Posted in જાણવા જેવું

कुतुब मीनार मुगलों में बनाया था,
ये नाम भी उनके ही बाप दादाओं के लिखे हैं…..

#गुप्त सम्राट चंदगुप्त विक्रमादित्य द्वारा स्थापित महरौली का लौह स्तंभ 
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विष्णु स्तम्भ (कुतुब मीनार टॉवर) के पास, शुद्ध लोहे से बना यह लौह स्तंभ है।
इसमें 99.72% लोहा, शेष 0.28% अशुद्धियाँ हैं।
यह स्तंभ महान गुप्त सम्राट चंदगुप्त विक्रमादित्य दितीय ने अपनी शकों पर विजय के उपलक्ष्य में स्थापित किया था।
इस लौह स्तंभ में आज 1600 वर्ष बीत जाने के बाद भी जंग नहीं लगी है यह लौह स्तंभ गुप्तकाल में हुए वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रगति का घोतक है।

इस कोलोसस का वजन 6.8 टन है।
निचला व्यास 41.6 सेमी है, शीर्ष पर यह 30 सेमी तक बढ़ता है। स्तंभ की ऊंचाई 7.5 मीटर है।

आश्चर्यजनक बात यह है कि वर्तमान में धातु विज्ञान में शुद्ध लोहे का निर्माण एक बहुत ही जटिल विधि और कम मात्रा में होता है, लेकिन लोहा इतनी शुद्धता का होना आज के युग में असम्भव है।

इस लौह स्तंभ में जंग क्यों नहीं लगता इसका कारण जानने के लिए IIT कानपुर के प्रोफेसर ने 1998 में एक प्रयोग किया,
IIT के प्रोफेसर डॉ. बालासुब्रमण्यम ने स्तम्भ के लोहे की मटेरियल एनालिसिस की,
इस विश्लेषण में पता चला कि स्तम्भ के लोहे को बनाते समय पिघले हुए कच्चा लोहा (Pig iron) में फ़ास्फ़रोस तत्व (Phosphorous) मिलाया गया था,
इससे आयरन के अणु बांड नहीं बन पाए,
जिसकी वजह से जंग लगने की गति हजारों गुना धीमी हो गयी I

आश्चर्य की बात यह है कि हमारे पूर्वजों को फ़ास्फ़रोस के जंगरोधी गुण के बारे में कैसे पता चला,
फ़ास्फ़रोस के जंग रोधी गुणों का पता तो आधुनिक काल में चला है,
दुनिया भर में यह माना जाता है कि फ़ास्फ़रोस की खोज सन 1669 में हेन्निंग ब्रांड ने की,
मगर यह स्तंभ तो 1600 वर्ष से अधिक पुराना है I

मतलब यही हुआ कि पुरातन काल में भारत में धातु-विज्ञान (Metallurgy) का ज्ञान उच्चकोटि का था,
सिर्फ दिल्ली ही नहीं धार, मांडू, माउंट आबू, कोदाचादरी पहाड़ी पर पाए गये लौह स्तम्भ, पुरानी तोपों में भी यह जंग-प्रतिरोधक (Anti-rust) क्षमता पाई गयी है,

दिल्ली का यह लौह स्तम्भ (Iron Pillar)हमारे लिए गौरव का प्रतीक है और हमारे महान इतिहास का प्रत्यक्ष प्रमाण है I

इस अद्भुत स्तंभ की तकनीकी को आधुनिक युग में प्राप्त करना असंभव है।

#VinitHindu

Posted in हिन्दू पतन

प्रिय संजय लीला भंसाली जी
आप हीरा मंडी पर फ़िलम बनाये थे* सर- उस से बढ़िया टॉपिक है मेरे पास। बहुत मसाला है एक वेब सीरीज के लिए।

मुग़ल शहज़ादियाँ
आपकी सहूलियत के लिए सैंपल एपिसोड की कहानी भी दे रहा हूँ।

१- रोजबॉडी
बाबर की लड़की गुलबदन बेगम की कहानी जो मुग़ल ज़माने की रोमिला थापर थी। गप्पी खूसट बुढ़िया- अकबर की बुआ। नाम से ही पता लगता है सरल सलिल मैगज़ीन की किसी थर्ड ग्रेड कहानी की नायिका होगी। इसका रोल किसी बुझी हुई डोकरी से करवाना- जया बच्चन सही रहेगी।

२- आराम बानो बेगम
अकबर की बेटी- दौलत शाद से पैदा हुई।  जहांगीर की ऐसी बहन जिसे जहांगीर ने कभी हरम से बाहर ना जाने दिया। इस शहज़ादी ने ताउम्र केवल आराम फ़रमाया। सोनाक्षी सिन्हा परफ़ेक्ट रहेगी आराम करके फैली हुई शहज़ादी।

३- जहाँनारा बेगम
शाहजहाँ की बेटी और शाहजहाँ की बादशाह बेगम। शाहजहाँ के लगाये पेड़ का फल जिसे शाहजहाँ ने ख़ुद चखा। मुमताज़ और जहाँनारा के डबल रोल में स्वरा भास्कर ठीक रहेगी। क्या है- बाद में औरंगज़ेब ने भी इसकु अपनी बादशाह बेगम बनाया। टी

४- रोशन आरा बेगम
एक साथ ग्यारह आदमियों के साथ चट्टे बट्टे खेलती पकड़ी गई शहज़ादी जिसे बढ़िया शराब बढ़िया कबाब और बढ़िया आदमी का शौक़ था। ताउम्र कुँवारी रहने के लिए मजबूर कर डाला इसे भी औरंगज़ेब ने । इसे किरदार के लिए हुमा क़ुरैशी को नोष फ़रमाए जनाब।

५- ज़ेबुनिस्सा बेगम
औरंगज़ेब की बदकिस्मत बेटी जो शायर थी और केवल एक बोसा के कारण निकाह ना कर पाई। इस रोल के लिए कोई फ्रेश फेस ढूँढ लेना । ये मुग़लिया रिपोर्टर की पर्सनल फ़ेवरिट है।

