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स्वस्तिवाचन मन्त्र ( अर्थ सहित )




हमारे देश की यह प्राचीन परंपरा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारंभ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते है और सबसे पहले मंगल मूर्ति गणेश की प्रार्थना करते है। इसके लिए दो नाम हमारे सामने आते हैं… पहला श्रीगणेश और दूसरा जय गणेश।

श्रीगणेश का अर्थ होता है कि जब हम किसी कार्य को आरंभ करते है, तो इसी नाम के साथ उस कार्य की शुरुआत करते है। जय गणेश का अर्थ होता है कि अब यह कार्य यहां समाप्त हो रहा है।

प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है, उनके चिन्तन, वाचन से अलौकिक दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है, मन शान्त होता है। किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ में, विवाह मण्डप पर, शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है। यह एक गहन विज्ञान है, जिसे समझने की आवश्यकता है।

यदि हम केवल मंगल वचन का प्रयोग करे और मांगलिक शब्दों का प्रयोग उसके अर्थ को बिना जाने हुए करे तो निश्चय ही यह हमारा अंधविश्वास माना जाएगा। जब तक धर्म को तथा उसके विज्ञान को हम समझ न लें, तब तक केवल अंधविश्वासी होकर उसकी सभी बातों को मानने का कोई औचित्य नहीं है। हमारा धर्म, हमारी संस्कृति,वैदिक ऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराण उपनिषद आदि इन सभी ग्रन्थों पृष्टभूमि में विज्ञान निहित है। हमारे ऋषियों ने जिन वैदिक ऋचाओं और पुराणों की कल्पना की, उपनिषदों के बारे में सोचा था फिर मांगलिक कार्यो के लिए जैसी व्यवस्था की, वह हमारे विज्ञान से किसी भी तरह से अलग नहीं है। उनके द्वारा सोची और की जाने वाली हर एक पहल हमेशा से ही विज्ञान के साथ रही है।

मन्त्र-1👉 आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥

अर्थ 👉 हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें।

मन्त्र-2👉 देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥

अर्थ 👉 यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।

मन्त्र-3👉 तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।
अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।

अर्थ 👉 हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।

मन्त्र-4👉 तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः ।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥

अर्थ 👉 वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।

मन्त्र-5👉 तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् ।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥

अर्थ 👉 हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।

मन्त्र-6👉 स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पुषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

अर्थ 👉 महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

मन्त्र-7👉 पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः ।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥

अर्थ 👉 चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।

✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ, [07-02-2025 12:52]
मन्त्र-8👉 भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

अर्थ 👉 हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।

मन्त्र-9👉 शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः॥

अर्थ 👉 हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र, पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।

मन्त्र-10👉 अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥

अर्थ 👉 अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।

मन्त्र-11👉 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थ 👉 द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ, [08-02-2025 06:32]
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं ।
गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥
जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं ।
नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥

भावार्थ
*आप अपरिमित बलवाले हैं , अनादि , अजन्मा , अव्यक्त ( निराकार ) , एक अगोचर ( अलक्ष्य ) , गोविंद ( वेद वाक्यों द्वारा जानने योग्य ) , इंद्रियों से अतीत , ( जन्म – मरण , सुख – दुःख , हर्ष-शोकादि ) द्वंद्वों को हरने वाले , विज्ञान की घनमूर्ति और पृथ्वी के आधार हैं तथा जो संत राम मंत्र को जपते हैं , उन अनन्त सेवकों के मन को आनंद देने वाले हैं । उन निष्कामप्रिय ( निष्कामजनों के प्रेमी अथवा उन्हें प्रिय ) तथा काम आदि दुष्टों ( दुष्ट वृत्तियों ) के दल का दलन करने वाले श्री रामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ।

जय श्रीराम

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बुरी स्मृतियाँ


दो भाई थे। परस्पर बडे़ ही स्नेह तथा सद्भावपूर्वक रहते थे। बड़े भाई कोई वस्तु लाते तो भाई तथा उसके परिवार के लिए भी अवश्य ही लाते, छोटा भाई भी सदा उनको आदर तथा सम्मान की दृष्टि से देखता।

