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मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न में कोई बदलाव नहीं हुआ?
कैसे?

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के कल चुनाव परिणाम सबके सामने आ गए हैं, चुनाव परिणाम के विश्लेषण से सबके सामने फिर ये तथ्य उभरकर आया है कि मुसलमान भाजपा को हराने के नाम पर मज़बूत दिख रहे दल के पक्ष में चला जाते हैं।

CAA/NRC आंदोलन और दिल्ली दंगे के बाद ये पहला विधानसभा चुनाव था।

दिल्ली के इस चुनाव में कांग्रेस ने सर्वाधिक मुस्लिम कैंडिडेट उतारे। जंगपुरा और बाबरपुर में तो इकलौते मुस्लिम कैंडिडेट कांग्रेस के ही थे। राहुल गांधी ने मुस्लिम इलाक़ों में चुनावी जनसभाएं भी की, राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस भाजपा और संघ पर बहुत खुलकर बात भी करती है। लेकिन मुसलमानों ने कांग्रेस में भी कोई रूचि नहीं दिखाई।

बहुजन समाज पार्टी ने बी टीम का दाग धोने के लिए मुस्लिम बहुल सीटों पर तो मुस्लिम कैंडिडेट नहीं दिए लेकिन संगम विहार और लक्ष्मीनगर जैसी मिश्रित मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर इकलौते कैंडिडेट दिए। लेकिन मुसलमानों ने बसपा में भी रूचि नहीं दिखाई। उत्तर प्रदेश और दिल्ली चुनाव के बाद मुझे तो लगता बसपा भी मुसलमानों की की नजर भाजपा जितनी ही अछूत और दुश्मन बनी हुई है।

मजलिस ने बी टीम के दुष्प्रचार से बचने के लिए मुस्लिम बहुल  सिर्फ़ दो सीटों पर प्रत्याशी दिए। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बैरिस्टर सदर साहब और उनकी पूरी टीम ने रात-दिन मेहनत की। अपनी क़ौम को जागरूक किया। केजरीवाल की नीतियों से अवगत कराया। लेकिन आशानुरूप उनका भी साथ नहीं दिया। क्योंकि मुसलमान की प्राथमिकता भाजपा को हराना ही रही।

अब बात आम आदमी पार्टी की।
आप ने मटिया महल, बल्लीमारान, ओखला, सीलमपुर और मुस्तफाबाद में तो मुस्लिम कैंडिडेट दिए लेकिन मुस्लिम प्रभाव वाली बाबरपुर सीट पर गोपाल राय को प्रत्याशी बनाया।
आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने किसी भी मुस्लिम बहुल इलाक़े में बड़ी जनसभा नहीं की। ध्रुवीकरण के डर से उचित दूरी बरक़रार रखी। आप का समर्थन करने वाले अखिलेश भैया ने भी किसी मुस्लिम बहुल विधानसभा में जनसभा नहीं की। इस सबके बावजूद मुसलमानों ने भर-भरकर साथ दिया।

अब चुनाव परिणाम पर गौर फ़रमाइए——

दिल्ली में केवल चार मुस्लिम विधायक जीते हैं।
और चारों आम आदमी पार्टी से जीते हैं।
जिन मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर भाजपा जीती है,
वहाँ भी सर्वाधिक वोट कांग्रेस, बसपा और मजलिस की तुलना में आम आदमी पार्टी को मिले हैं।

मटिया महल –
आले मोहम्मद इक़बाल आप- 58120
आसिम अहमद खान- कांग्रेस- 10295

बल्लीमारान-
इमरान हुसैन आप – 57004
हारून यूसुफ़ कांग्रेस- 13059

सीलमपुर –
चौधरी ज़ुबैर- आप – 79009
अब्दुल रहमान – कांग्रेस- 16551

ओखला-
अमानतुल्लाह ख़ान – आप 88943
शिफा उर रहमान- मजलिस 39558
अरीबा खान- कांग्रेस 12739
शेर मोहम्मद- आसपा 290

बाबरपुर-
गोपाल राय आप 76192
इशराक- 8797

मुस्तफ़ाबाद-
मोहन सिंह भाजपा 85215
आदिल अहमद आप 67637
ताहिर मजलिस 33474
अली मेंहदी कांग्रेस 11763

