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मोबाइल का मकड़जाल


बात उस समय की है जब मैं ग्यारहवी कक्षा जब पढ़ती थी। मैं पढ़ाई में हमेशा अव्वल आती थी। सभी गुरुजी मेरी तारीफ करते थे। मेरे पापा ने मुझे मेरे जन्मदिन पर एक मोबाइल उपहार में लाकर दिया।

मैं पढ़ाई से लेकर हर चीज के लिए धीरे-धीरे मोबाइल पर निर्भर होने लगी। मुझे पत्ता ही नहीं चला कि में कब पूर्णतया मोबाइल के मकड़जाल के फंस गई। ग्यारहवीं के पेपर होने वाले थे।

परीक्षा के बाद जब रिजल्ट आया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे नंबर बहुत कम आए हैं। गुरुजी ने मुझसे पूछा कि बेटा इस बार आपने पढ़ाई सही तरह से नहीं की इस वजह से आपके नंबर इतने कम आए हैं। मैंने कहा, ‘गुरुजी मैंने तो रात-दिन पढ़ाई मोबाइल से की है।’ गुरुजी ने कहा, “बेटा मोबाइल में हर चीज सही नहीं होती अगर सही होती तो स्कूलों में हमें पढ़ाने की जरूरत क्यों होती? जो हम सिखा सकते हैं वह मोबाइल नहीं सिखा सकता।’ मेरी आंखें खुल गईं। मैंने माता-पिता और गुरु जी से माफी मांगी। फिर रात दिन किताबों से पढ़ाई की और बारहवीं कक्षा में 90% से उत्तीर्ण हुई। मुझे समझ आ गया मोबाइल उपयोगी चीज है पर हमेशा हर चीज के लिए नहीं।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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वसंत का संदेश


एक छोटे से गांव में तन्विक नाम का एक युवक रहता था। वह अत्यंत मेहनती था, लेकिन जीवन में विफलताओं से निराश हो चुका था। वह एक साधु के पास गया और बोला,’बाबा, मैं कितना भी परिश्रम करूं, सफलता मेरे पास नहीं आती।’ साधु बोले, ‘बेटा, आओ, तुम्हें वसंत का एक रहस्य दिखाऊं।’ उन्होंने कहा, ‘देखो, यह पेड़ है। क्या यह सर्दियों में फल देता है?’ ‘नहीं बाबा, सर्दियों में तो यह सूखा सा दिखता है।’ साधु बोले, ‘क्या यह पेड़ मृत है? नहीं! यह अपनी जड़ों को मजबूत कर रहा होता है।
ठंड सहन कर रहा होता है, ताकि वसंत के आते ही यह हरी-भरी टहनियों और मीठे फलों से भर जाए।
जीवन में भी कठिनाइयों के दिन सर्दी के समान होते हैं। यदि तुम धैर्य रख अपने प्रयास जारी रखोगे, तो सफलता का वसंत अवश्य आएगा।’

तन्विक ने साधु की बात गांठ बांध ली। उसने परिश्रम जारी रखा। उसका व्यापार चल पड़ा। कुछ वर्षों बाद, वह गांव का सबसे सफल व्यक्ति बन गया।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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नया वसंत


वसंत का मौसम अनिका के लिए सबसे खूबसूरत मौसम हुआ करता था। इसी मौसम में यो पहली बार राज से मिली थी। हालांकि यह रिश्ता अनिका के माता-पिता ने ही तय किया था। परंतु फिर भी अनिका की राज से मिलने के बाद जो एहसास हुआ वह बिल्कुल नया और खूबसूरत था। अनिका तब केवल 21 साल की थी और राज उसका पहला प्यार। फिर वसंत पंचमी के दिन वे दोनों विवाह के बंधन में बंध गए।

अनिका ने राज और राज के परिवार को कभी भी शिकायत का कोई मौका नहीं दिया। राज अवसर अपने काम में बहुत व्यस्त रहता था। अनिका ने राज के परिवार को जिस तरह अपनाया था। लगता ही नहीं था कि वह राज का परिवार है। सब रिश्ते नाते अनिका के अपने लगते थे। राज के माता-पिता की सेवा हो या बच्चे की परवरिश। अनिका ने सब इतनी लगन और ईमानदारी से किया था कि जिसकी मिसाल दी जा सकती थी। अनिका ने अपने जीवन के 24 वसंत राज को निस्वार्थ और सच्चा प्रेम किया।

और अब वह काफी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गई थी। राज के माता-पिता अब नहीं रहे थे। अनिका और राज का बेटा भी विदेश के अच्छे कॉलेज में पढ़ रहा था। इस बार पहली बार अनिका ने अपने लिए कुछ सोचा। वह अपनी शादी की 25वीं सालगिरह धूमधाम से मनाना चाहती थी।

वो बहुत ज्यादा उत्साहित थी। अपने प्यार के 25वें वसंत को लेकर। जैसे-जैसे वसंत पंचमी की तारीख करीब आ रही थी। अनिका की तैयारियां भी जोर शोर से चल जा रही थीं। तभी अनिका के सपनों पर ऐसा कहर टूटा जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। राज ने अनिका को कहा, ‘शादी की सालगिरह मनाने की कोई आवश्यकता नहीं।

