श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक कि जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।
एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-
नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।
तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा।
इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-
1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।
2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।
ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि “शनै:चरति य: शनैश्चर:” अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।
सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का अकूत भंडार है🌹
Day: January 13, 2025
समय का सयोंग व राम जी की कृपा देखिये ..
यह नेपाल में 57 वर्ष पहले जारी किया गया श्रीराम सीता जी का डाक टिकट है।
18 अप्रैल 1967 की रामनवमी पर जारी हुए इस टिकट पर 2024 लिखा हुआ है,
दरअसल टिकट पर विक्रम संवत के अनुसार साल का जिक्र है,
1967 विक्रम संवत 2024 था।
संयोग ये है कि 2024 में ही श्रीराम जी की मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई।
जय श्री राम 🚩🚩🚩

उपवास क्या है?
उपवास की परिभाषा हर व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। आमतौर पर उपवास के दौरान व्यक्ति किसी निर्धारित समय के लिए किसी खास भोजन व पेय आदि का त्याग करता है। कभी-कभी व्यक्ति व्रत के दौरान पानी, फल या सिर्फ जूस ही लेते हैं और कभी दिनभर में कुछ भी नहीं लेते। व्रत की अवधि एक दिन, एक हफ्ते या इससे अधिक भी हो सकती है। जैसा कि हमने ऊपर बताया कि उपवास न सिर्फ श्रद्धा और भक्ति से जुड़ा होता है, बल्कि इसके स्वास्थ्य लाभ भी कई हैं, जिनके बारे में हम लेख में आगे विस्तार से बता रहे हैं।
उपवास क्या है, समझने के बाद उपवास रखने के फायदे और उपवास के प्रकार पर हम चर्चा करेंगे।
उपवास के प्रकार –
उपवास के प्रकार कई हैं। कुछ लोगों के लिए उपवास करने के फायदे का मतलब भगवान का आशीर्वाद और उनकी कृपा दृष्टि है। वैसे यह तो है ही, लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। उपवास के कुछ आम प्रकार इस तरह हैं।
- सुबह का उपवास – इस उपवास में सुबह का नाश्ता छोड़कर सिर्फ दो बार का खाना खाया जाता है।
- शाम का उपवास – इसमें रात को खाना नहीं खाया जाता है। पूरे दिन में दो बार खाना खाने के बाद शाम ढलने के बाद खाना नहीं खाते हैं।
- साप्ताहिक उपवास – कुछ लोग हर हफ्ते किसी एक विशेष दिन उपवास करते हैं। यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि उस उपवास के दौरान वो पानी पिए या फलाहार करे। बस इस दौरान नमक वाले खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता है।
- जूस या रस का उपवास – इस उपवास के दौरान व्यक्ति ठोस या भारी पदार्थों का सेवन नहीं करता। इसमें व्यक्ति सिर्फ फलों के रस ही पीता है।
- फलाहार उपवास – इसमें व्यक्ति सिर्फ फलों का सेवन करता है।
- निराहार उपवास – इस उपवास में व्यक्ति कुछ भी नहीं खाता। वो सिर्फ पानी पी सकता है। इसे पूर्णोपवास उपवास भी कहा जाता है।
- दूध का उपवास – इस उपवास के प्रकार में व्यक्ति सिर्फ दूध का सेवन करता है।
- निराहार-निर्जला उपवास – यह उपवास काफी कठिन होता है, क्योंकि इसमें न कुछ खाना होता है और न ही पीना।
- नैदानिक उपवास
अगर व्यक्ति मेडिकल टेस्ट कराने जाता है और उस टेस्ट में खाली पेट रहने की जरूरत हो, तो यह उपवास रखा जाता है। इसमें जब तक टेस्ट न हो जाए, तब तक व्यक्ति बिना कुछ खाए-पिए रहता है या व्यक्ति को जब तक खाने-पीने को न कहा जाए तब तक वो नहीं खाता। - इंटरमिटेंट फास्टिंग
यह उपवास आजकल काफी चलन में है। इसे वजन कम करने के लिए किया जाता है। इसमें खाने का वक्त या पैटर्न बदला जाता है। इसमें एक-दो दिन छोड़-छोड़कर उपवास कर सकते हैं या खाने की मात्रा को कम किया जा सकता है। इसके अलावा, सुबह आठ से पांच बजे के बीच लोग खाना खाते हैं। फिर सीधे अगले दिन सुबह आठ बजे खाना खाया जाता है। हां, पेय पदार्थ जैसे – जूस, कॉफी, चाय व पानी का सेवन कर सकते हैं - अन्य प्रकार – इनके अलावा भी उपवास के अन्य प्रकार हैं, जिसमें व्यक्ति शुगर या शुगर वाले खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करता। कुछ उपवास ऐसे होते हैं, जिसमें व्यक्ति उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों को लेना बंद कर देता है। कैसा उपवास करना है, यह पूरी तरह से व्यक्ति और उसके शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है।
