महाभारत काल की बात है,एक बार कृष्ण और बलराम किसी जंगल से गुजर रहे थे चलते हुए काफी समय बीत गया और अब सूरज भी लगभग डूबने वाला था, अंधेरे में आगे बढ़ना संभव नही था,
इसलिए कृष्ण बोले, बलराम हम ऐसा करते है कि अब सुबह होने तक यहीं ठहर जाते है,भोर होते ही हम अपने गंतव्य की और बढ़ चलेंगे
बलराम बोले, पर इस घने जंगल मे हमे खतरा हो सकता है,यहाँ सोना उचित नही होगा, हमे जाग कर ही रात बितानी होगी,
कृष्ण ने सुझाव दिया, अच्छा हम ऐसा करते है कि पहले मैं सोता हूँ और तब तक तुम पहरा देते रहो, और फ़िर जैसे ही तुम्हे नींद आए तुम मुझे जगा देना, तब मैं पहरा दूँगा और तुम सो जाना,
बलराम तैयार हो गए,
कुछ ही पलो मे कृष्ण गहरी नींद मे चले गए और तभी बलराम को एक भयानक आकृति उनकी ओर आती दिखी, वो कोई राक्षस था,
राक्षस बलराम को देखते ही जोर से चीखा और बलराम बुरी तरह डर गए, इस घटना का एक विचित्र असर हुआ, भय के कारण बलराम का आकार कुछ छोटा हो गया और राक्षस और विशाल हो गया,
उसके बाद राक्षस एक बार और चीखा और पुन: बलराम डर कर कांप उठे, अब बलराम और भी सिकुड़ गए, और राक्षस पहले से भी बड़ा हो गया
राक्षस धीरे-धीरे बलराम की और बढ़ने लगा, बलराम पहले से ही भयभीत थे और उस विशालकाय राक्षस को अपनी और आता देख जोर से चीख पड़े कृष्ण… और चीखते ही वहीं मूर्छित हो कर गिर पड़े,
बलराम की आवाज सुन कर कृष्ण उठे, बलराम को वहाँ देख उन्होने सोचा कि बलराम पहरा देते-दते थक गए और सोने से पहले उन्हे आवाज दे दी…
अब कृष्ण पहरा देने लगे,कुछ देर बाद वही राक्षस उनके सामने आया और जोर से चीखा
कृष्ण जरा भी घबराए नही और बोले, बताओ तुम इस तरह चीख क्यों रहे हो? क्या चाहिए तुम्हे?
इस बार भी कुछ विचित्र घटा, कृष्ण के साहस के कारण उनका आकार कुछ बढ़ गया और राक्षस का आकर कुछ घट गया, राक्षस को पहली बार कोई ऐसा मिला था जो उससे डर नही रहा था..
घबराहट मे वह पुन: कृष्ण पर जोर से चीखा…इस बार भी कृष्ण नही डरे और उनका आकर और भी बड़ा हो गया जबकि राक्षस पहले से भी छोटा हो गया..
एक आखिरी प्रयास मे राक्षस पूरी ताकत से चीखा पर कृष्ण मुस्कुरा उठे और फिर से बोले, बताओ तो क्या चाहिए तुम्हे?
फ़िर क्या था राक्षस सिकुड़ कर बिलकुल छोटा हो गया,और कृष्ण ने उसे हथेली मे लेकर अपनी धोती मे बाँध लिया और फिर कमर मे खोंस कर रख लिया…
कुछ ही देर मे सुबह हो गयी, कृष्ण ने बलराम को उठाया और आगे बढ़ने के लिए कहा, वे धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे
तभी बलराम उत्तेजित होते हुए बोले, पता है कल रात मे क्या हुआ था, एक भयानक राक्षस हमे मारने आया था…
रुको-रुको बलराम को बीच मे टोकते हुए कृष्ण ने अपनी धोती मे बँधा राक्षस निकाला और बलराम को दिखाते हुए बोले, कहीं तुम इसकी बात तो नही कर रहे हो?
हाँ ये वही है,पर कल जब मैंने इसे देखा था तो ये बहुत बड़ा था,ये इतना छोटा कैसे हो गया? बलराम आश्चर्यचकित होते हुए बोले…
कृष्ण बोले, जब हम जीवन मे किसी ऐसी चीज से बचने की कोशिश करते हो जिसका हमे सामना करना चाहिए तो वो हमसे बड़ी हो जाती है और हम पर नियंत्रण करने लगती है, लेकिन जब हम उस चीज का सामना करते हैं जिसका सामना हमे करना चाहिए तो हम उससे बड़े हो जाते हैं… और उसे नियंत्रित करने लगते हो.
जय श्री कृष्ण 🙏🙏
Day: January 16, 2025
એક પરિવાર હતો. એક શેઠને બે દીકરાઓ હતા. બેમાંથી મોટી પુત્રવધૂ સ્વછંદી અને ઉડાઉ હતી. તેથી થોડા જ સમયમાં તેમનો પરિવાર રોડ પર આવી ગયો. ખાવાના પણ સાંસા પડવા લાગ્યા. પરંતુ સૌથી નાની પુત્રવધૂ ખૂબ જ હોંશિયાર. એક દિવસ એ નાની વહુએ સસરા, જેઠ અને પોતાના પતિને કહ્યું, ‘તમે મૂંઝાશો નહીં. હું ચોક્કસ કંઈક રસ્તો કરીશ. તમને કામ નથી મળતું તો હું કરીશ. પણ એટલેથી પાર નહીં આવે. તમે ત્રણેય એક કામ કરો. શહેરની દાણાપીઠમાં, સોનીબજારમાં અને હીરા બજારમાં જાઓ અને ત્યાંથી ધૂળના પોટલા ભરી લાવો.