५- हज़रत बेगम
रंगीला की वो बेटी जिसे अब्दाली उठा कर ले गया- बेचारी सोलह बरस की शहज़ादी जिसे अफ़ग़ानियों ने ना बख्शा। श्रद्धा कपूर परफ़ेक्ट फिट रहेगी।

इस वेबसेरीज़ में मसाला है, से** है, साज़िश है- बॉलीवुड के प्रिय नरभोगी वाले बादशाह है- बड़े महल है , डिज़ाइनर ड्रेस है। सब कुछ है जो तुम लोग किसी भी फ़िल्म में दिखाते हो। वेरफ़ाईड इतिहास है जनाब।

भंसाली जी- कहाँ मनगाढत कहानियों पर पैसा बेकार कर रहे हो। इस पर बनाओ। दस मुग़ल शहज़ादियाँ रेडी है जो हीरा मंडी को टोटल फेल कर देंगी।

थोक में कहानियों के रेट लगा देंगे। रस्ते का माल सस्ते में।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पैठण में एकनाथ महाराज के स्थान से गोदावरीजी को जाने वाले रास्ते में एक जगह एक धर्मशाला-सी है।वहाँ एक यवन रहा करता था। वह उस रास्ते से आने-जाने वाले हिन्दुओं को बहुत तंग किया करता था। एकनाथ महाराज जब स्नान करके लौटें तब वह इनके ऊपर पिचकारी छोड़े। इससे महाराज को किसी-किसी दिन चार-चार पाँच-पाँच बार स्नान करना पड़े। जहाँ वह स्नान करके लौटने लगे कि यह उन्मत्त मनुष्य फिर उन पर थूके और महाराज फिर गंगा-स्नान करने जायँ। इस बदमाशी से कोई भी आदमी चिढ़ जाता।

चिढ़ना भी बिलकुल स्वाभाविक था, पर एकनाथ महाराज की शान्ति ऐसी विलक्षण थी कि बार-बार एकनाथ महाराज ‘मातर्गंगे !’ कहकर वन्दन करके आनन्द से स्नान करें और धन्यवाद दें उस यवन को यह कहकर कि इसकी कृपा से मेरे इतनी बार स्नान हो जाते हैं। एक दिन तो यह बात हुई कि वह यवन उस मौके पर नहीं था, पर नाथ उसका नियम भंग न हो इस खयाल से कुछ काल तक उसकी राह देखते हुए वहाँ ठहर गये। कुछ काल प्रतीक्षा करके उसके आने का कोई लक्षण नहीं देखा तब आगे बढ़े।

एक बार वह यवन अत्यन्त उन्मत्त होकर महाराज के बार-बार स्नान करके लौटने पर उनकी देह पर बार-बार थूकता ही रहा। वह थूकता जाय और महाराज स्नान करते जायँ, इस तरह कहते हैं कि एक सौ आठ बार हुआ। तथापि महाराज की शान्ति भंग नहीं हुई। उन्मत्त क्रोध और शान्त सहिष्णुता का यह द्वन्द्व देखने के लिये हजारों लोग वहाँ जुटे थे। अन्त को यवन थक गया। लज्जित हुआ। महाराज के चरणों पर लोट गया। यवन ने महाराज के महात्मापन की बड़ी स्तुति की। इतने पर भी वह अपनी मसजिद पर अपने चार बार नमाज पढ़ने की तारीफ करने से बाज न आया। तब महाराज ने हँसकर कहा-

मसजिदमें ही जो अल्लाह खड़ा। तो और स्थान क्या खाली पड़ा ? ॥
चारों वक्त नमाजों के । तो क्या और वक्त हैं चोरों के ? ॥
एका जनार्दन का बंदा । जमीन आसमान भरा खुदा ॥

तात्पर्य – अल्लाह यानी परमात्मा किसी एक जगह में ही बँधा नहीं, वह सब जगह मौजूद है। सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वसाक्षी है। सबका है, सबके हृदय में है और उसकी यथार्थ स्तुति यही हो सकती है कि मनुष्य उसका अखण्ड स्मरण करे, सब कुछ वही करता है, यह जाने और निरहंकार होकर रहे। यवन ने पहचाना कि एकनाथ महाराज बड़े औलिया हैं और तबसे वह उनके साथ बड़े विनय और नम्रता से पेश आने लगा..!!

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जब अयोध्या नष्ट होकर अपना अस्तित्व खो चुकी थी, तब साधु संत सम्राट विक्रमादित्य के पास आए हुए थे तो उन्होंने सम्राट से कहा कि यदि आप अयोध्या को पुनः बसा देंगे तो इतिहास आपको हमेशा याद रखेगा।

इच्छा तो विक्रमादित्य की भी बहुत थी लेकिन 100 साल पुराने तो पेड़ भी नही बचते तो हजारों साल पुरानी अयोध्या कैसे मिलती।

विक्रमादित्य ने साधुओं से साधारण रूप से कहा की “मैंने राजा रहते और भी बहुत काम किए है मुझे लगता है इतिहास मुझे यू भी याद रखेगा।”

इस पर साधुओं ने कुछ नही कहा, लेकिन सम्राट के एक नवरत्न कालिदास ने धीरे से कहा कि “सम्राट आप अयोध्या का क्या करते हैं, उसके लिए इतिहास आपको इन सबसे अलग याद करेगा।”

आखिरकार विक्रमादित्य ने जांच के आदेश दिए, वे अयोध्या को कृत्रिम रूप से बसाने की जगह उसके मूल स्थान को ढूंढकर बसाने के इच्छुक थे। सरयू नदी के आसपास के इलाको में अपार खुदाई हुई और आखिरकार प्राचीन अयोध्या के अवशेष मिले।

84 स्तंभ सेना ने ढूंढ निकाले, सम्राट विक्रमादित्य ने इन्ही के आधार पर निर्माण के आदेश दे दिए और महज चार कोस में अयोध्या बस गई। कालिदास की बाते सही थी, विक्रमादित्य ने अनेकों महान काम किए लेकिन राम मंदिर के लिए उन्हें अलग से याद किया जाता है।

