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सूर्य के रथ और उसकी गति का वर्णन……

श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! परिमाण और लक्षणों के सहित इस भूमण्डल का कुल इतना ही विस्तार है, सो हमने तुम्हें बता दिया। इसी के अनुसार विद्वान् लोग द्युलोक का भी परिमाण बताते हैं। जिस प्रकार चना-मटर आदि के दो दलों में से एक का स्वरूप जान लेने से दूसरे का भी जाना जा सकता है, उसी प्रकार भूर्लोक के परिमाण से ही द्युलोक का भी परिमाण जान लेना चाहिये। इन दोनों के बीच में अन्तरिक्षलोक है। यह इन दोनों का सन्धिस्थान है। इसके मध्यभाग में स्थित ग्रह और नक्षत्रों के अधिपति भगवान् सूर्य अपने ताप और प्रकाश से तीनों लोकों को तपाते और प्रकाशित करते रहते हैं। वे उत्तरायण, दक्षिणायन और विषुवत् नाम वाली क्रमशः मन्द, शीघ्र और समान गतियों से चलते हुए समयानुसार मकरादि राशियों में ऊँचे-नीचे और समान स्थानों में जाकर दिन-रात को बड़ा, छोटा या समान करते हैं।
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जब सूर्य भगवान् मेष या तुला राशि पर आते हैं, तब दिन-रात समान हो जाते हैं; जब वृषादि पाँच राशियों में चलते हैं, तब प्रतिमास रात्रियों में एक-एक घड़ी कम होती जाती है और उसी हिसाब से दिन बढ़ते जाते हैं। जब वृश्चिकादि पाँच राशियों में चलते हैं, तब दिन और रात्रियों में इसके विपरीत परिवर्तन होता है। इस प्रकार दक्षिणायन आरम्भ होने तक दिन बढ़ते रहते हैं और उत्तरायण लगने तक रात्रियाँ। इस प्रकार पण्डितजन मानसोत्तर पर्वत पर सूर्य की परिक्रमा का मार्ग नौ करोड़, इक्यावन लाख योजन बताते हैं। उस पर्वत पर मेरु के पूर्व की ओर इन्द्र की देवधानी, दक्षिण में यमराज की संयमनी, पश्चिम में वरुण की निम्लोचनी और उत्तर में चन्द्रमा की विभावरी नाम की पुरियाँ हैं। इन पुरियों में मेरु के चारों ओर समय-समय पर सूर्योदय, मध्याह्न, सायंकाल और अर्धरात्रि होते रहते हैं; इन्हीं के कारण सम्पूर्ण जीवों की प्रवृत्ति या निवृत्ति होती है।
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राजन्! जो लोग सुमेरु पर रहते हैं, उन्हें तो सूर्यदेव सदा मध्याह्नकालीन रहकर ही तपाते रहते हैं। वे अपनी गति के अनुसार अश्विनी आदि नक्षत्रों की ओर जाते हुए यद्यपि मेरु को बायीं रखकर चलते हैं तो भी सारे ज्योतिर्मण्डल को घुमाने वाली निरन्तर दायीं ओर बहती हुई प्रवह वायु द्वारा घुमा दिये जाने से वे उसे दायीं ओर रखकर चलते जान पड़ते हैं। जिस पुरी में सूर्य भगवान् का उदय होता है, उसके ठीक दूसरी ओर की पुरी में अस्त होते मालूम होंगे और जहाँ वे लोगों को पसीने-पसीने करके तपा रहे होंगे, उसके ठीक सामने की ओर आधी रात होने की कारण वे उन्हें निद्रावश किये होंगे। जिन लोगों के मध्याह्न के समय वे स्पष्ट दीख रहे होंगे, वे ही जब सूर्य सौम्यदिशा में पहुँच जायें, तब उनका दर्शन नहीं कर सकेंगे।