वो काफी दिनों से अनिका को बताना चाह रहा था कि वह किसी और से प्यार करता है। और अब वह उसी के साथ रहना चाहता है। और अनिका को इस बात से कोई आपत्ति ना हो तो वह इस घर में आराम से रह सकती है। अन्यथा वह जैसा चाहे।’ राज ने इतने साफ शब्दों में अपनी बात कह दी अनिका को कुछ समझ ही नहीं आया कि वह क्या करे।

अनिका के लिए यह गहरे सदमे से कम नहीं था। उसे लगा उसका अब तक का सारा जीवन अर्थहीन हो गया। उसकी सारी भावनाएं अपने आप को छला हुआ महसूस कर रही थी। वो कुछ भी नहीं कह पाई और चुपचाप अपना सामान उठाकर मायके चली आई। उसे समझ नहीं आ रहा था किसी से क्या कहें?

उसके जीवन में तो वसंत की जगह पतझड़ आ गया। मां भी अब नहीं रही। पिता और छोटे भाई को यह कैसे कहेगी और मायके भी कब तक रह पाएगी। और वापस राज के पास जाना मतलब अपने आत्मसम्मान से समझौता करना। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था। इस तरह अचानक अनिका का मायके आ जाना।

और उसके चेहरे का उड़ा रंग देखकर पिताजी ने उससे पूछ ही लिया। ‘बेटा क्या बात है?’ अनिका अपना दर्द कहने से खुद को रोक नहीं पाई।

पिता के सामने सारा दर्द आंसू बनकर बह गया। पिता को सुनकर बहुत धक्का लगा।

उम्र के इस पड़ाव पर यह सब तो उनकी सोच से भी परे था। उन्होंने अनिका को संभालते हुए कहा, ‘बेटा में दामाद जी से बात करूंगा। वो ऐसा नहीं कर सकते।’

पर आनिका ने सोच लिया था। जहां उसके प्रेम का ऐसा तिरस्कार हुआ है। वहां वो कभी वापस नहीं जाएगी। पर रास्ता भी नजर नहीं आ रहा था। कोई दूसरा

पिछले 24 सालों से तो उसने राज के घर परिवार को संभालने के अलावा कुछ सोचा भी नहीं था।

अगले दिन वसंत पंचमी थी और अनिका के पिता ने राज को समझा-बुझाकर अनीता को वापस ले जाने के लिए बुला लिया था। परंतु अनिका का मन इस समझौते के लिए तैयार नहीं था। जैसे ही आनिका के मायके में मां सरस्वती की पूजा समाप्त हुई। राज अनिका को लेने पहुंच चुका था।

पिता ने अनिका को समझाया, ‘बेटा इस उम्र में अब कहां जाओगी। समझदारी से काम लो सब ठीक हो जाएगा।’

जैसे ही अनिका राज के साथ जाने के लिए तैयार हुई, तभी अनिका को मां कहते हुए बेटे ने उसे कसकर गले लगा लिया।

दरअसल, अनिका के छोटे भाई ने फोन करके अनिका के बेटे को सब कुछ बता दिया था।

बेटे ने मां के आंसू पूछते हुए कहा, ‘मां आपका प्यार, आपकी भावनाएं कभी व्यर्थ नहीं हो सकती। आपको कोई आवश्यकता नहीं है अपने आत्मसम्मान से समझौता करने की। आप मेरे साथ चलिए। में वादा करता हूं। मैं आपके जीवन में वसंत का मौसम कभी खत्म नहीं होने दूंगा।’

अनिका की आंखों में खुशी की चमक थी। उसका निश्चल प्रेम राज को चाहे समझ ना आया हो पर उसकी संतान उसके साथ खड़ी थी।

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सीखने की प्रवृत्ति


एक बार गाँव के दो व्यक्तियों ने शहर जाकर पैसे कमाने का निर्णय लिया।

शहर जाकर कुछ महीने इधर-उधर छोटा-मोटा काम कर दोनों ने कुछ पैसे जमा किये।

फिर उन पैसों से अपना-अपना व्यवसाय प्रारंभ किया।दोनों का व्यवसाय चल पड़ा।

दो साल में ही दोनों ने अच्छी ख़ासी तरक्की कर ली।
व्यवसाय को फलता-फूलता देख पहले व्यक्ति ने सोचा कि अब तो मेरे काम चल पड़ा है।

अब तो मैं तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ता चला जाऊंगा, लेकिन उसकी सोच के विपरीत व्यापारिक उतार-चढ़ाव के कारण उसे उस साल अत्यधिक घाटा हुआ।
अब तक आसमान में उड़ रहा वह व्यक्ति यथार्थ के धरातल पर आ गिरा। वह उन कारणों को तलाशने लगा, जिनकी वजह से उसका व्यापार बाज़ार की मार नहीं सह पाया।

सबसे पहले उसने उस दूसरे व्यक्ति के व्यवसाय की स्थिति का पता लगाया, जिसने उसके साथ ही व्यापार आरंभ किया था। वह यह जानकर हैरान रह गया कि इस उतार-चढ़ाव और मंदी के दौर में भी उसका व्यवसाय मुनाफ़े में है।
उसने तुरंत उसके पास जाकर इसका कारण जानने का निर्णय लिया।