जब 1527 में मुगलों के घोड़े अयोध्या पहुंचे और बाबर के सेनापति मीरबाकी ने मंदिर तोड़ने के आदेश दिए तो चार ब्राह्मण मंदिर के सामने खड़े हो गए, मुस्लिम सैनिकों ने उनके सिर काट दिए और मंदिर के बाहर की दीवार तोड़ दी।

हिंदू अपने समय के कारण असहाय था, अपनी आंखों के सामने मंदिर टूटता देखने को विवश था। जब मुस्लिम शिल्पियों ने मस्जिद के लिए दीवारे खड़ी करने की कोशिश की तो वो बारंबार गिरने लगी। मानो कोई दैवीय शक्ति बाबर को कुछ इशारा कर रही हो।

आखिरकार मीरबाकी ने मंदिर का शिखर तोड़कर उसे ही मस्जिद का आकार दे दिया, लेकिन मंदिर के स्तंभ चीख चीख कर गवाही दे रहे थे कि वो मस्जिद नही अपितु मंदिर है। बस वो वर्ष था और अब आज का वर्ष है कि राम राज्य का आदर्श स्थापित करने वाले राम को न्याय मिला।

निश्चिंत रहिए अब कोई बाबर नही आयेगा, आया भी तो ये 1528 का भारत नही बल्कि 2024 का सशक्त आत्मनिर्भर भारत है। बाबर को दिल्ली तो वैसे भी नही मिलनी, क्या पता उज़्बेकिस्तान भी हाथ से निकल जाए।

जय जय श्री राम

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एक राजा को पक्षी पालने का शौक था । पाले गए पक्षियों में चकोर उन्हें अत्यंत प्रिय था । वे उसे अपने हाथ पर बैठाये रहते और कहीं भी जाते तो साथ ही ले जाते ।

एक बार राजा वन में शिकार करने गए,  उनका घोड़ा दूसरे साथियों से आगे निकल गया,  वह वन में भटक गए,  बहुत प्यास सताने लगी ।

पानी की खोज में भटकते हुए उन्होंने देखा कि एक चट्टान की संधि से बूंद बूंद करके पानी टपक रहा है । राजा ने एक प्याला निकाला और टपकते पानी के नीचे रख दिया । कुछ देर में प्याला भर गया । राजा ने जैसे ही पीने के लिए उठाया,  कंधे पर बैठे चकोर ने उड़कर पंख मारकर प्याला लुढ़का दिया । राजा को बहुत क्रोध आया किंतु संयम रखकर प्याला पुनः रख दिया भरने के लिए ।  थोड़ी देर में प्याला फिर भरा इस बार भी जैसे ही पीने चले,  चकोर ने फिर पंख मारकर गिरा दिया । क्रोध के मारे राजा ने चकोर को पकड़ा और गर्दन मरोड़  दी ।

चकोर को नीचे फेंक कर उन्होंने सिर ऊपर उठाया तो सहसा उनकी दृष्टि चट्टान की संधि पर पड़ी । वहां एक मरा हुआ सर्प दबा हुआ था और उसके शरीर से स्पर्श करता हुआ यह पानी टपक रहा था । राजा कांप उठा, हाय ! जल पीकर में मर जाता । बेचारे पक्षी ने दो बार जल गिराया और मैंने क्रोध में उसी को मार डाला । राजा जीवन भर पश्चाताप की अग्नि में जलते रहे पर कुछ कर न सके ।

क्रोध का परिणाम हमेशा ही बुरा होता है । कई बार ऊपर से गलती दिखती है पर अंदर गुप्त कल्याण भी समाया रहता है । सहज गीता ज्ञान हमें वह गुप्त कल्याण देख पाने का नेत्र प्रदान करता है और यदि किसी से सचमुच गलती हो, तो भी उसे क्षमा करना ही श्रेष्ठ हथियार है । क्षमा का परिणाम कभी बुरा नहीं निकलता है ।

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સારાહ એક રેસ્ટોરન્ટમાં વેઇટ્રેસનું કામ કરતી હતી.
એક દિવસ રોજની જેમ રેસ્ટોરન્ટમાં આવેલા એક યુગલ સમક્ષ સારાહે ભોજનનું મેનુ મૂક્યું. પણ, તેના આશ્ચર્ય વચ્ચે, તે યુગલે મેનુ ખોલ્યા વગર જ ઓર્ડર કરવાનું શરુ કર્યું… અને કહી દીધું,
‘અમારી પાસે થોડાક જ પૈસા છે. છેલ્લા થોડા મહિનાથી અમે પૈસાની તંગી અનુભવી રહ્યા છીએ. માટે, તારી દ્રષ્ટિએ સૌથી સસ્તી બે ડીશ હોય તેનો ઓર્ડર લખી લે!’
સારાહએ ચહેરા પર સહેજે આનાકાનીનો ભાવ લાવ્યા વગર બે ઓછી કિમતની આઈટમ સૂચવી. તે યુગલ સારાહના સૂચન સાથે સહમત થઈ ગયું. તેઓ એ ઝટપટ ભોજન પતાવી લીધું અને ઉતાવળે સારાહ પાસે બિલ માગ્યું.
સારાહે બીલને બદલે તેમને એક કાગળ અને એક કવર આપ્યું. જેની પર લખ્યું હતું…
‘આજે મે મારાં અંગત એકાઉન્ટમાંથી તમારું બિલ ચૂકવી દીધું છે. તેને મારી ભેટ ગણશો. અને સાથે 100 ડોલરની એક નાનકડી ભેટ છે
… આપની સારાહ!’

તે યુગલ રેસ્ટોરન્ટ છોડી ગયું. પણ, સારાહનું આ નાનકડું કૃત્ય તેમને અઢળક ખુશી આપી ગયું. તે સમજી શકતા હતા કે એક વેઇટ્રેસ પોતાની નાણાકીય મર્યાદાઓ છતાં આવું અદભુત કાર્ય કરી શકે! તે યુગલને પણ ખુશી હતી અને સારાહને પણ ખુશી હતી એક નાની મદદ કરવાની!

