Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

छोड़ो कल की बातें


एक पचपन की स्त्री आयी अपने बेटे, बहु और पति के साथ। समस्या थी, सास-बहू का कलह जो अब बहु को अवसाद में डाल रहा था। बेटा एकलौता था और ना तो घर छोड़ माँ से ही अलग हो पा रहा था नाही अपनी पत्नी के दुख को सम्भाल पा रहा था। पिता का धैर्य भी अब जवाब दे चुका था।

उस स्त्री ने बताया कि कैसे बहु तमाम ऐसी चीजें करती है जो उनके जमाने में स्त्री कभी नहीं किया करती थी। वे तमाम चीजें थी- बहु का  जीन्स पहनना, फ़िल्म देखने जाना, ट्रेकिंग ट्रिप बनाना और ऐसी ही एक हजार एक टुच्ची बातें जो अभी के जमाने में पली-बढ़ी हर सामान्य लड़की करती है। बेटा पर भी बीवी की ऐसी हर बात को पूरा समर्थन देने का इल्जाम था। पति पर बहु की इन हरक़तों पर ध्यान ना देने का इल्जाम था। अतः पूरा परिवार ही  स्त्री के नजर में दोषी था इस बदले समीकरण के लिये।

बेटे और पिता चाह रहे थे कि दोनों तरफ से कुछ compromise हो जाये तो गाड़ी किसी तरह आगे बढ़, इसीलिये family counselling की मांग की । पर psychologist ने साफ मना कर दिया और बोला अगली बार वह स्त्री अकेली आएगी। स्त्री ने विरोध किया कि हरयाणा से दिल्ली तक उसे अकेले ऐसे-कैसे बुलाया जा सकता है। डॉक्टरी चक्कर में तो साथ होना ही चाहिये लोगों को। वहाँ भी नहीं तो कम से कम  कार चलाने के लिए तो पुरुष चाहिए ही होगा। पर Psychologist ने एक नहीं सुनी। हालांकि बेटे को अलग से बता दिया गया था कि अगर माँ का डिसीजन ना बदले तो वह साथ लेकर आ जाये।

पर वह स्त्री अकेली आयी। बेटे ने जबरदस्ती भेजा, बस से। दूसरे सेशन में भी सिर्फ मन का गुब्बार निकालती रही। कैसे उनकी जिंदगी सास-ससुर की सेवा में बीती और कैसे अब बहु उसका एक चौथाई भी नहीं करती जितना उन्होंने किया था। बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं है अब उस बेचारी के लिये। फिर उस काउंसलर ने उसे कुछ होमवर्क दिया, अगली बार आने से पहले फ़िल्म देखने जाना, अपने लिये एक मोबाइल खरीदना( उसके पास नहीं थी, नाही उसे जरूरत लगी कभी), और अपने पसंदीदा गानों की एक लिस्ट डाउनलोड करना खुद से।

जब घर पहुंची तो बेटा इस लिस्ट को देखकर चिढ़ गया। उसकी बीवी दुःखी थी और यहाँ psychologist उसकी परम्परावादी घर बैठने वाली मां को फ़िल्म देखने भेज रही थी। पर उसने भी साथ दिया, मन मार कर ही सही। अगले सप्ताह काउंसलिंग के साथ फिर कुछ ऐसे ही होमवर्क मिले। कुछ सेशन बाद परिवार को बुलाया गया। लड़ाइयां अपने आप कम होती जा रही थी।

सास को कई होमवर्क में बहु ने मदद किया था, पुरूषों के पास समय के अभाव की वजह से अगली फ़िल्म दोनों साथ देखने गए थे और काउंसलर के कहे अनुसार पार्लर भी।

