Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

1978 ના સંભલ રમખાણો જેમાં માત્ર હિન્દુઓ માર્યા ગયા હતા અને તે પણ 250 હિન્દુઓ માર્યા ગયા હતા.

અત્યારે યોગી સરકાર તેની ફરીથી તપાસ કરાવી રહી છે.

  જ્યારે ફાઈલ ખોલવામાં આવી તો ચોંકાવનારા ખુલાસા થયા છે.

  તે સમયે મુલાયમ સિંહ ઉત્તર પ્રદેશના મુખ્યમંત્રી હતા, ત્યાં સમાજવાદી પાર્ટીની સરકાર હતી અને મુલાયમ સિંહે તમામ મુસ્લિમો પરના કેસ પાછા ખેંચવાનો આદેશ આપ્યો હતો.

અને આ આદેશ મીડિયા સુધી પહોંચવા પણ દેવામાં આવ્યો ન હતો

કોઈને ખ્યાલ ન હતો કે તમામ મુસ્લિમ તોફાનીઓ, હત્યારાઓ અને ડાકુઓ સામેનો કેસ પાછો ખેંચી લેવામાં આવ્યો છે.

અને આમાં એક જ ઘરમાં 48 હિંદુઓને જીવતા સળગાવીને મારનાર મુસ્લિમોના નામ પણ છે, લૂંટના આરોપીઓના નામ પણ છે અને હત્યાના આરોપીઓના નામ પણ છે.

ફાઈલમાં એવું પણ બહાર આવી રહ્યું છે કે, તપાસના નામે કોઈ પણ સાક્ષીનું નિવેદન નોંધવામાં આવ્યું નથી;

  એટલા માટે હિંદુઓ, યાદ રાખો કે જ્યારે પણ INDI ગઠબંધનને મત આપીએ છીએ ત્યારે હિન્દુ ઓ ના વિનાશના પ્રમાણપત્ર પર સહી કરી રહ્યા છીએ.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, रामायण - Ramayan

जब माता सीता ने मूलकासुर का वध किया था।



भगवान श्रीराम राजसभा में विराज रहे थे उसी समय विभीषण वहां पहुंचे। वे बहुत भयभीत और हड़बड़ी में लग रहे थे। सभा में प्रवेश करते ही वे कहने लगे- हे राम! मुझे बचाइए, कुंभकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढा रहा है। अब लगता है, न लंका बचेगी और न मेरा राजपाट।

भगवान श्रीराम द्वारा ढांढस बंधाए जाने और पूरी बात बताए जाने पर विभीषण ने बताया कि कुंभकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था इसलिए उस का नाम मूलकासुर रखा गया। इसे अशुभ जान कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था। जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया।

मूलकासुर जब बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया। अब उनके दिए वर और बल के घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है। जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राजपाट मुझे सौंप दिया है, तो वह भन्नाया हुआ है।

भगवन्, आपने जिस दिन मुझे राजपाट सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही उसने पातालवासियों के साथ लंका पहुंचकर मुझ पर धावा बोल दिया। मैंने 6 महीने तक मुकाबला किया, पर ब्रह्माजी के वरदान ने उसे इतना ताकतवर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा तथा अपने बेटे, मंत्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिए भागकर यहां पहुंचा हूं।

उसने कहा कि ‘पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारूंगा फिर पिता की हत्या करने वाले राम को भी मार डालूंगा। वह आपके पास भी आता ही होगा। समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं। जो उचित समझते हों तुरंत कीजिए।’

भक्त की पुकार सुन श्रीरामजी हनुमान तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक यान पर चढ़ झट लंका की ओर चल पड़े।

मूलकासुर को श्रीरामचन्द्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिए लंका के बाहर आ डटा। भयानक युद्ध छिड़ गया। 7 दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। मूलकासुर भगवान श्रीराम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था।

अयोध्या से सुमंत्र आदि सभी मंत्री भी आ पहुंचे। हनुमानजी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे। पर सब कुछ होते हुए भी युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दिख रहा था। भगवान भी चिंता में थे।

विभीषण ने बताया कि इस समय मूलकासुर तंत्र-साधना करने गुप्त गुफा में गया है। उसी समय ब्रह्माजी वहां आए और भगवान से कहने लगे- ‘रघुनंदन! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जाएगा।

