Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक कर्मचारी कम्पनी के सभी कामों से बचता था लेकिन बॉस को मक्खन लगाने में बड़ा माहिर था…..।

वह बॉस के आदेश के अनुसार सभी काम करता था।  ऑफिशियल काम को छोड़ कर वह बॉस के  सभी निजी काम जैसे उनके बेटे की कॉलेज फीस जमा करना, बेटी की डांस कॉस्ट्यूम खरीदना, उनकी कार की सर्विसिंग का काम, उनके  बेटे का प्रोजेक्ट पूरा करना, यानी लगभग सब कुछ करता था इसलिए जाहिर था कि, वह बॉस का पसंदीदा था उसे सभी प्रोत्साहन और इन्क्रीमेंट समय से मिलता था और  दूसरी  तरफ बाक़ी कर्मचारी , ऑफ़िशियल काम पूरा करने पर भी बॉस की डाँट खाते रहते थे ।

एक दिन अचानक बॉस की मां के निधन की खबर मिली।  सारे कर्मचारी बहुत उदास चेहरे के साथ उनके घर भागे जैसे उनकी ही माँ का देहांत हो गया हो…….

और हैरानी की बात यह थी कि ऐसे  वक्त  में वह बन्दा बॉस के घर के आस पास भी नहीं देखा गया, जिसके बारे में हर कोई कयास लगा रहा था……
कि वह अनुपस्थित कैसे..

अब अन्य कर्मचारियों ने माल्यार्पण से सुसज्जित वाहन की व्यवस्था की और बॉस की मां को श्मशान ले जाया गया…

लेकिन जब  सब  शवदाह  गृह  पहुंचे  तो  पहले  से  ही  16 शव बिजली से जलने के लिए कतार में थे।  प्रत्येक शरीर को जलने में लगभग  1 घन्टा  लग रहा  था …. यानी  कि कुल  मिलाकर  सूर्यास्त से पहले दाह संस्कार संभव नहीं था।   बॉस का चेहरा लाल  हो  रखा  था और बाक़ी सब  भी परेशान थे……

अचानक  कतार में  पड़े 16  शव में  से  दूसरा शव उठ बैठा …….

उपस्थित सब लोग मारे डर के भाग खड़े हुए…..

बाद  में  पूर्ण आश्चर्य के साथ पता चला कि यह कोई शव नहीं  था  बल्कि वही बन्दा था…..

उसने  तुरंत बॉस को बताया …

श्रीमान, माफ़ी  चाहूँगा  सुबह से आपके  घर  नहीं  आ  पाया  था क्योंकि  जैसे  ही आपकी माता जी  के  देहांत  का  समाचार सुना  और  देखा  कि सब  आपके  घर  की  तरफ  भाग  रहे  हैं  तो  ख्याल  आया  कि  पहले  यहां  का भी  इंतजाम  देख  लूँ और  देखा  तो  पाया  कि  जब आप  बॉडी  लेकर  आयेंगे  तो  शाम तक मुश्किल से नंबर  आ  पायेगा  । आज  तो  बस  आपके  खातिर  सुबह  से ही  आपकी माता  जी  का  नंबर  लगा  दिया  सर  सुबह  8 बजे  से  ही लाश  बनकर  लेटा हुआ हूं  यहाँ..

सब उसकी प्रतिबद्धता के स्तर को देखकर दंग रह गए। और  बॉस  कभी  उसको  बड़े  प्यार  से  देखते  और  कभी  बाक़ी कर्मचारियों  को  खा  जाने  वालीं  निगाहों  से…….!!