अब लेख में आगे बढ़ते हुए जानते हैं कि उपवास करने के फायदे क्या हैं।
उपवास के फायदे –
उपवास करने के फायदे सिर्फ मन की सुख-शांति नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी है। नीचे हम उसी के बारे में जानकारी दे रहे हैं।
- शरीर को डिटॉक्सीफाई करे
उपवास के फायदे में शरीर को साफ करना शामिल है। रिसर्च पेपर के अनुसार, अगर ऐसा उपवास रखा जाए, जिसमें खाद्य पदार्थों के सेवन के बजाय तरल पदार्थ शामिल हों, तो शरीर सही तरह से डिटॉक्सीफाई हो सकता है। इससे पाचन बेहतर होने के साथ ही पेट संबंधी परेशानियां और त्वचा संबंधी समस्याएं कम हो सकती हैं । - वजन कम करे
आधे से ज्यादा लोगों की समस्या मोटापा है। ऐसे में वक्त रहते इस पर ध्यान न दिया गया, तो यह कई शारीरिक समस्याओं का कारण बन सकता है। वैसे वजन कम करने के लिए उपवास अच्छा तरीका हो सकता है। रिसर्च पेपर के अनुसार, इंटरमिटेंट फास्टिंग से बढ़ती चर्बी को कम करने में मदद मिल सकती है। इस उपवास में ठोस पदार्थों की जगह पेय पदार्थों का सेवन किया जाता है या फिर खाने का वक्त बदला जाता है। - पाचन तंत्र के लिए उपवास के फायदे
उपवास पाचन तंत्र के लिए भी लाभकारी हो सकता है। उपवास करने से शरीर के खुद का हीलिंग तंत्र सही से काम करता है, जिससे शरीर कई तरह की परेशानियों से खुद-ब-खुद लड़ना शुरू कर देता है। एक शोध के अनुसार, 62.33% लोगों को उपवास के दौरान अपच की समस्या नहीं हुई, 27% लोगों की अपच की परेशानी ठीक हो गई। साथ ही उपवास को “चमत्कारिक इलाज” भी कहा जाता है, जिससे पाचन संबंधी विकार दूर हो सकते हैं - त्वचा के लिए उपवास
कई बार सिर्फ क्रीम और कॉस्मेटिक का ही नहीं, बल्कि खान-पान का असर भी त्वचा पर होने लगता है। ज्यादा तेल-मसाले या बाहरी खाने से त्वचा बेजान दिखने लगती है और कील-मुंहासे हो सकते हैं। ऐसे में उपवास लाभकारी हो सकता है। हमने ऊपर पहले ही बताया है कि उपवास रखने से शरीर डिटॉक्सीफाई हो सकता है (2)। जब शरीर डिटॉक्सीफाई होगा, तो शरीर में मौजूद विषाक्त तत्व बाहर निकलेंगे, जिससे त्वचा में नई चमक आएगी और त्वचा खूबसूरत दिखने लगेगी। - ब्लड प्रेशर के लिए उपवास
उपवास उच्च रक्तचाप की समस्या से काफी हद तक राहत दिला सकता है। इसमें अनिरंतर उपवास
जिसमें आमतौर पर 16 घंटे का उपवास और 8 घंटे खाने की सलाह दी जाती है, काफी लाभकारी साबित हो सकता है। रिसर्च पेपर में लिखा है कि एक हफ्ते तक उपवास रखने से रक्तचाप कम हो सकता है। इस उपवास को सही तरीके से करने से उच्च रक्तचाप नियंत्रित रह सकता है । - कोलेस्ट्रॉल को कम करें
अनिरंतर उपवास से वजन कम करने में मदद मिल सकती है। इससे कोलेस्ट्रॉल का जोखिम भी कम हो सकता है (1)। एक रिसर्च पेपर में कहा गया है कि एक दिन के अंतराल के बाद किए जाने वाले उपवास से कोलेस्ट्रॉल कम हो सकता है। इससे ट्राइग्लरसाइड यानी एक प्रकार का वसा और खराब कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित हो सकता है (4)।
एक शोध में इस बात का भी जिक्र मिलता है कि रमजान के दौरान किए जाने वाले उपवास से प्लाज्मा लिपिड्स और लिपोप्रोटीन को कम करने में भी मदद मिल सकती है। इसका सकारात्मक असर कोलेस्ट्रॉल पर पड़ सकता है। इस अधार पर उपवास को कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक माना जा सकता है (5)।
- ब्लड शुगर कम करने के लिए उपवास
शरीर में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाने पर इससे पीड़ित लोगों को स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इससे छुटकारा पाने के लिए उपवास लाभकारी माना जा सकता है। एक शोध के मुताबिक, ब्लड शुगर से पीड़ित लोगों के लिए उपवास काफी कारगर साबित हो सकता है (6)। हालांकि, जिनका ब्लड शुगर अनियंत्रित है, वो डॉक्टर की परामर्श के बाद ही उपवास रखें। - इम्युनिटी बढ़ाने के लिए उपवास
किसी भी संक्रमण से लड़ने के लिए इम्यून सिस्टम मजबूत होना आवश्यक होता है। माना जाता है कि इम्युनिटी बढ़ाने के लिए उपवास बेहद लाभकारी हो सकता है। इस पर हुए एक शोध के मुताबिक, उपवास रखने से ऑटोफेगी यानी शरीर के सेल्स को साफ करने की क्षमता बेहतर हो सकती है। इससे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र व इम्युनिटी मजबूत हो सकती है, जिससे तमाम बिमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ सकती है । - लत छुड़वाने के लिए उपवास
