Posted in खान्ग्रेस, राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki, हिन्दू पतन



                       आज से तीन दिन पहले एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) ने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट, भास्कर रमण को गिरफ्तार किया है। 

हुआ यह की 2015 में एक रेड के समय ED को एक बैंक लाकर से चार वसीयत मिली थी। ये चारों वसीयत भास्कर रमण, सी बी ऐन रेड्डी, रवि विश्वनाथन, पद्मा विश्वनाथन नामक चार लोगों ने किया थी।

इन वसीयतों की खासियत यह थी की इन चारों वसीयत एक ही दिन 19 जून 2013 को की गई थी और सब वसीयतों का एक गवाह वी मुरली नामक व्यक्ति था और बाकी तीन वसीयत में सी बी ऐन रेड्डी, और एक में रवि विश्वनाथन भी था।

अब आते है इन वसीयतों की ख़ास बात पर जो दो भागों में बनी है। एक भाग में तो सारी जायदाद, धन, मकान, गहने आम वसीयतों की तरह पत्नी और बच्चों के नाम किया था लेकिन वसीयतों का दूसरा भाग विशेष खास है।

इस भाग में इन सबने दो कंपनियों ‘क्रिया एफएमसीजी’ और ‘एडवांटेज स्ट्रेटेजिक कंसलटेंट प्राइवेट लिमटेड’ (Advantage) के सारे शेयर एक लड़की अदिति जो सुपुत्री डॉ श्रीनिधि और पौत्री डॉ बी. रंगराजन की है। यह सारे शेयर अदिति के नाम इसलिये किये गये की यह लोग डॉ बी. रंगराजन को अपना आदर्श, मार्गदर्शक, फिलोसोफर, मानते थे और  उनके द्वारा समाज के लिये जो काम किया है उसके प्रशंसक है।

अब मृत्यु होने की स्थिति में इन दोनों कंपनी में जिसमे इनकी हिस्सेदारी 60% है स्वतः इस लड़की अदिति के नाम हो जाएगी। अब इन दो कम्पनियों के बाकी के 40% शेयर एक कंपनी ‘ऑस्ब्रिज़’ के पास है जिसके मालिक मोहनन राजेश है।इस एडवांटेज कम्पनी में क्या खास बात है? इस ‘एडवांटेज’ कंपनी भारत मे ‘वसन आई केअर’ की 60% हिस्सेदारी है जो उसने सिर्फ 50 लाख में खरीदी थी और बाकी की 40% इक्विटी, वसन आई केअर ने मॉरिशस की एक कम्पनी ‘सेकोइन कैपिटल’ को 45 करोड़ में बेच दी, जिससे असल मे वसन आई केअर में एडवांटेज की असली हिस्सेदारी, 67.50 करोड़ की हो गयी!  

मामला सिर्फ इतना ही नही है, इस ‘एडवांटेज’ की एक सब्सिडियरी सिंगापुर में है, जिसका नाम है  ‘एडवांटेज स्ट्रेटेजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड( एडवांटेज सिंगापुर) जिसके पास विश्व भर में अरबो की प्रॉपर्टीज हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि अंटार्टिका और आर्कटिक को छोड़ कर सभी जगह इसकी सम्पति है।

अब ऐसी बेतहाशा अमीर अमीर कम्पनी, जिसकी धन संपदा व सम्पतियाँ अरबों-खरबों में है, उसको भास्कर रमण और अन्य चार लोगों ने एक लड़की #अदिति (#पी.#चिदम्बरम_की_पोती) को सिर्फ इसलिये दान कर दी क्योंकि वे उसके नाना डॉ बी रंगराजन से बेहद प्रभावित थे!

अब इस प्यारी सी बच्ची का पूरा नाम भी जान लीजिये, उसका पूरा नाम है “#अदिति_नलिनी_चिदंबरम”  और उसके पिता का नाम है “#कान्ति_चिदंबरम”, माँ का नाम “#सुनिधि_चिदंबरम”  और इसके बाद अदिति के दादा.. (#P. #Chidambaram) का नाम लेने की जरूरत है? इसको आप ही गेस कर लीजिये।

इस पूरे खेल की कहानी यहीं पर नहीं समाप्त होती है। ‘एडवांटेज’ के 40 % के मालिक ‘ऑस्ब्रिज़’ के माध्यम से खरीदने वाले मोहनन राजेश, दरअसल में कान्ति चिदंबरम के पडोसी भी हैं।

कान्ति चिदंबरम ने मोहनन से ‘ऑस्ब्रिज़’ को 2006 में पहले खरीद लिया था लेकिन जब ‘वसन आई केअर’ को लेकर लोग काना फूसी करने लगे तो फिर 2011 में उसे वापिस मोहनन राजेश को ट्रांसफर कर दिया गया।

इस पूरे अरबों-खरबों के खेल को चलाने वाला कोई बुद्धिमान और शक्तिशाली आदमी ही होना चाहिये, जो इतना #बुद्धिमान और #शक्तिशाली हो जितना भारत का #वित्त_मंत्री बनने के लिये होना चाहिये।

आगे आने वाला समय बड़े उथल पुथल का समय है, #मोदी_ सरकार की हर काम पर जहां नज़र है वही सरकार पर भी #शक्तिशालियों की नज़र है।

यदि इस बार #सरकार_चूक_गई तो बहुत बुरा होगा, क्योंकि अभी भी अंदर के तन्त्र में पुराने अच्छे दिनों के वापिस आने की उम्मीद है।

