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एक अरबपति महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया, पोट्रट बनवाया। चित्र बन गया, तो वह अमीर महिला अपना चित्र लेने आयी। वह बहुत खुश थी। चित्रकार से उसने कहा, कि उसका क्या पुरस्कार दूं?

चित्रकार गरीब आदमी था। गरीब आदमी वासना भी करे तो कितनी बड़ी करे, मांगे भी तो कितना मांगे?हमारी मांग, सब गरीब आदमी की मांग है परमात्मा से। हम जो मांग रहे हैं, वह क्षुद्र है। जिससे मांग रहे हैं, उससे यह बात मांगनी नहीं चाहिए। तो उसने सोचा मन में कि सौ डालर मांगूं, दो सौ डालर मांगूं, पांच सौ डालर मांगूं। फिर उसकी हिम्मत डिगने लगी। इतना देगी, नहीं देगी! फिर उसने सोचा कि बेहतर यह हो कि इसी पर छोड़ दूं, शायद ज्यादा दे। डर तो लगा मन में कि इस पर छोड़ दूं, पता नहीं दे या न दे, या कहीं कम दे और एक दफा छोड़ दिया तो फिर! तो उसने फिर भी हिम्मत की। उसने कहा कि आपकी जो मर्जी। महिला के हाथ में जो बैग था, पर्स था, उसने कहा, तो अच्छा! यह पर्स तुम रख लो। यह बडा कीमती पर्स है।

पर्स तो कीमती था, लेकिन चित्रकार की छाती बैठ गयी कि पर्स को रखकर करूंगा भी क्या? माना कि कीमती है और सुंदर है, पर इससे कुछ आता-जाता नहीं। इससे तो बेहतर था कुछ सौ डालर ही मांग लेते। तो उसने कहा, नहीं-नहीं, मैं पर्स का क्या करूंगा, आप कोई सौ डालर दे दें। उस महिला ने कहा, तुम्हारी मर्जी। उसने पर्स खोला, उसमें एक लाख डालर थे, उसने सौ डालर निकाल कर चित्रकार को दे दिये और पर्स लेकर वह चली गयी। सुना है कि चित्रकार अब तक छातीपीट रहा है और रो रहा है–मर गये, मारे गये, अपने से ही मारे गये!

आदमी करीब-करीब इस हालत में है। परमात्मा ने जो दिया है, वह बंद है, छिपा है। और हम मांगे जा रहे हैं–दो-दो पैसे, दो-दो कौड़ी की बात। और वह जीवन की जो संपदा उसने हमें दी है, उस पर्स को हमने खोल कर भी नहीं देखा है। जो मिला है, वह जो आप मांग सकते हैं, उससे अनंत गुना ज्यादा है।लेकिन मांग से फुरसत हो, तो दिखायी पड़े, वह जो मिला है।

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सवेदनशीलता


मोहन काका डाक विभाग के कर्मचारी थे . बरसों से वे माधोपुर और आस पास के गाँव में चिट्ठियां बांटने का काम करते थे .

एक दिन उन्हें एक चिट्ठी मिली , पता माधोपुर के करीब का ही था लेकिन आज से पहले उन्होंने उस पते पर कोई चिट्ठी नहीं पहुंचाई थी .

रोज की तरह आज भी उन्होंने अपना थैला उठाया और चिट्ठियां बांटने निकल पड़े . सारी चिट्ठियां बांटने के बाद वे उस नए पते की ओर बढ़ने लगे . दरवाजे पर पहुँच कर उन्होंने आवाज़ दी, “पोस्टमैन !”

अन्दर से किसी लड़की की आवाज़ आई , “काका ! वहीं दरवाजे के नीचे से चिट्ठी डाल दीजिये .”

“अजीब लड़की है मैं इतनी दूर से चिट्ठी लेकर आ सकता हूँ और ये महारानी दरवाजे तक भी नहीं निकल सकतीं !” काका ने मन ही मन सोचा .

“बाहर आइये ! रजिस्ट्री आई है , हस्ताक्षर करने पर ही मिलेगी !”, काका खीजते हुए बोले .

“अभी आई .”, अन्दर से आवाज़ आई .”

काका इंतज़ार करने लगे, पर जब 2 मिनट बाद भी कोई नहीं आयी तो उनके सब्र का बाँध टूटने लगा .