उपवास का असर उन लोगों में भी देखा गया है, जिन्हें किसी चीज की बुरी लत पड़ जाती है। चाहे वो लत खाने की हो या फिर किसी अन्य पदार्थ की, उपवास से मदद मिल सकती है। एक शोध के मुताबिक, उपवास रखने से ब्रेन न्यूरो केमिस्ट्री में कुछ बदलाव हो सकता है, जिससे बार-बार किसी चीज का सेवन करने की इच्छा कम हो सकती है
(8)। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि उपवास किसी भी लत को छुड़वाने में उपयोगी हो सकता है। - मानसिक और भावनात्मक लाभ के लिए उपवास
उपवास का असर सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इससे एकाग्रता में सुधार हो सकता है। साथ ही ध्यान केंद्रित करने में मदद मिल सकती है। यहीं नहीं, चिंता-तनाव और अनिद्रा जैसी समस्या दूर करने के लिए भी उपवास को जाना जाता है। उपवास करने से व्यक्ति को भावनात्मक रूप से शांत रहने और खुशी का एहसास करने में मदद
मिल सकती है
(3)।
हम लेख के अगले भाग में उपवास में क्या खाना चाहिए, ये बताने जा रहे हैं।
उपवास में क्या खाना चाहिए –
उपवास में क्या खाना चाहिए, यह इस पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस प्रकार का उपवास कर रहा है। हम नीचे कुछ खाद्य पदार्थों के बारे में बता रहे हैं, जिसका सेवन उपवास में किया जा सकता है। इनसे शरीर को पर्याप्त पोषक तत्व मिल सकेंगे, जो शरीर को किसी भी तरह की कमजोरी के जोखिम से बचा सकते हैं।
रसदार फलों का सेवन करें
ड्राई फ्रूट्स खाएं
अगर नमक नहीं खा रहे हैं, तो हरी सब्जियों को बिना नमक के पकाकर खाएं
निर्जला उपवास नहीं रखा है, तो दूध को आहार में शामिल कर सकते हैं
अगर दूध नहीं पसंद, तो चाय या कॉफी का सेवन करें
फलों का जूस पिएं
नोट : ऊपर बताए गए खाद्य पदार्थ उपवास रखने वाले व्यक्ति के लिए विकल्प के रूप में हैं। उपवास के प्रकार के अनुसार इनमें बदलाव किया जा सकता है।
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उपवास रखने के फायदे और उपवास में क्या खाना चाहिए, जानने के बाद पढ़ें उपवास में परहेज।
उपवास में परहेज –
लेख के इस भाग में बताए गए परहेजों पर ध्यान दें और ज्यादा से ज्यादा उसका पालन करने की कोशिश करें, ताकि पूरी तरह से उपवास करने के फायदे मिल सकें।
एसिडिटी या गैस की समस्या है, तो खाली पेट चाय या कॉफी पीने से भी बचें ।
अगर पहली बार उपवास कर रहे हैं, तो छोटे या कम वक्त के उपवास से शुरुआत करें। बड़े या लंबी अवधी के उपवास से बचें।
उपवास से पहले सही और पौष्टिक भोजन करें, ताकि उपवास के दौरान कोई परेशानी न हो। बस एक बार में ज्यादा खाने से बचें।
उपवास के दौरान कठिन व्यायाम या ज्यादा देर तक व्यायाम करने से बचें, क्योंकि इस दौरान शरीर को एनर्जी की जरूरत होती है और व्यायाम करने से शरीर में ऊर्जा की कमी हो सकती है। इससे थकावट और कमजोरी भी महसूस हो सकती है।
अगर स्वास्थ्य संबंधी समस्या है या कोई दवा ले रहे हैं, तो उपवास न करें।
उपवास के बाद जाहिर सी बात है ज्यादा भूख लग सकती है। ऐसे में उपवास तोड़ते वक्त या उपवास खत्म होने के तुरंत बाद कुछ भारी आहार करने से बचें।
पढ़ते रहें
लेख के अगले भाग में हम उपवास के नुकसान की जानकारी देंगे।
उपवास के नुकसान –
उपवास सही तरीके से न किया जाए, तो उपवास के नुकसान भी हो सकते हैं, जिसके बारे में हम लेख के इस भाग में जानकारी दे रहे हैं।
अगर उपवास के दौरान सही पौष्टिक तत्व युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करते हैं, तो डिहाइड्रेशन, चक्कर व कमजोरी जैसी स्वास्थ्य समस्या हो सकती है।
अगर लंबी अवधि तक का उपवास करते हैं, तो एनीमिया भी हो सकता है
(9)।उपवास के बाद तुरंत भारी खाने से पेट संबंधी समस्या हो सकती है।
कुछ लोगों को भूखे रहने से चिड़चिड़ापन या गुस्सा आने की शिकायत हो सकती है।
ज्यादा देर भूखे रहने से सिरदर्द व शरीर में समस्या हो सकती है।
ऊपर उपवास रखने के फायदे जानने के बाद आपको इतना तो पता चल ही गया होगा कि इससे न सिर्फ मन को शांति मिलती है, बल्कि स्वास्थ्य भी सुधर सकता है। यहां हम एक बात साफ कर देना चाहते हैं कि उपवास अपनी सेहत के हिसाब से ही रखना चाहिए। कमजोर इंसान को लंबे समय तक के उपवास करने की सलाह नहीं दी जाती है। उपवास के दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी, जूस और फलों का सेवन करें, ताकि उपवास के नुकसान से बचा जा सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या उपवास करना सेहत के लिए अच्छा है?