साभार

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जावेद अख्तर-
इनके विषय में यह उल्लेखनीय है कि इनके पिता जां निसार अख्तर ने अपनी प्रथम पत्नी के देहांत के पश्चात, दो नन्हे बच्चों के होते हुए भी दूसरा निकाह कर लिया। इस निर्णय से उनके ज्येष्ठ पुत्र जावेद अख्तर इतने संतप्त हुए कि उन्होंने अपने पिता से बातचीत करना पूर्णतः त्याग दिया।
कालांतर में, मानो इसी का प्रतिशोध लेने के हेतु, जावेद अख्तर ने स्वयं अपनी प्रथम पत्नी को परित्याग कर दूसरा निकाह रचाया।
यह देखकर उनके पुत्र फरहान अख्तर के मन में भी तीव्र रोष जागा और उसने भी अपनी प्रथम पत्नी को तलाक देकर दूसरा निकाह कर लिया। उल्लेखनीय है कि जावेद अख्तर की प्रथम पत्नी तथा फरहान अख्तर की दोनों पत्नियाँ मुस्लिम समुदाय से नहीं थीं।
इस प्रकार, भले ही परोक्ष रूप में, किंतु गजवा-ए-हिंद की संकल्पना अपने ढंग से साकार होती प्रतीत होती है।

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भगवान शिव के अद्धभुत रहस्य (भाग – 2)

भगवान शिव अर्थात् पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है……………….
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1. आदिनाथ शिव………………….
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सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें ‘आदिदेव’ भी कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम ‘आदिश’ भी है।
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2. शिव के अस्त्र-शस्त्र……………..
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शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।
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3. शिव का नाग…………………
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शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।
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4. शिव की अर्द्धांगिनी………………….
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शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।
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5. शिव के पुत्र……………..
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शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।
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6. शिव के शिष्य…………
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शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- वृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।
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7. शिव के गण……………
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शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। शिवगण नंदी ने ही ‘कामशास्त्र’ की रचना की थी। ‘कामशास्त्र’ के आधार पर ही ‘कामसूत्र’ लिखा गया।
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8. शिव पंचायत………………..
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भगवान सूर्य, गणपति, देवी उमा, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
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9. शिव के द्वारपाल………………..
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नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।
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10. शिव पार्षद…………
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जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।
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11. सभी धर्मों का केंद्र शिव…………
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शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।
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12. बुद्ध के रूप में…………….
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बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।
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13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव……………..
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भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।

@everyone

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वीर सावरकर


२६ फरवरी –
स्वातन्त्र्यवीर वि. दा. सावरकर जी की पुण्यतिथि पर उनका पुण्यस्मरण और उनकी स्मृति में कोटि कोटि अभिवादन !

सावरकर जी ने प्रायोपाशन (भोजन और औषधियों का परित्याग कर) से इच्छामृत्यु का वरण किया था ।

१. सावरकर जी भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केन्द्र लन्दन में उसके विरुद्ध क्रांतिकारी आन्दोलन संगठित किया।

२. वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1905 के बंग-भंग के बाद सन् 1906 में ‘स्वदेशी’ का नारा दिया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई।

३. वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अंग्रेज़ राजा के एकनिष्ठा की शपथ नहीं ली, इसलिए  उनकी ‘बैरिस्टर’ की उपाधि छीन ली गयी ।

४. वे पहले भारतीय थे जिन्होंने ‘पूर्ण स्वतन्त्रता’ की मांग की।

५. वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ बताते हुए 1907 में लगभग एक हज़ार पृष्ठों का इतिहास लिखा।

६. वे भारत के पहले और दुनिया के एकमात्र लेखक थे जिनकी पुस्तक को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश साम्राज्य की सरकारों ने प्रतिबन्धित कर दिया था।

७. वे दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे जिनका मामला हेग के अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय में चला था।

८. वे पहले भारतीय राजनीतिक कैदी थे जिसने एक पूर्व-अछूत को मन्दिर का पुजारी बनाया था।

९. उन्होने बौद्ध धर्म द्वारा सिखायी गयी “अतिरेकी अहिंसा” की आलोचना करते हुए केसरी में ‘बौद्धों की अतिरेकी अहिंसा का शिरच्छेद’ नाम से शृंखलाबद्ध लेख लिखे थे।

१०. सावरकर, महात्मा गांधी की मुस्लिम-तुष्टिकरण और अतिरेकी अहिंसा के कारण उनके कटु आलोचक थे। उन्होने अंग्रेजों द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जर्मनी के विरुद्ध हिंसा को गांधीजी द्वारा समर्थन किए जाने को ‘पाखण्ड’ करार दिया।

११. सावरकर ने अपने ग्रन्थ ‘हिन्दुत्व’ के पृष्ठ 81 पर लिखा है कि – कोई भी व्यक्ति बगैर वेद में विश्वास किए भी सच्चा हिन्दू हो सकता है। उनके अनुसार केवल जातीय सम्बन्ध या पहचान हिन्दुत्व को परिभाषित नहीं कर सकता है बल्कि किसी भी राष्ट्र की पहचान के तीन आधार होते हैं – भौगोलिक एकता, जातीय गुण और साझा संस्कृति।

१२. सावरकर ने ही वह पहला भारतीय झंडा बनाया था, जिसे जर्मनी में 1907 की अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम कामा ने फहराया था।

१३. वे प्रथम क्रान्तिकारी थे जिन पर स्वतंत्र भारत की सरकार ने झूठा मुकदमा चलाया और बाद में उनके निर्दोष साबित होने पर उनसे माफी मांगी।

१४. सावरकर ने भारत की सभी राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी समस्याओं को बहुत पहले ही भाँप लिया था। १९६२ में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने के लगभग दस वर्ष पहले ही कह दिया था कि चीन भारत पर आक्रमण करने वाला है।

१५. भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद गोवा की मुक्ति की आवाज सबसे पहले सावरकर ने ही उठायी थी।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

महारानी जोधाबाई, जो कभी थी ही नहीं, लेकिन बड़ी सफाई से उनका अस्तित्व गढ़ा गया और हम सब झांसे में आ गए ….

