Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पैठण में एकनाथ महाराज के स्थान से गोदावरीजी को जाने वाले रास्ते में एक जगह एक धर्मशाला-सी है।वहाँ एक यवन रहा करता था। वह उस रास्ते से आने-जाने वाले हिन्दुओं को बहुत तंग किया करता था। एकनाथ महाराज जब स्नान करके लौटें तब वह इनके ऊपर पिचकारी छोड़े। इससे महाराज को किसी-किसी दिन चार-चार पाँच-पाँच बार स्नान करना पड़े। जहाँ वह स्नान करके लौटने लगे कि यह उन्मत्त मनुष्य फिर उन पर थूके और महाराज फिर गंगा-स्नान करने जायँ। इस बदमाशी से कोई भी आदमी चिढ़ जाता।

चिढ़ना भी बिलकुल स्वाभाविक था, पर एकनाथ महाराज की शान्ति ऐसी विलक्षण थी कि बार-बार एकनाथ महाराज ‘मातर्गंगे !’ कहकर वन्दन करके आनन्द से स्नान करें और धन्यवाद दें उस यवन को यह कहकर कि इसकी कृपा से मेरे इतनी बार स्नान हो जाते हैं। एक दिन तो यह बात हुई कि वह यवन उस मौके पर नहीं था, पर नाथ उसका नियम भंग न हो इस खयाल से कुछ काल तक उसकी राह देखते हुए वहाँ ठहर गये। कुछ काल प्रतीक्षा करके उसके आने का कोई लक्षण नहीं देखा तब आगे बढ़े।

एक बार वह यवन अत्यन्त उन्मत्त होकर महाराज के बार-बार स्नान करके लौटने पर उनकी देह पर बार-बार थूकता ही रहा। वह थूकता जाय और महाराज स्नान करते जायँ, इस तरह कहते हैं कि एक सौ आठ बार हुआ। तथापि महाराज की शान्ति भंग नहीं हुई। उन्मत्त क्रोध और शान्त सहिष्णुता का यह द्वन्द्व देखने के लिये हजारों लोग वहाँ जुटे थे। अन्त को यवन थक गया। लज्जित हुआ। महाराज के चरणों पर लोट गया। यवन ने महाराज के महात्मापन की बड़ी स्तुति की। इतने पर भी वह अपनी मसजिद पर अपने चार बार नमाज पढ़ने की तारीफ करने से बाज न आया। तब महाराज ने हँसकर कहा-

मसजिदमें ही जो अल्लाह खड़ा। तो और स्थान क्या खाली पड़ा ? ॥
चारों वक्त नमाजों के । तो क्या और वक्त हैं चोरों के ? ॥
एका जनार्दन का बंदा । जमीन आसमान भरा खुदा ॥

तात्पर्य – अल्लाह यानी परमात्मा किसी एक जगह में ही बँधा नहीं, वह सब जगह मौजूद है। सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वसाक्षी है। सबका है, सबके हृदय में है और उसकी यथार्थ स्तुति यही हो सकती है कि मनुष्य उसका अखण्ड स्मरण करे, सब कुछ वही करता है, यह जाने और निरहंकार होकर रहे। यवन ने पहचाना कि एकनाथ महाराज बड़े औलिया हैं और तबसे वह उनके साथ बड़े विनय और नम्रता से पेश आने लगा..!!

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