हां, उपवास करना सेहत के लिए अच्छा माना जाता है। यह शरीर में सभी तरह के संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है। शरीर को डिटॉक्सीफाई करने का यह एक अच्छा तरीका है, जिसका सकारात्मक प्रभाव त्वचा पर भी नजर आता है
(2)। यही नहीं, मानसीक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहने में भी उपवास लाभकारी साबित हो सकता है
(3)।मुझे कब तक उपवास करना चाहिए?
आपको कब तक उपवास करना चाहिए, यह आपके शरीर और इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। ऐसे में आपको पहले निर्धारित करना होगा कि उपवास का मकसद क्या है। श्रद्धा के आधार पर उपवास रखना हो, तो हफ्ते में एक या दो दिन का उपवास जबतक आप चाहें, तबतक के लिए रख सकते हैं। मोटापा कम करने की इच्छा हो, तो अनिरंतर उपवास रोजाना किया जा सकता है। इसमें दिन के आठ घंटे पौष्टिक खाद्य पदार्थ खा सकते हैं और फिर बचे हुए 16 घंटे ठोस खाद्य पदार्थ नहीं खाया जाता है।
वजन कम करने के लिए मुझे कब तक उपवास करना चाहिए?
इंटरमिटेंट फास्टिंग
वजन कम करने में काफी मददगार साबित हो सकती है। इस फास्टिंग को व्यक्ति दो तरह से करते हैं। कुछ व्यक्ति 16 घंटे तो कुछ व्यक्ति 12 घंटे उपवास रखते हैं। ऐसे में जब तक वजन कम नहीं हो जाता है, तब तक इंटरमिटेंट फास्टिंग कर सकते हैं। अगर कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी है, तो यह उपवास करने से पहले विशेषज्ञ से परामर्श लें।
क्या रावण अंगद का पैर उठा सकता था…
राम की सेना में सुग्रीव के साथ वानर राज बालि और तारा का पुत्र अंगद भी था।। राम और रावण युद्ध के पूर्व भगवान श्रीराम ने अंगद को अपना दूत बनाकर लंका भेजा था।। लेकिन वहां पर रावण ने अंगद का अपमान किया।। अंगद ने तब अपनी शक्ति का परिचय देकर रावण को उपदेश दिया और पुन: राम के शिविर में लौट आए।।
अब सवाल यह उठता है कि अंगद में इतनी शक्ति कैसे आई की कोई भी असुर, राक्षस आदि उनका पैर हटाना तो दूर हिला भी नहीं पाए?
दरअसल, हनुमान, जामवंत और अंगद तीनों ही प्राण विद्या में पारंगत थे।। इस प्राण विद्या के बल पर ही वे जो चाहे कर सकते थे।। अंगद जब रावण की सभा में गए तो उन्होंने इसी प्राण विद्या के बल पर अपना शरीर बलिष्ठ और पैरों को इतना दृढ़ कर लिया था कि उसे हिलाना किसी के भी बस की बात नहीं थी।।यह प्राणा विद्या का ही कमाल था।।
श्रीराम द्वारा अंगद के पिता का वध करने बाद भी अंगद राम की सेना में कैसे?
अंगद के पिता बालि का प्रभु श्रीराम ने वध कर दिया था।
जब श्रीराम ने बालि को बाण मारा तो वह घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा था।। इस अवस्था में जब पुत्र अंगद उसके पास आया तब बालि ने उसे ज्ञान की मुख्यत: तीन बातें बताई थीं।।
पहली देश काल और परिस्थितियों को समझो।। दूसरी किसके साथ कब, कहां और कैसा व्यवहार करें, इसका सही निर्णय लेना चाहिए और तीसरी पसंद-नापसंद, सुख-दु:ख को सहन करना चाहिए और क्षमाभाव के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए।। बालि ने अपने पुत्र अंगद से ये बातें ध्यान रखते हुए कहा कि अब से तुम सुग्रीव के साथ रहो।।
अंगद को ही क्यों भेजा दूत बनाकर?