पर एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा सुनी हो गई। बात बढ़ गई और छोटे भाई ने बडे़ भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस फिर क्या था ? दोनों के बीच दरार पड़ ही तो गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और कोई किसी से नहीं बोला। कई वर्ष बीत गये। मार्ग में आमने सामने भी पड़ जाते तो कतराकर दृष्टि बचा जाते, छोटे भाई की कन्या का विवाह आया। उसने सोचा बडे़ अंत में बडे़ ही हैं, जाकर मना लाना चाहिए।

वह बडे़ भाई के पास गया और पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा माँगने लगा। बोला अब चलिए और विवाह कार्य संभालिए।

पर बड़ा भाई न पसीजा, चलने से साफ मना कर दिया। छोटे भाई को दुःख हुआ। अब वह इसी चिंता में रहने लगा कि कैसे भाई को मनाकर लगा जाए इधर विवाह के भी बहित ही थोडे दिन रह गये थे। संबंधी आने लगे थे।

किसी ने कहा-उसका बडा भाई एक संत के पास नित्य जाता है और उनका कहना भी मानता है। छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और पिछली सारी बात बताते हुए अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की तथा गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया और प्रार्थना की कि ”आप किसी भी प्रकार मेरे भाई को मेरे यही आने के लिए तैयार कर दे।”

दूसरे दिन जब बडा़ भाई सत्संग में गया तो संत ने पूछा क्यों तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है ? तुम क्या-क्या काम संभाल रहे हो ?

बड़ा भाई बोला- “मैं विवाह में सम्मिलित नही हो रहा। कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं।” संत जी ने कहा जब सत्संग समाप्त हो जाए तो जरा मुझसे मिलते जाना।” सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा, उन्होंने पूछा- मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था उसमें क्या बतलाया था ?

बडा भाई मौन ? कहा कुछ याद नहीं पडता़ कौन सा विषय था ?

संत ने कहा- अच्छी तरह याद करके बताओ।
पर प्रयत्न करने पर उसे वह विषय याद न आया।

संत बोले ‘देखो! मेरी बताई हुई अच्छी बात तो तुम्हें आठ दिन भी याद न रहीं और छोटे भाई के कडवे बोल जो एक वर्ष पहले कहे गये थे, वे तुम्हें अभी तक हृदय में चुभ रहे है। जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते, तब उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे और जब जीवन नहीं सुधारा तब सत्सग में आने का लाभ ही क्या रहा? अतः कल से यहाँ मत आया करो।”

अब बडे़ भाई की आँखें खुली। अब उसने आत्म-चिंतन किया और देखा कि मैं वास्तव में ही गलत मार्ग पर हूँ। छोटों की बुराई भूल ही जाना चाहिए। इसी में बडप्पन है।

उसने संत के चरणों में सिर नवाते हुए कहा मैं समझ गया गुरुदेव! अभी छोटे भाई के पास जाता हूँ, आज मैंने अपना गंतव्य पा लिया।”

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*हिन्दू धर्म की 10 महत्वपूर्ण बातें …*

*1) 10 ध्वनियां :*
1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग

*2) 10 कर्तव्य:-*
1. संध्यावंदन, 2. व्रत, 3. तीर्थ, 4. उत्सव, 5. दान, 6. सेवा 7. संस्कार, 8. यज्ञ, 9. वेदपाठ, 10. धर्म प्रचार।

*3) 10 दिशाएं :*
दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं।

*4) 10 दिग्पाल :*
10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत।

*5) 10 देवीय आत्मा :*
1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवा अश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.येति, 10.मकर।

*6) 10 देवीय वस्तुएं :*
1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कर्ण के कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि और संजीवनी बूटी।

*7) 10 पवित्र पेय :*
1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस

*8) 10 महाविद्या :*
1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्‍वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।

*9) 10 उत्सव :*
नवसंवत्सर, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, पोंगल, होली, दीपावली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्‍टमी, महाशिवरात्री और नवरात्रि।