हालांकि काउंसलिंग में और भी कई बातें थी, भावनाओं को समझना और उन्हें सम्भालना भी हुआ, पर बदलाव की मुख्य वजह यह थी कि पहली बार यह स्त्री वो चीजे कर पायी जो उसने अपनी सास की डर से कभी नहीं किया था। उसकी सास तो मर गयी पर परम्पराओ का जकड़न साथ रहा, अब यही जकड़न वह बहु पर लादना चाहती थी।लेकिन ज्यादा ध्यान से देखे तो दुःख बहु की हरकतों का नहीं था, दुःख था अपनी आजादी ना पाने का। मां को हमेशा किचन में देखने का आदि बेटा भी कभी नहीं पूछा फ़िल्म देखने चलने के लिये नाही पति ने कभी कहा जाओ सहेलियों के साथ कोई ट्रिप बनाओ। और सच कहा जाए तो उस स्त्री के दिमाग में भी कभी नहीं आया कि उसकी जिंदगी भी किसी अलग गति से अलग रास्ते पर चल सकती है। पर जब एक बार वह अपनी आजादी पाने लगी तो बहु की आजादी देखकर बुरा लगना भी बंद हो गया। काउंसलर ने सास-बहू के समीकरण के बजाय सास की जिंदगी पर ध्यान दिया, उसकी हॉबी ढूंढी, उसके सपनो पर बात की।

इन दिनों वह स्त्री बहु के साथ शिमला जाने के प्लान को लेकर बहुत excited है।

पर ऐसी कहानियाँ तो हर घर में है। अक्सर जब हम पुरानी पीढ़ी के कठोरता की शिकायत करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि यह वह पीढ़ी थी जिसके अस्तित्व की रचना ही मानो जिम्मेदारी निभाने के लिये हुई। हम चाहते हैं वो हमारी आजादी समझे पर कभी कोशिश नहीं करते उन्हें ज्यादा आजाद करने की। पर कोई इंसान जो हमेशा अपने सपनों से समझौता करता रहा iहो, उसे दूसरे की आजादी भी क्यों अच्छी लगेगी??

इसीलिये बेहतर है,नयी पीढ़ी को समझौता करने के बजाय पुरानी पीढ़ी की कुछ जिम्मेदारियाँ  छीन लेनी चाहिये, उन्हें भी आजाद कर देना चाहिये।

़ो कल की बातें*

एक पचपन की स्त्री आयी अपने बेटे, बहु और पति के साथ। समस्या थी, सास-बहू का कलह जो अब बहु को अवसाद में डाल रहा था। बेटा एकलौता था और ना तो घर छोड़ माँ से ही अलग हो पा रहा था नाही अपनी पत्नी के दुख को सम्भाल पा रहा था। पिता का धैर्य भी अब जवाब दे चुका था।

उस स्त्री ने बताया कि कैसे बहु तमाम ऐसी चीजें करती है जो उनके जमाने में स्त्री कभी नहीं किया करती थी। वे तमाम चीजें थी- बहु का  जीन्स पहनना, फ़िल्म देखने जाना, ट्रेकिंग ट्रिप बनाना और ऐसी ही एक हजार एक टुच्ची बातें जो अभी के जमाने में पली-बढ़ी हर सामान्य लड़की करती है। बेटा पर भी बीवी की ऐसी हर बात को पूरा समर्थन देने का इल्जाम था। पति पर बहु की इन हरक़तों पर ध्यान ना देने का इल्जाम था। अतः पूरा परिवार ही  स्त्री के नजर में दोषी था इस बदले समीकरण के लिये।

बेटे और पिता चाह रहे थे कि दोनों तरफ से कुछ compromise हो जाये तो गाड़ी किसी तरह आगे बढ़, इसीलिये family counselling की मांग की । पर psychologist ने साफ मना कर दिया और बोला अगली बार वह स्त्री अकेली आएगी। स्त्री ने विरोध किया कि हरयाणा से दिल्ली तक उसे अकेले ऐसे-कैसे बुलाया जा सकता है। डॉक्टरी चक्कर में तो साथ होना ही चाहिये लोगों को। वहाँ भी नहीं तो कम से कम  कार चलाने के लिए तो पुरुष चाहिए ही होगा। पर Psychologist ने एक नहीं सुनी। हालांकि बेटे को अलग से बता दिया गया था कि अगर माँ का डिसीजन ना बदले तो वह साथ लेकर आ जाये।

पर वह स्त्री अकेली आयी। बेटे ने जबरदस्ती भेजा, बस से। दूसरे सेशन में भी सिर्फ मन का गुब्बार निकालती रही। कैसे उनकी जिंदगी सास-ससुर की सेवा में बीती और कैसे अब बहु उसका एक चौथाई भी नहीं करती जितना उन्होंने किया था। बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं है अब उस बेचारी के लिये। फिर उस काउंसलर ने उसे कुछ होमवर्क दिया, अगली बार आने से पहले फ़िल्म देखने जाना, अपने लिये एक मोबाइल खरीदना( उसके पास नहीं थी, नाही उसे जरूरत लगी कभी), और अपने पसंदीदा गानों की एक लिस्ट डाउनलोड करना खुद से।