સારાહ કોઈ શ્રીમંત નહોતી. તેના ઘરે  તેનું જુનું વોશિંગ મશીન બગડી ગયું હતું, નવું ઓટોમેટિક વોશિંગ મશીન લેવા ઈચ્છતી હતી. તે માટે એકાદ વર્ષથી પૈસા બચાવી રહી હતી. આમ છતાં તે પૈસામાંથી તેણે પેલા યુગલના જીવનમાં ખુશીથી ભરવાનું નક્કી કર્યું.

તેને સૌથી વધુ આઘાત ત્યારે લાગ્યો કે જયારે તેની ખાસ સહેલીએ તેને આ કામ માટે શાબાશી આપવાને બદલે ખખડાવી નાખી! તેનું કહેવું હતું કે પોતાની અગ્રતાઓ બાજુએ મૂકી આમ બીજાને મદદ ના કરાય! વાત પણ વ્યવહારુ હતી.

પણ, તે સમયે જ સારાહ પર તેના મમ્મીનો ફોન આવ્યો… તે ઉત્તેજિત હતી, તેણે જોરથી બુમ પાડતા આવાજે પૂછ્યું…
‘સારાહ તે આ શું કર્યું?’
સારાહે ગભરાતા અવાજે કહ્યું..
‘મમ્મી, મે? મે તો કશું નથી કર્યું, કેમ શું થયું?’
અરે…. ‘હે દીકરી તને ખબર નથી?
પેલા લોકો કે જેને તે મદદ કરી હતી તેમણે આ વાત ફેસબુક પર પોસ્ટ કરી છે, તે વાયરલ થઈ છે અને ફેસબુક તારા વખાણથી ઉભરાઈ રહ્યું છે!’ મમ્મીએ ઉત્તેજિત અવાજે કહ્યું.
અને સહેજ ભીના અવાજે ઉમેર્યું, બેટા મને તારા માટે સાચે જ ગર્વ છે!

તે પછી તો તેના પર પરિચિતો, મિત્રોના ઢગલો ફોન આવવાના શરુ થયાં. સોશિયલ મીડિયા પર વાયરલ થયેલી સ્ટોરીએ ગજબ કામ કર્યું. હવે, અખબાર અને ટીવી ચેનલોએ તેનો સંપર્ક કરવાનું શરુ કર્યું હતું.

બે ત્રણ દિવસ બાદ સારાહે એક અતિ લોકપ્રિય ટીવી શો માટે આમત્રિત કરી. અને તે ટીવી ચેનલ તરફથી સારાહ ને 10000 ડોલરનો પુરસ્કાર આપ્યો.!! ઉપરાંત, શોને સ્પોન્સર કરતી કંપની દ્વારા આધુનિક વોશિંગ મશીન, નવો ટીવી સેટ, અને 5000 ડોલરના મૂલ્યની ઇલેક્ટ્રોનિક આઈટમોનું ગિફ્ટ હેમ્પર પણ આપ્યું!!
આવી અસંખ્ય ભેટોનો ધોધ વરસ્યો જેનું મૂલ્ય એક લાખ ડોલરથી વધુ હતું!

બે સસ્તી જમવાની ડીશ અને 100 ડોલરની કોઈ વળતળની અપેક્ષા વગર આપવામાં આવેલી મદદથી સારાહનું જીવન ખુશીઓથી ભરાઈ ગયું!!!

તમારે જેની જરૂર નથી તે આપવું તે સાચું દાન નથી!
દાન એ છે કે *જેની તમને જરૂર છે પણ બીજા કોઈને તેની વધુ જરૂર છે!*

ખરી ગરીબાઈ નાણાની નથી, પણ માનવતા અને ઉદાર અભિગમની છે!

આવો, ખુશી વહેંચીએ, ખુશ રહેવાનો અને સુખી થવાનો આ સૌથી આસાન રસ્તો છે!!!

ગુજરાતી અનુવાદક: મેહુલ ભટ્ટ

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ગેસ્ટ હાઉસ કૌભાંડની વાત… પછી માયાવતીએ ક્યારેય સાડી પહેરી ન હતી.

બસપાના ધારાસભ્યો  માર મારવામાં આવ્યો હતો

મામલો 2 જૂન 1995નો છે.  રાજ્યમાં એસપી-બસપા ગઠબંધનની સરકાર હતી.  મહાગઠબંધન તોડવા માટે બસપા સ્ટેટ ગેસ્ટ હાઉસમાં બેઠક કરી રહી હતી.  ત્યારબાદ સપાના ધારાસભ્યો અને સમર્થકો પહોંચ્યા.  તેઓ લડવા લાગ્યા.

બસપાના ધારાસભ્યોને ઉપાડી  વાહનોમાં ભરવા  લાગ્યા.  માયાવતી સાથે ખરાબ વર્તન કર્યું.  માયાવતીએ પોતાને એક રૂમમાં બંધ કરી દીધા હતા.

4 કલાક પછી જ્યારે રૂમ ખુલ્યો ત્યારે યુપીના રાજકારણના કપાળ પર ગેસ્ટ હાઉસ કૌભાંડ નામનું કલંક લાગી  ગયું જે આજ સુધી ભૂંસી શકાયું નથી.

2 જૂને લખનૌના મીરાબાઈ સ્ટેટ ગેસ્ટ હાઉસમાં જે બન્યું તે અચાનક નથી બન્યું.  તેની સ્ક્રિપ્ટ એક વર્ષ પહેલા લખવાની શરૂ થયેલ.

જ્યારે ભાજપને રોકવા માટે સપા-બસપા એક થઈને સરકાર બનાવી…

6 ડિસેમ્બર 1992ના રોજ જ્યારે બાબરી મસ્જિદ પડી ભાંગી ત્યારે કેન્દ્ર સરકારે કલ્યાણ સિંહ સરકારને બરતરફ કરી દીધી હતી.  1993માં ચૂંટણી યોજાઈ હતી.