श्रीराम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना फायदेमंद हो सकता है। जब इसके भाई-बिरादर लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी होकर कहा, ‘चंडी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ’। इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया- ‘दुष्ट! तूने जिसे ‘चंडी’ कहा है, वही सीता तेरी जान लेगी।

‘ मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया बाकी मुनि उसके डर से चुपचाप खिसक गए। तो हे राम! अब कोई दूसरा उपाय नहीं है। अब तो केवल सीता ही इसका वध कर सकती हैं। आप उन्हें यहां बुलाकर इसका वध करवाइए, इतना कहकर ब्रह्माजी चले गए।

भगवान श्रीराम ने हनुमानजी और गरूड़ को तुरंत पुष्पक विमान से सीताजी को लाने भेजा।

इधर सीता देवी-देवताओं की मनौती मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से ‘पाठ, रुद्रीय’ का जप करातीं, दुर्गाजी की पूजा करतीं कि विजयी श्रीराम शीघ्र लौटें। तभी गरूड़ और हनुमानजी उनके पास पहुंचे।

पति के संदेश को सुनकर सीताजी तुरंत चल दीं। भगवान श्रीराम ने उन्हें मूलकासुर के बारे में सारा कुछ बताया। फिर तो भगवती सीता को गुस्सा आ गया। उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था। यह छाया सीता चंडी के वेश में लंका की ओर बढ़ चलीं।

इधर श्रीराम ने वानर सेना को इशारा किया कि मूलकासुर जो तांत्रिक क्रियाएं कर रहा है उसको उसकी गुप्त गुफा में जाकर तहस-नहस करें। वानर गुफा के भीतर पहुंचकर उत्पात मचाने लगे तो मूलकासुर दांत किटकिटाता हुआ सब छोड़-छाड़कर वानर सेना के पीछे दौड़ा। हड़बड़ी में उसका मुकुट गिर पड़ा। फिर भी भागता हुआ वह युद्ध के मैदान में आ गया।

युद्ध के मैदान में छाया सीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन? अभी भाग जा। मैं औरतों पर मर्दानगी नहीं दिखाता।

छाया सीता ने भी भीषण आवाज करते हुए कहा, ‘मैं तुम्हारी मौत चंडी हूं। तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मारकर उसका बदला चुकाऊंगी।’ इतना कहकर छाया सीता ने मूलकासुर पर 5 बाण चलाए। मूलकासुर ने भी जवाब में बाण चलाए। कुछ देर तक घोर युद्ध हुआ, पर अंत में ‘चंडिकास्त्र’ चलाकर छाया सीता ने मूलकासुर का सिर

प्रेरक कथाएँ, [06-12-2024 09:40]
उड़ा दिया और वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा।

राक्षस हाहाकार करते हुए इधर-उधर भाग खड़े हुए। छाया सीता लौटकर सीता के शरीर में प्रवेश कर गई। मूलकासुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जय-जयकार की और विभीषण ने उन्हें धन्यवाद दिया। कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्रीराम सीता सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट आए।