ત્રણેત્રણ બાપ દીકરો જુદી જુદી જગાએ રાત્રે પહોંચી જવા લાગ્યા. દાણાપીઠમાંથી લાવેલાં ધૂળનાં પોટલાં ચાળી ચાળીને સ્ત્રીએ અનાજ ભેગું કર્યુ. એક દિવસ એક એક રોટલો મળી રહે એટલું અનાજ મળ્યું અને બધાંએ ખાધું. સોનાના દાગીના ઘડાતા હતા ત્યાંથી લાવેલી ધૂળ ચાળીને એમાંથી સોનાની ઝીણી ઝીણી કરચ કાઢી એ વેચી એમાંથી સારા એવા પૈસા ઊપજ્યા. એવી જ રીતે હીરા બજારની ધૂળ ચાળી ચાળીને એમાંથી પણ હીરાના કણ કાઢવાનો પ્રયાસ કર્યો. પણ કંઈ ના મળ્યું.
આખરે આ પ્રયોગ રોજ ચાલુ રહૃાો. થોડા જ સમયમાં સોનાની સારી એવી કરચ જમા થઈ ગઈ અને એક દિવસ નાનકડો, પણ કીમતી હીરો પણ ધૂળમાંથી નીકળ્યો. એ બંને વેચીને બાપ-દીકરાઓએ નવો ધંધો શ કર્યો. મૂળ વાણિયા હતા. નાનકડા ધંધામાંથી થોડા જ સમયમાં મોટો ધંધો શ થઈ ગયો. બે જ વર્ષમાં એ પરિવાર સેટલ થઈ ગયો. સારું એવું કમાતો અને શાંતિથી ખાતો હતો. આ પરિવાર બરબાદ થયો હતો સ્ત્રીઓમાં ચતુરાઈ નહોતી અને આબાદ પણ થયો હતો એક સ્ત્રીની ચતુરાઈને કારણે.
આ લોકકથા પરથી જ આપણે ત્યાં કહેવત પડી છે કે, ‘ચતુર સ્ત્રી ધૂળમાંથી ધાન પેદા કરે છે, જ્યારે ફુવડ સ્ત્રી ધાનને ધૂળ કરીને ખાય છે. સાર એ છે કે સ્ત્રીની ચતુરાઈને કારણે ઘરમાં સુખનાં સરોવર છલકાઈ શકે છે અને જો ચતુરાઈ ના હોય તો ઘરમાં દુ:ખના દરિયા પણ છલકાઈ શકે છે.
સાધના
दो मेंढक
मेंढको का एक समूह जंगल के रास्ते से, संतोषजनक रूप से अपने मेंढक व्यवसाय के बारे में बात करते हुए जा रहा था। चलते-चलते उनमें से दो मेंढक एक गहरे गड्ढे में गिर गए। अन्य सभी मेंढक गड्ढे के चारों ओर इकट्ठे हुए और सोचने लगे कि उनके साथियों की मदद करने के लिए क्या किया जा सकता है।
जब उन्होंने देखा कि गड्ढा बहुत गहरा है, तो सभी निराश हो गए। मेंढको के समूह ने सहमति व्यक्त की कि यह गड्ढा बहुत गहरा है और हम सब मदद करने में असमर्थ हैं। इसलिए उन्होंने गड्ढे में दोंनो मेंढकों को बताया कि उन्हें अपने भाग्य के लिए खुद को तैयार करना होगा, क्योंकि वह खुद से कोशिश करके इस स्थिति से बाहर नहीं आ सकते हैं।
इस भयानक भाग्य को स्वीकार करने के लिए वह दोंनो मेंढक तैयार नहीं थे, दोनों मेंढक अपनी पूरी शक्ति के साथ कूदने लगे। कुछ मेंढको ने गड्ढे में चिल्लाते हुए कहा, “अगर तुम अपनी कोशिश में सावधानी नहीं बरतोगे तो स्थिति और भयानक हो सकती है।”
यह सुनते ही दोंनो मेंढक थोड़ी और सावधानी से कूदने लगे। सभी मेंढक दुःखी होकर चिल्लाये, कि उन्हें अपनी ऊर्जा को बचा लेना चाहिए और कोशिश करना छोड़ देना चाहिए और उन्हें अपने आप को पहले से ही मृत के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए।
वह दोंनो मेंढक काफी समय तक कूदते रहे और इसकी वजह से वे काफी थक गए थे। नवनीत अंत में दोंनो मेंढकों में से एक ने अपने साथियों की बात मान ली। हताश और निराश होकर उसने चुपचाप खुद को अपने भाग्य पर छोड़ दिया और गड्ढे में नीचे लेट गया। गड्ढे के ऊपर चिल्लाते हुए मेंढको के लिए पहला वाला मेंढक मृत घोषित किया गया। गड्ढे के अंदर के दूसरे मेंढक ने ऊर्जा के हर साँस के साथ कूदना जारी रखा, हालाँकि उसके शरीर को दर्द ने तोड़ दिया था और वह पूरी तरह से थक गया था।
गड्ढे के ऊपर खड़े उसके साथी, उसे अपने भाग्य को स्वीकार करने, दर्द को रोकने और मरने के लिए चिल्ला रहे थे। जितना अधिक वह मेंढक चिल्ला रहे थे, उतना ही दूसरा मेंढक और परिश्रम किए जा रहा था। दूसरे मेंढक का इतना कठिन परिश्रम देख के गड्ढे के ऊपर खड़े सारे मेंढक आश्चर्यचकित हो गये। अंत में इतने गहरे गड्ढे से एक ऊँची छलांग लगाकर वह मेंढक बाहर आ गया, आखिरकार वह गड्ढे से बाहर आ ही गया। सभी आश्चर्यचकित हो गए।
सभी मेंढकों ने उस मेंढक के लिए खुशी मनाई और फिर उसके चारों ओर इकट्ठा हो गए और उस मेंढक से पूछने लगे, “जब हमने तुम्हें बताया कि बाहर निकलना असंभव है, फिर भी तुमने कूदना क्यों जारी रखा?” तब उस मेंढक ने उन्हें बताया कि वह बहरा था, और जब उसने उन सभी को इशारे करते और चिल्लाते हुए देखा, तो उसने सोचा कि वे उसे प्रयास करता हुआ देख खुश हो रहे थे। क्योंकि प्रोत्साहन ने उसे कठिन प्रयास करने और सभी बाधाओं के खिलाफ सफल होने के लिए प्रेरित किया।
सरल कहानी पर एक शक्तिशाली सीख!