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श्रीतुलसीदासजी महाराजने कहा है—

तुलसी  पूरब पाप ते  हरि चर्चा न सुहात ।
जैसे ज्वरके जोरसे  भूख  बिदा  हो  जात ॥

जब ज्वर (बुखार) का जोर होता है तो अन्न अच्छा नहीं लगता । उसको अन्नमें भी गन्ध आती है । जैसे भीतरमें बुखारका जोर होता है तो अन्न अच्छा नहीं लगता, वैसे ही जिसके पापोंका जोर ज्यादा होता है, वह भजन कर नहीं सकता, सत्संगमें जा नहीं सकता।

बंगाल के गांवों में एक बुढ़ा आदमी सरोवरके किनारे मछलियाँ पकड़ रहा था। दो भगवान के भक्तो ने उसे देखा और कहा—‘यह बूढ़ा हो गया, बेचारा भजनमें लग जाय तो अच्छा है ।’ उससे जाकर कहा कि तुम भगवन्नाम- उच्चारण  करो तो, उसे ‘राम’ नाम आया ही नहीं ।वह मेहनत करनेपर भी सही उच्चारण नहीं कर सका ।

कई नाम बतानेके बादमेंअन्तमें ‘होरे-होरे’ कहने लगा । इस नामका उच्चारण हुआ और कोई नाम आया ही नहीं । उससे पूछा गया कि ‘तुम्हें एक दिनमें कितने पैसे मिलते हैं ?’ तो उन्होंने बताया कि इतनी मछलियाँ मारनेसे इतने पैसे मिलते हैं । तो उन्होंने कहा कि ‘उतने पैसोंके चावल हम तुम्हें दे देंगे । तुम हमारी दूकानमें बैठकर दिनभर होरे-होरे (हरि-हरि) किया करो ।’ उसको किसी तरह ले गये दूकानपर । वह एक दिन तो बैठा । दूसरे दिन देरसे आया और तीसरे दिन आया ही नहीं ।

फिर दो-तीन दिन बाद जाकर देखा, वह उसी जगह धूपमें मछली पकड़ता हुआ मिला । उन्होंने उसे कहा कि ‘तू वहाँ दूकानमें छायामें बैठा था । क्या तकलीफ थी ? तुमको यहाँ जितना मिलता है, उतना अनाज दे देंगे केवल दिनभर बैठा हरि-हरि कीर्तन किया कर ।’उसने कहा—‘मेरेसे नहीं होगा ।’वह दूकानपर बैठ नहीं सका ।  पापीका शुभ काममें लगना कठीन होता है ।

इसलिए श्री रामसुखदासजी महाराज कहते हैं कि जो भाई सत्संगमें रुचि रखते हैं, सत्संगमें जाते हैं, नाम लेते हैं, जप करते हैं, उन पुरुषोंको मामूली नहीं समझना चाहिये । वे साधारण आदमी नहीं हैं । वे भगवान्‌का भजन करते हैं, शुद्ध हैं और भगवान्‌के कृपा-पात्र हैं ।

परन्तुजो भगवान्‌की तरफ चलते हैं, उनको अपनी बहादुरी नहीं माननी चाहिये कि हम बड़े अच्छे हैं । हमें तो भगवान्‌की कृपा माननी चाहिये, जिससे हमें सत्संग, भजन-ध्यानका मौका मिलता है । हमें ऐसा समझना चाहिये कि ऐसे कलियुगके समयमें हमें भगवान्‌की बात सुननेको मिलती है, हम भगवान्‌का नाम लेते हैं, हमपर भगवान्‌की बड़ी कृपा है ।

नाम संकीर्तन की जय हो

🪷 _ 🪷 _ 🪷 _ 🕉️ _ 🪷 _ 🪷 _ 🪷







 

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कर्तव्यनिष्ठा*


सुधा मेम …..आपको मालिक अपने केबिन में बुला रहे हैं …..प्यून ने टेबल पर अपने काम में व्यस्त सुधा से कहा……
ठीक है….. जाती हूं ….सुधा बोली….मगर मन मे सोचने लगी ….कम्पनी मालिक मोहनजी ने मुझे क्यों बुलाया है खैर बुलाया है तो जाना पडेगा….
सर ….आपने मुझे बुलाया….

जी हां …. बैठिए…..कम्पनी मालिक मोहनजी ने सामने की कुर्सी की ओर इशारा किया….
मोहनजी बड़े ध्यान से सुधा के चेहरे की ओर देख रहे थे उसके मुख पर सौम्य, संतोष का भाव था…. अचानक उन्होंने एक पेपर उसके सामने रखते हुए कहा….