जब भी कोई हिन्दू राजपूत किसी मुग़ल की गद्दारी की बात करता है तो कुछ मुग़ल प्रेमियों द्वारा उसे जोधाबाई का नाम लेकर चुप कराने की कोशिश की जाती है!

बताया जाता है कि कैसे जोधा ने अकबर की आधीनता स्वीकार की या उससे विवाह किया! परन्तु अकबर कालीन किसी भी इतिहासकार ने जोधा और अकबर की प्रेम कहानी का कोई वर्णन नहीं किया है!

उन सभी इतिहासकारों ने अकबर की सिर्फ 5 बेगम बताई है!
1.सलीमा सुल्तान
2.मरियम उद ज़मानी
3.रज़िया बेगम
4.कासिम बानू बेगम
5.बीबी दौलत शाद

अकबर ने खुद अपनी आत्मकथा अकबरनामा में भी किसी हिन्दू रानी से विवाह का कोई जिक्र नहीं किया। परन्तु हिन्दू राजपूतों को नीचा दिखाने के षड्यंत्र के तहत बाद में कुछ इतिहासकारों ने अकबर की मृत्यु के करीब 300 साल बाद 18 वीं सदी में “मरियम उद ज़मानी”, को जोधा बाई बता कर एक झूठी अफवाह फैलाई!

और इसी अफवाह के आधार पर अकबर और जोधा की प्रेम कहानी के झूठे किस्से शुरू किये गए! जबकि खुद अकबरनामा और जहांगीर नामा के अनुसार ऐसा कुछ नहीं था!

18वीं सदी में मरियम को हरखा बाई का नाम देकर हिन्दू बता कर उसके मान सिंह की बेटी होने का झूठा पहचान शुरू किया गया। फिर 18 वीं सदी के अंत में एक ब्रिटिश लेखक जेम्स टॉड ने अपनी किताब “एनालिसिस एंड एंटीक्स ऑफ़ राजस्थान” में मरियम से हरखा बाई बनी इसी रानी को जोधा बाई बताना शुरू कर दिया!

और इस तरह ये झूठ आगे जाकर इतना प्रबल हो गया कि आज यही झूठ भारत के स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया है और जन जन की जुबान पर ये झूठ सत्य की तरह आ चुका है!

और इसी झूठ का सहारा लेकर राजपूतों को नीचा दिखाने की कोशिश जाती है! जब भी मैं जोधाबाई और अकबर के विवाह प्रसंग को सुनता या देखता हूं तो मन में कुछ अनुत्तरित सवाल कौंधने लगते हैं!

आन, बान और शान के लिए मर मिटने वाले शूरवीरता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध भारतीय क्षत्रिय अपनी अस्मिता से क्या कभी इस तरह का समझौता कर सकते हैं??
हजारों की संख्या में एक साथ अग्नि कुंड में जौहर करने वाली क्षत्राणियों में से कोई स्वेच्छा से किसी मुगल से विवाह कर सकती हैं???? जोधा और अकबर की प्रेम कहानी पर केंद्रित अनेक फिल्में और टीवी धारावाहिक मेरे मन की टीस को और ज्यादा बढ़ा देते हैं!

अब जब यह पीड़ा असहनीय हो गई तो एक दिन इस प्रसंग में इतिहास जानने की जिज्ञासा हुई तो पास के पुस्तकालय से अकबर के दरबारी ‘अबुल फजल’ द्वारा लिखित ‘अकबरनामा’ निकाल कर पढ़ने के लिए ले आया, उत्सुकतावश उसे एक ही बैठक में पूरा पढ़ डाली । पूरी किताब पढ़ने के बाद घोर आश्चर्य तब हुआ, जब पूरी पुस्तक में जोधाबाई का कहीं कोई उल्लेख ही नहीं मिला!

मेरी आश्चर्य मिश्रित जिज्ञासा को भांपते हुए मेरे मित्र ने एक अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ ‘तुजुक-ए- जहांगिरी’ जो जहांगीर की आत्मकथा है उसे दिया! इसमें भी आश्चर्यजनक रूप से जहांगीर ने अपनी मां जोधाबाई का एक भी बार जिक्र नहीं किया!

हां कुछ स्थानों पर हीर कुँवर और हरका बाई का जिक्र जरूर था। अब जोधाबाई के बारे में सभी ऐतिहासिक दावे झूठे समझ आ रहे थे । कुछ और पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के पश्चात हकीकत सामने आयी कि “जोधा बाई” का पूरे इतिहास में कहीं कोई जिक्र या नाम नहीं है!

इस खोजबीन में एक नई बात सामने आई, जो बहुत चौंकाने वाली है! इतिहास में दर्ज कुछ तथ्यों के आधार पर पता चला कि आमेर के राजा भारमल को दहेज में ‘रुकमा’ नाम की एक पर्सियन दासी भेंट की गई थी, जिसकी एक छोटी पुत्री भी थी!