हमारे शब्द किसी को बर्बाद कर सकते हैं तो किसी को पूरी तरह आबाद कर सकते हैं। हमारे उत्साह-जनक शब्द किसी के जख्मों को भर सकते हैं, तो विनाशकारी शब्द किसी को गहरे घाव दे सकते हैं।
वह व्यक्ति जिसकी जुबान में नम्रता, शिष्टता और शालीनता होती है, उसका ह्रदय विशाल, शुद्ध और श्रेष्ठ तथा लोगों के मन को वशीभूत कर देने वाला होता है। मनुष्य जीवन का ध्येय प्राप्त करने के लिए एक शिष्ट जुबान का होना बहुत जरूरी है।”
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।
ईश्वर की सच्ची भक्ति
एक पुजारी थे, ईश्वर की भक्ति में लीन रहते. सबसे मीठा बोलते. सबका खूब सम्मान करते. जो जैसा देता है वैसा उसे मिलता है. लोग भी उन्हें अत्यंत श्रद्धा एवं सम्मान भाव से देखते थे।
पुजारी जी प्रतिदिन सुबह मंदिर आ जाते. दिन भर भजन-पूजन करते. लोगों को विश्वास हो गया था कि यदि हम अपनी समस्या पुजारी जी को बता दें तो वह हमारी बात बिहारी जी तक पहुंचा कर निदान करा देंगे।
एक तांगेवाले ने भी सवारियों से पुजारी जी की भक्ति के बारे में सुन रखा था. उसकी बड़ी इच्छा होती कि वह मंदिर आए लेकिन सुबह से शाम तक काम में लगा रहता क्योंकि उसके पीछे उसका बड़ा परिवार भी था।
उसे इस बात काम हमेशा दुख रहता कि पेट पालने के चक्कर में वह मंदिर नहीं जा पा रहा. वह लगातार ईश्वर से दूर हो रहा है. उसके जैसा पापी शायद ही कोई इस संसार में हो. यह सब सोचकर उसका मन ग्लानि से भर जाता था. इसी उधेड़बुन में फंसा उसका मन और शरीर इतना सुस्त हो जाता कि कई बार काम भी ठीक से नहीं कर पाता. घोड़ा बिदकने लगता, तांगा डगमगाने लगता और सवारियों की झिड़कियां भी सुननी पड़तीं।
तांगेवाले के मन का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ गया, तब वह एक दिन मंदिर गया और पुजारी से अपनी बात कही- मैं सुबह से शाम तक तांगा चलाकर परिवार का पेट पालने में व्यस्त रहता हूं. मुझे मंदिर आने का भी समय नहीं मिलता. पूजा- अनुष्ठान तो बहुत दूर की बात है।
पुजारी ने गाड़ीवान की आंखों में अपराध बोध और ईश्वर के कोप के भय का भाव पढ लिया. पुजारी ने कहा- तो इसमें दुखी होने की क्या बात है ?
तांगेवाला बोला- मुझे डर है कि इस कारण भगवान मुझे नरक की यातना सहने न भेज दें. मैंने कभी विधि-विधान से पूजा-पाठ किया ही नहीं, पता नहीं आगे कर पाउं भी या नहीं. क्या मैं तांगा चलाना छोड़कर रोज मंदिर में पूजा करना शुरू कर दूं ?
पुजारी ने गाड़ीवान से पूछा- तुम गाड़ी में सुबह से शाम तक लोगों को एक गांव से दूसरे गांव पहुंचाते हो. क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि तुमने किसी बूढ़े, अपाहिज, बच्चों या जिनके पास पास पैसे न हों, उनसे बिना पैसे लिए तांगे में बिठा लिया हो ?
गाड़ीवान बोला- बिल्कुल ! अक्सर मैं ऐसा करता हूं. यदि कोई पैदल चलने में असमर्थ दिखाई पड़ता है तो उसे अपनी गाड़ी में बिठा लेता हूं और पैसे भी नहीं मांगता।
पुजारी यह सुनकर खुश हुए. उन्होंने गाड़ीवान से कहा- तुम अपना काम बिलकुल मत छोड़ो. बूढ़ों, अपाहिजों, रोगियों और बच्चों और परेशान लोगों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है।
जिसके मन में करुणा और सेवा की भावना हो, उनके लिए पूरा संसार मंदिर समान है. मंदिर तो उन्हें आना पड़ता है जो अपने कर्मों से ईश्वर की प्रार्थना नहीं कर पाते।
तुम्हें मंदिर आने की बिलकुल जरूरत नहीं है. परोपकार और दूसरों की सेवा करके मुझसे ज्यादा सच्ची भक्ति तुम कर रहे हो।
ईमानदारी से परिवार के भरण-पोषण के साथ ही दूसरों के प्रति दया रखने वाले लोग प्रभु को सबसे ज्यादा प्रिय हैं. यदि अपना यह काम बंद कर दोगे तो ईश्वर को अच्छा नहीं लगेगा पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन ये सब मन को शांति देते हैं. मंदिर में हम स्वयं को ईश्वर के आगे समर्पित कर देते हैं. संसार के जीव ईश्वर की संतान हैं और इनकी सेवा करना ईश्वर की सेवा करना ही है।
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।
पुत्रवधू
वर्षो पहले की घटना है। सुदूर हिमालय की घाटियों में एक सुरम्य नगर बसा हुआ था जिसका नाम था राजसमन्द । राजसमन्द में एक धनाढ्य सेठजी नंदाराम अपने परिवार के साथ निवास करता था। उस सेठ का एक पुत्र था रघुवीर । पुत्र बड़ा संस्कारवान था, इसलिए उसने निश्चय किया कि वह एक समझदार लड़की को ही अपनी पुत्रवधु बनाएगा ।
सेठ जब भी किसी लडक़ी को देखने जाता तो प्रश्न करता —- “सर्दी, गर्मी ओर बरसात में कौन सा मौसम सबसे अच्छा है ?”