मिस सुधा…..आपने दुबारा प्रमोशन से इनकार कर दिया …..बड़ी हैरानी हुई ….
आज जहां आँफिस मे हरेक पदोन्नति के लिए होड़ सी लगाए है ….और एक आप हैं कि दूसरी बार इनकार कर रही हैं….आखिर कारण क्या है….

सुधा बड़े निर्लिप्त भाव से मुस्कुरा उठी….

सर…. ज़िन्दगी मे इच्छाएं अनन्त हैं सब इच्छाओं के झूले में झूलते रहते है बड़ी बड़ी पेंगे लगाते हैं पर मैं इस पर विश्वास नही करती….मैं तो उतनी ही पेंग लगाती हूँ जितने की मुझे आवश्यकता है….मैं जिस पोस्ट पर हूँ उससे खुश हूं…..

मिस सुधा ….. मैं आपको लगभग तीन वर्षों से देख रहा हूं कम्पनी में …..मैनेजर सहित तमाम कर्मचारी आपके काम की तारीफ करते हैं …… मगर ….तरक्की किसे नहीं पसंद…आखिर कोई तो कारण होगा जो आप मुझसे छिपा रही हैं ….एक गौरवशाली पद ….
गाड़ी बंगले की सहूलियत….बड़ा शहर….भला किसको आकर्षित नहीं करता…… जिंदगी एक सुनहरे मोड़ पर आपका इंतजार कर रही है और आप मोड़ की ओर जाना ही नहीं चाहतीं…..
अच्छा एक मालिक और कर्मचारी के नाते ना सही एक दोस्त के नाते ही सही ….कुछ तो बताइए ….

सुधा ने गंभीर मुद्रा से एक बार मोहनजी की ओर देखा और फिर बोली…सर मुझे मेरे माता पिता के प्रति अपना धर्म आकर्षित करता है….मेरे माता पिता के विवाह के कई साल बाद मेरा जन्म हुआ और मैं इकलौती बन कर रह गयी….
मम्मी पापा काफी उम्र के हो चले हैं आप तो जानते ही हैं कि एक पौधा कहीं भी मिट्टी में पनप जाता है पर वृक्ष नहीं….उन्हें यहां रहना पसंद है यहां वह जिंदगी जी रहे हैं हंसी खुशी और सर एक नये शहर में अगर उनके लिए नया जलवायु अनुकूल नहीं हुआ तो……
माना बड़ा बंगला गाड़ी ….ओहदा होगा मगर जिनके लिए मेरा जीवन है यदि वह वहां खुश नही रह पाऐगें तो ….ऐसे ओहदे बंगले गाड़ी…. मेरे लिए बेमानी हैं सर….
अतः मैं ये जगह छोड़  कर नहीं जा सकती…..

मगर….आपने अबतक शादी ….आइ मीन …. …..

सर…..मैंने कहा ना …..मेरे माता पिता पहले मेरी जिम्मेदारी हैं ….और आजकल ऐसे लड़के नहीं मिलते जो लडकी के माता पिता की भी सेवा करने की अनुमति दें ….मतलब लड़केवाले अपने परिवार के आगे भूल जाते हैं एक लड़की के भी माता पिता हैं ….बस इसलिए ….

इसलिए आपने अबतक शादी नहीं की …..मोहनजी ने मुस्कुराते हुए कहा….