अगले ही दिन वह दूसरे व्यक्ति के पास पहुँचा।दूसरे व्यक्ति ने उसका खूब आदर-सत्कार किया और उसके आने का कारण पूछा।

तब पहला व्यक्ति बोला, “दोस्त! इस वर्ष मेरा व्यवसाय बाज़ार की मार नहीं झेल पाया।बहुत घाटा झेलना पड़ा।

तुम भी तो इसी व्यवसाय में हो,तुमने ऐसा क्या किया कि इस उतार-चढ़ाव के दौर में भी तुमने मुनाफ़ा कमाया?”
यह बात सुन दूसरा व्यक्ति बोला, “भाई! मैं तो बस सीखता जा रहा हूँ, अपनी गलती से   भी और साथ ही दूसरों की गलतियों से भी।
जो समस्या सामने आती है, उसमें से भी सीख लेता हूँ। इसलिए जब दोबारा वैसी समस्या सामने आती है, तो उसका सामना अच्छे से कर पाता हूँ और उसके कारण मुझे नुकसान नहीं उठाना पड़ता।

बस ये सीखने की प्रवृत्ति ही है, जो मुझे जीवन में आगे बढ़ाती जा रही है.”
दूसरे व्यक्ति की बात सुनकर पहले व्यक्ति को अपनी भूल का अहसास हुआ। सफ़लता के मद में वो अति-आत्मविश्वास से भर उठा था और सीखना छोड़ दिया था।
वह यह प्रण कर वापस लौटा कि कभी सीखना नहीं छोड़ेगा। उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ता चला गया।

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विकल्प



एक धनी व्यक्ति का बटुआ बाजार में गिर गया।उसे घर पहुंच कर इस बात का पता चला।बटुए में जरूरी कागजों के अलावा कई हजार रुपये भी थे। फौरन ही वो मंदिर गया और प्रार्थना करने लगा कि बटुआ मिलने पर प्रसाद चढ़ाउंगा,गरीबों को भोजन कराउंगा आदि।

संयोग से वो बटुआ एक बेरोजगार युवक को मिला।बटुए पर उसके मालिक का नाम लिखा था।इसलिए उस युवक ने सेठ के घर पहुंच कर बटुआ उन्हें दे दिया। सेठ ने तुरंत बटुआ खोलकर देखा। उसमें सभी कागजात और रुपये यथावत थे।

सेठ ने प्रसन्न हो कर युवक की ईमानदारी की प्रशंसा की और उसे बतौर इनाम कुछ रुपये देने चाहे, जिन्हें लेने से युवक ने मना कर दिया।इस पर सेठ ने कहा, अच्छा कल फिर आना।

युवक दूसरे दिन आया तो सेठ ने उसकी खूब खातिरदारी की। युवक चला गया। युवक के जाने के बाद सेठ अपनी इस चतुराई पर बहुत प्रसन्न था कि वह तो उस युवक को सौ रुपये देना चाहता था। पर युवक बिना कुछ लिए सिर्फ खा -पी कर ही चला गया।

उधर युवक के मन में इन सब का कोई प्रभाव नहीं था, क्योंकि उसके मन में न कोई लालसा थी और न ही बटुआ लौटाने के अलावा और कोई विकल्प ही था।

सेठ बटुआ पाकर यह भूल गया कि उसने मंदिर में कुछ वचन भी दिए थे।सेठ ने अपनी इस चतुराई का अपने मुनीम और सेठानी से जिक्र करते हुए कहा कि देखो वह युवक कितना मूर्ख निकला।

हजारों का माल बिना कुछ लिए ही दे गया। सेठानी ने कहा, तुम उल्टा सोच रहे हो। वह युवक ईमानदार था। उसके पास तुम्हारा बटुआ लौटा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। उसने बिना खोले ही बटुआ लौटा दिया। वह चाहता तो सब कुछ अपने पास ही रख लेता। तुम क्या करते?

ईश्वर ने दोनों की परीक्षा ली। वो पास हो गया, तुम फेल। अवसर स्वयं तुम्हारे पास चल कर आया था, तुमने लालच के वश उसे लौटा दिया। अब अपनी गलती को सुधारो और जाओ उसे खोजो।

उसके पास ईमानदारी की पूंजी है, जो तुम्हारे पास नहीं है। उसे काम पर रख लो।

सेठ तुरत ही अपने कर्मचारियों के साथ उस युवक की तलाश में निकल पड़ा। कुछ दिनों बाद वह युवक किसी और सेठ के यहां काम करता मिला।

सेठ ने युवक की बहुत प्रशंसा की और बटुए वाली घटना सुनाई, तो उस सेठ ने बताया, उस दिन इसने मेरे सामने ही बटुआ उठाया था।

मैं तभी अपने गार्ड को लेकर इसके पीछे गया। देखा कि यह तुम्हारे घर जा रहा है। तुम्हारे दरवाजे पर खड़े हो कर मैंने सब कुछ देखा व सुना। और फिर इसकी ईमानदारी से प्रभावित होकर इसे अपने यहां मुनीम रख लिया।