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सूर्यदेव जब इन्द्र की पुरी से यमराज की पुरी को चलते हैं, तब पंद्रह घड़ी में वे सवा दो करोड़ और साढ़े बारह लाख योजन से कुछ–पचीस हजार योजन-अधिक चलते हैं। फिर इसी क्रम से वे वरुण और चन्द्रमा की पुरियों को पार करके पुनः इन्द्र की पुरी में पहुँचते हैं। इस प्रकार चन्द्रमा आदि अन्य ग्रह भी ज्योतिश्चक्र में अन्य नक्षत्रों के साथ-साथ उदित और अस्त होते रहते हैं।
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इस प्रकार भगवान् सूर्य का वेदमय रथ एक मुर्हूत में चौंतीस लाख आठ सौ योजन के हिसाब से चलता हुआ इन चारों पुरियों में घूमता रहता है। इसका संवत्सर नाम का एक चक्र (पहिया) बतलाया जाता है। उसमें मासरूप बारह अरे हैं, ऋतुरूप छः नेमियाँ (हाल) हैं, तीन चौमासेरूप तीन नाभि (आँवन) हैं। इस रथ की धुरी का एक सिरा मेरु पर्वत की चोटी पर है और दूसरा मानसोत्तर पर्वत पर। इसमें लगा हुआ यह पहिया कोल्हू के पहिये के समान घूमता हुआ मानसोत्तर पर्वत के ऊपर चक्कर लगाता है। इस धुरी में-जिसका मूल भाग जुड़ा हुआ है, ऐसी एक धुरी और है। वह लंबाई में इससे चौथाई है। उसका ऊपरी भाग तैलयन्त्र के धुरे के समान ध्रुवलोक से लगा हुआ है।
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इस रथ में बैठने का स्थान छत्तीस लाख योजन लंबा और नौ लाख योजन चौड़ा है। इसक जुआ भी छत्तीस लाख योजन ही लंबा है। उसमें अरुण नाम के सारथि ने गायत्री आदि छन्दों के-से नाम वाले सात घोड़े जोत रखे हैं, वे ही इस रथ पर बैठे हुए भगवान् सूर्य को ले चलते हैं।
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सूर्यदेव के आगे उन्हीं की ओर मुँह करके बैठे हुए अरुण उनके सारथि का कार्य करते हैं। भगवान् सूर्य के आगे अँगूठे के पोरुए के बराबर आकार वाले वालखिल्यादि साठ हजार ऋषि स्वस्तिवाचन के लिये नियुक्त हैं। वे उनकी स्तुति करते रहते हैं। इनके अतिरिक्त ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस और देवता भी-जो कुल मिलाकर चौदह हैं, किन्तु जोड़े से रहने के कारण सात गण कहे जाते हैं-प्रत्येक मास में भिन्न-भिन्न नामों वाले होकर अपने भिन्न-भिन्न कर्मों से प्रत्येक मास में भिन्न-भिन्न नाम धारण करने वाले आत्मस्वरूप भगवान् सूर्य की दो-दो मिलकर उपासना करते हैं।
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इस प्रकार भगवान् सूर्य भूमण्डल के नौ करोड़, इक्यावन लाख योजन लंबे घेरे में से प्रत्येक क्षण में दो हजार दो योजन की दूरी पार कर लेते हैं।