ભાજપની લોકપ્રિયતાથી વાકેફ, સપા અને બસપાના નેતાઓએ સાથે મળીને ચૂંટણી લડવાનો નિર્ણય કર્યો.  મુલાયમ સિંહે 256 બેઠકો પર ઉમેદવારો ઉભા રાખ્યા હતા.  109 જીત્યા.

કાંશીરામે 164 ઉમેદવારો ઉભા રાખ્યા અને તેમાંથી 67 જીત્યા.  ભાજપે 177 બેઠકો જીતી હતી જે બહુમતીના 212ના આંકડાથી ઘણી દૂર હતી.  ધ્યાનમાં રાખો કે તે સમયે યુપી-ઉત્તરાખંડ એક હતા અને બેઠકોની સંખ્યા 422 હતી.

સપા અને બસપાએ મળીને સરકાર બનાવી.  શરૂઆતમાં સરકાર યોગ્ય ચાલી.  મંડલ કમિશનનો અહેવાલ અને સરકારી નોકરીઓ અને શૈક્ષણિક સંસ્થાઓમાં દલિતો અને પછાત જાતિઓ માટે અનામત માટેનું સમર્થન એ બંને પક્ષોને જોડતો સિદ્ધાંત હતો.

સરકારની રચના બાદ કાંશીરામે માયાવતીને યુપીની જવાબદારી સોંપી અને પોતે અન્ય રાજ્યોમાં પાર્ટીનો વિસ્તાર કરવા લાગ્યા.   કાંશીરામ સીએમને ફોન કરીને રાહ જોવડાવતા, પછી લુંગી પહેરીને તેમને મળવા જતા – અજય બોઝ માયાવતીના જીવન પર લખાયેલા પુસ્તક ‘બહેનજી’માં લખે છે, “કાંશીરામ ક્યારેય મુલાયમને મળવા જતા ન હતા.

તેમણે આગ્રહ કર્યો કે મુલાયમ સિંહે તેમને રાજ્યના અતિથિ ગૃહમાં મળવા આવે.  જ્યારે પણ મુલાયમ આવતા ત્યારે કાંશીરામ અમને અડધો કલાક રાહ જોવડા  અંતે, તે ખૂબ જ બેદરકારીથી ગંજી અને લુંગી પહેરીને નીચે મળવા આવતા.  મીડિયાના કેમેરાને કારણે મુલાયમની ખચકાટ વધી.” પંચાયત ચૂંટણીમાં જ્યારે બસપા હારી અને સપા જીતી, ત્યારે અંતર વધ્યું – રાજ્યમાં 1995માં પંચાયતની ચૂંટણી યોજાઈ હતી. 50 જિલ્લામાંથી 30માં સપાનો વિજય થયો હતો. 9માં ભાજપ, પાંચમાં કોંગ્રેસ અને બસપાને માત્ર એક બેઠક મળી હતી.

આ પરિણામથી સ્પષ્ટ થઈ ગયું કે સપા-બસપા ગઠબંધનમાં માત્ર સપાને જ ફાયદો થયો છે.  અહીંથી બંને પક્ષો વચ્ચેનો વિવાદ ઉગ્ર બન્યો હતો.  એક તરફ મુલાયમ સિંહે બસપાના ધારાસભ્યોને પોતાની તરફ આકર્ષવા માંડ્યા.  બીજી તરફ બસપા ભાજપના સંપર્કમાં આવવા લાગી.  હવે વાત કરીએ ગેસ્ટ હાઉસની ઘટનાની…
1 જૂન 1995ના રોજ મુલાયમ સિંહને સમાચાર મળ્યા કે બસપા સમર્થન પાછું ખેંચી લેશે.  માયાવતી તત્કાલીન રાજ્યપાલ મોતીલાલ વોરાને મળ્યા હતા અને ભાજપની મદદથી સરકાર બનાવવાનો પ્રસ્તાવ મૂક્યો હતો.  મુલાયમ ગુસ્સાથી લાલ થઈ ગયા.

બસપાના પ્રદેશ અધ્યક્ષ રામ બહાદુરને તેમની બાજુમાં લેવામાં આવ્યા હતા.  તેમની સાથે 15 વધુ ધારાસભ્યો પણ આવ્યા હતા.  પરંતુ પક્ષપલટા વિરોધી કાયદો ટાળવા માટે, એક તૃતીયાંશ સભ્યોની જરૂર હતી, એટલે કે 8 વધુ ધારાસભ્યોની જરૂર હતી.

અજય બોઝ સમજાવે છે, “કાંશીરામ હોસ્પિટલમાં હતા ત્યારથી મુલાયમ સિંહને ખાતરી હતી કે સરકાર ચાલુ રહેશે.  કારણ કે બસપાના ઘણા ધારાસભ્યો પહેલેથી જ તેમના ખિસ્સામાં હતા.  પરંતુ જ્યારે સમર્થન પાછું ખેંચવાની વાત આવી ત્યારે બીએસપીના વધુ ધારાસભ્યોને ડરાવી-ધમકાવીને સપા  તરફ લાવવાનો નિર્ણય લેવામાં આવ્યો હતો.  2 જૂન 1995ના રોજ માયાવતી મીરાબાઈ સ્ટેટ ગેસ્ટ હાઉસમાં પાર્ટીના ધારાસભ્યો અને સાંસદો સાથે મીટિંગ કરી રહી હતી.

તે સમયે તે આ ગેસ્ટ હાઉસના રૂમ નંબર 1માં રહેતી હતી.  તમામ ધારાસભ્યો કોમન હોલમાં બેઠા હતા.  લગભગ 200 સપા કાર્યકરો અને ધારાસભ્યો ગેસ્ટ હાઉસ પહોંચ્યા ત્યારે ચાર વાગ્યા હતા.  તેમની પ્રથમ પંક્તિ હતી, “ચમાર  પાગલ થઈ ગયા છે.”  તેઓએ ધારાસભ્યોને ઉઠાવી લીધા અને સપાના કાર્યકરો તેમની સાથે માર પીટ કરી રહ્યા હતા.   જ્યારે બસપાના ધારાસભ્યોએ મુખ્ય દ્વાર બંધ કરવાનો પ્રયાસ કર્યો ત્યારે ગુસ્સે ભરાયેલા ટોળાએ તેને તોડી નાખ્યો હતો.  આ પછી બસપાના ધારાસભ્યોને હાથ, લાતો અને લાકડીઓથી મારવાનું શરૂ થયું.