इसकी ईमानदारी से मैं पूरी तरह निश्चिंत हूं।बटुए वाला सेठ खाली हाथ लौट आया। पहले उसके पास कई विकल्प थे , उसने निर्णय लेने में देरी की उस ने एक विश्वासी पात्र खो दिया। युवक के पास अपने सिद्धांत पर अटल रहने का नैतिक बल था।उसने बटुआ खोलने के विकल्प का प्रयोग ही नहीं किया। युवक को ईमानदारी का पुरस्कार मिल गया दूसरे सेठ के पास निर्णय लेने की क्षमता थी। उसे एक उत्साही , सुयोग्य और ईमानदार मुनीम मिल गया।

जिन वस्तुओं के विकल्प होते हैं , उन्हीं में देरी होती है। विकल्पों पर विचार करना गलत नहीं है।लेकिन विकल्पों पर ही विचार करते रहना गलत है।हम ‘ यह या वह ‘ के चक्कर में फंसे रह जाते हैं।

किसी संत ने कहा है- विकल्पों में उलझकर निर्णय पर पहुंचने में बहुत देर लगाने से लक्ष्य की प्राप्ति कठिन हो जाती है।

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लोहे का तराजू



एक बार एक व्यापारी को व्यापार के सिलसिले में परदेस जाना था और उसके लिए पैसों की जरूरत थी। वह एक साहूकार के पास गया और उससे पैसे उधार लिए। व्यापारी ने अपनी लोहे की तराजू साहूकार के पास गिरवी रखवा दी।

अपनी यात्रा से वापस आने के बाद, व्यापारी साहूकार के घर गया। उसने उसके पैसे वापस किए और उससे अपनी तराजू मांगा। लालची साहूकार बोला, “मेरी दुकान में बहुत सारे चूहे हैं। चूहों ने तुम्हारी तराजू कुतर दिया।”

व्यापारी को पता था कि साहूकार झूठ बोल रहा है पर उसने साहूकार से कोई बहस नहीं किया। उसने कहा, “कोई बात नहीं। मैं तुम्हारे लिए रेशम के कुछ कपड़े की थान लाया हूं। क्या तुम अपने बेटे को मेरे साथ भेज दोगे? वह कपड़ों के थान को लेकर वापस आ जाएगा।” सौदागर की आंखें चमक उठी और उसने अपने बेटे को व्यापारी के साथ भेज दिया।

व्यापारी साहूकार के बेटे को एक गुफा में ले गया और बोला, “मैंने अपना सामान इस गुफा में रखा हुआ है। अंदर जाकर दो थान निकाल लो।” जैसे ही लड़का अंदर गया, व्यापारी ने गुफा का दरवाजा बंद कर दिया। व्यापारी अकेला साहूकार के पास गया। परेशान साहूकार ने पूछा, “मेरा बेटा कहां है?”

व्यापारी ने कहा, “मुझे माफ करना। एक चील तुम्हारे बेटे को अपने पंजे में दबाकर उड़ गया।”

साहूकार गुस्से में बोला, “ऐसा कैसे हो सकता है? मैं तुम्हारी शिकायत गांव के बड़े बुजुर्ग से करूंगा।”

जब बुजुर्गों ने व्यापारी से लड़के को वापस करने को कहा तो व्यापारी बोला, “जब लोहे के तराजू को चूहा खा सकता है, तो लड़के को चील कैसे नहीं उठा सकता?”

उन लोगों ने व्यापारी से पूरा मामला बताने को कहा। व्यापारी की बात सुनकर बुजुर्गों ने साहूकार को तराजू वापस देने को कहा।

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જીવન માં સુખ દુખ ની ગતી સમજાવતી આજ ની વાર્તા

ગામડામાં રહેતા એક ખેડુત પાસે એક જાતવાન ઘોડો હતો. આખા પંથકમાં બધા એના આ ઘોડાના ખુબ વખાણ કરતા. કેટલાય ઘોડેસ્વારો આ ઘોડાના મો માંગ્યા દામ આપવા તૈયાર હતા પરંતું ખેડુત ઘોડો વેંચવા માંગતો નહોતો કારણકે એ ઘોડાને ખુબ પ્રેમ કરતો હતો.

એકદિવસ સવારે જાગીને એણે જોયુ તો એનો ઘોડો ગાયબ હતો. એણે ઘોડાને શોધવાના ખુબ પ્રયાસ કર્યા પણ ઘોડો ન મળ્યો. ગામના લોકોએ આ ખેડુતને કહ્યુ , “ ભાઇ, તમારા નસીબ ખરાબ છે કે તમારો જાતવાન ઘોડો ચોરાઇ ગયો.” ખેડુતે ગામ લોકોને કહ્યુ , “ મારા નસીબ ખરાબ છે કે સારા એ નક્કી કરનારો હું કે તમે કોણ ? કુદરતના આયોજનને સમજી શકવા માટે આપણે કોઇ સક્ષમ નથી.”

