोई तुम्हारी कद्र नहीं करता, तो नाराज़ मत होना, इसका मतलब सिर्फ इतना है कि तुम गलत जगह पर हो। तुम्हारी असली कीमत वही लोग समझेंगे जो सच में तुम्हें महत्व देते हैं। कभी भी वहां मत रहो, जहां तुम्हारी कद्र न हो!”

Posted in Love Jihad

हनी ट्रैप की आड़ में जासूसी का केस
        माधुरी गुप्ता भारतीय विदेश सेवा की वरिष्ठ अधिकारी थी ।
       वह 52 साल की थी  लेकिन अविवाहित थी उसने इजिप्ट मलेशिया जिंबॉब्वे इराक लीबिया सहित तमाम देशों में वरिष्ठ पदों पर काम किया था।  उर्दू पर अच्छी पकड़ के लिए उसे पाकिस्तान भेजा गया जहां उसे वीजा के साथ-साथ मीडिया प्रभार भी दिया गया था
      पाकिस्तान में तैनात होने वाले सभी अधिकारियों पर इंटेलिजेंस की पूरी नजर रहती है
      एक पार्टी में माधुरी गुप्ता को जमशेद उर्फ जिमी नमक 30 साल का एक युवक मिला उसे युवक ने अपनी वॉकपटुता और हाजिर जवाबी से माधुरी गुप्ता का दिल मोह लिया और माधुरी गुप्ता उसे युवक के प्यार में पड़ गई इतना ही नहीं माधुरी गुप्ता ने इस्लाम तक कबूल कर लिया
       इंटेलिजेंस की नजर माधुरी गुप्ता पर और तेज हो गई उनके ईमेल और फोन सर्विलांस पर लगा दिए गए तब पता चला कि माधुरी गुप्ता जमशेद के प्यार में देशद्रोही बन गई है और वह भारत की गुप्त सूचनाएं जमशेद को बता रही हैं
      दरअसल जमशेद ISI का जासूस था ISI ने ही उसे ट्रेनिंग देकर माधुरी गुप्ता को फंसाने के लिए लगाया था , क्योंकि ISI को जब पता चला कि 52 साल की उम्र में माधुरी गुप्ता अविवाहित है, तो उन्हें जरूर उन्हें किसी साथी की तलाश होगी ।
       उसके बाद उन्हें बहाने से भारत बुलाया गया और दिल्ली उतरते ही गिरफ्तार कर लिया गया उन्होंने जब सब सबूत देखा तब जुल्म स्वीकार किया उन्हें 3 साल की सजा हुई ।
     लेकिन कोविड महामारी के दौरान कुछ समय के लिए उन्हें जेल से जमानत मिल गई और वह गुमनामी में अजमेर चली गई,  और फिर खबर आई की गुमनामी में ही माधुरी गुप्ता का निधन हो गया,  उसे कोविद डायबिटीज और दूसरी कई बीमारियां एक साथ हो गई ।
     उसका अंतिम संस्कार भी मोहल्ले वालों ने और नगर निगम ने किया उसके मरने के बाद ना तो कोई रोने वाला था ना कोई दूसरे और संस्कार करने वाला था ।

     ये सत्य और बीती कहानी शेयर करने का मुद्दा और सोचने की बात ये है कि इतनी पढ़ी-लिखी और इतने वरिष्ठ पद पर तैनात 52 साल की मेच्योर महिला भी लव जिहाद में फंस जाती है,     
         तो फिर हम चौदह पन्द्रह सोलह साल की मासूम बच्चियों से कैसे उम्मीद करें कि वो किसी मकड़जाल में न फंसे ❓
     हर बार लवजेहाद की हर घटना पर और लव-जेहाद में हत्या पर ज्यादातर प्रतिक्रिया यही होती है कि , अच्छा हुआ, हमें उससे कोई हमदर्दी नहीं ,
     जबकि हम हिन्दुओं का लगभग रोज ऐसी घटनाओं से सामना हो रहा है ।

     कब तक बचेंगे ये कहकर कि अच्छा हुआ
कब तक अपराधी पक्ष हमारे ये कहने के कारण हौसले बुलंद रखेगा ? कब तक हम एक शिकार को ही अपराधी मनाकर अपने आप न्यायाधीश बने रहेंगे कि , क्योंकि उसने ऐसा किया था तो उसको सजा मिल गई?

       कब तक हम हैवानों के लिए कहते रहेंगे कि उनसे बचकर रहो।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

*जिस दिन तुम अपनी सब इच्छाएं छोड़ दोगे, अचानक तुम पाओगे, तुम्हारे पास विराट ऊर्जा है!!*

मैंने सुना है, एक अमीर आदमी के पास एक गरीब आदमी मिलने गया। वह अमीर आदमी ने अपने पास एक सोने का पीकदान रखा हुआ था। लाखों रुपए का होगा; उस पर हीरे जड़े थे। और वह उसमें बार—बारपान की पीक यूक रहा था।वह गरीब को बड़ा दुख हुआ, उसे बड़ा क्रोध भी आया। जिंदगीभर परेशान हो गया वह लक्ष्मी की तलाश करते—करते। आखिर उससेन रहा गया, उसने एक लात मारी पीकदान में और कहा, ससुरी! यहां थुकवाने को बैठी है। हम जिंदगीभर पीछे पड़े रहे, प्रार्थना की, पूजा की, सपने में भी दर्शन न दिए।वह अमीर आदमी हंसने लग गया। उसने कहा, ऐसी ही दशा पहले हमारी भी थी। जब तक हम भी पीछे लगे फिरे, कुछ भी हाथ न आया। जब से हम मुड़ गए और जब से हम पीछे फिरना छोड़ दिए, चीजें अपने आप चली आती हैं।तुम्हारी सब इच्छाएं जब तुम छोड़ दोगे, अचानक तुम पाओगे, तुम्हारे पास विराट ऊर्जा है। तब तुम इच्छा न करना चाहोगे और इच्छाशक्ति होगी।जब तुम विचार न करना चाहोगे, तब विचारशक्ति होगी।जब तुम जीना न चाहोगे, तब तुम्हारे पास अमर जीवनहोगा।जब तुम मिटने को राजी होओगे, तुम्हें मिटाने वाली कोई शक्ति नहीं।जब तुम सबसे पीछे खड़े हो जाओगे, तुम सबसे आगे होजाओगे।जीसस ने कहा है, जो यहां सबसे पीछे हैं, वे मेरे प्रभु के राज्य में प्रथम हो जाते है। और लाओत्सु ने कहा है, मुझे कोई हरा न सकेगा, क्योंकि मुझे जीत की कोई आकांक्षा नहीं है।ऐसी विजय अंतिम हो जाती है, परम हो जाती है। जीवन का यह सूत्र बड़ा बहुमूल्य है। जिसने इसे जाना, उसने बहुत कुछ जाना। और जो इसे चूकता रहा, वह जीवन के आसपास चक्कर मारता रहेगा भिखमंगे की तरह, वह कभी इस महल में प्रवेश न पा सकेगा।
~PPG~