મારપીટ દરમિયાન ધારાસભ્યોને મુલાયમ સિંહને સમર્થન આપવા માટે એક એફિડેવિટ પર સહી કરાવવા માટે કહેવામાં આવી રહ્યું હતું.  ધારાસભ્યો એટલા ડરી ગયા કે તેઓ કોરા કાગળો પર સહી કરવા લાગ્યા.  બસપાના પાંચ ધારાસભ્યોને બળજબરીથી વાહનમાં બેસાડવામાં આવ્યા હતા.  માયાવતી સાથે ગેર વર્તન શરૂ થયું.તો તે ભાગી ને  પોતાને એક રૂમમાં બંધ કરી દીધી  તેના સિવાય રૂમમાં વધુ બે લોકો હતા.  તેમાંથી એક સિકંદર રિઝવી હતો.  ઉપદ્રવ સર્જતા લોકોએ દરવાજો ખખડાવવાનું શરૂ કર્યું હતું.  તેઓ કહેતા હતા, “મોચી સ્ત્રીને તેના ગુફામાંથી ખેંચો.”

અંદરથી સિકંદર રિઝવીએ દરવાજા પાસે સોફા અને ટેબલ મૂક્યું, જેથી દરવાજો ખુલી ન શકે.  તે સમયે પેજરનો ઉપયોગ થતો હોવાની વહીવટી તંત્રને જાણ કરવામાં આવી હતી.  વરિષ્ઠ અધિકારીઓ ઘટના સ્થળે પહોંચી ગયા હતા.  એસએસપી કાર્યવાહી કરવાને બદલે સિગારેટ પી રહ્યા હતા, લખનૌના પોલીસ સુપરિન્ટેન્ડેન્ટ ઓપી સિંહ ગેસ્ટ હાઉસમાં આ ઘટના બની ત્યારે હાજર હતા.  પગલાં લેવાને બદલે તે માત્ર સિગારેટ પીતો જોવા મળ્યો હતો.  થોડા સમય બાદ ગેસ્ટ હાઉસમાં વીજળી અને પાણી પુરવઠો બંધ કરી દેવામાં આવ્યો હતો.  તેના પર આનો આરોપ પણ લાગ્યો હતો.  સરકારનો આદેશ હતો કે ધારાસભ્યો પર લાઠીચાર્જ નહીં થાય, જિલ્લા મેજિસ્ટ્રેટની સાથે એસપી રાજીવ રંજન ગેસ્ટ હાઉસ ખાલી કરાવવાનું શરૂ કર્યું.  પહેલા તેઓએ ધારાસભ્ય ન હતા તેમને હાંકી કાઢ્યા.  આ પછી, જ્યારે તેણે ધારાસભ્યોને બહાર કાઢવાનું શરૂ કર્યું, ત્યારે દલીલ થઈ.

સરકારે આદેશ આપ્યો હતો કે ધારાસભ્યો પર લાઠીચાર્જ ન થાય.  પરંતુ સ્થિતિ એવી હતી કે બળનો ઉપયોગ કરવો પડ્યો.  રાત્રે 9 વાગ્યાથી 11 વાગ્યા સુધી રાજ્યપાલ કાર્યાલય, કેન્દ્ર સરકાર અને ભાજપના વરિષ્ઠ નેતાઓએ આ મામલે દરમિયાનગીરી કરી અને ભારે સુરક્ષા દળો આવી પહોંચ્યા.  જ્યારે ભારે પોલીસ ફોર્સ આવી અને માયાવતીને લાગ્યું કે તે સુરક્ષિત છે, ત્યારે તે રૂમમાંથી બહાર આવી ગઈ.  માયાવતીને કોણે બચાવ્યા તે પ્રશ્ન પર વરિષ્ઠ પત્રકાર શરત પ્રધાન કહે છે કે ભાજપના નેતાઓએ તેમને બચાવ્યા.

જ્યારે આ ઘટના શરૂ થઈ ત્યારે મોટી સંખ્યામાં મીડિયા અહીં પહોંચી ગયું હતું.  સપાના લોકો તેમને હટાવવા માંગતા હતા, પરંતુ મીડિયા હટ્યું નહીં.  2 જૂનના રોજ, માયાવતી 39 વર્ષની વયે યુપીના મુખ્યમંત્રી બન્યા.  માયાવતીના બદલાયેલા ડ્રેસ અંગે છેલ્લી વાત
ગેસ્ટ હાઉસની ઘટના બાદ માયાએ ક્યારેય સાડી પહેરી નથી, 2 જૂન પહેલા માયાવતી ઘણીવાર સાડી પહેરેલી જોવા મળતી હતી, પરંતુ આ ઘટના પછી તેણે ક્યારેય સાડી પહેરી નથી.

ઘટના સમયે હાજર લોકોનું કહેવું છે કે તે સમયે બદમાશોના હાથ માયાવતીની સાડી સુધી પહોંચી ગયા હતા.  પરંતુ ન તો તેમણે તેમની આત્મકથામાં આવી કોઈ ઘટના વિશે લખ્યું કે ન તો તેમના પર પુસ્તકો લખનારાઓએ.