ગામ લોકો તો અંદરો અંદર વાતો કરતા જતા રહ્યા કે “ આ ડોહાનું ચસકી ગયુ છે એનો ઘોડો જતો રહ્યો એના આઘાતમાં આવી વાતો કરે છે.”. થોડા દિવસ પછી ઘોડો પાછો આવ્યો અને એની સાથે બીજા 10 જંગલી ઘોડાને લાવ્યો. ગામ લોકોને આ સમાચાર મળ્યા એટલે બધા ખેડુતને મળવા આવ્યા અને કહ્યુ , “ તમે તે દિવસે સાચુ કહેતા હતા. તમારા નસિબ ખરાબ નહી સારા છે અને એટલે આ ઘોડો બીજા 10 ઘોડાને પોતાની સાથે લાવ્યો છે.” ખેડુતે કહ્યુ, “ તમે હજુ તમે મારી વાત ને સમજી શક્યા નથી. આ ઘટના મારા સારા નસિબ છે એમ પણ ન કહી શકાય.”

થોડા દિવસ બાદ નવા આવેલા જંગલી ઘોડાને તાલીમ આપતી વખતે ખેડુતનો એકનો એક યુવાન દિકરો ઘોડા પરથી પડ્યો અને એના હાથ-પગ ભાંગી ગયા. ખેડુતનો એકમાત્ર આધાર પથારીવશ થઇ ગયો. ગામલોકો ખબર કાઢવા આવ્યા અને કહ્યુ , “ તમારી વાત બીલકુલ સાચી હતી. આ જંગલી ઘોડાઓ આવ્યા તે તમારા સારા નસિબ નહોતા જો ઘોડા ના આવ્યા હોત તો તમારો દિકરો સાવ સાજો નરવો હોત.તમારા નસિબ ખરાબ કે દિકરો ખાટલે પડ્યો.” ખેડુતે દુ:ખી થતા કહ્યુ , “ ભાઇઓ દિકરાના હાથપગ ભાંગ્યા તો એ મારા ખરાબ નસિબ છે એમ પણ ન કહેવાય કારણકે કુદરતના કાર્યનો તાગ કાઢવો મુશ્કેલ છે.”

થોડા સમય પછી યુધ્ધ જાહેર થયુ. સરકારના માણસો ગામમાં આવીને બધા જ યુવાનોને યુધ્ધમાં લડાઇ કરવા માટે ફરજીયાત લઇ ગયા પણ આ ખેડુતના દિકરાને છોડી દીધો કારણકે એ તો લડી શકે તેમ હતો જ નહી. ગામલોકો ફરી આ ખેડુતની ઘરે ગયા અને કહ્યુ , “ તમારા નસિબ સારા છે કે તમારા દિકરાના હાથપગ ભાંગ્યા કમસેકમ આ છોકરો તમારી નજર સામે તો છે.” ખેડુત ખડખડાટ હસવા લાગ્યો.

જીવનમાં આવતા ચડાવ ઉતાર જીવન આપનારાએ ગોઠવેલા છે. જીવનમાં બનતી જુદી-જુદી ઘટના વખતે ‘ મારા નસિબ સારા છે’ કે ‘મારા નસિબ ખરાબ છે’ નો હર્ષ-શોક કરવાને બદલે કુદરતે નક્કી કરેલા પ્રવાહમાં જીવનનૌકાને મુકત રીતે વહેતી મુકવામાં આવે તો એની મજા કંઇક જુદી જ છે

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तीन ग्रैंड स्लैम पदक जीतने वाले अमेरिकी टेनिस प्लेयर आर्थर ऐश जूनियर  की 1983 में हृदय की सर्जरी हुई थी ! इस सर्जरी के दौरान उन्हें गलती से एचआईवी संक्रमित खून चढ़ा दिया गया था !

एड्स की चपेट में आकर वे मृत्युशैया पर पड़े थे ! दुनिया भर से उनके प्रशंसक उन्हें पत्र लिख रहे थे कि भगवान ने उनके साथ ऐसा क्यों किया ?

इसके जबाव में आर्थर ऐश ने लिखा-

“पूरी दुनिया में 5 करोड़ बच्चे टेनिस खेलते हैं ! 50 लाख बच्चे टेनिस सीख जाते हैं !

उसमें 5 लाख बच्चे प्रोफेशनल टेनिस खेल पाते हैं, जिसमें से पचास हजार ही टीम में जगह पाते हैं !

जबकि 500 ही ग्रैंड स्लैम में भाग लेते हैं ! इन पांच सौ में से 50 विंबलडन तक पहुंचते हैं, 4 सेमीफाइनल खेलते हैं ! सिर्फ 2 को फाइनल खेलने का मौका मिलता है !

जब मैंने विंबलडन का पदक अपने हाथों में थामा, तब मैंने भगवान से यह नहीं पूंछा कि मुझे ही यह पदक क्यों मिला ? आज इस  दर्द में भी मैं भगवान से नहीं पूंछूंगा कि मुझे ही क्यों दर्द मिला ??