“यही काम नहीं है मेरे पास, जल्दी करिए और भी चिट्ठियां पहुंचानी है”, और ऐसा कहकर काका दरवाज़ा पीटने लगे .

कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला , सामने का दृश्य देख कर काका चौंक गए ! !!

एक 12-13 साल की लड़की थी जिसके दोनों पैर कटे हुए थे . उन्हें अपनी अधीरता पर शर्मिंदगी हो रही थी

लड़की बोली , क्षमा कीजियेगा मैंने आने में देर लगा दी, बताइए हस्ताक्षर कहाँ करने हैं ? काका ने हस्ताक्षर कराये और वहां से चले गए .

इस घटना के आठ-दस दिन बाद काका को फिर उसी पते की चिट्ठी मिली . इस बार भी सब जगह चिट्ठियां पहुँचाने के बाद वे उस घर के सामने पहुंचे !

चिट्ठी आई है, हस्ताक्षर की भी ज़रूरत नहीं है . नीचे से डाल दूँ , काका बोले .

नहीं-नहीं, रुकिए मैं अभी आई।”, लड़की भीतर से चिल्लाई .

कुछ देर बाद दरवाजा खुला , लड़की के हाथ में गिफ्ट पैकिंग किया हुआ एक डिब्बा था .

काका लाइए मेरी चिट्ठी और लीजिये अपना तोहफ़ा  !लड़की मुस्कुराते हुए बोली .

“इसकी क्या ज़रूरत है बेटा”, काका संकोचवश उपहार लेते हुए बोले .

लड़की बोली , “बस ऐसे ही काका.आप इसे ले जाइए और घर जा कर ही खोलियेगा !”

काका डिब्बा लेकर घर की और बढ़ चले , उन्हें समझ नहीं आर रहा था कि डिब्बे में क्या होगा !

घर पहुँचते ही उन्होंने डिब्बा खोला, और तोहफ़ा देखते ही उनकी आँखों से आंसू टपकने लगे .

डिब्बे में एक जोड़ी चप्पलें थीं . काका बरसों से नंगे पाँव ही चिट्ठियां बांटा करते थे लेकिन आज तक किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था .

ये उनके जीवन का सबसे कीमती तोहफ़ा था . काका चप्पलें कलेजे से लगा कर रोने लगे ! उनके मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था- बच्ची ने उन्हें चप्पलें तो दे दीं पर वे उसे पैर कहाँ से लाकर देंगे ?

दोस्तों ! संवेदनशीलता या sensitivity एक बहुत बड़ा मानवीय गुण है . दूसरों के दुखों को महसूस करना और उसे कम करने का प्रयास करना एक महान काम है . जिस बच्ची के खुद के पैर न हों उसकी दूसरों के पैरों के प्रति संवेदनशीलता हमें एक बहुत बड़ा सन्देश देती है .

आइये हम भी अपने समाज अपने आस-पड़ोस , अपने यार मित्रों , अजनबियों सभी के प्रति संवेदनशील बनें .

आइये , हम भी किसी के नंगे पाँव की चप्पलें बनें , और दुःख से भरी इस दुनिया में कुछ खुशियाँ फैलाएं !

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सोया भाग्य


एक व्यक्ति जीवन से हर प्रकार से निराश था। लोग उसे मनहूस के नाम से बुलाते थे। एक ज्ञानी पंडित ने उसे बताया कि तेरा भाग्य फलां पर्वत पर सोया हुआ है, तू उसे जाकर जगा ले तो भाग्य तेरे साथ हो जाएगा। बस! फिर क्या था वो चल पड़ा अपना सोया भाग्य जगाने। रास्ते में जंगल पड़ा तो एक शेर उसे खाने को लपका, वो बोला भाई! मुझे मत खाओ, मैं अपना सोया भाग्य जगाने जा रहा हूँ।

शेर ने कहा कि तुम्हारा भाग्य जाग जाये तो मेरी एक समस्या है, उसका समाधान पूछते लाना। मेरी समस्या ये है कि मैं कितना भी खाऊं … मेरा पेट भरता ही नहीं है, हर समय पेट भूख की ज्वाला से जलता रहता है।

मनहूस ने कहा– ठीक है।

आगे जाने पर एक किसान के घर उसने रात बिताई। बातों बातों में पता चलने पर कि वो अपना सोया भाग्य जगाने जा रहा है, किसान ने कहा कि मेरा भी एक सवाल है.. अपने भाग्य से पूछकर उसका समाधान लेते आना … मेरे खेत में, मैं कितनी भी मेहनत कर लूँ पैदावार अच्छी होती ही नहीं। मेरी शादी योग्य एक कन्या है, उसका विवाह इन परिस्थितियों में मैं कैसे कर पाऊंगा?

