इति शुश्रुम धीराणाम् :-
एक आश्रम में कुछ विरक्त सन्यासी महात्मा रहते थे।
उनमें से एक महात्मा उसे समय के ग्रेजुएट थे। आजकल के हिसाब से पहले तो आईआईटी पास ।
वह बाबा यह भी कहा करते थे की मैं बहुत सारा धन को छोड़कर साधु बना हूं। इस त्याग का बड़ा गर्व था I
इस कारण से अन्य किसी महात्माओं को अपने आगे कुछ समझते नहीं और बात-बात पर कहते – “तुमको मालूम है कि मैंने लाखों की संपत्ति पर लात मार दी है।”
ऐसा ही एक दिन बहुत बात बढ़ गई।
एक किसी नए महात्मा से ग्रेजुएट महात्मा डांटकर कहने लगे की तुम ठीक नहीं हो,तुम्हारा व्यवहार ठीक नहीं है और तुम्हें मालूम नहीं है कि मैंने लाखों की संपत्ति और डिग्री पर लात मार दी है।
बगल में ही एक वृद्ध महात्मा लेटे हुए थे।
ग्रेजुएट महात्मा ने जब कई बार इस बात को दोहराया तो वृद्ध महात्मा जी ने धीरे से ग्रेजुएट महात्मा को कहा-
“बेटा! तुमने लात तो मारी, पर लगता है कि वह लात ठीक से लगी नहीं !”