जी…..इसलिए मुझे कोई प्रमोशन नहीं चाहिए सर …..
उसने अंतिम फैसला सुनाया….
मोहनजी सुधा के धर्म निष्ठा पर मुग्ध हो उठे….उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा….
क्या मुझसे शादी करोगी……
मेरा दुनिया में कोई नहीं है एक अच्छे जीवनसाथी की अपेक्षा सबको होती है जो मुझे अबतक नहीं मिली थी मगर आपको देखकर लगता है मेरी तलाश पूरी हो गई है ….मुझे एक अच्छे जीवनसाथी के साथ साथ माता पिता का प्यार भी मिल जाएगा ….
तो कहिए ….मुझे अपना जीवनसाथी बनाओगी…..
कोई जल्दी नहीं है सोच समझकर …. जबाब देना ….मुझे इंतजार रहेगा….
इस अप्रत्याशित निवेदन से सुधा निःशब्द हो गयी …
उसने धीरे से हाथ आगे मोहनजी की ओर बढ़ा दिया……
अब एकसाथ दो जिंदगी एक सुनहरे मोड़ की ओर अग्रसर थी……

Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं – दरिद्रता नाशक
एक समय इंद्र देव से किसी बात पर रूष्ट होकर देव गुरू ‘बृहस्पति’ स्वर्गलोक त्याग कर चले गए ! असुरों ने इस सुअवसर का लाभ उठाकर स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया ! देवताओं तथा असुरों में युद्ध आरम्भ हो गया, जिसमें देवता पराजित हुए तथा असुरों ने स्वर्गलोक पर कब्जा कर लिया !
इंद्र देव स्वर्गलोक छोड़कर निकल गए तथा एक सरोवर के भीतर ‘कमल’ की कली के भीतर स्वयँ को छिपा लिया ! ओर वहीं से वे देवी लक्ष्मी की एक स्तुति करने लगे ! यह स्तुति ‘महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र’ के नाम से विख्यात हुयी ! जो वीस्तव में आठ श्लोकों की एक स्तुति है ! आठ श्लोकों से युक्त होने के कारण ही यह स्तुति ‘महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र’ कहलाती है !
इस स्तुति अथवा स्तोत्र के पाठ के फलस्वरूप इंद्र देव को खोया हुआ ऐश्वर्य पुन: प्राप्त हुआ ! यह स्तुति हर प्रकार की दरिद्रता का नाश करने वाली है, तनिक इसका पाठ तो आरम्भ करके देखिए ! महालक्ष्मी जी के चित्र अथवी विग्रह के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्जवलित करके स्तोत्र पाठ करना चाहिए !
नित्य स्तोत्र पाठ करने से हर प्रकार की दरिद्रता अथवा आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं तथा ऐश्वर्यादि की प्राप्ति होती है –
“नमस्तेस्तु महामाये श्री पीठे सुरपूजिते !
शंख चक्र गदाहस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते !!1!!
नमस्ते गरूडारूढे कोलासुर भयंकरि !
शंख चक्र गदाहस्ते महालक्ष्मीनमोस्तुते !!2!!
सर्वज्ञे सर्व वरदे सर्व दुष्ट भयंकरि !
सर्व दु:ख हरे देवि महालक्ष्मी नमोस्तुते !!3!!
सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि भुक्ति मुक्ति दायिनी !
मंत्र मूर्ति सदा देवि महालक्ष्मी नमोस्तुते !!4!!
आद्यंतर्हिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरी !
योगजे योग सम्भूते महालक्ष्मी नमोस्तुते !!5!!
स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोदरे !
महापाप हरे देवि महालक्ष्मी नमोस्तुते !!6!!
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्म स्वरूपिणी !
परमेशि जगन्नमातर्महालक्ष्मी नमोस्तुते !!7!!
श्वेतांबर धरे देवि नानालंकारभूषिते !
जगत्स्थिते जगन्नमातर्महालक्ष्मी नमोस्तुते !!8!!
फलस्तुति
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेन्नभक्ति मान्नर: !
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा !!
एककाले पठेन्नित्यं महापातक नाशनम् !
द्विकालं य: पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वित: !!