जब घर पहुंची तो बेटा इस लिस्ट को देखकर चिढ़ गया। उसकी बीवी दुःखी थी और यहाँ psychologist उसकी परम्परावादी घर बैठने वाली मां को फ़िल्म देखने भेज रही थी। पर उसने भी साथ दिया, मन मार कर ही सही। अगले सप्ताह काउंसलिंग के साथ फिर कुछ ऐसे ही होमवर्क मिले। कुछ सेशन बाद परिवार को बुलाया गया। लड़ाइयां अपने आप कम होती जा रही थी।

सास को कई होमवर्क में बहु ने मदद किया था, पुरूषों के पास समय के अभाव की वजह से अगली फ़िल्म दोनों साथ देखने गए थे और काउंसलर के कहे अनुसार पार्लर भी।

हालांकि काउंसलिंग में और भी कई बातें थी, भावनाओं को समझना और उन्हें सम्भालना भी हुआ, पर बदलाव की मुख्य वजह यह थी कि पहली बार यह स्त्री वो चीजे कर पायी जो उसने अपनी सास की डर से कभी नहीं किया था। उसकी सास तो मर गयी पर परम्पराओ का जकड़न साथ रहा, अब यही जकड़न वह बहु पर लादना चाहती थी।लेकिन ज्यादा ध्यान से देखे तो दुःख बहु की हरकतों का नहीं था, दुःख था अपनी आजादी ना पाने का। मां को हमेशा किचन में देखने का आदि बेटा भी कभी नहीं पूछा फ़िल्म देखने चलने के लिये नाही पति ने कभी कहा जाओ सहेलियों के साथ कोई ट्रिप बनाओ। और सच कहा जाए तो उस स्त्री के दिमाग में भी कभी नहीं आया कि उसकी जिंदगी भी किसी अलग गति से अलग रास्ते पर चल सकती है। पर जब एक बार वह अपनी आजादी पाने लगी तो बहु की आजादी देखकर बुरा लगना भी बंद हो गया। काउंसलर ने सास-बहू के समीकरण के बजाय सास की जिंदगी पर ध्यान दिया, उसकी हॉबी ढूंढी, उसके सपनो पर बात की।

इन दिनों वह स्त्री बहु के साथ शिमला जाने के प्लान को लेकर बहुत excited है।

पर ऐसी कहानियाँ तो हर घर में है। अक्सर जब हम पुरानी पीढ़ी के कठोरता की शिकायत करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि यह वह पीढ़ी थी जिसके अस्तित्व की रचना ही मानो जिम्मेदारी निभाने के लिये हुई। हम चाहते हैं वो हमारी आजादी समझे पर कभी कोशिश नहीं करते उन्हें ज्यादा आजाद करने की। पर कोई इंसान जो हमेशा अपने सपनों से समझौता करता रहा iहो, उसे दूसरे की आजादी भी क्यों अच्छी लगेगी??

इसीलिये बेहतर है,नयी पीढ़ी को समझौता करने के बजाय पुरानी पीढ़ी की कुछ जिम्मेदारियाँ  छीन लेनी चाहिये, उन्हें भी आजाद कर देना चाहिये।

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करवाचौथ


करीबन एक दशक पहले हमारी फैक्ट्री से माल लाने ले जाने के लिये हमने कई ऑटो और ट्राली वालों के साथ सम्पर्क कर रखा था।

ऑटो वालों की फेहरिस्त में एक नाम था…..मोहन।
मोहन एक ऐसा शख्स है जो शायद आखरी सांस तक मेरी स्मृतियों में ताज़ा रहेगा। जिसे मैं चाह कर भी नहीं भूल पाऊंगा।

मोहन हद दर्जे का ईमानदार और विश्वसनीय आदमी था।
धुंधला सा याद है……शायद अक्टूबर के महीना शुरु हुआ था।