मनहूस बोला — ठीक है।

और आगे जाने पर वो एक राजा के घर मेहमान बना। रात्री भोज के उपरान्त राजा ने ये जानने पर कि वो अपने भाग्य को जगाने जा रहा है, उससे कहा कि मेरी परेशानी का हल भी अपने भाग्य से पूछते आना। मेरी परेशानी ये है कि कितनी भी समझदारी से राज्य चलाऊं… मेरे राज्य में अराजकता का बोलबाला ही बना रहता है।

मनहूस ने उससे भी कहा — ठीक है।

अब वो पर्वत के पास पहुँच चुका था। वहां पर उसने अपने सोये भाग्य को झिंझोड़ कर जगाया— उठो! उठो! मैं तुम्हें जगाने आया हूँ। उसके भाग्य ने एक अंगडाई ली और उसके साथ चल दिया। उसका भाग्य बोला — अब मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा।

अब वो मनहूस न रह गया था बल्कि भाग्यशाली व्यक्ति बन गया था और अपने भाग्य की बदौलत वो सारे सवालों के जवाब जानता था।

वापसी यात्रा में वो उसी राजा का मेहमान बना और राजा की परेशानी का हल बताते हुए वो बोला — चूँकि तुम एक स्त्री हो और पुरुष वेश में रहकर राज – काज संभालती हो, इसीलिए राज्य में अराजकता का बोलबाला है। तुम किसी योग्य पुरुष के साथ विवाह कर लो, दोनों मिलकर राज्य भार संभालो तो तुम्हारे राज्य में शांति स्थापित हो जाएगी।

रानी बोली — तुम्हीं मुझ से ब्याह कर लो और यहीं रह जाओ। भाग्यशाली बन चुका वो मनहूस इन्कार करते हुए बोला — नहीं नहीं! मेरा तो भाग्य जाग चुका है। तुम किसी और से विवाह कर लो। तब रानी ने अपने मंत्री से विवाह किया और सुखपूर्वक राज्य चलाने लगी। कुछ दिन राजकीय मेहमान बनने के बाद उसने वहां से विदा ली।

चलते चलते वो किसान के घर पहुंचा और उसके सवाल के जवाब में बताया कि तुम्हारे खेत में सात कलश हीरे जवाहरात के गड़े हैं, उस खजाने को निकाल लेने पर तुम्हारी जमीन उपजाऊ हो जाएगी और उस धन से तुम अपनी बेटी का ब्याह भी धूमधाम से कर सकोगे।

किसान ने अनुग्रहित होते हुए उससे कहा कि मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ, तुम ही मेरी बेटी के साथ ब्याह कर लो। पर भाग्यशाली बन चुका वह व्यक्ति बोला कि नहीं! नहीं! मेरा तो भाग्योदय हो चुका है, तुम कहीं और अपनी सुन्दर कन्या का विवाह करो। किसान ने उचित वर देखकर अपनी कन्या का विवाह किया और सुखपूर्वक रहने लगा।

कुछ दिन किसान की मेहमाननवाजी भोगने के बाद वो जंगल में पहुंचा और शेर से उसकी समस्या के समाधानस्वरुप कहा कि यदि तुम किसी बड़े मूर्ख को खा लोगे तो तुम्हारी ये क्षुधा शांत हो जाएगी।

_शेर ने उसकी बड़ी आवभगत की और यात्रा का पूरा हाल जाना। सारी बात पता चलने के बाद शेर ने कहा कि भाग्योदय होने के बाद इतने अच्छे और बड़े दो मौके गंवाने वाले ऐ इंसान! तुझसे बड़ा मूर्ख और कौन होगा? तुझे खाकर ही मेरी भूख शांत होगी और इस तरह वो इंसान शेर का शिकार बनकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।

सच है —
यदि आपके पास सही मौका परखने का विवेक
और
अवसर को पकड़ लेने का ज्ञान नहीं है तो भाग्य भी आपके साथ आकर आपका कुछ भला नहीं कर सकता।