त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रु विनाशनं !
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्नावरदा शुभा !!”
फल प्राप्ति
महालक्ष्मी स्तोत्र का जो भकितिपूरीवक पाठ करता है, उसे समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है तथा उसका खोया हुआ उसे पुन: प्राप्त हो जाता है ! एक समय पाठ करने से पाप नष्ट होते हैं ! दो समय (प्रात: तथा साँयकाल) पाठ करने से धनधान्य आदि की प्राप्ति होती है ! तीन समय (प्रात: मध्याह्न तथा साँयकाल) अर्थात त्रिकाल संध्या में पाठ करने से शत्रुओं का नाश होता है तथा महालक्ष्मी उस पर सदा प्रसन्न रहती है !
शुक्रवार के दिन यह उपाय, प्रचुर धन के लिए जरूर आजमाएं ।
क्या आप जानते हैं उन कारणों को, जिनसे मां लक्ष्मी सदा प्रसन्न रहती है। शुक्रवार के दिन जो भक्त देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उनके लिए संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं है। गृहलक्ष्मी देवी गृहिणियों यानी घर की स्‍त्रियों में लज्जा, क्षमा, शील, स्नेह और ममता रूप में विराजमान रहती हैं। वे मकान में प्रेम तथा जीवंतता का संचार कर उसे घर बनाती हैं। इनकी अनुपस्थिति में घर कलह, झगड़ों, निराशा आदि से भर जाता है। गृहस्वामिनी को गृहलक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। जहां गृहस्वामिनी का सम्मान नहीं होता है, गृह लक्ष्मी उस घर को त्याग देती है। आइए जानते हैं शुक्रवार के ऐसे उपाय जो देते हैं धन और समृद्धि का वरदान….*
सुबह उठते ही मां लक्ष्मी को नमन कर सफेद वस्त्र धारण करें और मां लक्ष्मी के श्री स्वरूप व चित्र के सामने खड़े होकर श्री सूक्त का पाठ करें एवं कमल का फूल चढ़ाएं।
घर से काम पर निकलते समय थोड़ा-सा मीठा दही खाकर निकलें।
अगर पति-पत्नी में तनाव रहता है तो शुक्रवार के दिन अपने शयनकक्ष में प्रेमी पक्षी जोड़े की तस्वीर लगाएं।
अगर आपके काम में अवरोध आ रहा है, तो शुक्रवार के दिन काली चींटियों को शकर डालें।
शुक्रवार को माता लक्ष्मी के मंदिर जाकर शंख, कौड़ी, कमल, मखाना, बताशा मां को अर्पित करें। ये सब महालक्ष्मी मां को बहुत प्रिय हैं।
गजलक्ष्मी मां की उपासना करने से संपत्ति और संतान की प्राप्ति होती है।
वीरलक्ष्मी माता की उपासना सौभाग्य के साथ स्वास्‍थ्य भी देने वाली होती है।
लक्ष्मी मां का एक रूप अन्न भी है। कुछ लोग क्रोध आने पर भोजन की थाली फेंक देते हैं। इस तरह की आदत धन, वैभव एवं पारिवारिक सुख के लिए नुकसानदायक होती है।
घर में स्थायी सुख-समृद्धि हेतु पीपल के वृक्ष की छाया में खड़े रहकर लोहे के बर्तन में जल, चीनी, घी तथा दूध मिलाकर पीपल के वृक्ष की जड़ में डालने से घर में लंबे समय तक सुख-समृद्धि रहती है और लक्ष्मी का वास होता है।
घर में बार-बार धनहानि हो रही हो तो वीरवार को घर के मुख्य द्वार पर गुलाल छिड़ककर गुलाल पर शुद्ध घी का दोमुखी (दो मुख वाला) दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय मन ही मन यह कामना करनी चाहिए कि भविष्य में घर में धनहानि का सामना न करना पड़ें। जब दीपक शांत हो जाए तो उसे बहते हुए पानी में बहा देना चाहिए।
माता लक्ष्मी जी की पौराणिक कथा ।
मातालक्ष्मी हिन्दू धर्म की एक प्रमुख देवी हैं। लक्ष्मी, भगवान विष्णु की पत्नी और धन, सम्पदा, शान्ति और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं। दीपावली के त्योहार में उनकी गणेश सहित पूजा की जाती है। देवी की जितनी भी शक्तियाँ मानी गयी हैं, उन सब की मूल भगवती लक्ष्मी ही हैं। ये ही सर्वोत्कृष्ट पराशक्ति हैं। लक्ष्मी जी की अभिव्यक्ति दो रूपों में देखी जाती है-श्रीरूप और लक्ष्मी रूप।