*10) 10 बाल पुस्तकें :*
1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह।

*11) 10 पूजा :*
गंगा दशहरा, आंवला नवमी पूजा, वट सावित्री, तुलसी विवाह पूजा, शीतलाष्टमी, गोवर्धन पूजा, हरतालिका तिज, दुर्गा पूजा, भैरव पूजा और छठ पूजा।

*12) 10 धार्मिक स्थल :*
12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ, 4 धाम, 7 पुरी, 7 नगरी, 4 मठ, आश्रम, 10 समाधि स्थल, 5 सरोवर, 10 पर्वत और 10 गुफाएं।

*13) 10 पूजा के फूल :*
आंकड़ा, गेंदा, पारिजात, चंपा, कमल, गुलाब, चमेली, गुड़हल, कनेर, और रजनीगंधा।

*14) 10 धार्मिक सुगंध :*
गुग्गुल, चंदन, गुलाब, केसर, कर्पूर, अष्टगंथ, गुढ़-घी, समिधा, मेहंदी, चमेली।

*15)10 यम-नियम :*
1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। 6.शौच 7.संतोष, 8.तप, 9.स्वाध्याय और 10.ईश्वर-प्रणिधान।

*16)10 सिद्धांत :*
1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्‍वर है दूसरा नहीं), 2.आत्मा अमर है,
3.पुनर्जन्म होता है,
4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है,
5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से ‍कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है,
6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है,
7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है,
8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है,
9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है,
10.दान ही पुण्य है।

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1963માં અમેરિકી રાષ્ટ્રપતિ જ્હોન એફ કેનેડીની હત્યા કરવામાં આવી અને તેની સાથે જ ભારત-અમેરિકાના સંબંધોમાં તિરાડ શરૂ થઈ.  તેનાથી વિપરીત, સોવિયેત યુનિયનમાં નિકિતા ખ્રુશ્ચેવનું શાસન હતું જે ભારત તરફી હતા.

1965માં ભારત-પાકિસ્તાન યુદ્ધ થયું હતું. અમેરિકા અને સોવિયેત બંને દૂર રહ્યા હતા, જોકે સોવિયેટ્સે અંતે સમાધાન કર્યું હતું અને ભારતે જે યુદ્ધ જીત્યું હતું તે હારી ગયું હતું.  લાહોર આપણી મુઠ્ઠીમાં હતું, કાયદા પ્રમાણે અમને લાહોર મળવું જોઈતું હતું પરંતુ બદલામાં અમને pok પણ ન મળી શક્યું.

શાસ્ત્રીજીનું અવસાન સોવિયેતની વિચલિતતાની નિશાની હતી.  આ યુદ્ધ પછી અયુબ ખાન સમજી ગયા કે ભારતને એકલા હાથે હરાવી શકાય નહીં, તેથી તેઓ અમેરિકન ગેંગમાં જોડાયા.

જવાબમાં, ઇન્દિરા ગાંધી સોવિયેત છાવણીમાં જોડાયા ન હતા પરંતુ સોવિયત સંઘ સાથે સંરક્ષણ કરાર પર હસ્તાક્ષર કર્યા હતા.  આ સમજૂતીને કારણે 1971ના યુદ્ધમાં સોવિયેટ્સે ભારતનું રક્ષણ કર્યું હતું, પરંતુ 1965ની જેમ આ વખતે પણ અમારી સાથે છેતરપિંડી થઈ હતી.

સોવિયેટ્સે ભારતને પીઓકે મેળવવાની મદદ ન કરી.  હકીકતમાં તે સોવિયેતના હિતમાં હતું કે ભારત અને પાકિસ્તાન વચ્ચે યુદ્ધ ચાલુ રહે જેથી ભારત સોવિયેત પાસેથી શસ્ત્રો ખરીદતું રહે.  પાકિસ્તાનના સંદર્ભમાં અમેરિકાનું પણ આવું જ હતું.

