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स्नेह के आँसू



सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल की घंटी का बटन दबाया। ऊपर बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा।

“बीबी जी !  सब्जी ले लो ।” बताओ क्या- क्या तोलना है।  कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है क्या ? सब्जी वाले ने  कहा।

“रुको भैया!  मैं नीचे आती हूँ।”

महिला नीचे उतर कर आई और सब्जी वाले के पास आकर बोली –  “भैया ! तुम हमारे घर की घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।”

“कैसी बात कर रही हैं बीबी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी ?” सब्जीवाले ने कहा।

“नहीं भैया ! उनके पास अब कोई काम नहीं है। किसी तरह से हम लोग अपने आप को जिंदा रखे हुए हैं। जब सब ठीक हो जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे, तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी। मैं किसी और से सब्जी नहीं खरीदती हूँ। तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है ! उन्हें अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है।  इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।” ईतना कहकर महिला अपने घर में वापिस जाने लगी।

“बहन जी ! तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से आपको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे,  तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए थे। अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे ?
सब्जी वाले हैं ! कोई नेता जी तो है नहीं  कि वादा करके छोड़ दें।  रुके रहो दो मिनिट।”

और सब्जी वाले ने  एक थैली के अंदर टमाटर , आलू, प्याज, घीया, कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया ।
महिला हैरान थी… उसने तुरंत कहा – “भैया !  तुम मुझे उधार  सब्जी दे रहे हो, कम से कम तोल तो लेते और मुझे पैसे भी बता दो।  मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी।  जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हें तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।” महिला ने कहा।

“वाह ! ये क्या बात हुई भला ? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी -भाँजे से पैसे नहीं लेता हैं और बहिन ! मैं  कोई अहसान भी नहीं कर रहा हूँ । ये सब तो यहीं से कमाया है, इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुड़िया के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसमी ।
बच्चों का खूब ख्याल  रखना, ये बीमारी बहुत बुरी है और आखिरी बात भी सुन लो !
“घंटी तो मैं जब भी आऊँगा, जरूर बजाऊँगा।” ईतना कहकर सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं।
महिला की आँखें मजबूरी की जगह स्नेह के आंसुओं से भरी हुईं थीं।

सेवा का दिखावा करने के बजाय कहीं और न जाकर अपने आसपास के लोगों की सेवा यदि प्रत्येक व्यक्ति कर ले तो यह मुश्किल घड़ी भी आसानी से गुजर जाएगी और आत्मा आनंद अमृत से तृप्त होगी।

केवल अपना ही नहीं… अपने परिजनों और आस-पड़ोस का भी ध्यान रखें !

मेने नहीं लिखा पर पता नहीं क्यों, इस पोस्ट को पढ़कर मेरे भी आंसू निकल आये

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कुछ न कहो, [24-11-2024 21:56]
योगेश ट्रेन की जनरल बोगी में बर्थ सीट पर सोया हुआ था | गाडी रूककर वापस चली तो अचानक उसकी नजर अपनी तलाकशुदा पत्नी रागिनी पर पडी | पता नहीं कब वह उसके सामने वाली सीट पर आकर बैठ गई थी | 6 साल बाद वह उसे देख रहा था | वह बहुत कमजोर हो गई थी | उसने पुरानी
सस्ती सी साडी पहन रखी थी | ना माथे पर बिंदी और ना गले में मंगलसूत्र था | तो क्या उसने अभी तक दूसरा विवाह नहीं किया | क्या अभी तक वह मेरी तरह अकेली ही है | योगेश ऐसा सोच ही रहा था कि तभी रागिनी की नजर उस पर पडीनजरे मिली तो योगेश दूसरी तरफ देखने लगा | फिर पता नहीं
योगेश के दिमाग में क्या आया कि वह सीट से नीचे उतर आया और रागिनी के पास बैठे लडके से कहा कि वह ऊपर वाली सीट पर चला जाये | लडका मान गया तब योगेश रागिनी के पास बैठ गया | बैठते ही योगेश बोला ” रागिनी
कैसी हो ?”

रागिनी ने नजर न मिलाते हुए खिडकी की तरफ देखते हुए बोला कि ” मैं ठीक हूँ और आप? “
योगेश बोला मैं भी ठीक हूँ और कानपुर जा रहा हूँ |त्यौहार होने के कारण रिजर्वेशन सीट नहीं मिली | इस कारण जनरल बोगी में आना पडा | तुम कहां जा रही हो ? वह बोली मैं भी कानपुर ही जा रही हूँ | आजकल माँ वही बडे भईया के पास ही है | बीमार है इसलिए मिलने जा रही हूँ | काफी देर दोनों चुप रहे |
फिर योगेश बोला ” एक बात पूछूँ ?” रागिनी ने आँखों से ही पूछा क्या? योगेश संकोच करते हुए पूछा ” अभी तक शादी क्यों नहीं की ?
वह कुछ नहीं बोली | मगर जब योगेश ने दोबारा नहीं पूछा तो रागिनी ने पूछा ” आपने की है शादी ” योगेश ने भी बिना बोले ना में गर्दन हिला दी | फिर काफी देर तक दोनों चुप रहे | मानो एक दूसरे को परख रहे थे |
डिब्बे में कुल्फी बेचने वाला आ गया था | योगेश बोला खाओगी  रागिनी ने ना में सिर हिला दिया. योगेश ने रिक्वेस्ट करते हुए फिर पूछा ” खा लो यार , तुम्हारे
साथ मैं भी खा लूंगा ” | जानता हूँ तुम्हारी सबसे बडी
कमजोरी कुल्फी है | वह थोडा मुस्कुराई तो योगेश ने महसूस किया कि वह अपनी आँखों से बहने वाली आंसुओं को समेटने का प्रयास कर रही है | 5 साल उसके साथ रहा था ,जब वह अपने आँसुओं को समेटने का प्रयास करती थी तो ऐसे ही मुस्कुराया करती थी | योगेश दूसरी तरफ देखने
लगा तो रागिनी चुपके से अपनी आँसुओ को पोछने लगी |