एक लड़की ने उत्तर दिया —-गर्मी का मौसम सबसे अच्छा होता है । हिमालय की सुरम्य पहाड़ियों पर घूमने का बड़ा आनंद मिलता है। वहाँ टहलने में बड़ा सुख मिलता है।
दूसरी लड़की ने कहा —–जाड़े के मौसम सबसे अच्छा होता है । इस मौसम में तरह तरह के पकवान बनते है । हम जो भी खाते है , वह सब आसानी से पच जाता है । सर्दी के मौसम में गर्म कपड़े पहन कर घूमने का बड़ा आनंद आता है।
तीसरी लड़की ने कहा —मुझे तो वर्षा का मौसम पसंद है। इस मौसम में पृथ्वी पर चारो ओर हरियाली होती है। बारिश में भीगने में बहुत मजा आता है। पहाड़ो पर झरनों का अपना ही मजा है ।
सेठ जी को एक और लड़की ने बताया कोई मौसम भी अच्छा नही लगता गर्मी में गर्मी से परेशान जाड़े में ठंड से परेशान बारिश में भीग जाओ कीचड़ गंदगी कोई भी मौसम ठीक नही ।
सेठ जी परेशान होकर लडक़ी देखना बंद कर दिया । तभी अचानक एक मित्र के यहाँ उनकी मुलाकात एक लड़की से हुई।
उन्होंने उससे भी वही प्रश्न किया । लडक़ी बोली शरीर व मन स्वस्थ है, तो सभी मौसम अच्छे है यदि हमारा तन मन स्वस्थ नही, तो हर मौसम बेकार है।
सेठ जी इस उत्तर से बेहद प्रभावित हुए । उन्होंने उस लड़की को अपनी पुत्रवधू बना लिया ।
शिक्षा
सभी मौसम उपयोगी है। जीवन का भी यही है। शरीर और मन स्वस्थ हो तो काम करने के कोई भी मौसम हो सबका अपना मजा है ।
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।
टैक्सी चालक
आज की कहानी दिल्ली के एक साधारण टैक्सी चालक देवेन्द्र की है.
देवेन्द्र मूलतः नयासर के रहने वाले हैं। एक दिन देवेन्द्र की टैक्सी में राजस्थान का निवासी बैठा जिसे एयरपोर्ट से पहाड़गंज तक जाना था। देवेन्द्र ने उसको पहाड़गंज छोड़ा, अपना किराया वसूला और वापिस टैक्सी स्टैंड की ओर चल पड़े। इसी बीच उनकी नज़र गाड़ी में पड़े एक बैग पर गयी। बैग को देखकर देवेंद्र समझ गए कि यह उसी सवारी का बैग है, जिसे कुछ ही समय पहले वह पहाड़गंज छोड़ कर आये हैं। बैग को खोलकर देखा तो उसमें कुछ स्वर्ण आभूषण, एक एप्पल का लैपटॉप, एक कैमरा और कुछ नगद पैसे थे। सब कुछ मिला के लगभग 7 या 8 लाख का सामान था।।
एकदम देबेन्द्र की आँखों के सामने अपनी टैक्सी के फाइनेन्सर की तस्वीर आ गयी। इतने आभूषण बेच कर तो
उनकी टैक्सी का कर्ज आसानी से उतर सकता था। एक दम से प्रसन्न हो उठे। उनके मन में बैठा रावण जाग उठा। पराया माल अपना लगने लगा। परन्तु जीवन की यही तो विडम्बना है। मन में राम और रावण दोनों निवास करते हैं।
कुछ ही दूर गये थे के मन में बैठे राम जाग उठे। देबेन्द्र को लगा के वह कैसा पाप करने जा रहे थे।
नैतिकता आड़े आ गयी। बड़ी दुविधा थी। एक ओर आभूषण सामने पड़े थे और दूसरी ओर अपनी अंतरात्मा खुद को ही धिक्कार रही थी।
कुछ देर द्वंद चला पर अंत में विजय राम की ही हुई। देवेन्द्र पास के पुलिस स्टेशन गये और बैग ड्यूटी पर मौजूद थानेदार के हाथ में थमा दिया।
अब थानेदार कभी बैग में पड़े आभूषण देखे और कभी ड्राइवर का चेहरा देखे। थानेदार ने कहा कि तू अगर चाहता तो यह बैग लेकर भाग सकता था। देवेन्द्र ने जवाब दिया – “साहब ! हम “गरीब” हैं, पर “बेईमान” नहीं हैं।”
थानेदार भी निःशब्द हो गया। उसे लगा कि ड्राइवर सच में गरीब तो है किंतु ईमानदार है।
ख़ैर सवारी को उसका बैग सकुशल वापिस मिल गया। देवेन्द्र की ईमानदारी के इनाम के रूप में मालिक ने उसे कुछ रुपये देने की पेशकश की तो देवेन्द्र ने साफ मना कर दिया।
असली कथा आगे शुरू होती है –
थानेदार ने देवेन्द्र की ईमानदारी की गाथा एक मीडियाकर्मी के आगे सुना दी ।
मीडियाकर्मी भी थानेदार की तरह प्रभावित हो गया। उसने इस ईमानदारी की खबर अखबार में छापने की ठान ली ।
वह देवेन्द्र से मिला और उसका साक्षात्कार लेते हुये पूछा- “अगर बैग में पड़े सामान की कीमत (8 लाख रुपये) उसे मिल जायें तो वह क्या करेगा।”