साभार
@everyone

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જીવનની કિંમત



એક દિવસ જ્યારે રાજા તેના જન્મદિવસની સવારે ફરવા નીકળ્યો, ત્યારે તેણે નક્કી કર્યું કે તે આજે રસ્તામાં મળેલી પહેલી વ્યક્તિને ખુશ અને સંતુષ્ટ બનાવશે.
પહેલા તેણે એક ભિખારીને જોયો. જ્યારે ભિખારી રાજા પાસે ભીખ માંગવા લાગ્યો ત્યારે રાજાએ ભિખારી પર તાંબાના સિક્કા ફેંક્યા. પરંતુ તેના હાથમાંથી સિક્કા પડી ગયા અને બાજુના ગટરમાં ખાઈને પડી ગયા. ભિખારી ગટર પાસે ગયો અને તે સિક્કાઓ શોધવા લાગ્યો.
રાજાએ તેને બોલાવ્યો અને તાંબાનો બીજો સિક્કો આપ્યો. ભિખારી ખુશ હતો. તેણે તે સિક્કા પોતાના ખિસ્સામાં રાખ્યા અને ફરીથી ગટરમાં પડેલા સિક્કા શોધવા લાગ્યો.
રાજાને લાગ્યું કે ભિખારી બહુ ગરીબ છે. તેણે ફરીથી ભિખારીને બોલાવ્યો અને તેને ચાંદીના સિક્કા આપ્યા.
ભિખારીએ ચાંદીના સિક્કા રાખ્યા અને પછી તાંબાના સિક્કા શોધવા માટે નાળામાં ગયો.
રાજાએ તેને ફરીથી બોલાવ્યો અને હવે તેને સોનાનો સિક્કો આપ્યો.
ભિખારી આનંદમાં કૂદી પડ્યો અને પાછો દોડ્યો અને તે તાંબાના સિક્કા શોધવા માટે નાળામાં ગયો.
રાજાને ખૂબ દુઃખ થયું. તેને યાદ આવ્યું કે “આજે આપણે જે પ્રથમ વ્યક્તિને મળીશું તેને ખુશ અને સંતુષ્ટ બનાવવા માટે” તે સવારે તેણે પોતાને શું નક્કી કર્યું હતું.
તેણે ભિખારીને ફરીથી બોલાવ્યો અને કહ્યું કે હું તને 1000 સોનાના સિક્કા આપીશ. અત્યારે ખુશ અને સંતુષ્ટ રહો.
ભિખારીએ કહ્યું, “સરકાર! જ્યારે મને ગટરમાં પડેલા તાંબાના સિક્કા મળશે, ત્યારે જ હું ખુશ અને સંતુષ્ટ થઈશ.”
આપણી સ્થિતિ તે ભિખારી જેવી જ છે. ભગવાને આપણને એક અમૂલ્ય માનવીય ખજાના તરીકે શરીર આપ્યું છે અને એ ભૂલીને આપણે દુનિયાની ગટરોમાં તાંબાના સિક્કા શોધવામાં આપણું જીવન વેડફી નાખીએ છીએ. “જો આપણે આ અમૂલ્ય માનવ જીવનનો સારો ઉપયોગ કરીશું, તો આપણું જીવન ધન્ય બનશે.”

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एक व्यक्ति जो की अपने जीवन में काफी सफल हो चूका था और एक दिन अपनी माँ के पास गया और बोला “माँ आज कुछ भी मेरे पास है मै जिस सफलता के बुलंदियों को पा चूका हु वो सब आपके प्यार और ममता की ही देन है इसलिए माँ मै चाहता हु आपने जो प्यार दिया है मै उसका ऋण चुकता करना चाहता हु”

यह सुनकर माँ आश्चर्यचकित हो गयी और बोली “नही बेटा मुझे अपनी ममता और प्यार के बदले कुछ भी नही चाहिए ये तो मेरा फर्ज था जो की मै अपनी संतान के लिए किया”

लेकिन वह व्यक्ति बार बार जिद करने लगा नही माँ मै आपके प्यार और ममता के बदले कुछ देना चाहता हु माँ आप मांगों तो सही, तो बार बार जिद करने के बाद माँ बोली “ठीक है क्या तुम मेरे साथ जैसे बचपन में सोते थे वैसे सो सकते हो क्या” यह बात सुनकर वह व्यक्ति बोला बस इतनी सी बात है तो जरुर मै अपनी माँ के पास आज रात सोऊंगा