फिर वह सहज होकर बोली ” एक शर्त पर खाउंगी “योगेश बोला क्या शर्त है ? तो रागिनी बोली ” पैसे मैं दूंगी ” योगेश कुछ नहीं बोला फिर रागिनी ने दो कुल्फियां खरीद ली और एक कुल्फी योगेश को देते हुए बोली ” अब मैं भी कमाने लगी हूँ , एक प्राइवेट स्कूल में पढाती हूँ , महीने के 10 हजार मिलते हैं | कुल्फी खाते हुए योगेश बोला ” तलाक के समय
कोर्ट के आदेश पर मैं तुम्हें 30 लाख रूपये दे तो रहा था। अगर ले लेती तो अपना स्कूल खोल लेती | जबकि तुम बहुत स्वाभिमानी हो , इस जमाने में पैसे के बिना कुछ नहीं होता | वह हंस कर बोली अगर ले लेती तो अपनी जमीर को क्या जवाब देती | तो ये जमीर रोज कहता कि जिसे छोड कर
आयी हो उसी के सहारे पल रही हो | योगेश बोला तुम बहुत अच्छी हो , मासूम हो | ये एहसास तुमसे तलाक लेने के बाद मुझे हुआ | तुम यकीन नहीं करोगी? मैं बहुत बदल गया हूँ | पीना बिल्कुल छोड दिया है , गुस्सा बिल्कुल नहीं करता | अब मैं किसी को नीचा दिखाने की कोशिश भी नहीं करता जो तुम्हें बहुत बुरा लगता था | वो सब बुरी आदतें मैने छोड दी है | वह उदास होकर बोली ” अब क्या फायदा ” जब मैं मना किया करती थी तब आप मेरी एक भी बात नहीं सुनते थे | आपके कारण मैं हमेशा टेंशन में रहती थी | इसी कारण मुझे दो बार गर्भपात भी हुआ | वरना आज मेरे भी दो बच्चे होते | एक 8 साल का हो गया होता और दूसरा 6 साल का होता | कहकर
वो रो पडी | बच्चों की बात पता चली तो योगेश के भी आंखों में आँसों आ गये लेकिन वह पुरूष था तो आँसुओं को पलकों तक पहुँचने से पहले ही पी गया और बोला ” कभी कभी लगता है मैं बहुत बुरा आदमी हूँ | मैने कभी रिश्तों की कदर नहीं की , उसी की सजा झेल रहा हूँ आज | बिल्कुल अकेला हो गया हूँ , अब मां भी नहीं रही | “
मां के होने पर रागिनी को बडा दुख हुआ और बोली मां को भली चंगी छोड कर आयी थी , उनको क्या हो गया था | इस बार योगेश भावुकता वश अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया
और बोला वो तुम्हें हर दिन याद करती थी , बोलती थी बहु को वापस घर ले आओ | मैं उन्हें कैसे समझाता कि तलाक के बाद बहुएं वापस घर नहीं आती | फिर दोनों के बीच चुप्पी छा गई थी | कानपुर आ गया था |स्टेशन आने वाला था | योगेश बोला वापस कब जाओगी?  रागिनी बोली आज रात यही रूकूंगी , कल की सुबह की ट्रेन से वापस जाउंगी | फिर वही खडी हो गई ,योगेश भी खडा हो गया और पूछा” कितने बजे वाली ट्रेन से वापस जाओगी “