रुकमा की बेटी होने के कारण उस लड़की को ‘रुकमा-बिट्टी’ नाम से बुलाते थे आमेर की महारानी ने रुकमा बिट्टी को ‘हीर कुँवर’ नाम दिया चूँकि हीर कुँवर का लालन पालन राजपूताना में हुआ, इसलिए वह राजपूतों के रीति-रिवाजों से भली भांति परिचित थी!

राजा भारमल उसे कभी हीर कुँवरनी तो कभी हरका कह कर बुलाते थे। राजा भारमल ने अकबर को बेवकूफ बनाकर अपनी परसियन दासी रुकमा की पुत्री हीर कुँवर का विवाह अकबर से करा दिया, जिसे बाद में अकबर ने मरियम-उज-जमानी नाम दिया!

चूँकि राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था, इसलिये ऐतिहासिक ग्रंथों में हीर कुँवरनी को राजा भारमल की पुत्री बता दिया! जबकि वास्तव में वह कच्छवाह राजकुमारी नहीं, बल्कि दासी-पुत्री थी!

राजा भारमल ने यह विवाह एक समझौते की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन किया था। इस विवाह के विषय में अरब में बहुत सी किताबों में लिखा है!

(“ونحن في شك حول أكبر أو جعل الزواج راجبوت الأميرة في هندوستان آرياس كذبة لمجلس”) हम यकीन नहीं करते इस निकाह पर हमें
संदेह है, इसी तरह ईरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में एक भारतीय मुगल शासक का विवाह एक परसियन दासी की पुत्री से करवाए जाने की बात लिखी है!

‘अकबर-ए-महुरियत’ में यह साफ-साफ लिखा है कि (ہم راجپوت شہزادی یا اکبر کے بارے میں شک میں ہیں)

हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है, क्योंकि निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आखों में आँसू नहीं थे और ना ही हिन्दू गोद भराई की रस्म हुई थी!

सिक्ख धर्म गुरू अर्जुन और गुरू गोविन्द सिंह ने इस विवाह के विषय में कहा था कि क्षत्रियों ने अब तलवारों और बुद्धि दोनों का इस्तेमाल करना सीख लिया है, मतलब राजपूताना अब तलवारों के साथ-साथ बुद्धि का भी काम लेने लगा है!

17वी सदी में जब ‘परसी’ भारत भ्रमण के लिये आये तब अपनी रचना ”परसी तित्ता” में लिखा “यह भारतीय राजा एक परसियन वैश्या को सही हरम में भेज रहा है अत: हमारे देव (अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें”!

भारतीय राजाओं के दरबारों में राव और भाटों का विशेष स्थान होता था, वे राजा के इतिहास को लिखते थे और विरदावली गाते थे उन्होंने साफ साफ लिखा है-

”गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज ले ग्याली पसवान कुमारी ,राण राज्या राजपूता ले ली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत! (1563 AD)

मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है! हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने इतिहास में ले ली बिना लड़े पहली जीत 1563 AD!

ये ऐसे कुछ तथ्य हैं, जिनसे एक बात समझ आती है कि किसी ने जानबूझकर गौरवशाली क्षत्रिय समाज को नीचा दिखाने के उद्देश्य से ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की और यह कुप्रयास अभी भी जारी है!

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#सुनो
दिल्ली अर्ध केंद्र शासित राज्य है जहाँ लगभग 80%पावर LG के पास थी। कोई भी फ़ाइल LG से अप्रूवल हुए बिना राजधानी में लागू नहीं हो सकती। वहाँ पे इन्होंने मलाई खाने के लिये कई मुद्दों पर LG को ही बाईपास कर दिया। मतलब LG के approval के बिना ही policy लागू कर दी।ऐसे राज्य में ये लुटेरे गैंग इतनी बड़ी लूट मार कर सकते हैँ। 2028 करोड़ का चुना अकेले शराब घोटाले में लगा दिया। अभी बाकी फ़ाइल खुलनी बाकी हैँ।
एक छोटा सा राज्य, LG का शासन,जहाँ मुख्य्मंत्री की औकात एक मेयर से ज़्यादा नहीं हो जहाँ देश की सारी एजेंसियों के हेड office हों। केंद्र सरकार, उसका पूरा मन्त्रीमंडल जहाँ बैठता हो वहाँ इन सबकी नाक के नीचे इन्होंने इतने बड़े बड़े घोटालों को अंजाम दे डाला। अब आप हिसाब लगाइये पंजाब सूबे का।
एक पूर्ण राज्य। लॉ न आर्डर आपके हाथ में। ड्रग का फलता फूलता कारोबार । ट्रांसफर पोस्टिंग आपके हाथ में,रेत माफिया आपके साथ ।जहाँ राज्य का हर निर्णय आप अपनी मर्जी से ले सकते हों।और जहाँ का मुख्यमंत्री है एक दारुबाज नकारा आदमी हो जिसे शाम को इतना होश ना हो कि आज की रात घर पर गुजरेगी या मयखाने में। उस प्रदेश का क्या हाल बनाया होगा इन लुटेरों ने? कितना खाया होगा और कितना विदेशों में जमा करवाया होगा चिकने चड्डा की आँखों के ऑपरेशन के बहाने। ख़ैर ये वक़्त ही बतायेगा जब 2027 में पंजाब की जनता अपना निर्णय सुनाएगी।
ख़ैर अभी फिलहाल तो दिल्ली की जनता ने अपना फ़ैसला सुना दिया है और कोर्ट की कार्यवाही अंडर प्रोसेस हैँ।।2027 आते आते कहीं आप साफ़ ना हो जाये।।
जय हिन्द
🚩✍️