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पहले खुद राम तो बनो


आप मेरी बात तो सुनिए सुनंदा ने कहना चाहा, लेकिन सुमेश ने उसे बाहर करते हुए कहा मुझे कुछ नहीं सुनना, इस घर में अब तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। और भड़ाक से दरवाज़ा बंद कर लिया। सुनंदा को कुछ समझ नहीं आया, क्या करे, कहाँ जाए। उसने एक फोन लगाया और पूरी बात बताई। उधर से आवाज़ आई आप यहीं आ जाइए।
अगले दिन सुमेश से मिलने उसका मित्र अंकित आया तो देखा कि सुमेश नशे में धुत्त बैठा था। पास में दो बोतलें रखी थीं और गिलास ढ़ुलकी पड़ी थी।अंकित ने पूछा यार, भाभी कहाँ हैं? सुनकर वह फट पड़ा नाम मत लो उस कुलटा का, परसों रात भर पता नहीं कहाँ अपना मुँह काला करती रही, मैंने उसे घर से निकाल दिया।
तुमने कारण नहीं पूछा?
पूछने की ज़रूरत क्या थी? कहकर वह बोतल की बची शराब भी गटक गया।
अचानक सुमेश को कुछ याद आया, उसने अंकित से पूछा अब तेरी पत्नी की तबीयत कैसी है? अंकित बोला वही तो बताने आया हूँ। परसों रात अचानक अनु की तबीयत बहुत बिगड़ गई, मैंने तुझे ऑफ़िस में फ़ोन लगाया, लेकिन तूने नहीं उठाया तो फिर सुनंदा भाभी को फ़ोन किया, वह तो बहुत घबरा गईं, उन्होंने ही डाॅक्टर को मेरे घर का पता बताया और मेरे घर आ गईं। उन्होंने भी तुझे चार-पाँच फ़ोन किया था, तेरे से बात न होने पर वो बेचारी बहुत परेशान थी कि तेरे साथ कोई अनहोनी तो न हो गई है।डाॅक्टर ने अनु का चेकअप करके बताया कि सही समय पर मुझे इन्फार्म कर दिया वरना। देर बहुत हो गई थी तो हमने ही उन्हें रोक लिया था। मैं तो उनका धन्यवाद करने आया था परन्तु तुमने तो…
हे भगवान! ये मुझसे क्या अनर्थ हो गया। कहकर वह रोने लगा। रोते रोते उसने अपना फ़ोन देखा, सुनंदा के कई मिस्ड काॅल थें। सायलेंट मोड पर होने के कारण उसने नहीं सुना। वह अपने को कोसने लगा तब अंकित बोला खुद को अब कोसने से क्या फ़ायदा? याद है,भाभी कभी तुम्हारा फ़ोन नहीं उठा पाती तो तुम कितना चिल्लाते थे। उन्हें बिना बताए कहीं चले जाते, देर रात घर लौटते, कभी-कभी तो तुम अगली सुबह आते, लेकिन उन्होंने कभी तुमसे कुछ नहीं कहा, वो तुम पर विश्वास करती थीं, इसी विश्वास पर तो उस रात वो हमारे घर ठहर गईं थी, लेकिन तुमने उन्हें अपनी बात कहने का एक मौका तक नहीं दिया लानत है तुम पर। अरे, पत्नी का त्याग कर देने से ही कोई राम नहीं बन जाता। श्री राम में धैर्य था, व्यवहार में सौम्यता थी। क्रोध तो उन्हें कभी छुआ भी न था। तभी तो वे पुरुषोत्तम कहलाए। सीता की इच्छा रखते हो तो पहले स्वयं राम तो बनो।
अंकित की बात सुनकर सोमेश हाथ जोड़कर बोला मुझे माफ़ कर दो यार! मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई है।अब मैं सुनंदा को कहाँ ढूंढू? मैं पुलिस को फ़ोन करता हूँ। और वह पुलिस का नंबर डायल करने लगा तो अंकित बोला पहले अपना हुलिया ठीक करके मेरे घर चलो, नाश्ता करो, तब थाने चलेंगे। सोमेश ने अंकित की बात मान ली और फ़्रेश होकर अंकित के साथ उसके घर चला गया। डाइनिंग टेबल पर सुनंदा को नाश्ता सर्व करते देख सोमेश खुशी से उछल पड़ा। बोला सुनंदा,तुम यहाँ! फिर वह हाथ जोड़कर बोला मुझे माफ़ कर दो। क्रोध में आकर मैं अपना आपा खो बैठा था, इसीलिए तुम्हारे साथ बदसलूकी कर बैठा। प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो। सुनंदा ने जब कोई जवाब नहीं दिया तो वह कान पकड़कर उठक बैठक करने लगा, यह देखकर सुनंदा को हँसी आ गई और सोमेश ने उसे गले से लगा लिया, तभी अंकित आ गया, सोमेश से बोला मित्र घर प्यार और विश्वास से बनता है, शक का कीड़ा घर की दीवारों में दरारें पैदा कर देती हैं।अपनी गलती दोहराना मत वरना.
कभी नहीं! कहकर सोमेश अपनी सीता रूपी सुनंदा को लेकर घर आ गया।

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समय बहुत बलवान होता है


वह शिखंडी से भीष्म को मात दिला सकता है!

कर्ण के रथ को फंसा सकता है!

द्रौपदी का चीरहरण करा सकता है!

अगर किसी से डरना है तो वह है समय!

पढ़िए यह कहानी!एक मित्र ने भेजी है!