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खरगोश की कहानी


सदियों से दुनिया को खरगोश और कछुए की कहानी सुनाई जा रही है ।
कछुए और खरगोश में दौड़ हुई । तेज़ दौड़ने वाला खरगोश हार गया । धीरे धीरे रेंगने वाला कछुआ जीत गया । दुनिया को सबक मिला कि Slow n Steady wins the race ……. चलते रहो चलते रहो …..
कभी मत रुको …… चलते रहो …… चरैवेति चरैवेति ……

पर आज तक किसी ने खरगोश से न पूछा कि उस दिन आखिर हुआ क्या था ?????
एक दिन मुझे मिल गया वो खरगोश …….एक पेड़ के नीचे लेटा ……. ऊँघता , अलसाता ।
मैंने पूछा , तुम वही हो न ???? जो उस दिन हार गया था कछुए से ?????

हाँ …….मैं वही हूँ ……

क्या हुआ था उस दिन ?

अरे कुछ नही यार । ये आलसी लापरवाह होने की कहानी झूठी है ।
मैं बेतहाशा दौड़ा चला जा रहा था । कछुआ बहुत बहुत पीछे छूट गया था । मुझे पता था मैं बहुत आगे हूँ ….. मैंने सोचा , इस पेड़ के नीचे दो घड़ी सुस्ता लेता हूँ ।
पिछली रात कायदे से सोया नही था ।
Competition की anxiety के कारण नींद ही न आई । बरसों से कछूए की कहानियां सुनाई जा रही थीं मुझे , वो बिना थके चल सकता है , सालों साल चल सकता है ……कभी नही थकता …… ये ज़िन्दगी एक मैराथन रेस की तरह है ।
मैं उस कछुए को दिखाना चाहता था कि मैं भी तेज दौड़ सकता हूँ और बहुत दूर तक दौड़ सकता हूँ ।
इस पेड़ की छांव कितनी शीतल है …… मैंने घास बिछा के एक नर्म गुदगुदा बिस्तर बनाया और उसपे लेट गया ……. लेटते ही आँख लग गई ।
स्वप्नलोक में पहुंच गया ।
वहां एक सन्यासी ध्यानमग्न बैठे थे ।
मुझे पास जान उन्होंने आँखें खोली ।
वो मुस्कुराए ।
कौन हो ?????
मैं खरगोश हूँ . दौड़ में हिस्सा ले रहा हूँ । दौड़ लगी हुई है ।
क्यों दौड़ रहे हो ?
जंगल को ये बताने के लिए कि मैं ही सबसे तेज़ दौड़ता हूँ …….
उससे क्या होगा ? तुम जंगल को क्यों बताना चाहते हो कि तुम बहुत तेज़ दौड़ते हो ??? इतना तेज दौड़ के क्या मिलेगा ???

सबसे तेज़ धावक का medal मिलेगा । इज़्ज़त शोहरत मिलेगी …..मान सम्मान होगा ……. पैसा मिलेगा । मैं अच्छा भोजन खाऊंगा ।

अच्छा भोजन तो आज भी है चारों ओर । देखो चारों तरफ कितनी हरियाली है । पेड़ पौधों पे फल फूल लदे हुए हैं ।

जंगल मुझे याद करेगा कि मैं सबसे तेज़ दौड़ने वाला खरगोश था ।

एक हज़ार साल पहले सबसे तेज़ दौड़ने वाले हिरण का नाम याद है तुम्हें ???? या सबसे बड़े हाथी का ??????
सबसे ताकतवर शेर का ?????

नही तो ……

आज तुम्हारा मुकाबला कछुए से है ।
कल हिरण से होगा
परसों घोड़े से …….
किस किस से दौड़ लगाओगे ?????
क्या सारी जिंदगी दौड़ते ही रहोगे ?????

अच्छा आज की दौड़ जीतने के बाद क्या करोगे ?????

चैन की बंसी बजाऊंगा । उस विशाल पेड़ की घनी छांव में आराम की नींद सोऊंगा । भंवरे मुझे लोरियां सुनाएंगे । तितलियां गुनगुनाएँगी । मैं उस तालाब में बतख के साथ खेलूंगा ।
चैन की नींद तो तुम अब भी सो रहे हो …….उस बतख के साथ तो तुम अब भी खेल सकते हो ।

मेरी नींद खुल गई ।
सामने देखा तो पक्षी चहचहा रहे थे । मैं तालाब में कूद गया । मुझे बत्तखों ने घेर लिया । मछलियां मेरे साथ अठखेलियाँ करने लगी ।
तभी एक बतख ने याद दिलाया ……हे , तुम्हारी तो दौड़ लगी है न कछुए के साथ …….. तुमको तो दौड़ना है अभी …….