ऑटो वालों के साथ माल ढुलाई के लिये लेबर आया करती थी। मोहन एक शाम मेरे पास आया। गोडाऊन से माल लोड होने लगा और मैं यह देख कर आश्चर्यचकित हो गया के उसके साथ माल लोड करने वाले व्यक्ति नहीं थे। उसके साथ उसका चचेरा भाई था और वह दोनों मिल कर भारी भरकम बोरे उठा रहे थे।
मैं देख कर आश्चर्यचकित रह गया।
मोहन एक ऑटो ड्राइवर होते हुये स्वयं लेबर का काम कर रहा था।
मैंने उत्सुकतावश उससे पूछा के बंधु आज लेबर वालों को लेकर नहीं आया….. खुद ही भारी भरकम बोरे अपनी कमर पर लाद रहा है।

उसने कहा के शाम का वक्त था….मुझे लेबर वाले नहीं मिल पाये।

बात आयी गयी हो गयी।
एक दिन छोड़ कर वह फिर फैक्ट्री में अपनी कमर पर भारी भरकम बोरे लोड करता दिखाई दिया।

मैंने पुनः उससे पूछा के उसके साथ बोरे लोड करने वाले लेबर के बंधु नहीं आये।

उसने फिर मुझसे कहा के आज लेबरवाले नहीं मिले तो सोचा स्वयं ही माल लोड कर लूं।

एक दो दिन छोड़ कर वह फिर अपनी कमर पर भारी भरकम बोरी उठाता हुआ दिखाई दिया।
मैंने पुनः उससे पूछा तो उसने ठगा हुआ सा जवाब दिया….उसने कहा सेठ “माल मैं लोड करूँ या कोई और आपको तो लोडिंग के पैसे देने हैं।”

मैं उसके जवाब से हतप्रभ रह गया।

भारी भरकम बोरे उठा कर उसने टेम्पू में लोड कर दिये। फिर मेरे आफिस में आया और बोला …..”कुछ पैसे एडवांस दे दीजिये।”

मैंने उसे 500 रुपये एडवांस दे दिये।

वह ऑफिस से बाहर चला गया।
करीबन 10 मिनट बाद वह पुनः लौट कर आया।
बोला …..”आपकी मदद चाहिये।”
मुझे लगा के शायद उसे पैसे की आवश्यकता है।
मैं पर्स से रुपये निकालने ही लगा था के बोला ….”सेठ पैसा नहीं चाहिये”।

मैंने उससे पूछा के पैसा नहीं चाहिये तो किस तरह की मदद चाहिये।

उसका चेहरा लाल हो गया। कुछ समय मौन खड़ा रहा। फिर शर्माता सकुचाता हुआ बोला……आपकी भाभी के लिये एक साड़ी खरीदनी है…..अपने को समझ नहीं है। किसी दुकानदार के बारे में बता दीजिये ….जो अच्छी साड़ी दे दे।”

उस समय मुझे ध्यान आया के अगले दिन करवाचौथ था।
ना जाने मेरे मन में क्या आया मैने मोहन को गाड़ी में बिठाया हम शहर की व्यस्ततम मार्किट में गये वहां एक परिचित की दुकान से हमनें एक साड़ी खरीदी।
बगल की दुकान से एक चमचमाते हुये कागज़ में साड़ी को बाकायदा पैक करवाया।

बिल देने के लिये अपनी जेब से पर्स निकाला ही था के मोहन ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

तत्क्षण उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक पालीथिन निकाला। पालीथिन में कई गांठें बंधी हुई थी।
एक एक कर उसने गांठ खोली।

पालीथिन में 10 रुपये से लेकर 100 रुपये तक के नोट मौजूद थे। पॉलीथिन में रखे रुपये ऐसे लग रहे थे जैसे किसी अबोध बच्चे ने अपनी पसंदीदा चीज़ खरीदने के लिये सिक्के जमा किये हों। पालीथिन में वह 500 रुपये भी मौजूद थे जो उसने मुझसे एडवांस लिये थे और वह 10 – 20 रुपये के नोट भी मौजूद थे जो वह भारी भरकम बोरे उठा कर वह कमाता रहा था।

मेरे बारम्बार आग्रह करने के बाद भी उसने साड़ी के बिल के लिये एक पैसा भी लेने से इनकार कर दिया।

उसकी खुद की कमाई से खरीदी हुई साड़ी को जब मैंने उसे हाथ में थमाया तो उसकी आँखों की चमक देखने लायक थी।