महाभारत में एक प्रसंग आता है जब धर्मराज युधिष्ठिर ने विराट के दरबार में पहुँचकर कहा-

“हे राजन! मैं व्याघ्रपाद गोत्र में उत्पन्न हुआ हूँ तथा मेरा नाम ‘कंक’ है। मैं द्यूत विद्या में निपुण हूँ। आपके पास आपकी सेवा करने की कामना लेकर उपस्थित हुआ हूँ।”

द्यूत ……जुआ ……यानि वह खेल जिसमें धर्मराज अपना सर्वस्व हार बैठे थे। कंक बन कर वही खेल वह राजा विराट को सिखाने लगे।

जिस बाहुबली के लिये रसोइये दिन रात भोजन परोसते रहते थे वह भीम बल्लभ का भेष धारण कर स्वयं रसोइया बन गया।

नकुल और सहदेव पशुओं की देखरेख करने लगे।

दासियों सी घिरी रहने वाली महारानी द्रौपदी …….स्वयं एक दासी सैरंध्री बन गयी।

……और वह धनुर्धर। उस युग का सबसे आकर्षक युवक, वह महाबली योद्धा। वह द्रोण का सबसे प्रिय शिष्य। वह पुरुष जिसके धनुष की प्रत्यंचा पर बाण चढ़ते ही युद्ध का निर्णय हो जाता था।वह अर्जुन पौरुष का प्रतीक अर्जुन। नायकों का महानायक अर्जुन।एक नपुंसक बन गया।

एक नपुंसक ?

उस युग में पौरुष को परिभाषित करने वाला अपना पौरुष त्याग कर होठों पर लाली लगा कर ,आंखों में काजल लगा कर एक नपुंसक “बृह्नला” बन गया।

युधिष्ठिर राजा विराट का अपमान सहते रहे। पौरुष के प्रतीक अर्जुन एक नपुंसक सा व्यवहार करते रहे। नकुल और सहदेव पशुओं की देख रेख करते रहे……भीम रसोई में पकवान पकाते रहे और द्रौपदी…..एक दासी की तरह महारानी की सेवा करती रही।

परिवार पर एक विपदा आयी तो धर्मराज अपने परिवार को बचाने हेतु कंक बन गया। पौरुष का प्रतीक एक नपुंसक बन गया।एक महाबली साधारण रसोईया बन गया।

पांडवों के लिये वह अज्ञातवास नहीं था। अज्ञातवास का वह काल उनके लिये अपने परिवार के प्रति अपने समर्पण की पराकाष्ठा थी।

वह जिस रूप में रहे।जो अपमान सहते रहे …….जिस कठिन दौर से गुज़रे …..उसके पीछे उनका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं था। अज्ञातवास का वह काल परिस्थितियों को देखते हुये परिस्थितियों के अनुरूप ढल जाने का काल था !!

आज भी इस धरती में अज्ञातवास जी रहे ना जाने कितने महायोद्धा दिखाई देते हैं। कोई धन्ना सेठ की नौकरी करते हुये उससे बेवजह गाली खा रहा है क्योंकि उसे अपनी बिटिया की स्कूल की फीस भरनी है।

बेटी के ब्याह के लिये पैसे इकट्ठे करता बाप एक सेल्समैन बन कर दर दर धक्के खा कर सामान बेचता दिखाई देता है।

ऐसे असंख्य पुरुष निरंतर संघर्ष से हर दिन अपना सुख दुःख छोड़ कर अपने परिवार के अस्तिव की लड़ाई लड़ रहे हैं।

रोज़मर्रा के जीवन में किसी संघर्षशील व्यक्ति से रूबरू हों तो उसका आदर कीजिये।

उसका सम्मान कीजिये।

फैक्ट्री के बाहर खड़ा गार्ड……होटल में रोटी परोसता वेटर…..सेठ की गालियां खाता मुनीम……. वास्तव में कंक …….बल्लभ और बृह्नला हैं।

क्योंकि कोई भी अपनी मर्ज़ी से संघर्ष या पीड़ा नही चुनता। वे सब यहाँ कर्म करते हैं। वे अज्ञातवास जी रहे हैं……!