ये दो होकर भी एक हैं और एक होकर भी दो हैं। दोनों ही रूपों में ये भगवान विष्णु की पत्नी हैं। इनकी थोड़ी-सी कृपा प्राप्त करके व्यक्ति वैभववान हो जाता है। भगवती लक्ष्मी कमलवन में निवास करती हैं, कमल पर बैठती हैं और हाथ में कमल ही धारण करती हैं। समस्त सम्पत्तियों की अधिष्ठात्री श्रीदेवी शुद्ध सत्त्वमयी हैं। विकार और दोषों का वहाँ प्रवेश भी नहीं है। भगवान जब-जब अवतार लेते हैं, तब-तब भगवती महालक्ष्मी भी अवतीर्ण होकर उनकी प्रत्येक लीला में सहयोग देती हैं। इन्हें धन की देवी माना जाता है और नित्य लक्ष्मी जी का भजन पूजन और लक्ष्मी जी की आरती करते हैं। इनके आविर्भाव (प्रकट होने) की कथा इस प्रकार है-
महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। वह समस्त शुभ लक्षणों से सुशोभित थी। इसलिये उसका नाम लक्ष्मी रखा गया। धीरे-धीरे बड़ी होने पर लक्ष्मी ने भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुना। इससे उनका हृदय भगवान में अनुरक्त हो गया। वे भगवान नारायण को पतिरूप में प्राप्त करने के लिये समुद्र तट पर घोर तपस्या करने लगीं। उन्हें तपस्या करते-करते एक हज़ार वर्ष बीत गये।
उनकी परीक्षा लेने के लिये देवराज इन्द्र भगवान विष्णु का रूप धारण करके लक्ष्मी देवी के पास आये और उनसे वर माँगने के लिये कहा- लक्ष्मी जी ने उनसे विश्वरूप का दर्शन कराने के लिये कहा। इन्द्र वहाँ से लज्जित होकर लौट गये। अन्त में भगवती लक्ष्मी को कृतार्थ करने के लिये स्वयं भगवान विष्णु पधारे। भगवान ने देवी से वर माँगने के लिये कहा। उनकी प्रार्थना पर भगवान ने उन्हें विश्वरूप का दर्शन कराया। तदनन्तर लक्ष्मी जी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
लक्ष्मी जी के प्रकट होने का दूसरी कथा इस प्रकार है ।
एक बार महर्षि दुर्वासा घूमते-घूमते एक मनोहर वन में गये। वहाँ एक विद्याधरी सुन्दरी ने उन्हें दिव्य पुष्पों की एक माला भेंट की। माला लेकर उन्मत्त वेशधारी मुनि ने उसे अपने मस्तक पर डाल लिया और पुन: पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। इसी समय दुर्वासा जी को देवराज इन्द्र दिखायी दिये। वे ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे।
उनके साथ अन्य देवता भी थे। महर्षि दुर्वासा ने वह माला इन्द्र को दे दी। देवराज इन्द्र ने उसे लेकर ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने माला की तीव्र गन्ध से आकर्षित होकर उसे सूँड़ से उतार लिया और अपने पैरों तले रौंद डाला। माला की दुर्दशा देखकर महर्षि दुर्वासा क्रोध से जल उठे और उन्होंने इन्द्र को श्री भ्रष्ट होने का शाप दे दिया। उस शाप के प्रभाव से इन्द्र श्री भ्रष्ट हो गये और सम्पूर्ण देवलोक पर असुरों का शासन हो गया।
समस्त देवता असुरों से संत्रस्त होकर इधर-उधर भटकने लगे। ब्रह्मा जी की सलाह से सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये। भगवान विष्णु ने उन लोगों को असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर को मथने की सलाह दी। भगवान की आज्ञा पाकर देवगणों ने दैत्यों से सन्धि करके अमृत-प्राप्ति के लिये समुद्र मंथन का कार्य आरम्भ किया।