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પ્રગટ થયું: ૦૮ ફેબ્રુઆરી ૨૦૨૫

ચલ મન મુંબઈ નગરી
પિતિત હોલ બંગલાની બે મોંઘી ભેટ: ચીકુ અને રતન       
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દીપક મહેતા

દિનશા માણેકજી પિતિતે મલબાર હિલ પર બંધાવેલા પિતિત હોલ નામના બંગલાએ જમશેદ ભાભા થિયેટરને આરસનાં પગથિયાં ભેટ આપ્યાં તેમ બીજી બે મોંઘી ભેટ બી આપી. દિનશાજીને નવું નવું જોવા, જાણવા અને અજમાવવાનો શોખ. તે એક વેલા પરદેશથી એક નવીન ફળના રોપા મંગાવ્યા. બંગલામાં મોટો બગીચો. તેનું ધ્યાન રાખવા બે-પાંચ માળી, અને એક વડો માળી. રોપા આવ્યા કે તરત વડા માળીને બોલાવીને કહ્યું કે આપણા બગીચામાં આય રોપા વાવી દો. રોજ જાતે બગીચામાં જઈ પેલા રોપાનું બરાબર ધ્યાન રખાય છે કે નહિ તે જુએ. અને થોરા વખત પછી એ રોપા પર લાગીયાં ફળ. નાનાં, લંબગોળ, લાઈટ બ્રાઉન કલરની છાલ, અંદર નરમ માવો, તે બી બ્રાઉન કલરનો, અને સાથે બે-ત્રણ લંબગોળ કાળા રંગનાં બી. હવે તો ઓળખી ગિયા ને? આ ફળ તે ચીકુ ઉર્ફે સપોટા.
આપણા દેશમાં પહેલી વાર ઉગાડેલાં દિનશા શેઠે, પોતાના પિતિત હોલ બંગલાના ગાર્ડનમાં.
મૂળ દહાણુના વતની અરદેશર ઈરાની હતા દિનશા શેઠના એસ્ટેટ મેનેજર. વરસમાં એક-બે વાર રજા લઈ પોતાને ગામ જાય. ત્યાં તેમની એક વાડી. ૧૯૦૧માં ‘દેશ’ જતાં પહેલાં દિનશા શેઠ પાસે ગયા અને માગની કીધી કે આપના બગીચામાં થતાં ચીકુનાં થોડાં બી મને સાથે લઈ જવાની પરવાનગી આપવા મહેરબાની કરો. શેઠે કહ્યું કે લઈ જાવ, પણ ત્યાં તમે તેનું કરશો શું? અરદેશર કહે કે ત્યાં મારી નાનકડી વાડી છે તેમાં વાવીશ. અને દહાણુંની પોતાની વાડીમાં એવને ચીકુ ઉગાડ્યાં. અને જોતજોતામાં તો દહાણુ, ગોલવાડ, બોરડી વિસ્તારમાં ચીકુની વાડીઓ થઈ ગઈ. અને એ આખા વિસ્તારની ઈકોનોમી ચિકુથી ધમધમવા લાગી.
આ લખનારે નાનપણમાં મુંબઈથી ગુજરાતની ટ્રેન મુસાફરી દરમ્યાન દહાણુ-ગોલવાડ સ્ટેશનનાં પ્લેટફોર્મ પર વેચાતાં ચીકુ કંઈ કેટલીયે વાર ખાધાં છે. જેવી ટ્રેન ઊભી રહે કે ત્યાંની બાઈઓ મોટા ટોપલામાં મૂકેલી વાંસની નાની નાની છાબડીમાં ગોઠવેલાં ચીકુ લઈને વેચવા નીકળી પડે. છાબડીમાં ચીકુડીનાં નાનાં લીલાં પાન પાથર્યાં હોય અને તેના પર સરસ રીતે ગોઠવ્યાં હોય ચીકુ. નહિ કાચાં, નહિ બહુ પાકાં. એને છરીથી કાપવાનાં નહિ. બે હાથની હથેળી વચ્ચે જરાક દબાવીએ એટલે ચીકુનાં બે અડધિયાં. તેમાં બે-ત્રણ લાંબાં કાળાં બી હોય તે આંગળીના નખ વડે ખોતરીને કાઢી નાખવાનાં. અને એક પછી એક અડધિયું મોઢામાં! અને મોઢામાં ઉછળે મીઠાશનો મહેરામણ. પહેલાં તો દહાણુનીની ચણા દાળ, ગોલવડનાં ચીકુ, સુરતનાં ઘારી-ભૂસું, વડોદરાનો લીલો ચેવડો. દરેક સ્ટેશનને પોતાની આગવી ઓળખ. પણ હવે તો ‘જાને કહાં ગયે વો દિન!’ ૨૦૧૬માં ભારત સરકારે દહાણુ-ગોલવડ-બોરડી વિસ્તારને GI Tag (Geographical Indication Tag) આપ્યો. પણ સ્ટેશનો પર છાબડીઓમાં ભરીને ચીકુ વેચતી બાઈઓના કંઠની મીઠાશનો ટેગ તો ખોવાઈ જ ગયો!