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सीखो ! ऐसे लिया जाता है आतंकवाद से बदला

मोसाद टारगेट को मारने से पहले बुके भेजती थी
जिसमें लिखा होता था ” ये याद दिलाने के लिए कि हम ना तो भूलते हैं ना ही माफ करते हैं” उसके बाद आतंकवादी के जिश्म में गिनकर 11 गोली दाग दी जाती थी।

75 साल की बूढ़ी महिला थी इजरायल की प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर। जिसने पूरी दुनियां को बताया कि इजरायल के नागरिकों पर हमला करने का अंजाम क्या होता है

5 सितंबर 1972 को जर्मनी में ओलंपिक खेलों के दौरान फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के आतंकवादियों ने इजरायल के 11 खिलाड़ियों को पराए मुल्क में मार डाला। पूरा देश इस घटना से गुस्से में था लोग दुखी थे। लेकिन इजराइल की दादी मां गोल्डा मेयर ने छाती नहीं पीटी वो बूढ़ी औरत रोइ नहीं बल्कि उसने ऐसा कुछ किया कि फलस्तीनी आतंकी तो क्या दुनियां भर के आतंकवादी दहल गए।

गोल्डा मेयर के आदेश पर इजरायली सेना ने अपने खिलाड़ियों की हत्या के महज 48 घण्टे में सीरिया और लेबनान में घुसकर फलस्तीन के 10 कैम्पों पर एयर स्ट्राइक कर 200 आतंकियों और आम लोगों को मौत के घाट उतार दिया।

बूढ़ी गोल्डा मेयर यहीं नहीं रुकी, 200 मौतों के बाद भी उसके दिल में बदले की आग शांत नहीं हुई।
इसके बाद गोल्डा मेयर ने जो किया उसने पूरी दुनियां को हिलाकर रख दिया। गोल्डा मेयर ने इजरायली खिलाड़ियों का बदला लेने के लिए ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉड छेड़ दिया। और इसकी जिम्मेदारी दी इजरायल की सबसे खुंखार खुफिया एजेंसी मोसाद को।

मोसाद ने अगले 7 साल तक दुनियां भर में खोज खोज कर अपने खिलाड़ियों के हत्याकांड से जुड़े सभी 35 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया।
मोसाद टारगेट को मारने से पहले बुके भेजती थी
जिसमें लिखा होता था ” ये याद दिलाने के लिए कि हम ना तो भूलते हैं ना ही माफ करते हैं” उसके बाद आतंकवादी के जिश्म में गिनकर 11 गोली दाग दी जाती थीं। 11 गोलियां इसलिए कि आतंकियों ने इजरायल के 11 खिलाड़ी मारे थे।

मोसाद ने आगे 20 साल तक ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉड चलाया था। और दुनियां भर में फैले फलस्तीनी आतंकियों को ठिकाने लगाती रही। इसलिए गोल्डा मेयर को आयरन लेडी कहा गया, जो इजरायल की दादी मां थी।
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નેહરુ હંમેશા શોર્ટ ટેમ્પર હતા…

  જો તેનું સહેજ પણ ધાર્યું ન થાય તો  તરત જ ગુસ્સે થઈ જતા..!

  1962ની શરમજનક હાર બાદ દેશે તેમને ગંભીરતાથી લેવાનું બંધ કરી દીધું હતું.

  તેમના સૌથી પ્રિય મિત્ર કૃષ્ણ મેનન… નેહરુ કરતાં વધુ કટ્ટર સામ્યવાદી હતા!   કહેવાતી આઝાદી પહેલા પણ કૃષ્ણ મેનને નેહરુને પોતાની જાળમાં બાંધ્યા હતા.

  માઉન્ટબેટન અને કૃષ્ણ મેનન બે લોકો હતા, જેમણે
  કાશ્મીરનો મુદ્દો યુનોમાં લઈ જવા માટે નેહરુને  સમજાવ્યા હતા!
  1948 માં, જ્યારે નેહરુ દ્વારા એકપક્ષીય યુદ્ધવિરામ લેવામાં આવ્યો, ત્યારે ભારત ધાર પર હતું, કાશ્મીરમાં પાકિસ્તાન દ્વારા છીનવી લેવામાં આવેલી જમીન… આપણી  સેના ફરીથી નિયંત્રણ મેળવવાના માર્ગ પર હતી.

  આવી સ્થિતિમાં નેહરુ પોતે અચાનક સાંજે 5 વાગ્યે ઓલ ઈન્ડિયા રેડિયો પહોંચ્યા અને એકતરફી યુદ્ધવિરામની જાહેરાત કરી.

  કેટલાક વિસ્તારોમાં પાકિસ્તાની સેના ભાગી ગઈ હતી.

  પરંતુ યુદ્ધવિરામ સમાપ્ત થતાંની સાથે જ પાકિસ્તાનીઓ તે જગ્યા પર પાછા ફર્યા અને તેને ફરીથી કબજે કરી લીધો.   કૃષ્ણ મેનન વૈભવી સ્વભાવના વ્યક્તિ હતા,

  મેનનની ઈચ્છા મુજબ નેહરુએ મેનનને ભારતના હાઈ કમિશનર તરીકે લંડન મોકલ્યા…

  આખા ઈંગ્લેન્ડ અને યુરોપના સામ્યવાદીઓએ લંડનના ઈન્ડિયા હાઉસમાં કેમ્પ નાખવાનું શરૂ કર્યું.

  આખરે બ્રિટિશ સરકારે ભાગ્યે જ નેહરુને કૃષ્ણ મેનનને ભારત પાછા મોકલવા સમજાવ્યા.   આવા નકામા કૃષ્ણ મેનનને રક્ષા મંત્રી બનાવવામાં આવ્યા… ભારતે ઈંગ્લેન્ડ પાસેથી 80 લાખ રૂપિયામાં 200 સેકન્ડ હેન્ડ જીપ ખરીદી… 8000000 રૂપિયા લઈને ઈંગ્લેન્ડે 155 સંપૂર્ણ ભંગાર જીપ ભારતમાં મોકલી, જેનો કોઈ ફાયદો થયો નહીં!

  નેહરુ આ કૌભાંડ આંધળી આંખે જોતા રહ્યા….

  જીપ કૌભાંડ થયું ત્યારે મેનન ભારતીય હાઈ કમિશનર હતા અને આ સોદાના પ્રણેતા હતા…

  પણ પાછળથી નેહરુએ આ મેનનને ભારતના સંરક્ષણ પ્રધાન બનાવ્યા… ચીને કાશ્મીરમાં 200 કિમીનો રોડ બનાવ્યો…

  નેહરુએ આટલી મોટી માહિતીની અવગણના કરી!