रागिनी बोली हम गरीब लोग हैं ,रिजर्वेशन नहीं करा पता हैं , जनरल डिब्बे में सफर करते हैं | इसलिए जो भी ट्रेन मिलती है टिकट लेकर चढ जाते हैं | इतना कहकर वह नीचे उतर गई | योगेश अपना सूटकेस सम्हालता हुआ उसके पीछे लपका और बोला अगर मैं रिजर्वेशन की दो टिकटें ले लूं तो मुझे पता  है कि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी लेकिन मैं तुम्हारे साथ सफर करना चाहता हूँ | जनरल में ही चल लूंगा , बताओ कितने बजे
यहां मिलोगी ? रागिनी आटो में बैठती हुई बोली ” 9 बजे यहां मिलूंगी ” फिर उसके देखते देखते आटो आँखों से ओझल हो गया | योगेश कानपुर दो दिन के लिए आया था मगर रागिनी का
साथ पाने के लिए उसने अपना शेड्यूल बदल लिया | उसने जल्दी से अपने बिजनेस का काम पूरा किया और अगले दिन सुबह साढे 8 बजे ही स्टेशन आ गया | रागिनी 9 की जगह
10 बजे स्टेशन पहुँची | और बोली आप अभी तक यहीं पर  , मैं सोच रही थी कि आप चले गये होंगे |
रागिनी बहुत खुश थी | बोली मां अब बिल्कुल ठीक है | योगेश बोला मैं तुम्हारा भी टिकट ले आया हूँ | अब 30 रूपये के टिकट के लिए कुछ कहना मत | रागिनी हंसते हुए बोली अभी ट्रेन आने में आधा घंटा है , चलो तब तक कुल्फी खाते हैं | पैसे मैं दे दूंगी , हिसाब बराबर हो जायेगा | इतना कहकर
वह फिर मुस्कुरा दी | वह जब भी मुस्कुराती थी योगेश की नजर उसके चेहरे पर ठहर जाती थी | फिर दोनों ने कुल्फी खायी और तब तक ट्रेन आ गयी और फिर से एक नया सफर
शुरु हो गया मगर इस सफर में कुछ खास था | योगेश कुछ कहने के लिए तिलमिला रहा था | मगर डर भी रहा था कि वह मना करा देगी तो | योगेश नोटिस कर रहा था कि रागिनी बडे भाई के घर से नई साडी पहन कर आई थी |वह बहुत सुन्दर लग रही
थी | खिडकी से आ रही ठंडी हवा के झोंके से रागिनी के ललाट पर लटकी बालों की एक लडी झूम उठती है | उसे ऐसे देखकर योगेश के दिल में एहसास सा उठता है कि ये औरत कभी उसकी जिन्दगी थी मगर मैं इसे सम्हाल कर नहीं रख
पाया | योगेश की मन:स्थिति से अनजान रागिनी बोली ” क्या हुआ आप गुमशुम से क्यों हो ?” | दोस्त बन कर ही सही कुछ बात तो कर लो | योगेश बोला मुझे दोस्ती नहीं चाहिए | रागिनी को झटका सा लगा , बोली ” फिर क्यों मेरे साथ सफर  करने के लिए उतावले थे आप” योगेश बोला “मुझे तू चाहिए “
| हमेशा के लिए | जन्मों जन्मों के लिए | मेरे साथ हंसने के लिए , मेरे साथ रोने के लिए | वह इतनी जल्दी में ये सारी बातें बोला कि रागिनी बस उसके मुंह की ओर देखती रह गई | वह आगे बोला ” मैं गलत था , तुम्हारी कदर नहीं कर पाया ” |
मगर तुम्हारे जाने के बाद मुझे मेरे गलतियों का एहसास हो गया है | मुझे माफ कर दो ” कहकर वह रो पडा | रागिनी चुप हो गई , बस उसके चेहरे की तरफ देखे जा रही थी | योगेश
उसके दोनों हाथ पकड कर बोला ” मुझे माफ कर दे यार | मैं वादा करता हूँ अब कभी भी तुम्हारे आंसुओं की वजह नहीं बनूंगा | तू जो कहेगी वही करूंगा , प्लीज लौट आ | ” रागिनी ने माथे पर साडी थोडी सी पीछे सरकाई और बोली इधर देखिये जरा |” योगेश ने देखा रागिनी ने मांग भर रखी थी | वह बोली मैं जानती थी आप यही सब करोगे | मैंने कल ही सोच
लिया था कि अब अकेले चलने के दिन खत्म हो गये हैं | मेरा हमसफर लौट आया है | अब आगे का सफर उसी के साथ तय करना है | थक गई हूँ मैं अकेले चलते चलते | कहते हुए वह अजीब सी मुद्रा में मुस्कुराने लगी | योगेश बोला , मैं
जानता हूँ जब तेरा दिल रोने को होता है तब तू ऐसे ही मुस्कुराती है | मत रोक इन आंसुओं को , इन्हें बह जाने दो | दिल हल्का हो जायेगा | इतना सुनते ही रागिनी का संयम जवाब दे गया | वह जोर जोर से रोने लगी , पूरे डिब्बे के लोग
उन्हें देखने लगे | मगर रागिनी ने लोगों की परवाह नहीं की | वह योगेश के कंधे पर सर रखकर रोती रही | कुछ देर बाद रागिनी का गांव आ गया | गाडी कुछ पल रूकी फिर चल पडी | रागिनी को अब वहां उतरना ही नहीं था | जिन्दगी में एक नया सफर फिर से शुरू हो गया | अब उसकी मंजिल मायका
नहीं पिया का घर था | जो वर्षों से उसके उसके लौटने का इन्तजार कर रहा था | वह अब भी योगेश के कंधे पर सर रखी थी | आंखें बंद कर मंद मंद मुस्कुरा रही थी , एक मासूम बच्चे की तरह |
कहानी कैसी लगी कमेन्ट करके जरूर बतायें l
🙏🙏

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संता और बंता काफी सालो से अच्छे दोस्त थे, और अब दोनों की उम्र अब लगभग 90 के आसपास हो चुकी थी।

एक बार संता बहुत बीमार पड़ गया तो बंता उससे रोज मिलने के लिए आता और रोज वे अपने दोस्ती के किस्से दोहराते।

गुज़रते वक़्त के साथ संता और बंता दोनों को ही अब लगभग यकीन हो चला था कि संता अब बस चंद दिनो का ही मेहमान है, तो एक दिन बंता ने संता से कहा, ”देखो जब तुम मर जाओगे, तो क्या मेरे लिए एक काम करोगे?”

संता: कौन सा काम?’

क्योंकि संता और बंता दोनों ही क्रिकेट के बहुत दीवाने थे इसीलिए बंता ने संता से कहा, “तुम मरने के बाद क्या मुझे यह बताओगे कि स्वर्ग में क्रिकेट है या नहीं?”