પિતિત હોલની બીજી ભેટનું નામ રતન ઉર્ફે ‘બોમ્બે ફ્લાવર’ ઉર્ફે મરિયમ. દેખાવડી, હોશિયાર, પારસીઓ કહે તેમ ચાણાક. દિનશાજી (પહેલા બેરોનેટ) ખોદાયાજીને પ્યારા થઈ ગિયા તે પછી ફરામજી દિનશા પિતિત (૧૮૭૩-૧૯૩૩) બનિયા બીજા બેરોનેટ. એવનની એકની એક દીકરી તે રતન. ઈ.સ. ૧૯૦૦ના ફેબ્રુઆરીની ૨૦મી તારીખે મુંબઈમાં જન્મી. માત્ર ૨૯ વરસની ઉંમરે, ૧૯૨૯ના ફેબ્રુઆરીની ૨૦મી તારીખે જ – એટલે કે ૨૯મા જન્મ દિવસે – જન્નતનશીન થઈ. માલમ છે વાચક. તમે કહેશો કે આ તો મહેતાજી ગોથું ખાઈ ગિયા. બેહસ્તનશીનને બદલે જન્નતનશીન લખી નાખ્યું. પણ આખ્ખી વાત સમજસો પછે એમ નહિ બોલો.
રતનબાઈ જનમિયાં ત્યાં સુધીમાં પિતિત ખાનદાનની રહેણીકરણી, ખાનપાન, બધ્ધું જ વિલાયતી થઈ ગિયું હુતું. પિતિત હોલ આખો વિલાયતી જણસો, ચિત્રો, ઝુમ્મરો, ગાલીચાથી ઊભરાતો. રતનબાઈ ધાણી છૂટતી હોય એમ અંગ્રેજી બોલે. બોમ્બેના અપર મોસ્ટ ક્લાસમાં બધા તેને ‘ફ્લાવર ઓફ બોમ્બે’ તરીકે ઓળખે. રતનના બાવા રોજ સાંજે મલબાર હિલ પરના પિતિત હોલથી નીકળી ચોપાટીને દરિયા કિનારે આવેલી ઓરિયેન્ટ ક્લબમાં જાય. અનેક પરદેશી-દેશી મિત્રોને મળે. ખાનપાનની મહેફિલો જામે. ત્યાં એક ફૂટડો, ચાલાક, હોશિયાર જુવાન આવે. નામ મોહમ્મદ અલી. બંને વચ્ચે ઉંમરમાં ત્રણ જ વરસનો ફેર. એટલે જોતજોતામાં દોસ્તી જામી. પિતિત હોલની મિજબાનીઓમાં મોહમ્મદ અલીને નોતરું હોય જ. પછી તો દોસ્તી વધતી ચાલી. ૧૯૧૬ના ઉનાળામા પિતિત કુટુંબ દાર્જીલિંગ હવા ખાવા જતું હુતું. પિતિતશેઠે મોહમ્મદ અલીને બી નોતરું આપ્યું.
દાર્જીલિંગમાં એક દિવસ સાંજે પિતિતશેઠ અને મોહમ્મદ અલી બગીચામાં બેઠેલા હુતા. તે વારે મોહમ્મદ અલીએ પૂછયું: બે જુદા જુદા ધરમના છોકરા છોકરી મેરેજ કરે તો તે અંગે તમે શું માનો છો?’ જવાબ મળીયો: હું તો ખુસ જ થાઉં. આપના દેશમાં જુદા જુદા ધરમના લોકો વચ્ચે જે નફરત છે, વેરઝેર છે, તે મીટાવવા માટે આવાં લગ્નો તો બહુ જરૂરી છે.” આય સાંભળીને મોહમ્મદ અલી તો સાતમે આસમાને ઊડવા લાગીયા. જરા વાર રહીને બોલિયા: તમારા વિચારો આવા ઉમદા હોસે એની મુને તો ખાતરી જ હુતી. પણ તમે જે બોલિયા તે સમજીયા પછી મારામાં ઘન્ની વધુ હિંમત આવી છે. તમારી દીકરી રતન અને હુંએ શાદી કરવાનું નક્કી કર્યું છે. અને તોપના મોઢામાંથી ગોળો છૂટે એમ પિતિતશેઠના મોનામાંથી શબ્દો નીકળ્યા: તારી આ હિંમત? પિતિત ખાનદાન એટલે તો પારસીઓનું નાક. એની દીકરીને પરનવાનો તને વિચાર બી કેમ આવીયો? પેલા હિંદુઓ સું કેચ? હા, ક્યાં રાજા ભોજ, અને ક્યા ગંગુ તેલી? આજથી રતનની કે મારી બી સામ્ભે આવવાની હિંમત ના કરતો. મોહમ્મદ અલી ધીમેક રહીને ત્યાંથી ચાલતો થયો. તરત પિતિતશેઠના મોનામાંથી તોપનો ગોળો છૂટ્યો: અત્તર ઘરી અહીં આવ રતન. ‘જો રતન! બંને કાન ખોલીને સાંભલી લે. આજ પછી આય મોહમ્મદ અલીને સપનામાં બી જોવાનો નહિ. અને હા! નોકરોને કહે કે આપરો બધ્ધો સામાન બાંધી લે. આપરે અત્તર ઘરી જ બોમ્બે જવા નીકળવાનું છે.’
મુંબઈ પહોચ્યા પછી બંને પ્રેમી પંખીડાં છાનામાનાં મળીયાં. રતન કહે: ટુ જરા બી ચિંતા ના કરતો. હું તુને ચાહું છું ને હંમેશ ચાહતી રહીશ. અને આપરે બે શાદી કરશું એ વાતમાં મીનમેખ નહિ થાય.’ ‘અરે પણ રતન! હજી તુને ૧૮ વરસ પૂરાં થીયાં નથી. કાનૂનની નજરે તું બાલીગ છે. તારા ડેડી આપણને બંનેને જેલ ભેગા કરી દેશે.’ ‘પણ હું કા કેહું ચ કે આપરે અત્તર ઘરી લગન કરશું. હું અઢાર વરસની થઈસ તેને બીજે દિવસે કરશું. ત્યાં સુધી તો રાહ જોઇશ ને?’
એ વાતને બે વરસ વીતી ગિયાં. પોતાની પ્યારી દિકરીનો ૧૮મો બર્થ ડે પિતિતશેઠે તાજ મહાલ હોટેલમાં ધામધૂમથી મનાવિયો. સૌથી પહેલાં પિતિતશેઠે સૌ મહેમાનોને આવકાર્યા. પછી બોલવા ઊભી થઈ રતન. તેણે બી પહેલાં મહેમાનોનો આભાર માનિયો. અને પછી મોટ્ટો ધડાકો કીધો: મોહમ્મદ અલીએ અને મેં મેરેજ કરવાનું નક્કી કીધું છે. સાંભળીને બધ્ધા અવાચક! પિતિતશેઠનો ગુસ્સો સાતમે આસમાન… થોરા દહારા પછી રતને પોતાનો ધરમ છોડી મહમ્મદ અલીનો મજહબ અપનાવી લીધો. ધરમની સાથે નામ બી બદલ્યું અને રતન પિતિતમાંથી બની ગઈ મરિયમ મહમ્મદ અલી જિન્નાહ! હા, જે  ૧૯૪૭માં બન્યા પાકિસ્તાનના કાયદે આઝમ મહમ્મદ અલી જિન્નાહ.
પિતિત ખાનદાનની બીજી થોરી વાતો હવે પછી. 
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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बूढ़े व्यक्ति से एक युवा व्यक्ति मिलता है और पूछता है:
“क्या आप मुझे याद करते हैं?”
बूढ़ा व्यक्ति जवाब देता है, “नहीं, मुझे याद नहीं।”
तब युवा व्यक्ति बताता है कि वह उसका छात्र था।
गुरुजी पूछते हैं:
“तुम अब क्या करते हो, जीवन में क्या कर रहे हो?”
युवा व्यक्ति जवाब देता है:
“मैं एक शिक्षक बन गया हूँ।”
गुरुजी कहते हैं:
“अच्छा, मेरी तरह?”
युवा व्यक्ति कहता है:
“हाँ, वास्तव में मैं शिक्षक इसलिए बना क्योंकि आपने मुझे प्रेरित किया था।”