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas, हिन्दू पतन

यदि इको सिस्टम मे सबसे ज्यादा कही सुधार हुआ है या यू कहे सुधार दिखा है तो वो बॉलीवुड है।

पिछले कुछ वर्षो मे ऐसी कई फिल्मे आकर गयी जिन्होंने कांग्रेस द्वारा प्रायोजित हिन्दू विरोध को किनारे करके सच्चाई दिखाई है। अब आवश्यक नहीं है कि हिन्दू को सहिष्णु दिखाने के लिये एक अच्छा मुस्लिम किरदार घुसाया जाए। जिसे सहिष्णु समझना है समझें वरना अपना रास्ता नापे।

इतिहास को ज्यादा गहराई मे नहीं लिखूंगा क्योंकि फ़िल्म देखने योग्य है और देखी ही जाना चाहिए। मुग़ल आधिपत्य के समय कई हिन्दू शक्तियां थी जिनके मन मे स्वतंत्रता की आग उठ रही थी। ज़ब शिवाजी ने औरंगजेब को आगरा के तख़्त पर बैठा देखा तो उनके मन मे यही स्वर गूंजा

“तू जिस तख्त पर बैठा है वो प्रभु श्री राम, धर्मराज युधिष्ठिर, चन्द्रगुप्त और पृथ्वीराज का है। उस नाते इसका उत्तराधिकार मेरे पास है, इसलिए औरंगजेब नीचे उतर।”

इसी भावना के साथ 1674 मे मराठा साम्राज्य की स्थापना की गयी, रघुवंश कालीन छत्रपति उपाधि पुनः जीवित की गयी। 1680 मे शिवाजी की मृत्यु हो गयी, तमाम आंतरिक षड्यंत्रो से जूझकर उनके बेटे संभाजी अगले छत्रपति बने।

छत्रपति के रूप मे संभाजी का डेब्यू इतना भयावह था कि औरंगजेब खुद आगरा से निकल पड़ा और यही औरंगजेब की जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई क्योंकि इसके बाद वो दोबारा कभी उत्तर भारत नहीं लौट सका।

संभाजी 1681 से 1689 तक औरंगजेब से लड़ते रहे, हर युद्ध मे जीते और अंत मे धोखे से पकडे गए। कई दिनों की यातना के बाद उन्हें मार दिया गया, ये यातनाये फ़िल्म मे पूरी तरह दिखाई गयी है।

संभाजी को इतनी बेरहमी से मारा गया था कि हिन्दुओ के पास सिर्फ दो विकल्प बचे थे, या तो डरकर हथियार रख देते या फिर मुगलो की कब्र खुदने तक लड़ते, महाराष्ट्र मे हिन्दुओ ने दूसरा विकल्प चुना और लड़ाई जारि रखी। संभाजी को मारकर भी औरंगजेब वापस नहीं लौट सका और 27 वर्ष दक्खन मे बर्बाद करके मर गया।

ये इतना समय था कि उत्तर मे मेवाड़ के जय सिंह, भरतपुर के चुड़ामन जाट और गुरु गोविन्द सिंह जी ने हिन्दुओ की एक नई फ़ौज खड़ी करके मुगलो का सिरदर्द बढ़ा दिया। 1707 मे औरंगजेब महाराष्ट्र मे ही मर गया, आगे चलकर मराठा साम्राज्य मे भी छत्रपति की जगह उनके पेशवा प्रधान बन गए।

हालांकि स्वराज की अवस्था अभी दूर थी और 1757 मे जब पेशवा ने दिल्ली से अब्दाली को खदेड़कर अपना गवर्नर बैठाया तब जाकर पूर्ण स्वराज का सपना साकार हुआ। हालांकि 1803 मे अंग्रेजो ने मराठा साम्राज्य के सेनापति दौलतराव सिंधिया को हराकर दिल्ली पर कब्जा कर लिया।

किताबो मे आज भी यही पढ़ाया जाता है कि मुगलो ने 1857 तक राज किया मगर ये नहीं पढ़ाया जाता कि 1757 से ही उनकी शक्ति शून्य थी और वे एक हिन्दू साम्राज्य के अधीन थे।

खैर मराठा साम्राज्य 144 वर्ष शासन मे रहा, संभाजी का कार्यकाल इसमें 5% ही है मगर ये साम्राज्य के फाउंडिंग फिगर मे से एक है। यदि वे नहीं होते तो हमारे आज की कल्पना नहीं हो सकती थी शायद इसीलिए ही इन्हे इतिहास मे स्थान नहीं मिला।

लेकिन बॉलीवुड की ये अच्छी पहल रही, जब सेक्युलरिज्म के आधार पर पाठ्यक्रम बनाये जा रहे थे तो बनाने वालो ने सोचा भी नहीं होगा कि सच डिजिटल गलियारों मे रास्ता बनाकर हिन्दुओ के सामने खड़ा हो जाएगा।

उसी सच को जानने के लिये यह फ़िल्म जरूर देखिये, जो देख चुके है वे पूर्ण रेटिंग दे। ये भी एक प्रकार का इनफार्मेशन वॉरफेयर ही है।

विशेषार्थ – ये फ़िल्म बंटेंगे तो कटेंगे की अगली कड़ी है, इस पर चर्चा करते समय जातियों के नाम का प्रयोग करने से बचे, पोस्ट मे मराठा शब्द साम्राज्य के लिये प्रयोग हुआ है, किसी जाति के लिये नहीं। हमें जातिवाद मे उलझें बिना सिर्फ हिन्दू एकता पर केंद्रित होना है।

✍️परख सक्सेना✍️
https://t.me/aryabhumi

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અખિલેશ યાદવ


દિલ ધ્રૂજી જશે…..