और जैसे ही रात में वह व्यक्ति अपने पास के सो गया माँ उठकर एक मग पानी ले आती है जहा अपने सोयी थी उस तरफ से पानी डाल देती है जिससे धीरे धीरे वह पानी उस व्यक्ति की तरफ भी चला गया और फिर नमी से वह व्यक्ति परेशानी महसूस करने लगा और दूसरी तरफ खिसक गया तो फिर माँ ने और पानी डाल दिया जिससे जिससे उधर भी नमी महसूस हुआ तो वह तुरंत उठ गया और अपनी माँ के हाथ में मग देखकर गुस्से से बोला “आप क्या कर रही हो माँ, मुझे सोने क्यू नही देती हो आप मुझे गीली बिस्तर पर भला कैसे सुला सकती हो”

तो वह माँ बोली “ बेटा जब तुम बचपन में मेरे साथ सोते थे तो ऐसे ही तुम भी बिस्तर गीली कर देते थे और फिर मै दूसरी तरफ तुम्हे करके खुद गीली स्थान पर सो जाती थी तुम तो मेरे प्यार और ममता का कर्ज चुकाना चाहते हो जो मैंने तुम्हारे लिए किया था क्या तुम मेरे लिए थोडा सा भी केवल एक रात के लिए गीले में सो नही सकते हो यदि तुम ऐसा कर सकते है तो मै समझ जाउंगी की तुमने मेरे ममता का कर्ज चूका दिया है”

माँ की बाते सुनकर अब उस व्यक्ति की आखे खुल गयी थी उसे अब समझ आ चूका था की जो माँ अपने न जाने कितने रातो को मेरे ख़ुशी के लिए ऐसे ही गुजार दिए है भला उस माँ का कर्ज कैसे चुकता किया जा सकता है अब वह किये पर शर्मिंदा था

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આંધળાનું ફાનસ*

એક ગામમાં એક અંધ વ્યક્તિ રહેતો હતો. છતાં તે જ્યારે રાત્રે બહાર જતો તો પોતાની સાથે એક સળગતી ફાનસ લઈને જતો હતો. એક રાત્રે તે જ્યારે ઘરે પાછો ફરી રહ્યો હતો તો તેને યુવાનોનું એક ટોળું મળ્યું. તેમણે જોયું કે, એ વ્યક્તિ અંધ હોવા છતાં તેની પાસે ફાનસ છે. તેઓ તેની મજાક ઉડાડવા લાગ્યા. તેમાંથી એકે પૂછ્યું કે, તું આંધળો છે છતાં ફાનસ લઈને કેમ જઈ રહ્યો છે?

આંધળાએ જવાબ આપ્યો,

હા, કમનસીબે હું જોઈ શકતો નથી, પરંતુ હું જે ફાનસ લઈને જઈ રહ્યો છું એ તમારા જેવા લોકો માટે છે. બની શકે છે કે, તમે આંધળા વ્યક્તિને આવતા જોઈ ન શકો અને મારી સાથે અથડાઈ જાઓ તો. યુવાનોએ શરમ અનુભવી અને પોતાના વ્યવહાર માટે માફી માગી.

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शुक्रिया चेतन विश्वकर्मा जी…

इस पोस्ट के प्रति ध्यानाकर्षण के लिए…

यह पोस्ट जैसे स्वयं मेरे लिए संकेत के रूप में यूनिवर्स ने डिजाइन की हो…?
कि प्रदीप…तुम भी रवि की तरह यूं करो…
तो कैसा हो…?
हालांकि स्टार्टर नहीं मिल रहा…
फ़िर भी फ़ाइनली हार की पूर्व संध्या तक मुझे जूझना होगा…

#प्रदीप_कुमार_पालीवाल_ईशू

#पी_बी_सी_क्रिएशन_भारत

(9761453660)

आइए पोस्ट देखें…

“रवि ने अपनी ऊनी मफलर को कसकर गले में लपेटा और जनवरी की ठंडी सुबह में बाहर निकल आया। पुरानी दिल्ली की गलियां धीरे-धीरे जाग रही थीं। ताज़ा चाय की खुशबू, गरमागरम पराठों की महक और मंदिर की घंटियों की धीमी आवाज़ चारों ओर बिखरी हुई थी। यह नए साल का पहला दिन था…
दिन जो अक्सर नई उम्मीदें लेकर आता है। लेकिन रवि के लिए यह बस एक और दिन था, भरा हुआ ज़िम्मेदारियों के बोझ से…