जब श्रीराम जी लंका पहुंच गए तब उन्होंने रावण के पास अपना दूत भेजने का विचार किया।। सभा में सभी ने प्रस्ताव किया कि हनुमानजी को ही दूत बनाकर भेजना चाहिए।। लेकिन राम जी ने यह कहा कि अगर रावण के पास फिर से हनुमान जी को भेजा गया तो यह संदेश जाएगा कि राम की सेना में अकेले हनुमान ही महावीर हैं।। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति को दूत बनाकर भेजा जाना चहिए जो हनुमान की तरह पराक्रमी और बुद्धिमान हो।। ऐसे में प्रभु श्री राम की नजर अंगद पर जा टिकी।। अंगद ने भी प्रभु श्री राम के द्वारा सौंपे गए उत्तरदायित्व को बखूबी संभाला।।
रावण की सभा में अंगद :
युद्ध करने के पूर्व प्रभु श्रीराम ने अंगद को रावण की सभा में अपना दूत बनाकर सुलह करने के लिए भेजा था।। प्रभु श्रीराम ने अंगद से कहा कि हे अंगद! रावण के द्वार जाओ।। कुछ सुलह हो जाए, उनके और हमारे विचारों में एकता आ जाए, जाओ तुम उनको शिक्षा दो।।
जब अंगद रावण की सभा में पहुंचे तो वहां नाना प्रकार के योद्धा भी विराजमान थे, रावण और उनके सभी पुत्र विराजमान थे।। रावण ने कहा कि आओ! तुम्हारा आगमन कैसे हुआ? अंगद ने कहा कि प्रभु मैं इसलिए आया हूं कि राम और तुम्हारे दोनों के विचारों में एकता आ जाए।। तुम्हारे यहां संस्कृति के प्रसार में अभाव आ गया है, अब मैं उस अभाव को शांत करने आया हूं।। चरित्र की स्थापना करना राजा का कर्त्तव्य होता है, तुम्हारे राष्ट्र में चरित्र हीनता आ गई है, तुम्हारा राष्ट्र उत्तम प्रतीत नहीं हो रहा है इसलिए मैं आज यहां आया हूं।। रावण ने कहा कि यह तो तुम्हारा विचार यथार्थ है परन्तु मेरे यहां क्या सूक्ष्मता है?
अब अंगद बोले तुम्हारे यहां चरित्र की सूक्ष्मता है।। राजा के राष्ट्र में जब चरित्र नहीं होता तो संस्कृति का विनाश हो जाता है।।संस्कृति का विनाश नहीं होना चाहिए, संस्कृति का उत्थान करना है।। संस्कृति यही कहती है कि मानव के आचार व्यव्हार को सुन्दर बनाया जाए, महत्ता में लाया जाए, एक दूसरे की पुत्री की रक्षा होनी चाहिए।। वह राजा के राष्ट्र की पद्धति कहलाती है।।
रावण ने पूछा क्या मेरे राष्ट्र में विज्ञान नहीं? अंगद बोले कि हे रावण! तुम्हारे राष्ट्र में विज्ञान है परन्तु विज्ञान का क्या बनता है? एक मंगल की यात्रा कर रहा है परन्तु मंगल की यात्रा का क्या बनेगा, जब तुम्हारे राष्ट्र में अग्निकांड हो रहे हैं।। हे रावण! तुम सूर्य मंडल की यात्रा कर रहे हो, उस सूर्य की यात्रा करने से क्या बनेगा, जब तुम्हारे राष्ट्र में एक कन्या का जीवन सुरक्षित नहीं।। तुम्हारे राष्ट्र का क्या बनेगा?
रावण ने कहा कि यह तुम क्या उच्चारण कर रहे हो, तुम अपने पिता की परंपरा शांत कर गए हो।। अंगद ने कहा कदापि नहीं, में इसलिए आया हूं कि तुम्हारे राष्ट्र और अयोध्या दोनों का समन्वय हो जाए।। इस पर रावण मौन हो गया।। नरायान्तक बोले कि भगवन! इसको विचारा जाए, यह दूत है, यह क्या कहता है? अंगद बोले दिया रावण! राम से तुम अपने विचारों का समन्वय कर लोगे तो राम माता सीता को लेकर चले जाएंगे।।
रावण ने कहा कि यह क्या उच्चारण कर रहा है? मैं धृष्ट नहीं हूं।। अंगद बोले यही धृष्टता है संसार में, किसी दूसरे की कन्या को हरण करके लाना एक महान धृष्टता है।। तुम्हारी यह धृष्टता है कि राजा होकर भी परस्त्रीगामी बन गए हो।। जो राजा किसी स्त्री का अपमान करता है उस राजा के राष्ट्र में अग्निकाण्ड हो जाते हैं।।
तब अंगद ने अपना पैर जमा दिया।।
रावण ने कहा कि यह कटु उच्चारण कर रहा है।। अंगद ने कहा कि मैं तुम्हें प्राण की एक क्रिया निश्चित कर रहा हूं, यदि चरित्र की उज्ज्वलता है तो मेरा यह पग है।। इस पग को यदि कोई एक क्षण भी अपने स्थान से दूर कर देगा तो मैं उस समय में माता सीता को त्याग करके राम को अयोध्या ले जाऊंगा।। अंगद ने प्रण की क्रिया की और उनका शरीर विशाल एवं बलिष्ठ बन गया।। तब उन्होंने भूमि पर अपना पैर स्थिर कर दिया।।