छोड़ो , कुछ नही रखा इस बेकार की दौड़ में …….
मुझे किसी के सामने कुछ prove नही करना …….
मुझे किसी से मुकाबला नही करना …….….
चलो तैरने चलें ………
इस तरह मैंने वो दौड़ छोड़ दी ।

कछुए वाली दौड़ मैं बेशक हार गया , पर ज़िन्दगी की दौड़ में जीत गया हूँ ।

इस दुनिया मे 7 Billion लोग हैं ।
हम किसी को खुश नही रख सकते ।
इस भरी दुनिया मे आप सिर्फ एक आदमी को खुश रख सकते हैं …….खुद को ।

दुनिया को खुश करने के लिए नही , स्वयं को खुश रखने के लिये जियो ।

Fb पे पढ़ी एक पोस्ट का हिंदी रूपांतरण है ।
मूल रचना अंग्रेज़ी में है ।

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तिन गाँठे


भगवान बुद्ध अक्सर अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। एक दिन प्रातः काल बहुत से भिक्षुक उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे । बुद्ध समय पर सभा में पहुंचे, पर आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी। बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठें लगाने लगे ।

तीन गांठें

वहाँ उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब बुद्ध आगे क्या करेंगे ; तभी बुद्ध ने सभी से एक प्रश्न किया, ‘ मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं , अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या यह वही रस्सी है, जो गाँठें लगाने से पूर्व थी ?’
   एक शिष्य ने उत्तर में कहा,” गुरूजी इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है, ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है। एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है । दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं; अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं। पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरुप अपरिवर्तित है।”

“सत्य है !”, बुद्ध ने कहा ,” अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ।”यह कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक दुसरे से दूर खींचने लगे। उन्होंने पुछा, “तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूँ?”

“नहीं-नहीं , ऐसा करने से तो या गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हे खोलना और मुश्किल हो जाएगा। “, एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया।

बुद्ध ने कहा, ‘ ठीक है , अब एक आखिरी प्रश्न, बताओ इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा ?’

शिष्य बोला ,’”इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा , ताकि हम जान सकें कि इन्हे कैसे लगाया गया था , और फिर हम इन्हे खोलने का प्रयास कर सकते हैं। “

“मैं यही तो सुनना चाहता था। मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो, वास्तव में उसका कारण क्या है, बिना कारण जाने निवारण असम्भव है। मैं देखता हूँ कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं , कोई मुझसे ये नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है, लोग पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूँ ? कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहाँ से आया , लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे ख़त्म करूँ ?

प्रिय शिष्यों , जिस प्रकार रस्सी में में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरुप नहीं बदलता उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते। जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं। इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही , और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा, आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें,  निवारण स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा । ”
बुद्ध ने अपनी बात पूरी की।