અખિલેશ યાદવ ઉત્તર પ્રદેશના મુખ્યમંત્રી હતા.
ઉત્તર પ્રદેશમાં આતંકનો માહોલ હતો.

યુપીનો દરેક જિલ્લો જેહાદની પકડમાં હતો, ક્યારેક મુઝફ્ફરનગરમાં તો ક્યારેક સુલતાનપુરમાં રમખાણો થયા હતા.

કૈરાના, અલીગઢ અને દેવબંદના મુસ્લિમ પ્રભુત્વવાળા વિસ્તારોમાંથી હિંદુઓ સ્થળાંતર કરી રહ્યા હતા.

ઘરો પર “મકન વેચવાનું ” ના બોર્ડ હતા અને દરવાજા બંધ હતા.

તે સમયે મથુરામાં એક ભરત યાદવ એક લારી પર લસ્સી વેચીને તેના પરિવારનું ભરણપોષણ કરતો હતો…

ભરત યાદવ જીને એક નાની પુત્રી હતી, તેના માતા-પિતા, તેની પત્ની… યાદવજી લસ્સી વેચીને પોતાનું ગુજરાન ચલાવતા હતા…

એક મુસ્લિમ તેની દુકાને આવ્યો, લસ્સી પીધી અને રૂ આપ્યા વગર ચાલતી પકડી,ભરત યાદવે તેને અટકાવ્યા ત્યારે તેણે ત્યાં જ છરી કાઢી અને ભરત યાદવની હત્યા કરી.

અખિલેશ યાદવના જ્ઞાતિ સમુદાય એટલે કે યાદવ સમુદાયના એક યુવકની હત્યા કરવામાં આવી હતી, પરંતુ અખિલેશ યાદવ પોતે ન તો ભરત યાદવના પરિવારજનોને સાંત્વના આપવા ગયા હતા… ન તો તેમણે સરકારી તિજોરીમાંથી 1 રૂપિયાનું વળતર આપવાની જાહેરાત કરી હતી, ન તો તેમણે તેમના પક્ષના કોઈ નેતા કે મંત્રીને ભારતના ઘરે મોકલ્યા હતા.



કારણ કે અખિલેશ યાદવને લાગતું હતું કે હત્યારો મુસ્લિમ છે, તો જો તેઓ ભરત યાદવના ઘરે જશે તો મુસ્લિમ સમુદાય તેમનાથી નારાજ થશે.

ઘણા હિન્દુ સંગઠનોએ ક્રાઉડ ફંડિંગ દ્વારા ભરત યાદવના પરિવારને 51 લાખ રૂપિયાનો ચેક આપ્યો હતો…. રાત-દિવસ જાતિવાદનું ઝેર વાવનાર અખિલેશ યાદવને યાદવ યાદ નથી આવતા જ્યારે એક નિર્દોષ યાદવની જેહાદી દ્વારા હત્યા કરવામાં આવે છે.

આવી જ એક ઘટના તાજેતરમાં પ્રયાગરાજમાં જોવા મળી હતી જ્યારે નવમા ધોરણમાં ભણતા શૈલેષ યાદવની જેહાદીઓએ નિર્દયતાથી હત્યા કરી હતી.

શૈલેષના મૃત શરીરને પણ આ રાક્ષસોએ વિકૃત કરી નાખ્યું હતું.  અહીં જેહાદીઓએ એવી ભૂલ કરી હતી કે તેઓ ભૂલી ગયા હતા કે ઉત્તર પ્રદેશમાં હવે યોગીની સરકાર છે.  બુલડોઝર ગર્જ્યા …

પરંતુ સવાલ એ છે કે સંભલમાં પથ્થરબાજોને 5-5 લાખ રૂપિયા વહેંચનાર અખિલેશ યાદવે શૈલેષ યાદવના પરિવારને એક પૈસો પણ નથી આપ્યો…

આખરે કેમ..?


સુલતાનપુરમાં બંદૂકની અણીએ જ્વેલરી શોપ લૂંટનાર ડાકુ મંગેશ યાદવના એન્કાઉન્ટર બાદ અખિલેશ યાદવ કેવી રીતે રડી પડ્યા હતા.

જ્યારે કોઈ ગુનેગારની હત્યા થાય છે ત્યારે જાતિ પ્રેમ જાગે છે, પરંતુ અખિલેશ યાદવ જ્યારે કોઈ નિર્દોષની હત્યા થાય છે ત્યારે વોટ બેંકની નારાજગી સ્વીકારતા નથી.

અખિલેશ યાદવ જી,શું ભરત યાદવ કે શૈલેષ યાદવ તમારી જાતિના નથી.

એક નહીં…
ભરત યાદવ અને શૈલેષ યાદવ જેવા હજારો યાદવોની કહાની છે,
મુખ્તાર અંસારીના મૃત્યુથી શ્રી અખિલેશ યાદવને વધુ દુ:ખ થયું હતું .

અતીક અહેમદ અને અશરફની હત્યાથી અખિલેશ યાદવ લગભગ સમાન રીતે દુખી હતા.

અખિલેશ યાદવના હૃદયમાં જેહાદીઓ, આતંકવાદીઓ, ડાકુઓ, માફિયાઓ અને ગુનેગારો વસે છે.

તેમના માટે અખિલેશ યાદવ જી સંસદમાં પણ રડતા.