संता: क्यों नहीं जरुर।

और कुछ दिनों के बाद संता भगवान को प्यारा हो गया।

कुछ दिन बाद बंता जब सो रहा होता है संता उसके सपने में आता है और कहता है, ”तुम्हारे लिए मेरे पास दो खबरें है. . .एक बुरी और एक अच्छी।

बंता: तो पहले अच्छी खबर सुनाओ।

संता: अच्छी खबर यह है कि स्वर्ग में क्रिकेट है।

बंता:और बुरी खबर?

संता: बुरी खबर यह है कि तुम्हें आनेवाले रविवार को होने वाले मैच में बॉलिंग करनी है।

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जवानी चढ़ते ही अपने प्रेम के साथ जिस्मानी संबंध बनाने की ठसक सर पर चढ़ने लगती है
नवंबर में मेरी शादी हुई थी। सबकुछ अच्छा था—प्यार करने वाला पति, खुशहाल परिवार, और जीवन के सुनहरे सपने। शादी के शुरुआती साल गुलाबी सपनों की तरह थे। हम दोनों एक-दूसरे का साथ पाकर बेहद खुश थे। हर दिन रोमांटिक, हर पल खास। हाथों में हाथ डालकर घूमना और अनगिनत बातें करना हमारे जीवन का हिस्सा बन गया था।

लेकिन वक्त तो रेत की तरह फिसलता है। धीरे-धीरे हमारी जिंदगी में जिम्मेदारियां आने लगीं। शादी के दो साल बाद हमारे घर एक नन्हा मेहमान आया। बच्चे के आने से पूरा ध्यान उसकी देखभाल में चला गया। रात-दिन उसके लाड-प्यार में बीतने लगे। इस बीच, कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, और कब हमारी बातें और साथ में बिताया गया समय कम हो गया, पता ही नहीं चला।

जीवन आगे बढ़ा। बच्चा बड़ा होने लगा। उसकी पढ़ाई, घर की किस्तें, गाड़ी का लोन, और बैंक में शून्यों को बढ़ाने की चिंता ने हम दोनों को अपने-अपने काम में व्यस्त कर दिया। मैं अपनी नौकरी में खो गया, और वह घर-परिवार में।

35 की उम्र तक आते-आते सब कुछ होते हुए भी दिल में एक खालीपन था। घर, गाड़ी, और बैंक में पैसे तो थे, पर वह खुशी कहीं खो गई थी। उसने अपनी चिड़चिड़ाहट को बढ़ा लिया, और मैं अपनी उदासीनता को। हम दोनों एक साथ होकर भी अलग हो चुके थे।

समय का पहिया घूमता रहा। बेटा बड़ा हुआ, और उसका अपना संसार बन गया। हम दोनों पैंतालीस के हो गए। मैंने एक दिन उससे कहा, “चलो, कहीं घूमने चलते हैं, हाथों में हाथ डालकर।” उसने मुझे अजीब नजरों से देखा और कहा, “तुम्हें फुर्सत है, पर मेरे पास बहुत काम है।” यह सुनकर मैं चुप हो गया।

वक्त के साथ बाल सफेद होने लगे, आंखों पर चश्मा लग गया। बेटा अपनी पढ़ाई पूरी करके परदेश चला गया। घर की दीवारें अब खाली लगने लगीं। वह भी उम्रदराज हो गई थी। हमारी जिंदगी अब दवाइयों और डॉक्टरों के चक्कर में सिमट गई थी।

एक दिन बेटा फोन करता है और कहता है, “पिताजी, मैंने शादी कर ली है। अब यहीं रहूंगा। आपके लिए वृद्धाश्रम में जगह देख ली है। बैंक में जो पैसे हैं, उन्हें वहीं दान कर दीजिए।”

फोन रखते हुए मैं ठंडी हवा में सोचने लगा कि जिंदगी ने हमें कहां लाकर खड़ा कर दिया है। मैं सोफे पर बैठा था, और उसने दिया-बाती खत्म कर ली। मैंने उसे पुकारा, “आज फिर से हाथों में हाथ डालकर बातें करें?”

वह मुस्कुराई और बोली, “अभी आई।” मेरे चेहरे पर चमक आ गई, लेकिन वह पल आखिरी था। मैं निस्तेज हो गया, हमेशा के लिए।

वह मेरे पास आई, मेरे ठंडे हाथों को अपने हाथ में लिया। पूजा घर में जाकर भगवान को प्रणाम किया और लौटकर बोली, “चलो, अब बताओ, क्या बातें करनी हैं?” उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उसने मुझे एकटक देखा।

अब ठंडी हवा का झोंका चल रहा था। वह मेरी ठंडी देह के पास बैठी सोच रही थी, “क्या यही जिंदगी है?”

जिंदगी को जीने का यही सच है—खुशियों के छोटे-छोटे पलों को सहेजना और उन्हें अपने तरीके से जीना।

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ज़िन्दगी की शाम ढलने को है,


किसी बात पर पत्नी से चिकचिक हो गई, वह बड़बड़ाते घर से बाहर निकला , सोचा कभी इस लड़ाकू औरत से बात नहीं करूँगा, पता नहीं समझती क्या है खुद को? जब देखो झगड़ा, सुकून से रहने नहीं देती,

नजदीक के चाय के स्टॉल पर पहुँच कर चाय ऑर्डर की और सामने रखे स्टूल पर बैठ गया.

आवाज सुनाई दी – इतनी सर्दी में बाहर चाय पी रहे हो?