परंतु वह अपमान के भागी नहीं हैं। वह प्रशंसा के पात्र हैं। यह उनकी हिम्मत है…..उनकी ताकत है ……उनका समर्पण है कि विपरीत परिस्थितियों में भी वह डटे हुये हैं।

वह कमजोर नहीं हैं ……उनके हालात कमज़ोर हैं…..उनका वक्त कमज़ोर है।

याद रहे……

अज्ञातवास के बाद बृह्नला जब पुनः अर्जुन के रूप में आये तो कौरवों के नाश कर दिया। पुनः अपना यश, अपनी कीर्ति सारे विश्व में फैला दी। वक्त बदलते वक्त नहीं लगता इसलिये जिसका वक्त खराब चल रहा हो,उसका उपहास और अनादर ना करें।

उसका सम्मान करें, उसका साथ दें।

क्योंकि एक दिन संघर्षशील कर्मठ ईमानदारी से प्रयास करने वालों का अज्ञातवास अवश्य समाप्त होगा।

समय का चक्र घूमेगा और बृह्नला का छद्म रूप त्याग कर धनुर्धर अर्जुन इतिहास में ऐसे अमर हो जायेंगे.. कि पीढ़ियों तक बच्चों के नाम उनके नाम पर रखे जायेंगे। इतिहास बृह्नला को भूल जायेगा। इतिहास अर्जुन को याद रखेगा।

हर संघर्षशील,लग्नशील और कर्मठ व्यक्ति में बृह्नला को मत देखिये। कंक को मत देखिये। बल्लभ को मत देखिये। हर संघर्षशील व्यक्ति में धनुर्धर अर्जुन को देखिये। धर्मराज युधिष्ठिर और महाबली भीम को देखिये।

उसका भरपूर सहयोग करिए उसके ईमानदार प्रयासों को सराहे ! क्योंकि याद रखना एक दिन हर संघर्षशील व्यक्ति का अज्ञातवास खत्म होगा।

यही नियति है।
यही समय का चक्र है।
यही महाभारत की भी सीख है!

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

हमारा गौरवशाली इतिहास


इतिहासकारों ने हमारे #इतिहास को केवल 200 वर्षों में ही समेट कर रख दिया है जबकि उन्होंने हमें कभी नहीं बताया कि एक  राजा ऐसा भी था जिसकी सेना में  महिलाएं  कमांडर थी और जिसने अपनी  विशाल  नौकाओं वाली  शक्तिशाली  नौसेना की मदद से पूरे दक्षिण-पूर्व  एशिया पर कब्जा कर लिया था 

राजा राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044) — वामपंथी इतिहासकारों के साजिशों की भेंट चढ़ने वाला हमारे इतिहास का एक महान शासक

राजाराजेन्द्रचोल, चोल राजवंश के सबसे महान शासक थे उन्होंने अपनी विजयों द्वारा चोल सम्राज्य का विस्तार कर उसे दक्षिण भारत का सर्व शक्तिशाली साम्राज्य बना दिया था । राजेंद्र चोल एकमात्र राजा थे जिन्होंने न केवल अन्य स्थानों पर अपनी विजय का पताका लहराया बल्कि उन स्थानों पर वास्तुकला और प्रशासन की अद्भुत प्रणाली का प्रसार किया जहां उन्होंने शासन किया।

सन 1017 ईसवी में हमारे इस शक्तिशाली नायक ने सिंहल (श्रीलंका) के प्रतापी राजा महेंद्र पंचम को बुरी तरह परास्त करके सम्पूर्ण सिंहल(श्रीलंका) पर कब्जा कर लिया था ।

जहाँ कई महान राजा नदियों के मुहाने पर पहुँचकर अपनी सेना के साथ आगे बढ़ पाने का हिम्मत नहीं कर पाते थे वहीं राजेन्द्र चोल ने एक शक्तिशाली नेवी का गठन किया था जिसकी सहायता से वह अपने मार्ग में आने वाली हर विशाल नदी को आसानी से पार कर लेते थे ।

अपनी इसी नौसेना की बदौलत राजेन्द्र चोल ने अरब सागर स्थित सदिमन्तीक नामक द्वीप पर भी अपना अधिकार स्थापित किया यहाँ तक कि अपने घातक युद्धपोतों की सहायता से कई राजाओं की सेना को तबाह करते हुए राजेन्द्र प्रथम ने जावा, सुमात्रा एवं मालदीव पर अधिकार कर लिया था ।