  1959થી આખી દુનિયાને ખબર હતી કે ચીન ભારત પર હુમલો કરશે… પરંતુ નેહરુ માઓ અને હિન્દી-ચીની ભાઈચારાના નારામાં મગ્ન હતા.

  અમેરિકાએ શસ્ત્રોની ઓફર કરી…
  નેહરુએ તેનો અસ્વીકાર કર્યો!
              
  ચીનની ધમકીને જોઈને અમેરિકી રાષ્ટ્રપતિ જેએફ કેનેડીએ ભારતને પરમાણુ શક્તિ બનવાની સલાહ આપી અને મદદની ઓફર કરી.

  નેહરુએ પણ આ સલાહને નકારી કાઢી હતી…તેઓ માનતા હતા કે તેમની (નેહરુની) સામ્યવાદી પૃષ્ઠભૂમિને જોતાં…

  માઓ ભારત પર હુમલો નહીં કરે!
    
  નેહરુ… ચીન અને રશિયા બંનેને મિત્ર માનતા હતા કારણ કે તેઓ સામ્યવાદી હતા… પરંતુ ચીને હુમલો કર્યો અને રશિયાએ શસ્ત્રો આપવાની ના પાડી!

  હજારો ભારતીય સૈનિકોને માર્યા પછી ચીને ભારતની 38 હજાર ચોરસ કિલોમીટર જમીન છીનવી લીધી… જેના માટે સંપૂર્ણપણે નહેરુ જવાબદાર હતા!

  પાછળથી અમેરિકાએ જ ભારતીય સેનાને શસ્ત્રો અને ગરમ વસ્ત્રો આપ્યાં… નેહરુ પોતાના પર એટલા મોહિત થઈ ગયા કે તેમણે મરતા સુધી વડાપ્રધાન પદની સાથે સાથે વિદેશ મંત્રીનું પદ પણ સંભાળ્યું!

  મતલબ કે ભારત પાસે પહેલા 17 વર્ષ સુધી વિદેશ મંત્રાલય નહોતું.

  હા, 17 વર્ષ સુધી ભારતને કોઈ વિદેશ મંત્રી નથી મળ્યા.
           
  નેહરુ અંતમાં વિચારવા અને નિર્ણયો લેવામાં અસમર્થ બન્યા, પરંતુ તેમણે વડા પ્રધાન પદ છોડ્યું નહીં.   ચાલવામાં અસમર્થ નેહરુ 27 મે 1964 ના રોજ સ્નાન કરવા માટે બાથરૂમમાં પ્રવેશ્યા, તેઓ ક્યારે અંદર પડ્યા અને બેભાન થઈ ગયા તેની કોઈને જાણ ન થઈ.

  દોઢ કલાક સુધી એ જ હાલતમાં બાથરૂમમાં પડી રહ્યા

  થોડા કલાકો પછી નેહરુના મૃત્યુની સત્તાવાર જાહેરાત કરવામાં આવી.   ભારત પર ખુલ્લેઆમ સામ્યવાદી શાસન પર હુમલો થયો…!

  પંડિત નેતન્યાહુ મિશ્રા

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सनातन संस्कृति में गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है और गुरु का गुणगान भी खूब किया है। साथ ही कहा गया है कि गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनकी सेवा और सत्यनिष्ठा जरूरी है। जो शिष्य अपने गुरू की आज्ञा का पालन दिल से करता है उसको दुर्लभ ज्ञान की प्राप्ति स्वत: हो जाती है। हम आपको महाभारत की एक ऐसी कहानी बता रहे हैं, जिसमें शिष्य ने गुरु की आज्ञाके पालन से कुछ ही समय में बरसों का ज्ञान प्राप्त कर लिया।
तक्षशिला में आयोदधौम्य नाम के ऋषि रहते थे। उनके एक प्रिय शिष्य का नाम था आरूणी। एक बार ऋषि ने आरूणि को खेत की मेड़ बांधने के लिए भेजा। आरूणि ने बहुत कोशिश की, लेकिन जब मेड़ को बांधते-बांधते थक गया तो पानी के बहाव को रोकने के लिए खुद लेट गया। आरूणि के लेटने से पानी रुक गया। काफी देर पश्चात ऋषि का ख्याल आया तो उन्होने अपने दूसरे शिष्यों से पूछा कि ‘आरूणी कहां गया है?’
तब शिष्यों ने कहा कि ‘आपने ही तो उसको खेत की मेड़ बांधने के लिए भेजा है। ‘तब गुरू आयोदधौम्य ने शिष्यों से कहा कि ‘काफी देर हो गई है चलो चलकर देखते हैं। ‘खेत पर पहुचकर ऋषि ने आरूणी को आवाज लगाई , तो आरूणी तुरंत ऋषि के सामने आया और उनको प्रणाम किया। ऋषि ने कहा ‘शिष्य तुम अभी तक कहां थे? और तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?’ तब आरूणी ने कहा कि ‘खेत की मेड़ बांधने में मैं असफल रहा था इसलिए मैने खुद लेटकर खेत में पानी के बहाव को रोका है। आपकी आवाज सुनकर आपकी सेवा में आया हूं आदेश किजिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं।
‘गुरू अपने शिष्य की भक्ति से बड़े प्रसन्न हुए और कहा कि ‘बेटा तुम मेड़ को उद्दलन( तोड़कर) कर ख़ड़े हुए हो इसलिए आज से तुम्हारा नाम उद्दालक होगा और तुमने अपने गुरू की आज्ञा का बड़ी सत्यनिष्टा के साथ पालन किया है, इसलिए तुमको वेद,पुराण और धर्मशास्त्र स्वत: ज्ञात हो जाएंगे।‘इस तरह से आरूणी आचार्य का आशीर्वाद पाकर अपने अभिष्ट स्थान पर चला गया और गुरु के आशीवार्द से वेद-शास्त्रों में पारंगत हो गया।