ભારતના લોકો માનતા હતા કે આપણે અમેરિકા અને સોવિયત સંઘ વચ્ચે સેન્ડવીચ બની રહ્યા છીએ, પરંતુ આ સમજ પાકિસ્તાનને લાગુ પડતી ન હતી કારણ કે પાકિસ્તાન નેતાઓ દ્વારા નહીં પરંતુ સેના દ્વારા ચલાવવામાં આવે છે અને જ્યારે યુદ્ધ થાય ત્યારે જ સેનાના ઉચ્ચ અધિકારીઓને ફાયદો થતો હતો.

ભારત માટે પણ સોવિયેત મિત્રતા મોંઘી પડી રહી હતી;  સામ્યવાદીઓએ ભારતની યુનિવર્સિટીઓ, સિનેમાઘરો અને ઓફિસો પર કબજો કરી લીધો હતો.  ભારતીય ઈતિહાસ ભારત વિરુદ્ધ જ ઝેર ઓકવામાં આવી રહ્યો હતો.

જૂની ફિલ્મો જોશો, તો તમને મુખ્ય પાત્રોમાં મજૂર હડતાલ, લાલ ઝંડા, નાસ્તિકતા જોવા મળશે.  1975 સુધીમાં ભારત પર સોવિયેતનો પ્રભાવ એટલો બધો હતો કે સોવિયેત જાસૂસો દિલ્હીની ગલીઓમાં ફરતા હતા.

ભારતમાં આંતરિક કટોકટી લાદવાની ચિનગારી સોવિયેટ્સ દ્વારા આપવામાં આવી હતી અને ભારતના બંધારણમાં સમાજવાદી શબ્દ ઉમેરવામાં આવ્યો હતો તે આ હકીકતનો પુરાવો છે.  સોવિયેટ્સે તેમની વિચારધારાને સમાજવાદ તરીકે ટેગ કરીને વેચી દીધી છે.

ભગવાને મુશ્કેલ સમયમાં ભારતની મદદ કરી, સોવિયેત ગુપ્તચર ભ્રષ્ટ થઈ ગયું અને તેણે અફઘાનિસ્તાન પર હુમલો કર્યો.  આ હુમલો સોવિયેત યુનિયન માટે એટલો મોંઘો સાબિત થયો કે તે 1991માં નાદાર થઈ ગયો અને તેના ટુકડા થઈ ગયા.

સર્જકની બીજી રમત પણ જુઓ ત્યાં સુધીમાં સોવિયેત-મિત્ર ગાંધી પરિવાર સત્તાથી બહાર હતો અને નરસિંહ રાવ વડા પ્રધાન હતા, જે સામ્યવાદી વિચારધારાનો વિરોધ કરતા હતા.  સોવિયેત એજન્ટો નિષ્ક્રિય કરવામાં આવ્યા હતા.

1991 પછી, ભારતે આગળ વધવાનું શરૂ કર્યું અને આત્મનિર્ભર બનવા માટે કામ કર્યું.



1991માં સોવિયેત યુનિયનનું વિઘટન થયું પરંતુ ભારત પરનો તેનો પ્રભાવ 2019માં ગાયબ થઈ ગયો.  વાસ્તવમાં, તેની છાપ હજુ પણ કેટલીક જગ્યાએ જોવા મળે છે.  જે રીતે સોવિયેત યુનિયન ભારતની વ્યવસ્થામાં જકડાયેલું હતું તેમ અમેરિકા પાકિસ્તાનની વ્યવસ્થામાં હતું.

સોવિયેત લુંટાઈ ગયા પણ અમેરિકા નહોતું, આ જ કારણ છે કે આજે પણ પાકિસ્તાનમાં તખ્તાપલટ થતી રહે છે કારણ કે અમેરિકા અંદરથી એટલું ઊંડું ઉતરી ગયું છે કે તે પાકિસ્તાનને પોતાની ઈચ્છા પ્રમાણે ચલાવી શકે છે.  ભારત સાથે પણ આવું થયું હશે પરંતુ સમય જતાં સોવિયેત યુનિયન તૂટી ગયું અને આપણે બચી ગયા.