गुरुजी उत्सुक होकर पूछते हैं कि “तुमने कब तय किया कि शिक्षक बनना है?”
युवा व्यक्ति एक कहानी सुनाता है:

“एक दिन, मेरा एक मित्र एक नई घड़ी पहनकर आया। मुझे वह घड़ी पसंद आई, और मैंने उसे चुरा लिया। थोड़ी देर बाद, मेरे मित्र ने गौर किया कि उसकी घड़ी गायब है और उसने तुरंत आपसे शिकायत की।

तब आपने पूरी कक्षा से कहा:
‘आज कक्षा के दौरान इस छात्र की घड़ी चोरी हो गई है। जिसने भी चुराई हो, कृपया लौटा दें।’

“मैंने घड़ी वापस नहीं की क्योंकि मैं पकड़ा नहीं जाना चाहता था।

तब आपने दरवाजा बंद कर दिया और कहा:
‘सभी खड़े हो जाओ और एक घेरा बना लो। मैं सबकी जेब की तलाशी लूँगा, लेकिन इस शर्त पर कि सभी अपनी आँखें बंद रखेंगे।’

“हमने वैसा ही किया जैसा आपने कहा।
आपने एक-एक करके सभी की जेबें टटोलनी शुरू कीं। जब आपने मेरी जेब में हाथ डाला, तो आपको घड़ी मिल गई। लेकिन आपने तलाशी जारी रखी, ताकि किसी को यह न पता चले कि घड़ी किसकी जेब से मिली थी।

जब तलाशी पूरी हो गई, आपने कहा:
‘अपनी आँखें खोलो। घड़ी मिल गई है।’

“उस दिन आपने मुझे शर्मिंदा नहीं किया। न ही आपने कभी इस बारे में बात की, न मुझे अलग से बुलाकर कोई उपदेश दिया।
मुझे आपका संदेश स्पष्ट रूप से मिल गया था।
उस दिन मेरी ज़िंदगी बदल गई। मैंने निश्चय किया कि मैं कभी गलत रास्ते पर नहीं जाऊँगा।
आपने मेरी इज्जत बचाई और मुझे सही राह दिखाई।
इसीलिए मैं शिक्षक बना, क्योंकि आपसे मैंने सीखा कि एक सच्चा शिक्षक क्या होता है।”*

युवा व्यक्ति पूछता है:
“क्या आपको यह घटना याद है, गुरुजी?”

बूढ़े शिक्षक मुस्कुराते हुए उत्तर देते हैं:
“मुझे वह घटना जरूर याद है, जब मैंने घड़ी खोजी थी। लेकिन मुझे तुम याद नहीं हो। क्योंकि जब मैं तुम्हारी जेब टटोल रहा था, तब मैंने भी अपनी आँखें बंद कर रखी थीं।”

“यही सच्ची शिक्षा का सार है—

यदि सुधारने के लिए अपमान करना पड़े, तो आप सिखाने की कला नहीं जानते।”

साभार सोशल मीडिया