देवेन्द्र ने कहा कि पहले तो फाइनेन्सर का कर्जा चुकाएगा और फिर अगर सम्भव हुआ तो एक टैक्सी खरीदेगा।
रिपोर्टर ने कहा कि तेरे सर पर कर्ज़ है तो तू बैग लेकर भाग क्यों नहीं गया? देवेन्द्र ने रिपोर्टर से भी यही कहा कि साहब, हम गरीब हैं पर बेईमान नहीं हैं। थानेदार की तरह अब रिपोर्टर भी प्रभावित हुआ।
रिपोर्टर ने उसकी ईमानदारी की गाथा एफ एम चैनल के एक रेडियो जॉकी को बताई। एफ एम रेडियो के ज़रिए देवेन्द्र की कहानी दिल्लीवासियों को सुना दी गई…
साथ ही साथ दिल्ली वालों को देवेन्द्र के कर्ज के विषय में भी बताया गया। इसी के साथ देवेन्द्र का एक बैंक खाता नम्बर भी दिया गया, जिसमे धनराशि डाल कर वह ईमानदार देवेन्द्र का कर्ज़ उतारने में उसकी मदद कर सकते थे।
केवल 2 घँटे बाद ही…… मात्र 120 मिनट में
दिल्ली ने देबेन्द्र के खाते में 91751 रुपये डलवा दिये।
और 8 लाख रुपये मिल गए मात्र 2 दिन में।
सबने अपनी हैसियत के हिसाब से पैसा दिया। दिलवालो की दिल्ली ने देवेन्द्र की ईमानदारी के उपहार में उसे ऋण मुक्त कर दिया। लाखों लोगों ने उसकी ईमानदारी को सराहा….
देवेन्द्र आज भी कहते हैं कि मन के रावण को राम पर हावी ना होने देना उनके जीवन की सबसे बड़ी जीत थी। अगर वह बैग लेकर भाग जाते तो कर्ज़ा तो उतार लेते पर खुद को कभी माफ नहीं कर पाते।
यह सच सिद्ध हो गया कि मन में बैठा रावण आज की व्यवस्था में हावी है। परन्तु मन में बैठे राम आज भी दशानन का वध करने में सक्षम हैं। अच्छाई और बुराई मे आज भी धागे भर का फासला है। इस ओर गये तो राम और उस ओर गये तो रावण।
गरीब ड्राइवर देवेन्द्र ने दिल की सुनी और दिमाग के तर्क को नकार दिया, अपने संस्कार से सिद्ध किया कि किसी और के परिश्रम से अर्जित धन को हड़पने से धन नहीं आता। ईमानदारी ही जीवन को सुखी और समृद्ध बना सकती है।
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।
अन्न का आदर
एक रिश्तेदार की शादी की पार्टी में सोनू अपने परिवार के साथ पहुंचा। वहाँ जाकर उसने देखा कि खाना शुरू हाे चुका था। जाते ही उसने एक प्लेट में पनीर की सब्जी, खूब सारे चावल, दही-भल्ले, पापड़, अचार, सलाद आदि सजा लिए।
अपनी खाने से लबालब प्लेट काे लेकर सोनू एक साईड में चला गया। खाना शुरू ही किया था कि दाे चम्मच चावल खाते ही सोनू काे लगा कि खाने में नमक ज़्यादा है। सोनू ने साेचा कि मैं ये खाना खाकर पेट क्यों भर रहा हूँ, ये ताे राेज़ घर पर खाता हूँ। … मुझे ताे रसगुल्ले, गुलाब जामुन, आइसक्रीम, इत्यादि खाने चाहिए।
बस फिर क्या था, सोनू खाने से भरी प्लेट चुपचाप रखने की जगह ढूँढने लगा। एक जगह से टैंट खुला हुआ था। सोनू ने नज़रें बचाकर टैंट से बाहर जाकर वह प्लेट रख दी आैर चुपचाप टैंट के अन्दर आ गया।
किसी काे कुछ ना पता चलता देख सोनू खुश हाे गया आैर गुलाब जामुन लेने चला गया।
गुलाब जामुन लेकर सोनू उसी जगह आ गया जहाँ वाे पहले खड़ा हाेकर खाना खा रहा था। गुलाब जामुन बड़े आनन्द से खाकर वो खाली प्लेट उसी जगह फेंकने गया जहाँ उसने खाने से भरी प्लेट रखी थी, पर जैसे ही सोनू प्लेट फेंकने गया, वहाँ का दृश्य देख सोनू हैरान हाे गया।
सोनू ने देखा कि जाे प्लेट उसने वहाँ रखी थी उसमें रखे खाने काे एक बच्चा खा रहा था।
सोनू नेे बच्चे काे देखकर कहा,
- ए बच्चे, ये क्या कर रहे हाे ?
बच्चा डर गया और सोनू के पाँव में आकर गिर गया और कहने लगा,
- खाने दाे भैया, मैंने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। मैं आपके पाँव पड़ता हूँ।
सोनू की आँखे भर आईं। वह बच्चे के पास बैठा और बाेला,
- बेटा ये खाना ज़मीन पर गिरकर ख़राब हाे गया है और देखाे इसमें नमक भी ज़्यादा है।
बच्चा राेने लगा बाेला,
- भैया, आपके लिए ये खाना जैसा भी हाेे, पर मुझे तो इस समय ये मेरी ज़िंदगी लग रहा है, खाने दाे भैया।
सोनू के आँसू राेके नहीं रुक रहे थे।
सोनू ने उससे कहा,
- गुलाब जामुन खाओगे, लाऊँ तुम्हारे लिए ?