ઉલટાનું, અમેરિકા અને ભારતના સંબંધો સુધર્યા છે, હવે સ્થિતિ એવી છે કે અમેરિકન રાષ્ટ્રપતિ ભારત આવે છે અને પાકિસ્તાનને અડ્યા વગર પાછા જાય છે.

આ આખી વાર્તાનો સાર એ છે કે આંતરરાષ્ટ્રીય રાજકારણમાં કોઈ મિત્ર કે દુશ્મન નથી હોતું, કંઈ મફતમાં આપવામાં આવતું નથી.  સોવિયેટ્સે 1971માં આપણું રક્ષણ કર્યું પરંતુ અમને સમાજવાદના કેન્સરને આશ્રય આપીને તેની કિંમત ચૂકવી.

આજે પણ તામિલનાડુમાં ડીએમકે, કેરળમાં સીપીઆઈ, બિહારમાં આરજેડી અને ઉત્તર પ્રદેશમાં એસપીનું વર્ચસ્વ એ વાતનો પુરાવો છે કે આપણાં ઘણાં રાજ્યોમાં સમાજવાદનું ઝેર કેટલું ઊંડું છે અને કોણ જાણે આપણે એમાંથી કેવી રીતે છુટકારો મેળવીશું?

ઉપરોક્ત રાજ્યોના નાગરિકોએ સમજવું પડશે કે આપણે હાલમાં જે વસ્તી ધરાવીએ છીએ તેની સાથે સમાજવાદ આપણને પોસાય તેમ નથી.  આપણે યુદ્ધના ધોરણે ઉદ્યોગોની જરૂર છે, આ સમયે જો કોઈ વ્યક્તિ એક પણ રોજગાર બનાવે છે તો તે ભગવાનથી ઓછો નથી.

તેથી, બને તેટલી વહેલી તકે સમાજવાદનો ત્યાગ કરો.

Posted in खान्ग्रेस, नहेरु परिवार - Nehru Family

વડાપ્રધાન મોદીએ પોતાના સંસદીય સંબોધનમાં રાહુલ ગાંધી પર નિશાન સાધતા કહ્યું હતું કે જો તેમને વિદેશ નીતિ શીખવી હોય તો તેમણે “JFK’s Forgotten Crisis” નામનું પુસ્તક વાંચવું જોઈએ.
આ પુસ્તક અમેરિકી રાષ્ટ્રપતિ જ્હોન એફ કેનેડીના સેક્રેટરી દ્વારા લખવામાં આવ્યું છે અને તેમણે કેનેડી અને નેહરુ (1960-61)ની બેઠકોનો ઉલ્લેખ કર્યો છે અને જણાવ્યું છે કે કેનેડી કેવી રીતે ભારતને સમર્થન આપવા માટે ઉત્સુક હતા અને ભારતને પરમાણુ શક્તિ ધરાવતો દેશ બનાવવા માટે પણ તૈયાર હતા અને ચીન ભારત માટે સૌથી મોટો ખતરો છે.  પરંતુ ચીનના ભાઈચારામાં આંધળા નહેરુજીએ કેનેડીની સદંતર અવગણના કરીને તેમનું અપમાન કર્યું અને બીજા જ વર્ષે જ્યારે ચીને ભારત પર હુમલો કર્યો ત્યારે રશિયાએ પણ ભારતને સાથ ન આપ્યો કારણ કે ચીન સામ્યવાદી દેશ હતો અને રશિયા પણ હતો.

તે લખે છે
“નેહરુ સાથેની મુલાકાત ખૂબ જ રફ રહી, મારી સાથે વાત કરતી વખતે તેઓ આખો સમય અહીં-ત્યાં અથવા છત તરફ જોતા રહ્યા અને એવું લાગતું હતું કે તેમને રસ નથી પણ મારી પત્ની જેક્લીન આવતાની સાથે જ તેઓ સંપૂર્ણપણે સજાગ થઈ ગયા અને આખો સમય તેમની સાથે વાત કરતા રહ્યા” – જોન એફ કેનેડી.