उसने गर्दन घुमा कर देखा तो साथ के स्टूल पर बैठे बुजुर्ग उससे मुख़ातिब थे.

आप भी तो इतनी सर्दी और इस उम्र में बाहर हैं.

बुजुर्ग ने मुस्कुरा कर कहा मैं निपट अकेला, न कोई गृहस्थी, न साथी, तुम तो शादीशुदा लगते हो. पत्नी घर में जीने नहीं देती, हर समय चिकचिक,बाहर न भटकूँ तो क्या करूँ.

गर्म चाय के घूँट अंदर जाते ही दिल की कड़वाहट निकल पड़ी. बुजुर्ग-: पत्नी जीने नहीं देती!

बरखुरदार ज़िन्दगी ही पत्नी से होती है. 8 बरस हो गए हमारी पत्नी को गए हुए, जब ज़िंदा थी, कभी कद्र नहीं की, आज कम्बख़्त चली गयी तो भूलाई नहीं जाती, घर काटने को होता है, बच्चे अपने अपने काम में मस्त, आलीशान घर, धन दौलत सब है पर उसके बिना कुछ मज़ा नहीं, यूँ ही कभी कहीं, कभी कहीं भटकता रहता हूँ. कुछ अच्छा नहीं लगता, उसके जाने के बाद, पता चला वो धड़कन थी मेरे जीवन की ही नहीं मेरे घर की भी. सब बेजान हो गया है,

बुज़ुर्ग की आँखों में दर्द और आंसुओं का समंदर था. उसने चाय वाले को पैसे दिए, नज़र भर बुज़ुर्ग को देखा, एक मिनट गंवाए बिना घर की ओर मुड़ गया.

दूर से देख लिया था, डबडबाई आँखो से निहार रही पत्नी चिंतित दरवाजे पर ही खड़ी थी.
कहाँ चले गए थे, जैकेट भी नहीं पहना, ठण्ड लग जाएगी तो ?

तुम भी तो बिना स्वेटर के दरवाजे पर खड़ी हो,

कुछ यूँ…दोनों ने आँखों से एक दूसरे के प्यार को पढ़ लिया

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सब्जी वाला


लड़का और लड़की की शादी तो हो चुकी थी..
पर दोनों में बन नहीं रही थी..
पंडित ने कुंडली के 36 गुण मिला कर शादी का नारियल फोड़वाया था..
पर शादी के साल भर बाद ही चिकचिक शुरू हो गई थी..

पत्नी अपने ससुराल वालों के उन अवगुणों का भी पोस्टमार्टम कर लेती..
जिन्हें कोई और देख ही नहीं पाता था..
लगता था कि अब तलाक तो तब तलाक..
पूरा घर तबाह होता नज़र आ रहा था..
सबने कोशिश कर ली कि किसी तरह यह रिश्ता बच जाए..
दो परिवार तबाही के दंश से बच जाएं..
पर सारी कोशिशें व्यर्थ थीं..

जो भी घर आता..
पत्नी अपने पति की ढेरों खामियां गिनाती और कहती कि उसके साथ रहना असम्भव है वो कहती कि इसके साथ तो एक मिनट भी नहीं रहा जा सकता दो बच्चे हो चुके हैं और बच्चों की खातिर किसी तरह ज़िंदगी कट रही है..

उनके कटु रिश्तों की यह कहानी पूरे मुहल्ले में चर्चा का विषय बनी हुई थी..

ऐसे में एक दिन एक आदमी सब्जी बेचता हुआ उनके घर आ पहुंचा..
उस दिन घर में सब्जी नहीं थी
“ऐ सब्जी वाले,
तुम्हारे पास क्या-क्या सब्जियां हैं”
“बहन, मेरे पास आलू, बैंगन, टमाटर, भिंडी और गोभी है”

“जरा दिखाओ तो सब्जियां कैसी हैं..
सब्जी वाले ने सब्जी की टोकरी नीचे रखी महिला टमाटर देखने लगी..
सब्जी वाले ने कहा,
“बहन आप टमाटर मत लो इस टोकरी में जो टमाटर हैं..
उनमें दो चार खराब हो चुके हैं आप आलू ले लो”
“अरे..
चाहिए टमाटर तो आलू क्यों ले लूं तुम टमाटर इधर लाओ..
मैं उनमें से जो ठीक हैं उन्हें छांट लूंगी”

सब्जी वाले ने टमाटर आगे कर दिए..
महिला खराब टमाटरों को किनारे करने लगी..
और अच्छे टमाटर उठाने लगी दो किलो टमाटर हो गया..
फिर उसने भिंडी उठाई
सब्जी वाला फिर बोला..
“बहन..
भिंडी भी आपके काम की नहीं इसमें भी कुछ भिंडी खराब हैं..
आप आलू ले लीजिए वो ठीक हैं”..

“बड़े कमाल के सब्जी वाले हो तुम।
तुम बार-बार कह रहे हो आलू ले लो..
आलू ले लो..
भिंडी टमाटर किसके लिए हैं मेरे लिए नहीं है क्या”

“मैं सारी सब्जियां बेचता हूं पर बहन..
आपको टमाटर और भिंडी ही चाहिए..
मुझे पता है कि मेरी टोकरी में कुछ टमाटर और कुछ भिंडी खराब हैं..
इसीलिए मैंने आपको मना किया और कोई बात नहीं”

“पर मैं तो अपने हिसाब से अच्छे टमाटर और भिंडियां छांट सकती हूं..
जो ख़राब हैं, उन्हें छोड़ दूंगी..
मुझे अच्छी सब्जियों की पहचान है”

“बहुत खूब बहन आप अच्छे टमाटर चुनना जानती हैं..
अच्छी भिंडियां चुनना भी जानती हैं..
आपने ख़राब टमाटरों को किनारे कर दिया..
ख़राब भिंडियां भी छांट कर हटा दीं पर..
आप अपने रिश्तों में एक अच्छाई नहीं ढूंढ पा रहीं..
आपको उनमें सिर्फ बुराइयां ही बुराइयां नज़र आती हैं..