जंगपुरा
तरविंदर भाजपा 38859
मनीष आप 38184
फरहाद सूरी 7350

दिल्ली विधानसभा चुनाव के मुस्लिम वोटिंग पैटर्न को समझने की ज़रूरत है। कांग्रेस, बसपा और मजलिस को 2027 में अपनी रणनीति पर ध्यान देना चाहिए। क्या 2027 में भी भाजपा हराओ मिशन के तहत ही वोटिंग के आसार दिख रहे हैं?
निश्चित ही इसमें कोई बदलाव आने की गुंजाइश नहीं है,,
मुसलमान इसी पेटर्न पर वोट करता रहा है और करेगा।
सोचना हिंदूओं को है
अब कुछ सवाल——

-जब देश में सभी क़ौमें हिस्सेदारी, नेतृत्व और सम्मान पर वोट कर रही हैं तो आखिर मुसलमानों में ही इस तरह का वोटिंग पैटर्न क्यों?

-क्या लोकतंत्र में किसी दल को हराने के लिए वोटिंग करना किसी सभ्य समाज के लिए शोभनीय है?

-इस तरह के वोटिंग पैटर्न से भविष्य में क्या नुक़सान हो सकते हैं?
-क्या इस तरह के वोटिंग पैटर्न से भविष्य में राजनैतिक दलों के टिकट वितरण को प्रभावित करेगा?

आख़िर इस तरह का वोटिंग पैटर्न क्यों है?
भाई इमरान शकील के लेख में अपने हिसाब से कुछ परिवर्तन मैंने किये हैं।
शकील भाई ने सवाल उठाया है कि केवल मुसलमानों में इस तरह का वोटिंग पेटर्न क्यों?

अब आते हैं इस क्यों के जवाब पर।
इसके पीछे केवल और केवल मुस्लिम समाज की कट्टर पंथी विचार धारा के सिवा कुछ भी नहीं है।

मुसलमान को पसंद आता है अपना “गजवा ए हिन्द” का सपना।

भाजपा इस रास्ते में उनके सामने बाधा दिखती है, अन्यथा विकास तो मुसलमानो का भाजपा ने दुसरे सभी दलों की सरकारों से ज्यादा किया है, लेकिन वो गजवा ए हिन्द के लिए छूट नहीं देती है।

बसपा से भी मुसलमान की दुश्मनी इसीलिए है, बसपा ने मुसलमान को प्रतिनिधित्व देने में सम्मान देने में कभी कोताही नहीं बरती,, लेकिन कट्टर पंथी आतंकी सोच को समर्थन नहीं किया,यही कारण है मुसलमान ने बसपा से दूरी बना ली।

रहीं बात मुस्लिमों की – आप चाहें कोठियां बनाकर दे दो इन्हें – जो गजवा के रास्ते मे आएगा उसको ये रत्ती भर वोट नहीं करेंगे – बाकी जो दो चार मुस्लिम हैं जो लोग सेक्युलर बन कर भाइचारे की पिंग चलाते है लेकिन उनका प्रभाव ही कितना हैं !

यहि कारण हैं कि यहां कभी लश्कर-ए-तोइबा- ISIS- मुजाहिदीन- आदि के विरोध के लिए सडकों पर नहीं आयेंगे – किन्तु गाजा – फिलिस्तीन के लिए- सीरिया के लिए – इस्राइल या अमेरिका के ख़िलाफ़ सडकों पर जरूर आ जाएंगे !

ये बर्मा के रोहिंगया के लिए सडकों पर आ सकते हैं – किन्तु बांग्लादेश के हिन्दुओं के लिए नहीं !
ये CAA के ख़िलाफ़ होंगे – NRC के ख़िलाफ़ होंगे – क्युकि इसमे इनके भाई जो बांग्लादेश- पाकिस्तान या कहीं और से अवैध रूप से भारत मे घुसे हैं उनको निकलना पड़ेगा बाहर – यहि कारण हैं – बिहार पश्चिम बंगाल – कश्मीर मे ये एकतरफ़ा वोट करते हैं – नुह मेवात यूपी केरल पश्चिम बंगाल – ये वो जगह हैं जहाँ सेक्यूलर लोगों को जाकर उस पैटर्न को समझना पड़ेगा !

✍️साभार प्रदीप तरार 🙏🙏

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