38 साल के रवि अपने करियर, परिवार और एक ऐसी विरासत के बीच फंसे हुए थे, जो कभी-कभी बोझ जैसी लगती थी। वह गुरुग्राम की एक कॉर्पोरेट कंपनी में मिड-लेवल मैनेजर थे…

नौकरी जो घर का खर्चा तो निकाल देती थी लेकिन हमेशा तनाव में रखती थी…
घर पर उनके दो छोटे बच्चे, एक बुजुर्ग मां, और पत्नी अनु उनकी परवाह में लगे रहते थे। अनु खुद एक नौकरी संभालती थीं और साथ ही घर की ज़िम्मेदारी भी.

इस सबके बीच था प्रेम प्रकाश पुस्तकालय, एक छोटा सा बुकस्टोर जिसे उनके दिवंगत पिता ने अपनी पूरी ज़िंदगी दी थी। यह दुकान कभी चांदनी चौक की एक खास जगह थी, जहां छात्र, कवि और साहित्य प्रेमी आते थे…

लेकिन समय बदल चुका था। अब लोग ई-बुक्स और ऑनलाइन शॉपिंग को प्राथमिकता देते हैं, और दुकान पर लोगों की आवाजाही लगभग बंद हो गई थी.

उस सुबह जब रवि ने दुकान का पुराना ताला खोला, तो अंदर से किताबों की जानी-पहचानी महक आई। यह महक सुकून देती थी, लेकिन साथ ही उसे यह भी याद दिलाती थी कि दुकान को ज़िंदा रखने का बोझ अब उसी के कंधों पर था…
उसने गहरी सांस ली और सोचा कि वह इसे कब तक संभाल पाएगा…?

जैसे ही रवि दुकान के काउंटर पर चाय का कप लेकर बैठा, दरवाजे पर लगी घंटी बजी। एक आदमी, जो करीब 35 साल का था, अंदर आया…
उसने एक सलीकेदार सूट पहना हुआ था। वह इधर-उधर देखने लगा, उसकी नज़रें उन रैक पर घूम रही थीं जहां हिंदी साहित्य और उर्दू शायरी सजी हुई थी.

“क्या आपके पास लीडरशिप या टाइम मैनेजमेंट पर किताबें हैं ?”
उसने शिष्ट लेकिन व्यस्त स्वर में पूछा…

रवि थोड़ा ठिठका। दुकान में साहित्य, कविता और अकादमिक किताबें थीं…
उसके पिता की पसंद की किताबें…!
but आधुनिक पेशेवरों के लिए कुछ भी नहीं था…
“मुझे खेद है, लेकिन हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है,”
उसने जवाब दिया…

आदमी ने सिर हिलाया और एक छोटी डायरी खरीदते हुए कहा, “यह जगह बड़ी खास है। अगर आप यहां ऐसी किताबें रखेंगे, जो प्रोफेशनल्स के काम आएं…लीडरशिप, प्रोडक्टिविटी, बायोग्राफी…तो शायद लोग ज्यादा आएंगे।”

वह चला गया, लेकिन उसकी बात रवि के मन में घर कर गई…

पूरा दिन गुजर गया, लेकिन रवि सोचता रहा कि शायद वह सही कह रहा था। दुनिया बदल चुकी थी, और शायद दुकान को भी बदलने की ज़रूरत थी…

अगले सप्ताहांत रवि ने कुछ करने का फैसला किया। वह दरियागंज के रविवार बुक मार्केट गया, लेकिन इस बार हिंदी साहित्य और कविताओं के लिए नहीं। उसने उन किताबों की तलाश शुरू की, जो आज के प्रोफेशनल्स को पसंद आएं। उसने मशहूर किताबें जैसे एटॉमिक हैबिट्स, डीप वर्क, लीन इन और वित्तीय योजना पर गाइड खरीदीं…