सकुचाते हुये उसने बतलाया के यह पहला तोहफा है जो शादी के 5 साल बाद वह अपनी अर्धांगनी को देने जा रहा है।

उस समय मेरी आँखों के आगे अपनी कमर पर भारी भरकम बोरे लाद कर एक एक पाई जमा करते मोहन की छवि सामने आ गयी।

हिंदुस्तान में औरत के मर्द के प्रति प्रेम और समर्पण के विषय में लिखने की मेरे पास शब्द नहीं हैं। हिंदुस्तानी नारी वाकई सब पर भारी है। उनका प्रेम ,उनका त्याग ,उनका समर्पण , अविश्वनीय है, अकल्पनीय है।

परंतु यकीन कीजिये के यह जीवन रूपी रेल अगर सरपट दौड़ रही है तो एक बहुत बड़ा योगदान हिंदुस्तानी पुरूष का भी है।

शायद वह आपसे किसी यूरोपियन , अमेरिकन या आस्ट्रेलियन की तरह आई लव यू स्वीटहार्ट ना कह सके…..लेकिन वह आपके लिये एक साड़ी खरीदने के लिये अपनी कमर पर भारी भरकम बोरी ढोने के लिये एक पल भी नहीं हिचकिचायेगा।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

प्राचीन तेलहारा विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय का प्रतिस्पर्धी था। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग और इत्सिंग ने अपनी यात्रा वृतांतों में तेलहारा विश्वविद्यालय का उल्लेख एक उच्च शोध केंद्र के रूप में किया है।

पुरातत्वविद कनिंघम, जिन्होंने इस स्थल पर छह टीले और अभिलेख खोजे थे, ने इस क्षेत्र को टेल्याधक या तेलाधक कहा था।

यह एक तीन-मंजिला विश्वविद्यालय था, जिसमें एक प्रार्थना कक्ष और 1,000 से अधिक छात्रों/भिक्षुओं के बैठने के लिए एक मंच था। इन इमारतों में आंगन, तीन-मंजिला मंडप, मीनारें, द्वार आदि शामिल थे। कनिंघम ने यहां एक मस्जिद की खोज की, जिसकी छत विशाल पत्थर की पट्टियों से बनी थी, जो पत्थर की बीमों पर टिकी हुई थीं। मस्जिद के निर्माण में उपयोग की गई सामग्री एक मंदिर के अवशेष थे।

खुदाई के दौरान, एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) की टीम को 1.5 फुट मोटी राख की परत मिली, जिससे यह संकेत मिलता है कि तेलहारा विश्वविद्यालय को नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों की तरह नष्ट और जला दिया गया था।

इस प्राचीन विश्वविद्यालय का पूरा विवरण ‘विश्वगुरु भारत: प्रतिध्वनि प्राचीन काल की’ (अध्याय 10) में दिया गया है, जिसमें अन्य प्राचीन विश्वविद्यालयों और गुरुकुलों का भी विवरण है। (लिंक: https://www.amazon.in/gp/product/B0CMCQ5B7G/)

मनोशी सिन्हा; छवि स्रोत: गूगल।


फेसबुक पेज MyIndiaMyGlory की दीवार से।

Posted in हिन्दू पतन

उन जेहादी बलात्कारियों से जब उस माँ ने कहा “अब्दुल अली एक-एक करके करो, नहीं तो वो मर जाएंगी “।

ये सच्ची घटना घटित हुई थी 8 अक्टूबर 2001 को बांग्लादेश में।

अनिल चंद्र और उनका परिवार 2 बेटीयों पूर्णिमा व 6 वर्षीय छोटी बेटी के साथ बांग्लादेश के सिराजगंज में रहता था। उनके पास जीने खाने और रहने के लिए पर्याप्त जमीन थी. बस एक गलती उनसे हो गयी, और ये गलती थी एक हिंदु होकर 14 साल व 6 साल की बेटी के साथ बांग्लादेश में रहना। एक क़ाफिर के पास इतनी जमीन कैसे रह सकती है..? यही सवाल था बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिद ज़िया के पार्टी से सम्बंधित कुछ उन्मादी लोगों का।

8 अक्टूबर के दिन अब्दुल अली, अल्ताफ हुसैन, हुसैन अली, अब्दुर रउफ, यासीन अली, लिटन शेख और 5 अन्य लोगों ने अनिल चंद्र के घर पर धावा बोल दिया, अनिल चंद्र को मारकर डंडो से बाँध दिया, और उनको काफ़िर कहकर गालियां देने लगे।