बच्चा बाेला,
- नहीं भैया, मेरे लिए तो यही बहुत है।
सोनू राेने लगा, उसे रोता देख बच्चा हँसा और बाेला,
- भैया, आप क्यों राेते हाे ? आप जैसे किस्मत वालों काे राेना शाेभा नहीं देता।
- मैं किस्मत वाला कैसे ? सोनू ने बड़ी हैरानी से पूछा।
बच्चा खाना खाते-खाते बाेला,
- भैया, ये सब खाना खाने के, मेरे जैसे ना जाने कितने बच्चे रात काे सपना देखकर राेड पर भूखे साे जाते हैं, और एक आप हो जाे एेसे खाने काे फेंक देते हो, ताे हुए ना आप किस्मत वाले ?
… आप मत रोइये भैया,
राेना ताे मुझे चाहिए, जिसे आज तो आपका ये झूठा, फेंका हुआ खाना खाने काे मिल गया, पर कल इस समय फिर ये पेट भूखा हाेगा। आैर पता है भैया, तब मैं आज के इस पल काे याद करके भूखा सो जाऊंगा, ये साेचकर कि कल मैं इस समय ये खाना खा रहा था।
आप कल इस समय फिर से अच्छा खाना खाएंगे, पर मैं नहीं, मैं फिर भूखा तड़पूंगा। इसलिए राेना ताे मुझे चाहिए, आपकाे नहीं।
सोनू राेने लगा ङर अब सोनू काे उस अन्न की महिमा और महत्व पता चल गया था जिसे उसने फेंका था।
सोनू ने कहा,
- रुक मैं तेरे लिए गुलाब जामुन लाता हूँ।
बच्चे ने जाते सोनू काे राेका आैर कहा,
- भैया, अगर कृपा करनी ही है ताे मुझे ये खाना घर ले जाने दीजिए। मेरी माँ हमेशा मुझे खिलाकर ही खाती है। साेचिए मैंने तीन दिन से खाना नहीं खाया ताे मेरी माँ भी ताे तीन दिन से ही भूखी हाेगी। क्या मैं ये अपनी माँ के लिए ले जाऊं ??
सोनू गया ङर उसके लिए खूब सारा खाना लाया और उसे दे दिया।
वाे बच्चा ताे चला गया पर अब जब भी सोनू खाना खाता आैर उसे उसका स्वाद अच्छा ना लगता, ताे खाने की प्लेट वापस करने से पहले ही उसके आगे वह बच्चा आ जाता जाे उससे कहता,
- देखाे भैया, हाे ना आप किस्मत वाले, मैं तो आज भी भूखा हूँ आैर आपकाे खाना मिल रहा है ताे आप उसका आदर नहीं कर रहे हो।
… ये सुनते ही सोनू खाने काे सिर माथे लगाता और भगवान का शुक्रिया कर उसे खाता।
धन्यवाद
… इसलिए जीवन में हमेशा अन्न का आदर करिये
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।
नजरिया
राजस्थान के एक सरकारी ऑफिस में किरन नाम एक महिला कार्य करती थी। उसे अपने द्वारा किये हुए कार्य के अलावा किसी का कार्य पसंद नहीं आता था। वह ऑफिस के हर सहकर्मी में और उनके द्वारा किये कार्य में कोई न कोई कमी निकाल ही लेती थी।
एक दिन जब किरन अपने ऑफिस में अपना कार्य कर रही थी तो अचानक उसने देखा कि उसकी ऑफिस बिल्डिंग के ठीक सामने वाली बिल्डिंग में एक महिला कपड़े सुखा रही है।
उसको देखते ही किरन ने अपने पास बैठे सहकर्मी से कहा, “देखो तो! यह महिला कितने गंदे कपड़े धोती है। और इसका घर तो देखो, वह भी कितना गन्दा है। और तो और जो कपड़े वह पहने हुए है वह भी कितने गंदे हैं।”
किरन के पास बैठे सहकर्मी ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलायी और अपना कार्य करने लगा।अब तो रोज जब भी वह महिला अपने बिल्डिंग की बॉलकनी में कपड़े सुखाने आती थी तो किरन रोज उसमे कोई न कोई कमी निकालती और उसको और उसके आसपास की चीजों को गन्दा कहती। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा।
एक दिन जब किरन अपने ऑफिस में बैठी उस महिला को देख रही थी कि तभी ऑफिस का बॉस किरन के केबिन में आ गया।
किरन को बॉस के आने का पता भी नहीं लगा क्योंकि वह उस महिला को बहुत ध्यान से देख रही थी और उसमे बुराइयाँ निकाले जा रही थी।
यह सभी देख बॉस ने उसे टोका, “किरन! आप कहाँ देख रही हैं? क्या आपका मन अपने कार्य में नहीं लग रहा?”
बॉस की आवाज सुनकर और उसे पास खड़ा देखकर किरन अचानक चौंक गयी और अपनी सीट से उठकर बोली, “कुछ नहीं सर! बस मैं तो उस सामने वाली बिल्डिंग की उस महिला को देख रही हूँ जो रोज गंदे कपडे सुखाने अपनी बालकनी में आ जाती है।”
बॉस ने भी उस महिला, उसकी बिल्डिंग और उसके कपड़ों पर नजर डाली।
तभी किरन फिर बोली, “देखो तो सर! अपने काम के प्रति कितने लापरवाह लोग होते हैं। वह महिला जो भी कपड़े धोकर सुखाती है वह गंदे ही होते हैं। उसके पहने हुए कपड़े भी कितने गंदे हैं और उसकी बिल्डिंग ऐसी की बरसों से उसकी धूल साफ ही नहीं की गयी है।”
बॉस उस महिला को कुछ ध्यान से देखने लगे और मुस्कुराने लगे। किरन को यह कुछ अजीब लगा।
उससे न रहा गया और अपने बॉस से पूछा, “सर आप इस महिला को देखकर मुस्कुरा रहे हैं? मेरी तो आज तक यह समझ नहीं आया कि यह महिला इतनी गन्दी कैसे रह लेती है?”