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पतिव्रता स्त्री की महिमा


      किसी नगर में कौशिक नामक एक क्रोधी और निष्ठुर ब्राह्मण रहता था। उसे कोढ़ की बीमारी थी। उसकी पत्नी शांडिली अत्यंत माँ दुर्गा की बड़ी भक्ता थी। वह बड़ी पतिव्रता थी और कोढ़ से सड़े-गले पति को सर्वश्रेष्ठ पुरूष और पूजनीय समझती थी।
      एक रात वह अपने पति को कंधे पर लादकर कहीं लेकर जा रही थी। रास्ते में माण्डव्य मुनि को उसके पैरों की ठोकर लग गई। ऋषि क्रोधित हुए और शाप दे दिया- 'मूर्ख स्त्री तेरा पति सूर्योदय होते ही मर जाएगा।' ऋषि के शाप को सुनकर शांडिली बोली- 'महाराज, भूल से मेरे पति का पैर आपको लगा, जानबूझकर आपका अपमान नहीं किया, फिर भी आपने शाप दिया। मैं शाप देती हूँ कि जब तक मैं न कहूँ तब तक सूर्य ही उदय न हो।' माण्डव्य आश्चर्य में पड़ गये। उन्होंने कहा- 'तुम इतनी बड़ी तपस्विनी हो कि सूर्य की गति को रोक सकती हो'?  शांडिनी बोली- 'मैं तो भगवती की शरणागत हूँ, वही मेरे पतिव्रत धर्म की रक्षा करेंगी'।
       उसकी बात निष्फल नहीं रही। सूर्य अगली सुबह से लेकर दस दिन तक नहीं निकले। ब्रह्मांड संकट में आ गया। देवताओं को बड़ी चिंता हुई। वे अनुसूया जी के पास पहुँचे। अनुसूया जी सबसे बड़ी पतिव्रता स्त्री थीं। उनका प्रभाव देवों से भी अधिक था। देवों ने कहा- 'माता, एक पतिव्रता के प्रभाव के कारण संसार में संकट आ गया है। आपसे ज्यादा योग्य संसार में कोई और स्त्री नहीं होगी जो एक पतिव्रता शांडिली को समझाकर उसका क्रोध शांत कर सके'। अनुसूयाजी शांडिनी के पास पहुँची और उसके कारण उत्पन्न हुए संकट का प्रभाव बताकर वचन वापस लेने का अनुरोध किया। अनुसूयाजी ने कहा, 'तुम्हारे पति की मृत्यु के बाद उन्हें फिर से जीवित और स्वस्थ करने का मैं वचन देती हूँ'। शांडिनी को भरोसा हो गया, उसने अपना वचन वापस ले लिया और सूर्य की गति को की अनुमति दे दी।
       सूर्योदय के साथ ही माण्डव्य के शाप के कारण उसका पति मर गया। अनुसूयाजी ने सूर्य का आह्वान करते हुए कहा- 'मेरे पतिव्रत में यदि शक्ति है तो आप इस मृत पुरुष को पुनः जीवन, स्वास्थ्य और सौ वर्ष तक सुखद गृहस्थ जीवन का आशीर्वाद करें'। माण्डव्य ने इसे अपने अहं का प्रश्न बना लिया और बोले- मेरे शाप को कोई काट नहीं सकता। इसे जीवित करने का प्रयास करना व्यर्थ है। अनुसूयाजी ने भगवती का स्मरण किया- 'माता मेरी लाज रखकर माण्डव्य का अहंकार चूर करें'। अनुसूया माता की स्तुति करने लगीं। माता वहाँ प्रकट हुईं और कौशिक को जीवन और स्वास्थ्य प्रदान किया। माण्डव्य का अहंकार समाप्त हो गया।
      माण्डव्य बोले- 'आज मैंने दो पतिव्रता नारियों की शक्ति देख ली। पतिव्रता स्त्रियों में स्वयं भगवती का वास हो जाता है। हे भगवती, मैं अपनी शक्तियों के अनुचित प्रयोग के लिए क्षमा माँगता हूँ।' माता ने माण्डव्य को क्षमा कर दिया। माण्डव्य तप के लिए चले गए।
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स्फिर्फ अपने लक्ष्य पर ध्यान


एक बार की बात है। एक तालाब में कई सारे मेढ़क रहते थे। उन मेढ़को में एक राजा मेंढक था। एक दिन सारे मेढक ने कहा, क्यों न कोई प्रतियोगिता खेली जाए। तालाब में एक पेड़ था। राजा मेंढक ने कहाकि “जो भी इस पेड़ पर चढ़ जाएगा, वह विजयी कहलाएगा।

सारे मेढ़क द्वारा यह प्रतियोगिता स्वीकार कर ली गई और अगले दिन उस प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। सभी मेंढक तैयार थे। इस प्रतियोगिता मैं भाग लेने के लिए सारे मेंढक जैसे ही प्रतियोगिता शुरू हुई एक एक करके उस पेड़ पर चढ़ने लगे। कुछ मेढ़क ऊपर चढ़ते गए और फिर फिसलते गए। फिर नीचे गिर जाते थे।

ऐसे ही कई मेंढक ऊपर चढ़ते रहे और फ़िसलते रहे और फिर नीचे गिर जाते। इसी बीच कुछ मेढ़क ने हार मान कर बंद कर चढ़ना बन्द कर दिया। परंतु कुछ मेढ़क चढ़ते रहे, जो मेढ़क नहीं चढ़ पाए थे और छोड़ दिया था। वह कह रहे थे कि “इस पर कोई चढ़े ही नहीं पाएगा। यह असंभव है, असंभव है।”