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ध्यान,धारणा, समाधि



एक फकीर एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे । वो रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काट कर ले जाते देखते थे। एक दिन उन्होंने लकड़हारे से कहा कि सुन भाई, दिन-भर लकड़ी काटता है, दो वक्त की रोटी भी नहीं जुट पाती । तू जरा आगे क्यों नहीं जाता, वहां आगे चंदन का जंगल है । एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा ।

गरीब लकड़हारे को विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कोई नहीं जानता ! जंगल में लकड़ियां काटते-काटते ही तो जिंदगी बीती । मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो ! एक बार प्रयोग करके देख लेना चाहिए ।

फकीर के बातों पर विश्वास कर वह आगे गया । लौटा तो फकीर के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है । मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी ।  हम यही जलाऊ-लकड़ियां काटते-काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या ! मैं भी कैसा अभागा ! काश, पहले पता चल जाता ! फकीर ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है । जब जागा तभी सबेरा ।

लकड़हारे के दिन अब बड़े मजे में कटने लगे । एक दिन काट लेता, सात— आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती।

एक दिन फकीर ने कहा ; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी । जिंदगी— भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए ; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है ? उसने कहा; यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है ?

उस फकीर ने कहा : चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है । लकड़ियाँ काटना छोड़ो । एक दिन ले आओगे, दो-चार छ: महीने के लिए हो गया । अब तो वह फकीर पर भरोसा करने लगा था । बिना संदेह किये भागा । चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या ! चांदी ही चांदी !

चार-छ: महीने नदारद हो जाता । एक दिन जाता, फिर नदारद हो जाता ।

फकीर ने उसे फिर एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझे ही तुम्हें जगाना पड़ेगा । आगे सोने की खदान है मूर्ख ! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं ? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत ही फुर्सत। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता ?

उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा ? गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था ।

फकीर ने कहा, थोड़ा और आगे सोने की खदान है। फिर और आगे हीरों की खदान

और एक दिन फकीर ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया ? अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी हो गया था, महल भी खड़े कर लिए थे । उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन मत करो । अब मेरे पास सब कुछ है।

उस फकीर ने कहा, क्या तुम खुश रहतो हो। थोड़ी देर चुप चाप खड़ा रहा और फिर फुट फुट कर रोने लगा।

फ़क़ीर ने कहा कि तुम्हे पता है कि यह आदमी मस्त यहां क्यों बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा ! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा ?

वह आदमी रोने लगा । फ़कीर के चरणों में सिर पटक दिया और कहा कि मेरे पास सब कुछ है पर मन कि शांति, परिवार का सुख और ख़ुशी नाम की चीज मेरे जीवन से कोसो दूर जा चुकी हैं। ।

फकीर ने कहा :  अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं । अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे आगे है ।

यही मैं तुमसे कहता हूं ,, उस समय तक मत रुकना जब तक कि भीतर चल रहे उपद्रव शांत न हो जाएं फिर अनुभव होगा परम पिता परमात्मा के निकट होने का अनुभव।

एक सन्नाटा, एक शून्य । और उस शून्य में जलता है बोध का दीया। वही परम है । वही परम-दशा है, वही समाधि है ।