मन्दराचल की मथानी और वासुकि नाग की रस्सी बनी। भगवान विष्णु स्वयं कच्छपरूप धारण करके मन्दराचल के आधार बने। इस प्रकार मन्थन करने पर क्षीरसागर से क्रमश: कालकूट विष, कामधेनु, उच्चैश्रवा नामक अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभमणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, लक्ष्मी, वारुणी, चन्द्रमा, शंख, शांर्ग धनुष, धन्वंतरि और अमृत प्रकट हुए।
क्षीरसमुद्र से जब भगवती लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं, तब वे खिले हुए श्वेत कमल के आसन पर विराजमान थीं। उनके श्री अंगों से दिव्य कान्ति निकल रही थी। उनके हाथ में कमल था। लक्ष्मी जी का दर्शन करके देवता और महर्षि गण प्रसन्न हो गये। उन्होंने वैदिक श्रीसूक्त का पाठ करके लक्ष्मी देवी का स्तवन किया। सबके देखते-देखते वे भगवान विष्णु के पास चली गयीं।
माता लक्ष्मी के पौराणिक संदर्भ
एक बार लक्ष्मी ने गौओं के समूह में प्रवेश किया। गौओं ने उस रूपवती का परिचय पूछा। लक्ष्मी ने बताया कि उसका सहवास सबके लिए सुखकर है तथा वह लक्ष्मी है और उसके साथ रहना चाहती है। गौओं ने पहले तो लक्ष्मी को ग्रहण करना स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वह स्वभाव से ही चंचला मानी जाती है, फिर लक्ष्मी के बहुत अनुनय-विनय पर उन्होंने उसे अपने गोबर तथा मूत्र में रहने की आज्ञा प्रदान की।
सृष्टि के आदि में राधा और कृष्ण थे। राधा के वामांग से लक्ष्मी प्रकट हुई। कृष्ण ने भी दो रूप धारण किये- एक द्विभुज और एक चतुर्भुज। द्विभुज कृष्ण राधा के साथ गोलोक में तथा चतुर्भुज विष्णु महालक्ष्मी के साथ बैकुंठ चले गये। एक बार दुर्वासा के शाप से इन्द्र श्री भ्रष्ट हो गये।
मृत्युलोक में देवगण एकत्र हुए। लक्ष्मी ने रुष्ट होकर स्वर्ग त्याग दिया तथा वह बैकुंठ में लीन हो गयीं। देवतागण बैकुंठ पहुंचे तो पुराण पुरुष की आज्ञा से लक्ष्मी सागर-पुत्री होकर वहां चली गयीं। देवताओं ने समुद्र मंथन में पुन: लक्ष्मी को प्राप्त किया। लक्ष्मी ने सागर से निकलते ही क्षीरसागरशायी विष्णु को वरमाला देकर प्रसन्न किया।
भृगु के द्वारा ख्याति ने धाता और विधाता नामक दो देवताओं को तथा लक्ष्मी को जन्म दिया। लक्ष्मी कालांतर में विष्णु की पत्नी हुई। लक्ष्मी नित्य, सर्वव्यापक है। पुरुषवाची भगवान हरि है और स्त्रीवाची लक्ष्मी, इनसे इतर और कोई नहीं है। एक बार शिव के अंशावतार दुर्वासा को याचना करने पर एक विद्याधरी से संतानक पुष्पों की एक दिव्य माला उपलब्ध हुई।
ऐरावत हाथी पर जाते हुए इन्द्र को उन्होंने वह माला दे दी। तदुपरांत इन्द्र ने अपने हाथी को पहना दी। हाथी ने पृथ्वी पर डाल दी। इस बात से रुष्ट होकर दुर्वासा ने इन्द्र को श्रीहीन होने का शाप दिया। समस्त देवता तथा जगत के तत्त्व श्रीहीन हो गये तथा दानवों से परास्त हो गये।
वे सब ब्रह्मा की शरण में गये। उन्होंने विष्णु के पास भेजा। विष्णु ने दानवों के सहयोग से समुद्र मंथन का संपादन किया। समुद्र मंथन में से लक्ष्मी (श्री) पुन: प्रकट हुई तथा विष्णु के वक्ष पर स्थित हो गयी। इन्द्र की पूजा से प्रसन्न होकर उन्होंने वर दिया कि वह कभी पृथ्वी का त्याग नहीं करेंगी। जब भी विष्णु अवतरित होते हैं, ‘श्री’ सीता, रुक्मिणी आदि के रूप में प्रकट होती हैं।
200- ₹ -190 – पेज की जन्म कुंडली –
कुंडली पीडीएफ द्वारा आपको मोबाइल पर भेज दी जाएगी
500 -₹ – 500, पेज की जन्म कुंडली – rebrand.ly/kundli
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✔️ Gemologer, Astrologer –
Gyanchand Bundiwal | 08275555557
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Posted in कविता - Kavita - કવિતા, यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