इसके बाद ये शैतान माँ के सामने ही उस १४ साल की निर्दोष बच्ची पर टूट पड़े और उस वक्त जो शब्द उस बेबस लाचार मां के मुँह से निकले वो पूरी इंसानियत को झंकझोर देने वाले हैं।

अपनी बेटी के साथ होते इस अत्याचार को देखकर उसने कहा “अब्दुल अली, एक एक करके करो, नहीं तो मर जाएगी, वो सिर्फ १४ साल की है।”

वो यहीं नहीं रुके उन माँ बाप के सामने उनकी छोटी 6 वर्षीय बेटी का भी सभी ने मिलकर ब#लात्कार किया ….उनलोगों को वही मरने के लिए छोडकर  जाते जाते आस पड़ोस के लोगों को धमकी देकर गए की कोई इनकी मदद नहीं करेगा।

ये पूरी घटना बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी अपनी किताब “लज्जा” में लिखी जिसके बाद से उनको देश छोड़ना पड़ा, ये पूरी घटना इतनी हैवानियत से भरी है पर आजतक भारत में किसी बुद्धिजीवी ने इसके खिलाफ बोलने की हैसियत तक नहीं दिखाई है, ना ही किसी मीडिया हाउस ने इसपर कोई कार्यक्रम करने की हिम्मत जुटाई।

ये होता है किसी इस्लामिक देश में हिन्दू या कोई अन्य अल्पसंख्यक होने का, चाहे वो बांग्लादेश हो या पाकिस्तान।

पता नहीं कितनी पूर्णिमाओं की ऐसी आहुति दी गयी होगी बांग्लादेश में हिंदुओं की जनसँख्या को 22 प्रतिशत से 5 प्रतिशत और पाकिस्तान में 15 प्रतिशत से 1 प्रतिशत पहुँचाने में।

और हिंदुस्तान में हामिद अंसारी जैसे घिनौने लोग कहते है कि हमें डर लगता है!!!
जहाँ उनकी आबादी आज़ादी के बाद से 24 प्रतिशत अधिक बढ़ी है। अगर आप भी सेक्युलर हिंदु (स्वघोषित बुद्धिजीवी) हैं और आपको भी लगता है कि भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है तो कभी बांग्लादेश या पाकिस्तान की किसी पूर्णिमा को इन्टरनेट पर ढूंढ कर देखिये। मेरा दावा है कि आपका नजरिया बदल जाएगा!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक पिता ने अपने बेटे से कहा, “तुमने सम्मान के साथ स्नातक किया है। यह एक वॉल्क्सवैगन बीटल है, जिसे मैंने कई साल पहले खरीदा था… यह 50 साल से भी पुरानी है, लेकिन इसे तुम्हें देने से पहले, इसे शहर के एक डीलरशिप पर ले जाओ और पूछो कि वे इसे कितने में खरीदेंगे।”

बेटा डीलरशिप पर गया और वापस आकर बोला, “उन्होंने केवल 2,000 पेसो की पेशकश की क्योंकि यह बहुत पुरानी और इस्तेमाल की हुई लगती है।”

पिता ने कहा, “इसे एकpawn shop (गिरवी रखने वाली दुकान) पर ले जाओ।”

बेटा वहां गया और वापस आकर बोला, “उन्होंने सिर्फ 10,000 पेसो की पेशकश की क्योंकि उनका कहना था कि यह बहुत पुरानी है।”

आखिर में, पिता ने बेटे से कहा कि वह इस कार को एक क्लासिक कार क्लब में ले जाकर दिखाए। बेटा क्लब गया और वापस आकर बोला, “वहां कुछ लोगों ने मुझे 10 लाख से 20 लाख पेसो तक की पेशकश की, क्योंकि यह कार बहुत दुर्लभ है और क्लब के सदस्यों के बीच इसकी बहुत मांग है।”

पिता ने मुस्कुराते हुए बेटे से कहा, “मैं चाहता था कि तुम यह समझो कि सही जगह पर ही तुम्हारी सही कद्र होती है। यदि कोई तुम्हारी कद्र नहीं करता, तो नाराज़ मत होना, इसका मतलब सिर्फ इतना है कि तुम गलत जगह पर हो। तुम्हारी असली कीमत वही लोग समझेंगे जो सच में तुम्हें महत्व देते हैं। कभी भी वहां मत रहो, जहां तुम्हारी कद्र न हो!”