बहन, जैसे आपने टमाटर छांट लिए, भिंडी छांट ली, वैसे ही रिश्तों से अच्छाई को छांटना सीखिए जैसे मेरी टोकरी में कुछ टमाटर ख़राब थे, कुछ भिंडी खराब थीं पर आपने अपने काम लायक छांट लिए, वैसे ही हर आदमी में कुछ न कुछ अच्छाई होती है उन्हें छांटना आता, तो आज मुहल्ले भर में आपके ख़राब रिश्तों की चर्चा न चल रही होती”

सब्जी वाला तो चला गया..
पर उस दिन महिला ने रिश्तों को परखने की विद्या सीख ली थी..

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कभी भी अपने सामर्थ्य का दिखावा मत करो


एक राज्य में एक गुरुजी रहा करते थे. वे अपनी बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थे. उनकी बुद्धिमत्ता के चर्चे दूर-दूर तक हुआ करते थे।

एक दिन उस राज्य के राजा ने गुरुजी को अपने दरबार में आमंत्रित किया. गुरुजी दरबार में पहुँचे। राजा ने उनसे कई विषयों पर गहन चर्चा की।चर्चा समाप्त होने के पश्चात् जब गुरुजी प्रस्थान करने लगे, तो राजा ने उनसे कहा, “गुरुजी! आप आज्ञा दें, तो मैं एक बात आपसे पूछना चाहता हूँ.”

गुरुजी ने कहा, “पूछिए राजन.”

“आप इतने बुद्धिमान है गुरुजी, किंतु आपका पुत्र इतना मूर्ख क्यों हैं?” राजा ने पूछा.

राजा का प्रश्न सुनकर गुरुजी को बुरा लगा. उन्होंने पूछा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं राजन?”

“गुरुजी, आपके पुत्र को ये नहीं पता कि सोने और चाँदी में अधिक मूल्यवान क्या है.” राजा बोला.
ये सुनकर सारे दरबारी हँसने लगे।

सबको यूं हँसता देख गुरुजी ने स्वयं को बहुत अपमानित महसूस किया. किंतु वे बिना कुछ कहे अपने घर लौट आये।

घर पहुँचने पर उनका पुत्र उनके लिए जल लेकर आया और बोला, “पिताश्री, जल ग्रहण करें.”

उस समय भी सारे दरबारियों की हँसी गुरुजी के दिमाग में गूंज रही थी. वे अत्यंत क्रोध में थे। उन्होंने जल लेने से मना कर दिया और बोले, “पुत्र, जल तो मैं तब ग्रहण करूंगा, जब तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर दोगे.”

“पूछिये पिताश्री.” पुत्र बोला.

“ये बताओ कि सोने और चाँदी में अधिक मूल्यवान क्या है?” गुरुजी ने पूछा।

“सोना अधिक मूल्यवान है.” पुत्र के तपाक से उत्तर दिया,

पुत्र का उत्तर सुनने के बाद गुरुजी ने पूछा, “तुमने इस प्रश्न का सही उत्तर दिया है. फिर राजा तुम्हें मूर्ख क्यों कहते हैं? वे कहते हैं कि तुम्हें सोने और चाँदी के मूल्य का ज्ञान नहीं है.”

गुरुजी की बात सुनकर पुत्र सारा माज़रा समझ गया. वह उन्हें बताने लगा, “पिताश्री! मैं प्रतिदिन सुबह जिस रास्ते से विद्यालय जाता हूँ, उस रास्ते के किनारे राजा अपना दरबार लगाते हैं।वहाँ ज्ञानी और बुद्धिमान लोग बैठकर विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं। मुझे वहाँ से जाता हुआ देख राजा अक्सर मुझे बुलाते है और अपने एक हाथ में सोने और एक हाथ में चाँदी का सिक्का रखकर कहते हैं कि इन दोनों में से तुम्हें जो मूल्यवान लगे, वो उठा लो. मैं रोज़ चाँदी का सिक्का उठाता हूँ. यह देख वे लोग मेरा परिहास करते हैं और मुझ पर हँसते हैं. मैं चुपचाप वहाँ से चला जाता हूँ.”

पूरी बात सुनकर गुरुजी ने कहा, “पुत्र, जब तुम्हें ज्ञात है कि सोने और चाँदी में से अधिक मूल्यवान सोना है, तो सोने का सिक्का उठाकर ले आया करो. क्यों स्वयं को उनकी दृष्टि में मूर्ख साबित करते हो? तुम्हारे कारण मुझे भी अपमानित होना पड़ता है।”

पुत्र हँसते हुए बोला, “पिताश्री मेरे साथ अंदर आइये. मैं आपको कारण बताता हूँ।

वह गुरुजी को अंदर के कक्ष में ले गया। वहाँ एक कोने पर एक संदूक रखा हुआ था।उसने वह संदूक खोलकर गुरुजी को दिखाया। गुरुजी आश्चर्यचकित रह गए. उस संदूक में चाँदी के सिक्के भरे हुए थे।

गुरुजी ने पूछा, “पुत्र! ये सब कहाँ से आया?”