किरन के पूछने पर बॉस मुस्कुराते हुए बोले, “आपके इन प्रश्नों का उत्तर मैं कल दूंगा। कल जब आप इस महिला को कपड़े सुखाते हुए देखें तो मुझे बुला लेना।”
इतना कहकर बॉस चले गए। किरन अब भी सोच रही थी कि बॉस आखिर मुस्कुरा क्यों रहे थे।अगला दिन आया। रोज की तरह किरन अपने ऑफिस में काम करने लगी। अब जैसे ही वह महिला कपड़े सुखाने अपनी बॉलकनी में आयी तो किरन की नजर उस पर पड़ी।
अरे यह क्या?” किरन अचानक बहुत चौंक गयी।
“यह महिला तो आज कितने साफ़ कपड़े सुखा रही है।”
तभी किरन की नजर उस महिला के पहने कपड़ों और उसकी बिल्डिंग पर गयी।
किरन के मुँह से अचानक ही निकला, “अरे! आज तो यह कितने साफ़ कपड़े पहने हुए है और उसकी बिल्डिंग भी आज कितनी साफ़ नजर आ रही है जैसे कल रात ही पेंट कराया गया हो।”
उसने तुरंत अपने बॉस को बुलाया और सभी बातें बताते हुए आश्चर्यचकित होकर पूछने लगी, “सर आप आज मेरे प्रश्न का उत्तर देने वाले थे। लेकिन सर आज तो सब कुछ साफ़ हो गया है। आखिर यह कैसे हुआ होगा?”
बॉस मुस्कुराये और बोले, “यह महिला रोज साफ कपड़े ही सुखाती है। इसके पहने कपड़े भी कभी गंदे नहीं होते। और तो और इसकी बिल्डिंग पर भी पेंट बहुत दिनों से नया ही है। बस कल शाम आपके जाने के बाद सामने का शीशा जिससे आप उसको देखती हैं, उस पर बहुत धूल लगी थी और अब उसे अच्छे से मैंने साफ करा दिया है।”
यह बात सुनकर किरन भी मुस्कुराने लगी और उसे अपनी भूल का एहसास हुआ।
दोस्तों! हो सकता है इस प्रेरक कहानी का मजेदार अंत पढ़कर आपके चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गयी हो लेकिन यह कहानी हमें बहुत कुछ सिखा देती है।
यह दुनिया, इस दुनिया के सभी लोग और इस दुनिया की सभी बस्तुएं हमें वैसी ही दिखाई देती हैं जैसे दृष्टिकोण से हम उनको देखते हैं।
अर्थात आप जिस रंग का चश्मा पहने होंगे, यह दुनिया भी आपको उसी रंग की दिखाई देगी।
यदि आप धूल लगे हुए चश्मे से देखेंगे तो यह दुनिया आपको गन्दी ही नजर आएगी।
बहुत से लोग इतने नकारात्मक दृष्टिकोण के होते हैं कि उन्हें दुनिया के हर इंसान और बस्तु में कोई न कोई कमी नजर आने ही लगती है।
सभी लोगों में कुछ अच्छाइयां जरूर होती हैं। क्यों न हम सभी लोगों की उन अच्छाइयों की तरफ अपना फोकस करें।
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।
घास और बाँस
बहुत समय पहले रघुवीर नाम का एक व्यापारी था लेकिन उसका व्यापार डूब गया और वो पूरी तरह निराश हो गया। अपनी जिन्दगी से बुरी तरह थक चुका था।
एक दिन परेशान होकर वो उपरमालिया के जंगल में गया और जंगल में काफी देर अकेले बैठा रहा। कुछ सोचकर भगवान से बोला – मैं हार चुका हूँ, मुझे कोई एक वजह बताइये कि मैं क्यों ना हताश होऊं, मेरा सब कुछ खत्म हो चुका है। हे भगवान मेरी सहायता करो!
भगवान का जवाब :
तुम जंगल में इस घास और बांस के पेड़ को देखो- जब मैंने घास और इस बांस के बीज को लगाया। मैंने इन दोनों की ही बहुत अच्छे से देखभाल की। इनको बराबर पानी दिया, बराबर प्रकाश दिया।
घास बहुत जल्दी बड़ी होने लगी और इसने धरती को हरा भरा कर दिया लेकिन बांस का बीज बड़ा नहीं हुआ। लेकिन मैंने बांस के लिए अपनी हिम्मत नहीं हारी।
दूसरी साल, घास और घनी हो गयी उसपर झाड़ियाँ भी आने लगी लेकिन बांस के बीज में कोई विकास नहीं हुआ। लेकिन मैंने फिर भी बांस के बीज के लिए हिम्मत नहीं हारी।
तीसरे साल भी बांस के बीज में कोई वृद्धि नहीं हुई, लेकिन मित्र मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।
चौथे साल भी बांस के बीज में कोई जड़ नहीं हुई लेकिन मैं फिर भी लगा रहा।
पांच साल बाद, उस बांस के बीज से एक छोटा सा पौधा अंकुरित हुआ.. घास की तुलना में ये बहुत छोटा था और कमजोर था लेकिन केवल 6 महीने बाद ये छोटा सा पौधा 100 फ़ीट लम्बा हो गया।
मैंने इस बांस की जड़ की ग्रोथ करने के लिए पांच साल का समय लगाया। इन पांच सालों में इसकी जड़ इतनी मजबूत हो गयी कि 100 फिट से ऊँचे बांस को संभाल सके।
जब भी तुम्हें जिन्दगी में संघर्ष करना पड़े तो समझिए कि आपकी जड़ मजबूत हो रही है। आपका संघर्ष आपको मजबूत बना रहा है जिससे कि आप आने वाले कल को सबसे बेहतरीन बना सको।
मैंने बांस पर हार नहीं मानी,
मैं तुम पर भी हार नहीं मानूंगा,
किसी दूसरे से अपनी तुलना मत करो
घास और बांस दोनों के बड़े होने का समय अलग अलग है दोनों का उद्देश्य अलग अलग है।
तुम्हारा भी समय आएगा। तुम भी एक दिन बांस के पेड़ की तरह आसमान छुओगे। मैंने हिम्मत नहीं हारी, तुम भी मत हारो !
