ंग की महिमा
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अजामिल के पूर्व जन्म में संस्कार अच्छे थे | इस जन्म में वेश्या के संग से उसका पतन हो गया था | बाद में संतों के संग से उसका कल्याण हो गया | महान नीच होने पर भी सत्संग पाकर उसका कल्याण हो गया |
आपका मूल प्रश्न है कि पूर्व जन्म के संस्कार के कारण ही महात्माओं का संग होता है या और कोई कारण है ? कैसा ही पापी हो, यत्किंचित पुण्य के संस्कार भी मिल ही जाते हैं |
एक महात्मा के पास कोई रूपये के लिये आता है, कोई अपने कल्याण के लिये आता है | जो नि:स्वार्थभाव से संग करने आता है, उसे अधिक लाभ होता है |
एक व्यक्ति भगवान् की भक्ति मुक्ति के लिये करता है, एक अपना संकट निवारण के लिये, एक निष्कामभाव से करता है | जो निष्कामभाव से करता है, भगवान् को वह अधिक प्यारा है, जैसे प्रहलाद | कहने पर भी कुछ नहीं लेता | जितना ऊँचा निष्काम भाव है, उतना ही मूल्यवान है | आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु सबकी श्रध्दा है, परन्तु निष्कामी की विशेषता है | सबको लाभ मिलता है, पर सबको समान नहीं मिलता | साधारण लाभ तो सत्संग में मिलता ही है | भाव भी नहीं है, प्रेम भी नहीं है, श्रध्दा भी नहीं है, तब भी लाभ होता ही है |
अजामिल की थोड़ी तो श्रध्दा थी ही, जिसके कारण साधुओं के कहने से पुत्र का नाम नारायण रखा | उसके पूर्व का संस्कार था, किन्तु जिसके पूर्व का संस्कार नहीं होता, वह भी सत्संग के प्रताप से महान पापी होने पर भी महात्मा बन सकता है | लाखों – करोड़ों में कोई एक ही महात्मा होते हैं | उनकी पहचान होनी कठिन है | ईश्वर की दया महात्मा की दया से ही होती है | यह कठिन भी है, सुगम भी है, प्रयत्न साध्य भी है |