पुत्र ने उत्तर दिया, “पिताश्री! राजा के लिए मुझे रोकना और हाथ में सोने और चाँदी का सिक्का लेकर वह प्रश्न पूछना एक खेल बन गया है। अक्सर वे यह खेल मेरे साथ खेला करते हैं और मैं चाँदी का सिक्का लेकर आ जाता हूँ. उन्हीं चाँदी के सिक्कों से यह संदूक भर गया है. जिस दिन मैंने सोने का सिक्का उठा लिया. उस दिन ये खेल बंद हो जायेगा. इसलिए मैं कभी सोने का सिक्का नहीं उठाता.”

गुरुजी को पुत्र की बात समझ तो आ गई. किंतु वे पूरी दुनिया को ये बताना चाहते थे कि उनका पुत्र मूर्ख नहीं है। इसलिए उसे लेकर वे राजा के दरबार चले गए. वहाँ पुत्र ने राजा को सारी बात बता दी है कि वो जानते हुए भी चाँदी का सिक्का ही क्यों उठाता है।

पूरी बात जानकर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने सोने के सिक्कों से भरा संदूक मंगवाया और उसे गुरुजी के पुत्र को देते हुए बोला “असली विद्वान तो तुम निकले।”

मित्रों” कभी भी अपने सामर्थ्य का दिखावा मत करो. कर्म करते चले जाओ. जब वक़्त आएगा, तो पूरी दुनिया को पता चल जायेगा कि आप कितने सामर्थ्यवान हैं. उस दिन आप सोने की तरह चमकोगे और पूरी दुनिया आपका सम्मान करेगी।

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अंतिम प्रयास


एक समय की बात है. एक राज्य में एक प्रतापी राजा राज करता था. एक दिन उसके दरबार में एक विदेशी आगंतुक आया और उसने राजा को एक सुंदर पत्थर उपहार स्वरूप प्रदान किया।

राजा वह पत्थर देख बहुत प्रसन्न हुआ. उसने उस पत्थर से भगवान विष्णु की प्रतिमा का निर्माण कर उसे राज्य के मंदिर में स्थापित करने का निर्णय लिया और प्रतिमा निर्माण का कार्य राज्य के महामंत्री को सौंप दिया।

महामंत्री गाँव के सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकार के पास गया और उसे वह पत्थर देते हुए बोला, “महाराज मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करना चाहते हैं. सात दिवस के भीतर इस पत्थर से भगवान विष्णु की प्रतिमा तैयार कर राजमहल पहुँचा देना. इसके लिए तुम्हें ५० स्वर्ण मुद्रायें दी जायेंगी।

५० स्वर्ण मुद्राओं की बात सुनकर मूर्तिकार ख़ुश हो गया और महामंत्री के जाने के उपरांत प्रतिमा का निर्माण कार्य प्रारंभ करने के उद्देश्य से अपने औज़ार निकाल लिए. अपने औज़ारों में से उसने एक हथौड़ा लिया और पत्थर तोड़ने के लिए उस पर हथौड़े से वार करने लगा. किंतु पत्थर जस का तस रहा. मूर्तिकार ने हथौड़े के कई वार पत्थर पर किये. किंतु पत्थर नहीं टूटा।

पचास बार प्रयास करने के उपरांत मूर्तिकार ने अंतिम बार प्रयास करने के उद्देश्य से हथौड़ा उठाया, किंतु यह सोचकर हथौड़े पर प्रहार करने के पूर्व ही उसने हाथ खींच लिया कि जब पचास बार वार करने से पत्थर नहीं टूटा, तो अब क्या टूटेगा।

वह पत्थर लेकर वापस महामंत्री के पास गया और उसे यह कह वापस कर आया कि इस पत्थर को तोड़ना नामुमकिन है. इसलिए इससे भगवान विष्णु की प्रतिमा नहीं बन सकती।

महामंत्री को राजा का आदेश हर स्थिति में पूर्ण करना था. इसलिए उसने भगवान विष्णु की प्रतिमा निर्मित करने का कार्य गाँव के एक साधारण से मूर्तिकार को सौंप दिया. पत्थर लेकर मूर्तिकार ने महामंत्री के सामने ही उस पर हथौड़े से प्रहार किया और वह पत्थर एक बार में ही टूट गया।

पत्थर टूटने के बाद मूर्तिकार प्रतिमा बनाने में जुट गया. इधर महामंत्री सोचने लगा कि काश, पहले मूर्तिकार ने एक अंतिम प्रयास और किया होता, तो सफ़ल हो गया होता और ५० स्वर्ण मुद्राओं का हक़दार बनता।

💐सीख – मित्रों, हम भी अपने जीवन में ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होते रहते हैं. कई बार किसी कार्य को करने के पूर्व या किसी समस्या के सामने आने पर उसका निराकरण करने के पूर्व ही हमारा आत्मविश्वास डगमगा जाता है और हम प्रयास किये बिना ही हार मान लेते हैं।

कई बार हम एक-दो प्रयास में असफलता मिलने पर आगे प्रयास करना छोड़ देते हैं।

जबकि हो सकता है कि कुछ प्रयास और करने पर कार्य पूर्ण हो जाता या समस्या का समाधान हो जाता. यदि जीवन में सफलता प्राप्त करनी है, तो बार-बार असफ़ल होने पर भी तब तक प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिये, जब तक सफ़लता नहीं मिल जाती. क्या पता, जिस प्रयास को करने के पूर्व हम हाथ खींच ले, वही हमारा अंतिम प्रयास हो और उसमें हमें कामयाबी प्राप्त हो जाय।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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अपंग