अपने जीवन में संघर्ष से मत घबराओ, यही संघर्ष हमारी सफलता की जड़ों को मजबूत करेगा।
लगे रहिये, आज नहीं तो कल आपका भला हो जाएगा
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।
संस्कारो पर नाज
बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था …इसलिए बात-बात पर अपनी माँ किशोरी से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब फाइनेसिअली इंडिपेंडेंट बेटा पिता के कई बार समझाने पर भी इग्नोर कर देता और कहता, “यही तो उम्र है शौक की,खाने पहनने की, जब आपकी तरह मुँह में दाँत और पेट में आंत ही नहीं रहेगी तो क्या करूँगा।”
बहू खुशबू भी भरे पूरे परिवार से आई थी, इसलिए बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी अच्छी थी तो फ्रेंड सर्किल उसी हिसाब से मॉडर्न थी। बहू को अक्सर वह पुराने स्टाइल के कपड़े छोड़ कर मॉडर्न बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती …..,वो कहता “कमाल करती हो तुम, आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है,मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ। तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। क्वालिटी लाइफ क्या होती है तुम्हें मालूम ही नहीं।” और बहू कहती “क्वालिटी लाइफ क्या होती है, ये मुझे जानना भी नहीं है, क्योकि लाइफ की क्वालिटी क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।”
आज अचानक पापा आई. सी. यू. में एडमिट हुए थे। हार्ट अटेक आया था। डॉक्टर ने पर्चा पकड़ाया, तीन लाख और जमा करने थे। डेढ़ लाख का बिल तो पहले ही भर दिया था मगर अब ये तीन लाख भारी लग रहे थे। वह बाहर बैठा हुआ सोच रहा था कि अब क्या करे। उसने कई दोस्तों को फ़ोन लगाया कि उसे मदद की जरुरत है, मगर किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ बहाना कर दिया। आँखों में आँसू थे और वह उदास था तभी खुशबू खाने का टिफिन लेकर आई और बोली,”अपना ख्याल रखना भी जरुरी है। ऐसे उदास होने से क्या होगा? हिम्मत से काम लो, बाबू जी को कुछ नहीं होगा आप चिन्ता मत करो। कुछ खा लो फिर पैसों का इंतजाम भी तो करना है आपको मैं यहाँ बाबूजी के पास रूकती हूँ आप खाना खाकर पैसों का इंतजाम कीजिये। पति की आँखों से टप -टप आँसू झरने लगे। कहा न आप चिन्ता मत कीजिये। जिन दोस्तों के साथ आप मॉडर्न पार्टियां करते हैं आप उनको फ़ोन कीजिये, देखिए तो सही, कौन कौन मदद को आता हैं। पति नवनीत खामोश और सूनी निगाहों से जमीन की तरफ़ देख रहा था। कि खुशबू का हाथ उसकी पीठ पर आ गया। और वह पीठ को सहलाने लगी।
सबने मना कर दिया। सबने कोई न कोई बहाना बना दिया खुशबू।आज पता चला कि ऐसी दोस्ती तब तक की है जब तक जेब में पैसा है। किसी ने भी हाँ नहीं कहा जबकि उनकी पार्टियों पर मैंने लाखों उड़ा दिये।
इसी दिन के लिए बचाने को तो माँ-बाबा कहते थे। खैर, कोई बात नहीं, आप चिंता न करो, हो जाएगा सब ठीक। कितना जमा कराना है?
अभी तो तनख्वाह मिलने में भी समय है, आखिर चिन्ता कैसे न करूँ खुशबू ?
“तुम्हारी ख्वाहिशों को मैंने सम्हाल रखा है।”
“क्या मतलब….?”
“तुम जो नई नई तरह के कपड़ो और दूसरी चीजों के लिए मुझे पैसे देते थे वो सब मैंने सम्हाल रखे हैं। माँ जी ने फ़ोन पर बताया था, तीन लाख जमा करने हैं। मेरे पास दो लाख थे। बाकी मैंने अपने भैया से मंगवा लिए हैं। टिफिन में सिर्फ़ एक ही डिब्बे में खाना है बाकी में पैसे हैं।” खुशबू ने थैला टिफिन सहित उसके हाथों में थमा दिया।
“खुशबू ! तुम सचमुच अर्धांगिनी हो, मैं तुम्हें मॉडर्न बनाना चाहता था, हवा में उड़ रहा था। मगर तुमने अपने संस्कार नहीं छोड़े. आज वही काम आए हैं। “
सामने बैठी माँ के आँखो में आंसू थे उसे आज खुद के नहीं बल्कि पराई माँ के संस्कारो पर नाज था और वो बहु के सर पर हाथ फेरती हुई ऊपरवाले का शुक्रिया अदा कर रही थी।
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।