*वही सच्चा सुख है।*



*आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।*


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ઉદાસી …ખુશી.. ( વાત એક નાનકડી )
આલોક ઉદાસ બનીને આ હોટેલમાં બેઠો હતો. આજે તેની પત્નીની પ્રથમ પુણ્યતિથિ હતી. તેની પત્ની આશકાની આ પ્રિય જગ્યા હતી. અવારનવાર બંને અહીં કોફી પીવા આવતા અને કલાકો ગાળતા.આ હોટેલ તેમની અનેક સુંદર સાંજની સાક્ષી હતી. પણ આજે…નિતાંત એકલતા તેને ઘેરી વળી. કોફી તો આવી ગઇ હતી. પરંતુ પીવાનું મન ન થયું. સાથે પીનાર કયાં ? કેન્સરે તેની પ્રિય વ્યક્તિને છીનવી લીધી હતી. તેના પ્રાણમાં એક ઉદાસી છવાઇ રહી.
અચાનક આલોકનું ધ્યાન હોટેલના એક ખૂણામાં..કોઇની નજર ન જાય તે રીતે બેસેલ એક યુવતી પર પડી. તેની આંખોમાં પણ તેને ઉદાસીની એક ઝલક નજરે પડી. પરંતુ કદાચ આ તો પોતાના જ મનનું પ્રતિબિંબ…! પોતાની ઉદાસ દ્રષ્ટિને બધે ઉદાસી જ દેખાય છે. છતાં ન જાણે કેમ પણ તેણે તે યુવતીનું નિરીક્ષણ ચાલુ રાખ્યું. ના, ના, આ પોતાની ઉદાસીનું પ્રતિબિંબ નથી જ. ખરેખર તેની આંખોમાં..ચહેરા પર છવાયેલી ઉદાસી..અસ્વસ્થતા તે જોઇ શકતો હતો..કોઇની નજર તેના પર ન પડે તે રીતે તે ચહેરો પાછળ ફેરવી બેઠી હતી. આ તો પોતે એ રીતે બેઠો હતો તેથી તેને જોઇ શકતો હતો.
આલોકે તેના ચહેરાના ભાવ વાંચવાનો પ્રયત્ન કર્યો. ના…ના…કોઇ વાત જરૂર છે જે તેને અસ્વસ્થ બનાવે છે. યુવતીએ માથા પર સુંદર સ્કાર્ફ વીંટેલ હતો. તેનો લંબગોળ ચહેરો,પાણીદાર આંખો, કપાળ પર નાનકડી કાળી બિન્દી, બધું મળીને એક સુંદર વ્યક્તિત્વનો એહસાસ થતો હતો. આ ઉદાસી કયા કારણે ? તેને જાણવાની જિજ્ઞાસા થઇ. પણ એમ અજાણી વ્યક્તિને પૂછાય કેમ ? અને તે પણ સુંદર યુવતીને ? લાફો જ ખાવો પડેને ?
જે હોય તે મારે શું ? એમ વિચારી તેણે અભાનપણે હાથમાં કોફીનો કપ ઉપાડયો. આશકાની ઝિલમિલ આંખોનું પ્રતિબિંબ કોફીમાં ઉપસતું હતું કે શું ?
અચાનક હવાની એક લહેરખી આવી. યુવતીના માથા પરનો સ્કાર્ફ ફરફર્યો. યુવતી જાણે બેબાકળી બની ગઇ. તેણે જોશથી સ્કાર્ફ પકડી રાખ્યો..કોઇ જોઇ તો નથી ગયું ને ? તેની નજર ચારે તરફ ફરી રહી. શું હતું એ નજરમાં ?
આલોકે પોતાના ચહેરા આડે છાપુ ધર્યું. પણ જે જોવાનું હતું તે તો એક ક્ષણમાં જોવાઇ ગયું હતું.
યુવતીના માથા પર વાળ નહોતા..ફકત વાળના અવષેશ જ બચ્યા હતા..નાના નાના વાળ ઊગવાની શરૂઆત થઇ હતી. આશકા પણ આમ જ…કીમોથેરાપી કરાવ્યા બાદ આમ જ સ્ક્રાફ બાંધી રાખતી…! આમ જ વિહવળ રહેતી..કોઇ તેને જોઇ જાય આ રીતે તે તેને જરાયે પસંદ નહોતું પડતું. અહીં કોફી પીવા આવતી ત્યારે આમ જ માથા ઉપર સ્કાર્ફ બાંધી રાખતી અને કોઇ જોઇ ન જાય માતે સતત સચેત કે સાવધાન રહેતી. પોતે ઘણી વખત આશકાને સમજાવતો..
’એમા શરમાવા જેવું શું છે ? શા માટે એવો કોઇ ડર રાખે છે ? તું તારે બિન્દાસ રહે ને…હું છું ને તારી સાથે ? ‘
પણ આશકા એ પરિસ્થિતિ કયારેય મનથી સ્વીકારી શકી નહોતી. રોજ સવારે ઉઠીને પહેલું કામ અરીસામાં જોવાનું કરતી..હવે કેટલા વાળ આવ્યા ? ઇચ્છા મુજબનો ગ્રોથ ન દેખાતા તેની વિશાળ આંખોમાં આમ જ ઉદાસી છવાઇ જતી. અને વાળ પૂરા ઊગે તે પહેલાં તો…..
આજે આ અજાણ યુવતીની આંખોમાં પણ એ જ ભાવ..એ જ વિહવળતા હતા. તેને આશકા યાદ આવી ગઇ. તેની આંખો ભીની બની.
અચાનક આલોકે એક કાગળ લીધો..પેન ઉપાડી અને..
’ તમે ખૂબ સુંદર છૉ..તમારી આંખો ખૂબ સુંદર છે. તમારું વ્યક્તિત્વ એટલું સુંદર છે કે કોઇ કમી તેને સ્પર્શી શકશે નહીં. આ દુનિયા ખૂબ સુન્દર છે..માણવા લાયક છે અને જીવન અણમોલ છે. તેને ઉદાસીની ગર્તામાં ધકેલવાની ભૂલ ન કરશો.. જે ક્ષણો ઇશ્વરે આપી છે તેને સંપૂર્ણપણે સ્વીકારો. તેનાથી ભાગવાને બદલે સામનો કરો. તમારી આંખોમાં મારી આશકાની વિહવળતા મને દેખાય છે. મારી આશકા પરિસ્થિતિનો સ્વીકાર ન કરી શકી..અને મને છોડીને હમેશ માટે…….’
લખીને આલોકે વેઇટરને બોલાવ્યો. કાગળ આપીને કોને આપવાનો છે એ સમજાવ્યું. પછી તે દૂર ચાલ્યો ગયો. થોડીવાર પછી તેણે દૂરથી યુવતી તરફ નજર નાખી. યુવતીએ કાગળ વાંચ્યો..આસપાસ નજર ફેરવી.. બે પાંચ મિનિટ મૌન બેસી રહી. મનમાં કોઇ વિચારો….કોઇ ગડમથલ ચાલતી હતી કે શું ?
તેની ઉદાસ આંખોમાં એક ચમક ઉપસી આવી. તે ધીમેથી ઊભી થઇ.. તે ખૂણાની જગ્યા છોડીને વચ્ચે આવીને બેઠી. અહીંથી હવે તે બધાને જોઇ શકતી હતી. અને બધા તેને જોઇ શકે તેમ હતા. તેણે માથા પરથી સ્કાર્ફ કાઢી નાખ્યો. તેની આંખોમાંથી પેલી વિહવળતા અદ્ર્શ્ય થઇ ગઇ હતી.
દૂરથી તેને જોઈ રહેલા આલોકની ઉદાસી અદ્રશ્ય થઇ ગઇ. તે ધીમેથી વ્હીસલ વગાડતો હોટેલની બહાર નીકળી ગયો.
નીલમ દોશી