एक विशाल भूभाग पर अपना साम्राज्य स्थापित करने के बाद उन्होंने (गंगई कोड़ा) चोलपुरम नामक एक नई राजधानी का निर्माण किया था, वहाँ उन्होंने एक विशाल कृत्रिम झील का निर्माण कराया जो सोलह मील लंबी तथा तीन मील चौड़ी थी। यह झील भारत के इतिहास में मानव निर्मित सबसे बड़ी झीलों में से एक मानी जाती है। उस झील में बंगाल से गंगा का जल लाकर डाला गया।

एक तरफ आगरा मे शांहजहाँ के शासन के दौरान भीषण अकाल के बावजूद इतिहासकार उसकी प्रशंसा में इतिहास के पन्नों को भरने में लगे रहे दूसरी तरफ जिस राजेन्द्र चोल के अधीन दक्षिण भारत एशिया में समृद्धि और वैभव का प्रतिनिधित्व कर रहा था उसके बारे में हमारे इतिहास की किताबें एक साजिश के तहत खामोश रहीं ।

यहाँ तक कि बंगाल की खाड़ी जो कि दुनिया की सबसे बड़ी खाड़ी है इसका प्राचीन नाम चोला झील था, यह सदियों तक अपने नाम से चोल की महानता को बयाँ करती रही, बाद में यह कलिंग सागर में बदल दिया गया गया और फिर ब्रिटिशर्स द्वारा बंगाल की खाड़ी में परिवर्तित कर दिया गया, वाम इतिहासकारों ने हमेशा हमारे नायकों के इतिहास को नष्ट करने की साजिश रची और हमारे मंदिरों और संस्कृति को नष्ट करने वाले मुगल आक्रांताओं के बारे में पढ़ाया, राजेन्द्र चोल की सेना में कमांडर के पद पर कुछ महिलाएं भी थी, सदियों बाद मुगलों का एक ऐसा वक्त आया जब महिलाएं पर्दे के पीछे चली गईं ।

हममें से बहुत से लोगों को चोल राजवंश और मातृभूमि के लिए उनके योगदान के बारे में नहीं पता है। मैंने इतिहास के अलग-अलग स्रोतों से अपने इस महान नायक के बारे में जाने की कोशिश की और मुझे महसूस हुआ कि अपने इस स्वर्णिम इतिहास के बारे में आपको भी जानने का हक है

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सपना पुरा होने की खुशी


अंशुल और निशा आज सविता जी को गांव से शहर ले आए। नए नए शहर और घर में आने से डर रही सविता को बेटे बहु ने बहुत प्यार, सम्मान दिया। अर्जुन जी के जाने के बाद अकेली कैसे रहने देते अपनी मां को। सामान जमाते जमाते निशा को सविता जी की लिखी एक डायरी दिखी। उसे खोलकर पढ़ते पढ़ते कब दोपहर से शाम हो गई निशा को पता ही ना चला। खो गई उन डायरी के पन्नो में और हैरत में रह गई अपने सास के इस गुण से। मां कितना अच्छा लिखती है और मै उन्हें गांव में सब काम करते देख एक सामान्य सी महिला समझती थी पर मां के लिखे इन पन्नों ने उनकी काबिलियत का अहसास करवा दिया। वो चुपचाप बाहर आई और अपने काम में लग गई। रात में कमरे में अंशुल को मां की डायरी दिखाते हुए बोली ये देखिए मां कितना अच्छा लिखती है। भाषा, शैली, शब्दो का चयन मां का तो अद्भुत है।
अंशुल ने पढ़ते पढ़ते बताया कि हां मां को कभी कभी मैने देखा था अकेले में लिखते हुए पर कभी ध्यान ही नहीं दिया कि मां इतना अच्छा लिखती है। हमेशा काम में ही व्यस्त देखा उन्हे और सबकी सेवा करते ही उनके चहेरे पर जो सुकून देखते बस हमे लगता कि मां इसी में खुश है।
सुनिए ना अंशुल मां को फिर से लिखने के लिए प्रोत्साहित करते है ना!
बिलकुल करना भी चाहिए निशा, मेरी मां इतना अच्छा लिखती है। उनकी डायरी पढ़कर ही उनके सुख का अनुभव कर रहा हूं मैं।
मां कहां है आप?
यहीं हूं अंशुल बेटा क्या हुआ?
मां एक बात पूछूं ?
हां बेटा कहो!
मां आपका कोई एक सपना जो अधूरा रह गया हो जिसे आप पूरा करना चाहते हो पर कर ना पाए हो!
आज ये क्या लेके बैठ गया बेटा?
प्लीज मां बताओ ना, ऐसा कोई सपना, कोई खुवाइश जो आपने चाही पर पूरी ना कर पाई आप।
बेटा एक ही ख्वाब था कि मेरा कि मैं बहुत लिखूं, हर विधा में लिखूं, मेरा लिखा लोग पढ़े, पर संयुक्त परिवार में आकर ये सब ख्वाब कब आंखो से ओझल हो गए पता ही नही चला।
ओर फिर एक दिन अंशुल और निशा ने एक पैकेट आकर सविता जी को दिया ये क्या है बेटा?
आप खुद ही देखिए मां!
पैकेट खोलकर अंदर अपने लिखे को किताब के रूप में देख सविता जी का चेहरा खिल गया, पन्ने बदलते बदलते मां के चेहरे के है भाव को पढ़ रहे थे दोनो। हर पन्ने को बदलते ही होठों पर आई मुस्कान, फिर आंखो से बहते खुशी के आंसू, फिर याद कर कर के हर बात बताना कि क्या हुआ था घर में, तब मैने ये लिखा था, और भर भर मां का आशीर्वाद देना, मुझे और निशा को गले लगाना, माथा चुमना। आज मां को खुश देखकर सही में बहुत खुशी हुई। तब हमने मां से कहा मां, अब आप रोज लिखना, सब लिखना आपका सपना अब हर बार पूरा होगा और मां ने गले लगा लिया!