राजसभा में कोई ऐसा बलिष्ठ नहीं था जो उसके पग को एक क्षण भर भी अपनी स्थिति से दूर कर सके।। अंगद का पग जब एक क्षण भर दूर नहीं हुआ तो रावण उस समय स्वतः चला परन्तु रावण के आते ही उन्होंने कहा कि यह अधिराज है, अधिराजों से पग उठवाना सुन्दर नहीं है।। उन्होंने अपने पग को अपनी स्थली में नियुक्त कर दिया और कहा कि हे रावण! तुम्हें मेरे चरणों को स्पर्श करना निरर्थक है।। यदि तुम राम के चरणों को स्पर्श करो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है।। रावण मौन होकर अपने स्थल पर विराजमान हो गया।।
सरल भाषा में अंत में रावण जब खुद अंगद के पांव उठाने आया तो अंगद ने कहा कि मेरे पांव क्यों पकड़ते हो पकड़ना है तो मेरे स्वामी राम के चरण पकड़ लो वह दयालु और शरणागतवत्सल हैं।।उनकी शरण में जाओ तो प्राण बच जाएंगे अन्यथा युद्घ में बंधु-बांधवों समेत मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।। यह सुनकर रावण ने अपनी इज्जत बचाने में ही अपनी भलाई समझी।।
दिन की आखिरी ट्रेन अगर स्टेशन से निकल गई तो फिर कल सुबह ही अगली ट्रेन मिलने की कल्पना किए एक बूढ़ी महिला के पैर तेजी से स्टेशन की तरफ बढ़े जा रहे थे किंतु स्टेशन पहुंचते पहुंचते आखिर ट्रेन छूट ही गई तो महिला निढ़ाल होकर एक बेंच पर बैठ गई,,उनके चेहरे पर चिंता के भाव थे,,
एक कुली ने इसे देखा और माँ से पूछा।
- माईजी, आपको कहाँ जाना था?
- मैं अपने बेटे के पास दिल्ली जाऊंगी….
- पर आज कोई ट्रेन नहीं माई अब कल सुबह मिलेगी।।
महिला बेबस लग रही थी तो कुली ने कहा,,,, माई अगर आपका घर दूर हो तो यहीं प्रतीक्षालय में आपके लेटने का प्रबंध कर दूं और भोजन भी आपको पहुंच जाएगा,कोई दिक्कत की बात नहीं है,,,,,,,,
वैसे दिल्ली में आपका बेटा क्या काम करता है???
माँ ने जवाब दिया कि मेरा बेटा रेल महकमे में काम करता है।
माई आप जरा बेटे का नाम बताइए,, देखूंगा अगर संपर्क संभव होगा तो तार (प्राचीन भारत का टेलीफोनिक सिस्टम) से आपकी बात करवा दूंगा,,,,, कुली ने कहा,,,
- वह मेरा लाल है, मैं उसे लाल ही बुलाती हूं मगर
उसको सब लाल बहादुर शास्त्री कहते हैं !
(माँ ने जवाब दिया)
वृद्ध महिला के मुंह से उनके बेटे का नाम सुनकर कुली के पैरों तले जमीन खिसक गई वो आवाक रह गया,,भागकर स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुंचा और एक ही सांस में पूरी बात कह सुनाया।
स्टेशन मास्टर तुरंत हरकत में आए कुछ लोगों से आनन फानन तार से बात की और अपने मातहतों के साथ भागकर बूढ़ी महिला के पास पहुंच गए,,,,,,,,
महिला को सादर प्रणाम कर स्टेशन मास्टर ने पूछा,,,,,, मां जी आपके बेटे ने कभी आपको बताया नहीं की वो रेल महकमे में क्या काम करते हैं????
बताया था ना मुझे,,,बोला था की अम्मा मैं रेलवे के दिल्ली दफ्तर में छोटा सा मुलाजिम हूं!!
मां जी,,आपकी शिक्षा व संस्कारों ने आपके बेटे को बहुत बड़ा व महान बना दिया है,, जानना नही चाहेंगी की आपके बेटे जी रेल महकमे में कौन सा काम करते हैं??? स्टेशन मास्टर की बात सुनके महिला के चेहरे पर विस्मय के भाव थे……
मां जी,,,इस पूरे भारत में जितनी ट्रेन चलती है और जितने मेरे जैसे लाखों रेलवे के मुलाजिम हैं उन सबके वो मुखिया और अगुआ हैं,,वो भारत के माननीय रेल मंत्री हैं।।
स्टेशन मास्टर व वृद्ध महिला के बीच चल रहे वार्तालाप के बीच ही स्टेशन का माहौल पूरी तरह बदल चुका था,,,सायरन की हुंकार के साथ जिले के पुलिस कप्तान जिला कलेक्टर सहित रेलवे पुलिस बल के जवान व अधिकारी स्टेशन पर पहुंच चुके थे एंबेसडर कार भी आ चुकी थी।। वृद्ध मां को सलामी देते हुए उनको पूरे सम्मान के साथ रेलवे के सुरक्षा गार्डों के सुपुर्द कर शास्त्री जी के पास दिल्ली रवाना कर दिया गया।। बनारस के छोटे से स्टेशन पर चल रहे इस बड़े घटनाक्रम से दिल्ली दरबार में बैठा वो “छोटे कद का बड़ा आदमी” पूरी तरह अनजान था……..