बहुत समय पहले की बात है। किसी नगर में एक सेठ रहते थे। उनके पास अपार संपत्ति थी, लंबी-चौड़ी हवेली थी, नौकर-चाकरों की सेना थी, भरापूरा परिवार था। सब तरह के सुख थे, पर एक दुख था। सेठ को रात को नींद नहीं आती थी, कभी आंख लग भी जाती तो भयंकर सपने आते। सेठ को बड़ी बेचैनी रहती। उन्होंने बहुतेरा इलाज कराया, लेकिन रोग घटने के बजाय बढ़ता ही गया।

एक दिन एक साधु उस नगर में आए। वे बहुत पहुंचे हुए साधु थे। लोगों के दुख दूर करते थे।

सेठ को पता लगा तो वह भी उनके पास गए और अपनी विपदा उन्हें कह सुनाई। बोले-

महाराज! जैसे भी हो मेरा कष्ट दूर कर दीजिए।“

साधु ने कहा- “सेठजी! आपके रोग का एक ही कारण है और वह यह कि आप अपंग हैं।“

सेठ ने विस्मय से उनकी ओर देखा। पूछा- “आप मुझे अपंग कैसे कह सकते है? यह देखिए, मेरे अच्छे-खासे हाथ पैर हैं।“

साधु ने हंसकर कहा- “अपंग वह नहीं होता जिसके हाथ-पैर नहीं होते। वास्तव में अपंग तो वह है जो हाथ-पैर होते हुए भी उनका इस्तेमाल नहीं करता। तुम्हीं बोलो, अपने शरीर से तुम कितना काम करते हो?”

सेठ क्या जवाब देते! वे तो हर छोटे-बड़े काम के लिए नौकर पर निर्भर करते थे।

साधु ने कहा- “अगर तुम अपने रोग से बचना चाहते हो तो हाथ-पैर की इतनी मेहनत करो कि थककर चूर हो जाओ। तुम्हारी बीमारी दो दिन में दूर हो जाएगी।”

सेठ ने यही किया। साधु की बात सही निकली। दूसरे दिन रात को सेठ को इतनी गहरी नींद आई कि वह चकित रह गए।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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बच्चें की सीख


एक पापी इन्सान मरते वक्त बहुत दुख और पीड़ा भोग रहा था।

लोग वहाँ काफी संख्या मेँ इक्ट्ठे हो गये, वहीँ पर एक महापुरूष आ गये, पास खड़े लोगोँ ने महापुरूष से पूछा कि आप इसका कोई उपाय बतायेँ जिससे यह पीड़ा से मुक्त होकर प्राण त्याग दे और ज्यादा पीड़ा ना भोगे। महापुरूष ने बताया कि अगर स्वर्ग की मिट्टी लाकर इसको तिलक किया जाये तो ये पीड़ा से मुक्त हो जायेगा। ये सुनकर सभी चुप हो गये। अब स्वर्ग की मिट्टी कहाँ से और कैसे लायेँ ?

महापुरुष की बात सुन कर एक छोटा सा बच्चा दोड़ा दोड़ा गया और थोड़ी देर बाद एक मुठ्ठी मिट्टी लेकर आया और बोला ये लो स्वर्ग की मिट्टी इसे तिलक कर दो। बच्चे की बात सुनकर एक आदमी ने मिट्टी लेकर उस आदमी को जैसे ही तिलक किया कुछ ही क्षण मेँ वो आदमी पीड़ा से एकदम मुक्त हो गया। ये चमत्कार देखकर सब हैरान थे, क्योँकि स्वर्ग की मिट्टी कोई कैसे ला सकता है ? और वो भी एक छोटा सा बच्चा।
हो ही नहीँ सकता।

महापुरूष ने बच्चे से पूछा-बेटा! ये मिट्टी तुम कहाँ से लेकर आये हो ? पृथ्वी लोक पे कोन सा स्वर्ग है जहाँ से तुम कुछ ही पल मेँ ये मिट्टी ले आये?

लड़का बोला-बाबा जी एक दिन हमारे स्कूल के शिक्षक नवनीत ने बताया था कि माँ के चरणोँ मेँ सबसे बड़ा स्वर्ग है, उसके चरणोँ की धुल से बढ़कर दूसरा कोई स्वर्ग नहीँ। इसलिये मैँ ये मिट्टी अपनी माँ के चरणोँ के नीचे से लेकर आया हूँ।

बच्चे मुँह से ये बात सुनकर महापुरूष बोले-बिल्कुल बेटे माँ के चरणो से बढ़कर इस जहाँ मेँ दूसरा कोई स्वर्ग नहीँ। और जिस औलाद की वजह से माँ की आँखो मेँ आँसू आये ऐसी औलाद को नरक इस जहाँ मेँ ही भोगना पड़ता है।

इसलिये अगर आप चाहे कितनी भी तरक्की कर लेँ, कितना भी रूपया पैसा जमा कर लेँ आसमां की उच्चाईयोँ को क्योँ ना छू लेँ जब तक आपकी वजह से माँ खुश नहीँ है तब तक वो भगवान भी आपसे खुश नहीँ होगा। कोई भी दान, पुण्य और तीर्थ करने का फल आपको नहीँ मिलेगा।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।