Posted in भारतीय शिक्षा पद्धति

कोटा में आत्महत्या करने वाली छात्रा कृति ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि :-“मैं भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से कहना चाहती हूं कि अगर वो चाहते हैं कि कोई बच्चा न मरे तो जितनी जल्दी हो सके इन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दे।

ये कोचिंग छात्रों को खोखला कर देते हैं।

पढ़ने का इतना दबाव होता है कि बच्चे बोझ तले दब जाते हैं।
कृति ने लिखा है कि वो कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाईड करने से रोकने में सफल हुई लेकिन खुद को नहीं रोक सकी।

बहुत लोगों को विश्वास नहीं होगा कि मेरे जैसी लड़की जिसके 90+ मार्क्स हो वो सुसाइड भी कर सकती है,
लेकिन मैं आपलोगों को समझा नहीं सकती कि मेरे दिमाग और दिल में कितनी नफरत भरी है।

अपनी मां के लिए उसने लिखा- “आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया और मुझे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर करती रहीं।
मैं भी विज्ञान पढ़ती रहीं ताकि आपको खुश रख सकूं।

मैं क्वांटम फिजिक्स और एस्ट्रोफिजिक्स जैसे विषयों को पसंद करने लगी और उसमें ही बीएससी करना चाहती थी लेकिन मैं आपको बता दूं कि मुझे आज भी अंग्रेजी साहित्य और इतिहास बहुत अच्छा लगता है क्योंकि ये मुझे मेरे अंधकार के वक्त में मुझे बाहर निकालते हैं।”

कृति अपनी मां को चेतावनी देती है कि- ‘इस तरह की चालाकी और मजबूर करनेवाली हरकत 11 वीं क्लास में पढ़नेवाली छोटी बहन से मत करना,
वो जो बनना चाहती है और जो पढ़ना चाहती है उसे वो करने देना क्योंकि वो उस काम में सबसे अच्छा कर सकती है जिससे वो प्यार करती है।

इसको पढ़कर मन विचलित हो जाता है कि इस होड़ में हम अपने बच्चों के सपनो को छीन रहे है।
आज हम लोग अपने परिवारों से प्रतिस्पर्धा करने लगे है कि फलां का बेटा-बेटी डॉक्टर बन गया,
हमें भी डॉक्टर बनाना है।