इस पर कोई नहीं कर सकता। जो मेंढक दोबारा चढ़ रहे थे, उन्होंने भी हार मान ली। परंतु उनमें से एक मेंढक लगातार प्रयास करता रहा। लगातार प्रयास करने के कारण अंत में वह पेड़ पर चढ़ गया और सभी मित्रों द्वारा तालियां बजाई गई और सबने उससे चढ़ने का कारण पूछा उनमें से एक पीछे से एक ने कहा यह तो बहरा है, इसे कुछ सुनाई नहीं देता। उस बहरे मेंढक के एक दोस्त ने उससे पूछा तुमने यह कैसे कर लिया। उसने कहा मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। मुझे लग रहा था कि नीचे खड़े यह लोग मुझे प्रोत्साहित कर रहे हैं कि तुम कर सकते हो। अब तुम ही हो तुम कर सकते हो और मैं आखिरकार इस पेड़ पर चढ़ गया।

सब ने उसकी खूब तारीफ की और उसे पुरस्कृत किया गया।

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त्नी #वामांगी क्यों कहलाती है?*

पत्नी को वामंगी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है बाएं अंग का अधिकारी। इसलिए पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है।

🔸इसका कारण यह है कि भगवान शिव के बाएं अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है शिव का अर्धनारीश्वर शरीर। यही कारण है कि हस्तरेखा विज्ञान की कुछ पुस्तकों में पुरुष के दाएं हाथ से पुरुष की और बाएं हाथ से स्त्री की स्थिति देखने की बात कही गयी है।

🔸कहा गया है कि स्त्री पुरुष की वामांगी होती है इसलिए सोते समय और सभा में, सिंदूरदान, द्विरागमन, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं ओर रहना चाहिए। इससे शुभ फल की प्राप्ति होती।

🔸वामांगी होने के बावजूद भी कुछ कामों में स्त्री को दायीं ओर रहने के बात शास्त्र कहता है। शास्त्रों में बताया गया है कि कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं ओर बैठना चाहिए।

🔸पत्नी के पति के दाएं या बाएं बैठने संबंधी इस मान्यता के पीछे तर्क यह है कि जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति के बायीं ओर बैठती है। क्योंकि यह कर्म स्त्री प्रधान कर्म माने जाते हैं।

🔸यज्ञ, कन्यादान, विवाह यह सभी काम पारलौकिक माने जाते हैं और इन्हें पुरुष प्रधान माना गया है। इसलिए इन कर्मों में पत्नी के दायीं ओर बैठने के नियम हैं।

🔸सनातन धर्म में पत्नी को पति की वामांगी कहा गया है, यानी कि पति के शरीर का बांया हिस्सा, इसके अलावा पत्नी को पति की अर्द्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी, पति के शरीर का आधा अंग होती है, दोनों शब्दों का सार एक ही है, जिसके अनुसार पत्नी के बिना पति अधूरा है।

🔸पत्नी ही पति के जीवन को पूरा करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, उसके परिवार का ख्याल रखती है, और उसे वह सभी सुख प्रदान करती है जिसके वह योग्य है, पति-पत्नी का रिश्ता दुनिया भर में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ महाभारत में भी पति-पत्नी के महत्वपूर्ण रिश्ते के बारे में काफी कुछ कहा गया है, भीष्म पितामह ने कहा था कि पत्नी को सदैव प्रसन्न रखना चाहिये, क्योंकि, उसी से वंश की वृद्धि होती है, वह घर की लक्ष्मी है और यदि लक्ष्मी प्रसन्न होगी तभी घर में खुशियां आयेगी, इसके अलावा भी अनेक धार्मिक ग्रंथों में पत्नी के गुणों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है।

🔸आज आपको गरूड पुराण, जिसे लोक प्रचलित भाषा में गृहस्थों के कल्याण की पुराण भी कहा गया है, उसमें उल्लिखित पत्नी के कुछ गुणों की संक्षिप्त व्याख्या करेंगे, गरुण पुराण में पत्नी के जिन गुणों के बारे में बताया गया है, उसके अनुसार जिस व्यक्ति की पत्नी में ये गुण हों, उसे स्वयं को भाग्यशाली समझना चाहिये, कहते हैं पत्नी के सुख के मामले में देवराज इंद्र अति भाग्यशाली थे, इसलिये गरुण पुराण के तथ्य यही कहते हैं।

सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।।

🔸गरुण पुराण में पत्नी के गुणों को समझने वाला एक श्लोक मिलता है, यानी जो पत्नी गृहकार्य में दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है, वास्तव में वही पत्नी है, गृह कार्य में दक्ष से तात्पर्य है वह पत्नी जो घर के काम काज संभालने वाली हो, घर के सदस्यों का आदर-सम्मान

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बड़ा दिल


बात कुछ दिनों पूर्व की है,बाहर से किसी के मांगने की आवाज आई। सुबह से मांगने वालों का तांता सा लगा हुआ था तो पुनः बाहर जाने में थोड़ी झुंझलाहट सी महसूस हुई, लेकिन फिर आदत से मजबूर हो बाहर देखने गई।

एक श्याम वर्ण की दुबली पतली औरत खाने के लिए कुछ मांग रही थी। उसकी काया देख मैं उसके लिए कुछ खाने के लिए लेकर बाहर गई। साथ में एक 9-10 वर्ष के लड़के को देख मैंने उससे पूछा कि क्या यह तुम्हारा लड़का है? क्या यह पढ़ता है? तो उसने बड़े ही आत्मविश्वास से कहा कि दीदी यह लड़का मुझे मंदिर की सीढ़ियों पर मिला था।
वहां यह भीख मांगा करता था। मैं इसे अपने साथ घर ले आई और अब मैं ही इसकी देखभाल करती हूं। मैंने इसका दाखिला स्कूल में भी कराया है। इसका भाग्य बन जाए और मुझे क्या चाहिए।

मन ही मन उस महिला के प्रति सम्मान का भाव जगा। एक गरीब महिला जिसके पास स्वयं के लिए मुश्किल से कुछ होगा एक अनाथ बच्चे को पाल रही थी और हम लोग इतने सक्षम होकर भी इस तरह के कदम उठाने में झिझकते हैं। ऐसे में कभी-कभी लगता है कि जीवन में इतना आगे बढ़ कर भी क्या जीवन में कुछ अच्छा कर पाते हैं हम ? इस एक घटना ने मुझे काफी कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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मन के भाव


एक छोटा बच्चा था, जिसका नाम तन्विक था। बहुत ही नेक और बुद्धिमान ।
एक दिन वो मंदिर में गया। मंदिर के अन्दर सभी भक्त भगवान के मंत्र बोल रहे थे। कुछ भक्त स्तुतिगान भी कर रहे थे। कुछ भक्त संस्कृत के काफी कठिन श्लोक भी बोल रहे थे।

बच्चे ने कुछ देर यह सब देखा और उसके चहेरे पर उदासी छा गयी। क्योंकि उसे यह सब प्रार्थना और मंत्र बोलना आता नहीं था। कुछ देर वहाँ खड़ा रहा उसने अपनी आँखे बन्द की, अपने दोनों हाथ जोड़े और बार-बार “क-ख-ग-घ” बोलने लगा।

मंदिर में एक व्यक्ति ने यह देखा उसने लड़के से पूछा कि “बेटे तुम यह क्या कर रहे हो, बच्चे ने कहा भगवान की पूजा”। व्यक्ति ने कहा की “बेटे भगवान से इस तरह से प्रार्थना नहीं की जा सकती, तुम तो क-ख-ग-घ बोल रहे हो।” व्यक्ति की कोई गलती भी नहीं थी, क्योंकि उनकी तो पूजा भी रटी रटाई होती है।

भाव का तो मिश्रण होता ही नहीं, लेकिन बच्चा मासूम है, उसके पास शब्द तो थे नहीं सो भाव से क ख ग घ ही बोलने लगा।

लड़के ने उत्तर दिया की “मुझे प्रार्थना, मंत्र, भजन नहीं आते, मुझे सिर्फ क-ख-ग-घ ही आती है। मुझे मेरे पिताजी ने घर में पढ़ाते वक्त यह बताया था कि सारे शब्द इसी क-ख-ग-घ से बनते हैं इसलिये मेरे को इतना पता है प्रार्थना, मंत्र, भजन यह सब क-ख-ग-घ से ही बनते है।

मैं दस बार क-ख-ग-घ बोल गया हूँ, और भगवान से प्रार्थना करी की हे भगवान मैं अभी छोटे से स्कूल में पढ़ता हूँ मुझे अभी यही सिखाया है।इन सब शब्दों में से अपने लिए खुद प्रार्थना, मंत्र, भजन बना लेना।

बच्चे की बात सुनकर व्यक्ति चुप हो गए। उनको अपनी भूल का एहसास हो गया ।