जब वह दुकान लौटा, तो उसने सबसे सामने वाली रैक को खाली किया और उसे “प्रोफेशनल्स के लिए…”
नाम देकर सजाया। उसने नई किताबों को प्लानर्स, जर्नल्स और स्टाइलिश डायरियों के साथ व्यवस्थित किया। पुरानी क्लासिक्स और कविताएं अपनी जगह पर रहीं, एक श्रद्धांजलि के रूप में, लेकिन नई रैक ने उसे भविष्य की ओर एक पुल जैसा महसूस कराया…

कुछ ही हफ्तों में, इस बदलाव का असर दिखने लगा। शनिवार की सुबह, एक युवा पिता अपनी बेटी के साथ आया। जब उसकी बेटी बच्चों की किताबों के सेक्शन में थी, उसने नई रैक से द 5 एएम क्लब उठाई…

“यही तो मुझे चाहिए,” उसने रवि से कहा। “काम और परिवार के बीच, मेरी लाइफ बहुत असंगठित हो गई है। शुक्रिया इसे रखने के लिए।”

एक और ग्राहक, जो सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था, ने कम्युनिकेशन स्किल्स पर किताब मांगी। रवि ने उसे हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल दी…डेल कार्नेगी जी की…

धीरे-धीरे, पास के ऑफिस के प्रोफेशनल्स ने लंच ब्रेक और वीकेंड पर आना शुरू कर दिया। कई लोग सिर्फ किताबों के लिए नहीं, बल्कि दुकान की अलग सी सुकूनभरी दुनिया के लिए आते थे…

दुकान धीरे-धीरे एक नई ऊर्जा से भरने लगी। रवि ने छोटे-छोटे इवेंट्स शुरू किए: वीकेंड पर लेखकों के साथ चर्चा, करियर ग्रोथ पर बातें, और कामकाजी माता-पिता के लिए जर्नलिंग वर्कशॉप्स।

घर पर भी बदलाव महसूस होने लगा। रवि ने किताबों से प्रेरित होकर रात में जर्नलिंग शुरू की, अपने दिन को बेहतर तरीके से प्लान करना सीखा। वह बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने लगा, होमवर्क में मदद करता, और पत्नी अनु के साथ शाम की चाय पीने के लिए वक्त निकालने लगा…

एक शाम, जब रवि दुकान बंद कर रहा था, उसकी पत्नी और बच्चे उसे सरप्राइज देने पहुंचे। उन्होंने दुकान के नए लुक को देखा। अनु ने नई रैक से लीन इन उठाई और मुस्कुराते हुए कहा, “तुमने इस जगह को बदल दिया है। तुम्हारे पापा को तुम पर गर्व होता।”

रवि ने चारों ओर देखा। क्लासिक्स, जो उसके पिता के दिल के करीब थीं, अभी भी अपनी जगह पर थीं। लेकिन नई रैक ने दुकान को एक आधुनिक ऊर्जा दी थी। यह अब सिर्फ एक बुकस्टोर नहीं था; यह एक ऐसा स्थान बन गया था, जहां लोग सीखते, सोचते और जुड़ते थे।

उस रात, जब वह अपने परिवार के साथ घर की ओर चल रहा था, तो पुरानी दिल्ली की गलियों की ठंडी हवा भी कम ठंडी महसूस हुई। रवि को एहसास हुआ कि उसने न केवल अपने पिता की विरासत को संभाला है, बल्कि उसे नए समय के अनुरूप ढाला भी है।

जिंदगी की चुनौतियां कभी आसान नहीं होतीं, लेकिन जब आप अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को संतुलन में लाना सीख जाते हैं, तो वह हर चुनौती के लायक बन जाती है।”

मूल लेखक/अनुवादक जी और व्हाट्सएप श्री जी का भी शुक्रिया…
फ़ोटो के लिए गूगल जी आपको ढ़ेरों प्यार…