ऐसे थे भारत मां के सच्चे सपूत श्री लाल बहादुर शास्त्री जी❣️
साहित्यिक पत्रिका से प्राप्त प्रेरक प्रसंग का आवर्धित संस्करण!
પુરુષ ની પાસે રૂપિયા હોય તો સ્ત્રી નગ્ન થઈ જાય અને પુરુષ પાસે જો રૂપિયા ના હોય તો પુરુષ નગ્ન થઈ જાય …
આજે એક વ્યક્તિ એ મને આપવીતી બતાવી તે તમારી સમક્ષ રાખું છું
એને કહેવા ની ચાલુ કર્યું …
જયારે મારા લગ્ન નક્કી થયા તો મને થયું કે મારી પત્ની ની સુંદરતા જોઈ ને થયું કે ઈશ્ર્વરે મારા માટે જ બનાવી છે અમારી બોન્ડિગ એટલી સારી થઈ ગઈ અમે ઘરેલુ વાતચીત ની સાથે સાથે અંગત વાતો ની પણ ચર્ચા કરવા લાગ્યા મને લાગ્યું કે મારી શાદી જલ્દી થી જલ્દી મારી હોવા વાળી પત્ની સાથે થાય તો મારું નવું જીવન સરૂ કરું …
મારી પત્ની મને હંમેશા મને કેહતી કે હું તમારા કરતાં તમારા માતા પિતા ને પ્રેમ કરું છું આ સાંભળી ને મને લાગ્યું કે મારું જીવન સીધી દિશા માં જાય છે મને થયું કે આવી પત્ની મળી ને મારું જીવન ધન્ય થઈ જશે જે મારા માતા પિતા નું સમ્માન કરસે અને મને પણ પ્રેમ કરસે અને અમારા રિશ્તા માં ગેહરાઈ રહેશે…લગન થઇ ગયું અને શરૂવાત ના દિવસ માં બહુ જ મજા ના હતા ,મને મારી પત્ની થી એટલો પ્રેમ થઈ ગયો કે હું તેનો પડતો બોલ ઝીલી લેતો હતો અને તેની દરેક ઈચ્છા પૂરી કરવા ની કોશિશ કરતો ,પણ ધીરે ધીરે જવાબદારી વધતી ગઈ ….
મે એક દિવસ મારી પત્ની ને કીધું હવે આપડે થોડી બચત કરવી પડશે ,જેથી આપડું ભવિષ્ય સારું થાય ,આ સાંભળી મારી પત્ની નારાજ થઈ ને કહે ,હવે સુ બચત કરવી છે ? હું તો પેહલા થી જ મારી બધી ઈચ્છા દબાવી ને બેઠી છું …
એની આ વાત સાંભળી ને હું વિચારવા મજબૂર થઈ ગયો ,મે એને પૂછ્યું આમ કેમ બોલે છે? આખરે તને સુ વાત ની કમી છે ? તો એ કહે મારે મોટી ગાડી જોઈએ એને વર્ષ માં ચાર પાચ વખત ફરવા જવા જોઈએ ,મારે ઘર ની સજાવટ કરવી છે અને મોંઘો મેક અપ જોઈએ …
મે પેહલા થી જ કીધું તું પેહલા થી જ 3000 ની લિપસ્ટિક અને 5000 નો પાવડર વાપરે છે હજી કેટલો મોંઘો જોઈએ ? તો એ કહે હું કશું માંગતી નથી અને જ્યારે માંગુ છું ત્યારે તમારા થી પૂરું તો થતું નથી …
આ સાંભળી ને મને મારી જાત પર અફસોસ થયો , એટલે એના ખર્ચા પૂરા કરવા મે એના માટે અલગ કામ કરવા લાગ્યો . ..
એક દિવસ જ્યારે એનો જન્મ દિવસ આવ્યો તો એને 12000 નો ડ્રેસ પસંદ કર્યો ,મે મજાક માં કીધું આ વખતે પગાર થોડો લેટ મળવા નો છે તો આગલા મહિને લઇ લેજે ..આ સાંભળી ગુસ્સે થઈ ગઈ એને મારી સાથે વાત કરવા ની બંધ કરી દીધી તો મે મજાક કરું છું એમ કરો ને મે એને પાર્ટી અને ડ્રેસ માટે 22000 રૂપિયા આપ્યા ,રૂપિયા મળતા જ એનો ગુસ્સો ગાયબ થઈ ગયો અને એને મારા થી માફી માંગી, પણ આવા વ્યહવાર થી હું અંદર થી તૂટી ગયો …
ધીરે ધીરે મને એહસાસ થયો કે મને નહિ મારા રૂપિયા ને પ્રેમ કરે છે , તેના ખર્ચા વધતા ગયા ઘર ના કામકાજ માં ધ્યાન ના આપે અને મારા માતા પિતાની પણ કદર ના કરે એમને માનસિક ત્રાસ વધતો ગયો તો મે નિર્ણય કર્યો કે હું હવે માતા પિતા ને લઇ ને ગામડે જતો રહીશ ,મે મારી પત્ની ને પૂછ્યું તું અમારી સાથે આવીશ તો એને ના પાડી દીધી ,હું એને ત્યાં જ મૂકી ને ગામડે આવી ગયો અને ત્યાં થી દર મહિને ખર્ચા ના રૂપિયા મોકલવા નું ચાલુ રાખ્યું ….