Posted in Love Jihad

हनी ट्रैप की आड़ में जासूसी का केस
        माधुरी गुप्ता भारतीय विदेश सेवा की वरिष्ठ अधिकारी थी ।
       वह 52 साल की थी  लेकिन अविवाहित थी उसने इजिप्ट मलेशिया जिंबॉब्वे इराक लीबिया सहित तमाम देशों में वरिष्ठ पदों पर काम किया था।  उर्दू पर अच्छी पकड़ के लिए उसे पाकिस्तान भेजा गया जहां उसे वीजा के साथ-साथ मीडिया प्रभार भी दिया गया था
      पाकिस्तान में तैनात होने वाले सभी अधिकारियों पर इंटेलिजेंस की पूरी नजर रहती है
      एक पार्टी में माधुरी गुप्ता को जमशेद उर्फ जिमी नमक 30 साल का एक युवक मिला उसे युवक ने अपनी वॉकपटुता और हाजिर जवाबी से माधुरी गुप्ता का दिल मोह लिया और माधुरी गुप्ता उसे युवक के प्यार में पड़ गई इतना ही नहीं माधुरी गुप्ता ने इस्लाम तक कबूल कर लिया
       इंटेलिजेंस की नजर माधुरी गुप्ता पर और तेज हो गई उनके ईमेल और फोन सर्विलांस पर लगा दिए गए तब पता चला कि माधुरी गुप्ता जमशेद के प्यार में देशद्रोही बन गई है और वह भारत की गुप्त सूचनाएं जमशेद को बता रही हैं
      दरअसल जमशेद ISI का जासूस था ISI ने ही उसे ट्रेनिंग देकर माधुरी गुप्ता को फंसाने के लिए लगाया था , क्योंकि ISI को जब पता चला कि 52 साल की उम्र में माधुरी गुप्ता अविवाहित है, तो उन्हें जरूर उन्हें किसी साथी की तलाश होगी ।
       उसके बाद उन्हें बहाने से भारत बुलाया गया और दिल्ली उतरते ही गिरफ्तार कर लिया गया उन्होंने जब सब सबूत देखा तब जुल्म स्वीकार किया उन्हें 3 साल की सजा हुई ।
     लेकिन कोविड महामारी के दौरान कुछ समय के लिए उन्हें जेल से जमानत मिल गई और वह गुमनामी में अजमेर चली गई,  और फिर खबर आई की गुमनामी में ही माधुरी गुप्ता का निधन हो गया,  उसे कोविद डायबिटीज और दूसरी कई बीमारियां एक साथ हो गई ।
     उसका अंतिम संस्कार भी मोहल्ले वालों ने और नगर निगम ने किया उसके मरने के बाद ना तो कोई रोने वाला था ना कोई दूसरे और संस्कार करने वाला था ।

     ये सत्य और बीती कहानी शेयर करने का मुद्दा और सोचने की बात ये है कि इतनी पढ़ी-लिखी और इतने वरिष्ठ पद पर तैनात 52 साल की मेच्योर महिला भी लव जिहाद में फंस जाती है,     
         तो फिर हम चौदह पन्द्रह सोलह साल की मासूम बच्चियों से कैसे उम्मीद करें कि वो किसी मकड़जाल में न फंसे ❓
     हर बार लवजेहाद की हर घटना पर और लव-जेहाद में हत्या पर ज्यादातर प्रतिक्रिया यही होती है कि , अच्छा हुआ, हमें उससे कोई हमदर्दी नहीं ,
     जबकि हम हिन्दुओं का लगभग रोज ऐसी घटनाओं से सामना हो रहा है ।

     कब तक बचेंगे ये कहकर कि अच्छा हुआ
कब तक अपराधी पक्ष हमारे ये कहने के कारण हौसले बुलंद रखेगा ? कब तक हम एक शिकार को ही अपराधी मनाकर अपने आप न्यायाधीश बने रहेंगे कि , क्योंकि उसने ऐसा किया था तो उसको सजा मिल गई?

       कब तक हम हैवानों के लिए कहते रहेंगे कि उनसे बचकर रहो।