शुभ…

#प्रदीप_इटावा_वाला

संभव है यह सब काल्पनिक हो…
लेकिन दिया तो जलता है…
कि आप जीना चाहते हैं तो आपको अतीत,वर्तमान और भविष्य के बीच सामंजस्य बैठाना होगा…

प्रतिक्रिया दीजिएगा…
#पी_बी_सी_क्रिएशन_भारत
के सहयोगी बनकर साहस भी दीजिएगा…
#पालीवाल_बुक_सेण्टर
#इटावा
(9761453660)

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પ્રશ્ન: કુંભ મેળો કેટલો જૂનો છે?

ઉ. ૮૮૦૦ વર્ષ જૂનો. અધિકૃત હિન્દુ ગ્રંથ ઇતિહાસ મુજબ !!!

*પ્રયાગ કુંભ મેળાનો યુગ ( ઈસા પૂર્વે ૩ ડિસેમ્બર ૬૭૭૭ )*

૬૭૭૭  પહેલા, પ્રાચીન ભારતીયો પાંચ વર્ષના યુગ કેલેન્ડરનું પાલન કરતા હતા. કેલેન્ડર વર્ષ માઘ શુક્લ પ્રતિપદાથી શરૂ થતું હતું અને પોષ અમાવસ્યા પર સમાપ્ત થતું હતું, જેમાં અષાઢ અને પોષ અઢી વર્ષના અંતરાલ સાથે આંતરકાલીન મહિના તરીકે સેવા આપતા હતા. યુગ કેલેન્ડર મૂળભૂત રીતે ચંદ્ર સૂર્ય હતું.

૨૨ ફેબ્રુઆરી ૬૭૭૮ બીસીના રોજ માયાસુર દ્વારા રચિત સૂર્ય સિદ્ધાંતે ૧૨ વર્ષના ગુરુ ચક્રની રજૂઆત કરીને પ્રાચીન ભારતીય ખગોળશાસ્ત્રમાં ક્રાંતિ લાવી, જે ગુરુ મેષ રાશિમાં હતો ત્યારે શરૂ થયું હતું.  પરંપરાગત પૈતમાહ સિદ્ધાંતે ૧૨ વર્ષના આ જોવિયન ચક્રને ૩ ડિસેમ્બર ૬૭૭૭ ઈ.પુ.ના રોજ શરૂ થતા ૬૦ વર્ષના ચક્ર સાથે અપનાવ્યું હતું, જ્યારે ગુરુએ વૃષભ રાશિમાં પ્રવેશ કર્યો હતો. યુગના સમયગાળાને પાંચ વર્ષથી ૧૨૦૦ વર્ષ (૧૨ x ૧૦૦) સુધી વધારવાથી કેલેન્ડર ગણતરીઓ અને ગ્રહોની ગતિની ચોકસાઈમાં નોંધપાત્ર વધારો થયો, જેનાથી પ્રથમ વખત ગ્રહોની ગણતરી ભારતીય ખગોળશાસ્ત્રનું અભિન્ન પાસું બન્યું. વધુમાં, ૭૩૨૨ ઈ.પૂ.ની આસપાસ શિયાળુ અયનકાળ અશ્વિની નક્ષત્રમાં સ્થળાંતરિત થતાં કૃતિકાદિ યાદીને બદલે અશ્વિન્યાદિ નક્ષત્રોની યાદી રજૂ કરવામાં આવી. આમ, ૬૭૭૭ બીસીઇનો યુગ પ્રાચીન ભારતીય ખગોળશાસ્ત્રના ઇતિહાસમાં એક મુખ્ય વળાંક રજૂ કરે છે.