*पति-पत्नी दोनों मिल खूब कमाते हैं*
*तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं*

*सुबह आठ बजे नौकरियों*
*पर जाते हैं*
*रात ग्यारह तक ही वापिस आते हैं*

*अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं*
*अकेले रह कर वह कैरियर बनाते हैं*

*कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं*
*भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं*

*मोटे वेतन की नौकरी छोड़ नहीं पाते हैं*
*अपने नन्हे मुन्ने को पाल नहीं पाते हैं*

*फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते हैं*
*उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते हैं*

*परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है*
*केवल आया’आंटी’ को ही पहचानता है*

*दादा-दादी, नाना-नानी कौन होते है ?*
*अनजान है सबसे किसी को न मानता है*

*आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है*
*टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है*

*यूनिफार्म पहना के स्कूल कैब में बिठाती है*
*छुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है*

*नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है*
*जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है*

*उसे सुलाने में अक्सर वो भी सो जाती है*
*कभी जब मचलता है तो टीवी दिखाती है*

*जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है*
*देसी खाना छोड कर पीजा बर्गर खाता है*

*वीक एन्ड पर मॉल में पिकनिक मनाता है*
*संडे की छुट्टी मौम-डैड के संग बिताता है*

*वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है*
*वह स्कूल से निकल के कालेज में आता है*

*कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है*
*आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है*

*वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है*
*मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है*

*धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है*
*मौम डैड से रिश्ता पैसों का रह जाता है*

*कुछ दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है*
*जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है*

*माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूट जाता है*
*बेटे के दिमाग में भी कैरियर रह जाता है*

*बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं*
*जिनकी अनदेखी की उनसे आँखें चुराते हैं*

*क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं*
*घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं*

*हाथ पैर ढीले हो जाते, चलने में दुख पाते हैं*
*दाढ़-दाँत गिर जाते, मोटे चश्मे लग जाते हैं*

*कमर भी झुक जाती, कान नहीं सुन पाते हैं*
*वृद्धाश्रम में दाखिल हो, जिंदा ही मर जाते हैं :*

*सोचना की बच्चे अपने लिए पैदा कर रहे हो या विदेश की सेवा के लिए।*

*बेटा एडिलेड में, बेटी है न्यूयार्क।*
*ब्राईट बच्चों के लिए, हुआ बुढ़ापा डार्क।*

*बेटा डालर में बंधा, सात समन्दर पार।*
*चिता जलाने बाप की, गए पड़ोसी चार।*

*ऑन लाईन पर हो गए, सारे लाड़ दुलार।*
*दुनियां छोटी हो गई, रिश्ते हैं बीमार।*

*बूढ़ा-बूढ़ी आँख में, भरते खारा नीर।*
*हरिद्वार के घाट की, सिडनी में तकदीर।*

*तेरे डालर से भला, मेरा इक कलदार।*
*रूखी-सूखी में सुखी,*
*अपना घर संसार*

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