फलां की बेटी-बेटा सीकर/कोटा हॉस्टल में है तो हम भी वही पढ़ाएंगे,चाहे उस बच्चे के सपने कुछ भी हो…हम उन्हें अपने सपने थोंप रहे है।
आज हमारे स्कूल(कोचिंग संस्थान) बच्चों को परिवारिक रिश्तों का महत्व नही सीखा पा रहे,उन्हें असफलताओं या समस्याओं से लड़ना नही सीखा पा रहे।

उनके जहन में सिर्फ एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा के भाव भरे जा रहे है जो जहर बनकर उनकी जिंदगियां लील रहा है।
जो कमजोर है वो आत्महत्या कर रहा है व थोड़ा मजबूत है वो नशे की ओर बढ़ रहा है।

जब हमारे बच्चे असफलताओ से टूट जाते है तो उन्हें ये पता ही नही है कि इससे कैसे निपटा जाएं।
उनका कोमल हदय इस नाकामी से टूट जाता है इसी वजह से आत्महत्या बढ़ रही है।

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संकट में धैर्य रखें


घर के बाहर पेड़ के नीचे बच्चे दादाजी के चारों ओर खड़े हो गए। प्लीज, दादाजी हमें कहानी सुनाइए ना, अच्छा सुनाता हूं, पहले सब बैठ जाओ, दादाजी ने कहा।
सभी बच्चे अपनी- अपनी जगह चुन कर बैठ गए। दादाजी ने कहानी कहना शुरू किया। मनोरम नामक वन में एक बहुत ही सुंदर बड़ा सा तालाब था। तालाब चारों ओर से सुंदर वृक्षों व फूल पौधों से घिरा हुआ था।
तालाब में कमल खिले हुए हुए थे। एक समय की बात है कि दो मछुआरे मनोरम वन में विश्राम कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि तालाब में खूब सारी मछलियां हैं।

दोनों मछुआरे आश्चर्यचकित होकर बोले,’ हमें आज तक इस तालाब का पता क्यों नहीं चला।’ काफी समय हो गया था। संध्या हो चुकी थी, इसलिए दोनों आपस में बात करते हुए वहां से लौट गए कि कल आकर यहां पर जाल बिछाएंगे।
यह बात तालाब में बैठी तीन मछलियों ने सुन ली, वे आपस में बातें करने लगीं कि अगले दिन मछुआरे आकर यहां जाल बिछाएंगे और हम सभी को पकड़ लेंगे। क्यों न हम लोग तालाब से निकलकर नदी में चलें?
उनमें से एक मछली आलसी थी। उसने सुझाव को स्वीकार नहीं किया और कहा कि जब मछुआरे आएंगे तब हम कहीं छुप जाएंगे। अगले दिन जैसे ही मछुआरा आया, एक मछली छलांग लगाकर नदी में चली गई।

आलसी मछली और उसकी एक मित्र भी मछलियों के साथ जाल में पकड़ी गई।
जैसे ही मछुआरा जाल समेटने के लिए आगे बढ़ा तो समझदार मछली ने मरे हुए होने का झूठा नाटक किया। मछुआरे ने मरा हुआ समझकर उस मछली को निकालकर फेंक दिया।
वह मछली अपनी समझदारी का प्रयोग करते हुए उछलकर नदी में भाग गई, किंतु जो आलसी मछली थी, वह जाल में पड़ी रही। मछुआरों ने उसे ले जाकर बाजार में बेच दिया। दादाजी बोले, हमेशा अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए और हमें आलसी नहीं बनना चाहिए।

किसी भी परिस्थति में कभी घबरानाएं नहीं, बुद्धि का प्रयोग करके संकट से बच सकते हैं। कहानी सभी बच्चों को बहुत पसंद आई, ताली बजाते हुए बच्चे दादाजी के साथ घर के भीतर चले गए।

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किसी अंग्रेज ने एकबार बिरला जी से पूछा- ‘आप अपने कर्मचारियों को समय पर आफिस आने के लिये कैसे प्रेरित करते हो ?

बिरला जी ने कहा- बहुत आसान है. मेरे आफिस में 25 लोग काम करते हैं और मैंने फ्री पाकिग केवल 24 बनवाई है, 25वी का पार्किंग चार्ज 100 रु है. तो 100 रु बचाने के लिये हर कर्मचारी एक दूसरे से पहले आने की कोशिश करता है।अंग्रेज ने जमीन पर लेटकर बिरला जी को प्रणाम किया था।