યુગનો સમયગાળો પાંચ વર્ષથી ૧૨૦૦ વર્ષ સુધી લંબાવવા સાથે, ૬૭૭૭ બીસીઇના યુગથી વીતેલા ૧૦૦ વર્ષનો રેકોર્ડ જાળવવો જરૂરી બન્યો.  ૨૭૦૦ વર્ષનું સપ્તર્ષિ ચક્ર સ્થાપિત કરવામાં આવ્યું હતું, જેમાં દરેક ૧૦૦ વર્ષના સમયગાળાને એક નક્ષત્રના નામ પરથી નામ આપવામાં આવ્યું હતું, જે અશ્વિની નક્ષત્રથી શરૂ થયું હતું. આ નવીન અભિગમે ૬૭૭૭ ઈ.પૂ.ના યુગથી વીતેલા વર્ષોનો રેકોર્ડ હતો. ત્યારબાદ એવું અનુમાન કરવામાં આવ્યું હતું કે સપ્તર્ષિઓ દરેક નક્ષત્રમાં ૧૦૦ વર્ષ રહ્યા હતા. પુરાણો સર્વસંમતિથી સૂચવે છે કે યુધિષ્ઠિરના શાસનકાળ દરમિયાન સપ્તર્ષિઓ મઘ નક્ષત્રમાં સ્થિત હતા, જે સૂચવે છે કે ૬૭૭૭ ઈ.પૂ.થી મહાભારત યુગ સુધી ૩૬૦૦ વર્ષ વીતી ગયા હતા.

આમ, સપ્તર્ષિ કેલેન્ડરનો યુગ, ૩ ડિસેમ્બર ૬૭૭૭  પ્રાચીન ભારતના ઘટનાક્રમ સ્થાપિત કરવામાં મહત્વપૂર્ણ ભૂમિકા ભજવે છે. તે ૧૨ વર્ષ અને ૬૦ વર્ષના પ્રથમ ચક્રની શરૂઆત પણ દર્શાવે છે.  પ્રયાગનો મહાકુંભ મેળો પ્રથમ ૧૨ વર્ષના ચક્રના યુગ સાથે સુસંગત છે, ખાસ કરીને ૩ ડિસેમ્બર ૬૭૭૭ ના રોજ, જ્યારે ગુરુ વૃષભ રાશિમાં હતા ,અને સૂર્ય મકર રાશિમાં હતો. પ્રથમ કુંભ ૬૭૭૭ ઈ.પૂ.માં પ્રયાગમાં ઉજવવામાં આવ્યો હતો, અને ૧૪૪ વર્ષ (૧૨ x ૧૨-વર્ષ ચક્ર) નું મહાન ચક્ર પણ ૬૭૭૭ માં શરૂ થયું હતું. ૧૪૪ વર્ષ (૩૬૦૦ વર્ષ) ના પચીસ ચક્ર કળિયુગના પ્રારંભની આસપાસ પસાર થઈ ગયા હતા. એવું લાગે છે કે યુધિષ્ઠિર યુગ (૩૧૬૧ ઇ.પૂ.) માં ૧૨ વર્ષ અને ૧૪૪ વર્ષના ચક્ર ફરીથી ગોઠવવામાં આવ્યા હતા. ગુરુ વૃષભ રાશિમાં પ્રવેશ કર્યો ત્યારે પ્રથમ કુંભ ૩૧૫૯ ઈ.પૂ.માં ઉજવવામાં આવ્યો હતો.  ૩૧૫૯ ઈ.પૂ.થી શરૂ કરીને, ૨૦૨૫ સુધીમાં ૧૪૪ વર્ષના ૩૬ ચક્ર પૂરા થયા હતા. ૧૪૪ વર્ષના ૩૬મા ચક્રનું સમાપન ૧૩ જાન્યુઆરી ૨૦૨૫ ના રોજ થશે. આમ, પ્રયાગ ખાતે કુંભ મેળાની પરંપરા ૮૮૦૦ વર્ષથી વધુ જૂની છે.

જયતુ સનાતન સંસ્કૃતિ 🚩
#મહાકુંભ૨૦૨૫ #કુંભમેળા૨૦૨૫ #કુંભમેળા