ચાર મહિના પછી મે રૂપિયા મોકલવા નું બંધ કરી દીધું તો એનો અસલી ચેહરો સામે આવ્યો ,એને મારા ઉપર કેસ કરી દિધો અને આરોપ લગાવ્યો કે હું તેને શારીરિક સુખ નથી આપી શકતો એટલે મારે છૂટા છેડા જોઈએ છીએ અને દર મહિને ગુજારો ભત્તું ની માંગણી કરી…
કોર્ટ માં મે મારો પક્ષ રાખ્યો તો ખબર પડી કે કાયદા બધા મહિલા તરફી જ વધારે છે અને કોર્ટ એ મને 40000 રૂપિયા દર મહિને આપવા નો હુકમ કર્યો અને હું દર મહિને 40000 રૂપિયા આપુ છું અને મારા માતા પિતા સાથે ગામડે રહુ છું …
આ અનુભવ પછી મને એહસાસ થઈ ગયો કે માતા પિતા જ નિસ્વાર્થ પ્રેમ કરે છે ,એમનો પ્યાર જ બિન શરતી હોય છે …
જો આ યુગ માં કોઈ ને જીવન શાથી સારો મળી જાય તો મોટી ગિફ્ટ કેહવાય ,પણ આજે લગન માટે પાત્ર સોધતી વખત ખાલી સુંદરતા પર જ ધ્યાન નથી આપો , સાદગી,જવાબદારી નિભાવે અને ત્યાગ અને બલિદાન કરે તેવું પાત્ર શોધજો
આ વાર્તા પર થી તમારુ સુ કેહવુ છે?
संगठन का महत्व
एक आदमी था जो हमेशा अपने संगठन (ग्रुप) में सक्रिय रहता था । उसको सभी जानते थे , बड़ा मान सम्मान मिलता था, अचानक किसी कारण वश वह निष्क्रिय रहने लगा मिलना-जुलना बंद कर दिया और संगठन से दूर हो गया।
कुछ सप्ताह पश्चात् एक बहुत ही ठंडी रात में उस संगठन के मुखिया ने उससे मिलने का फैसला किया ।
मुखिया उस आदमी के घर गया और पाया कि आदमी घर पर अकेला ही था। एक सिगड़ी / बोरसी (अलाव) में जलती हुई लकड़ियों की लौ के सामने बैठा आराम से आग ताप रहा था।
उस आदमी ने आगंतुक मुखिया का बड़ी खामोशी से स्वागत किया।
दोनों चुपचाप बैठे रहे। केवल आग की लपटों को ऊपर तक उठते हुए ही देखते रहे।
कुछ देर के बाद मुखिया ने बिना कुछ बोले उन अंगारों में से एक लकड़ी जिसमें लौ उठ रही थी (जल रही थी) उसे उठाकर किनारे पर रख दिया।
और फिर से शांत बैठ गया।
मेजबान हर चीज़ पर ध्यान दे रहा था। लंबे समय से
अकेला होने के कारण मन ही मन आनंदित भी हो रहा था कि वह आज अपने संगठन के मुखिया के साथ है।
लेकिन उसने देखा कि अलग की हुई लकड़ी की आग की लौ धीरे धीरे कम हो रही है। कुछ देर में आग बिल्कुल बुझ गई। उसमें कोई ताप नहीं बचा।
उस लकड़ी से आग की चमक जल्द ही बाहर निकल गई।
कुछ समय पूर्व जो उस लकड़ी में उज्ज्वल प्रकाश था और आग की तपन थी वह अब एक काले और मृत टुकड़े से ज्यादा कुछ शेष न था।
इस बीच.. दोनों मित्रों ने एक दूसरे का बहुत ही संक्षिप्त अभिवादन किया कम से कम शब्द बोले।
जाने से पहले मुखिया ने
अलग की हुई बेकार लकड़ी को उठाया और फिर से आग के बीच में रख दिया।
वह लकड़ी फिर से सुलग कर लौ बनकर जलने लगी और चारों ओर रोशनी तथा ताप बिखेरने लगी।
जब आदमी मुखिया को छोड़ने के लिए दरवाजे तक पहुंचा तो उसने मुखिया से कहा मेरे घर आकर मुलाकात करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
आज आपने बिना कुछ बात किए ही एक सुंदर पाठ पढ़ाया है कि अकेले व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता संगठन का साथ मिलने पर ही वह चमकता है और रोशनी बिखेरता है संगठन से अलग होते ही वह लकड़ी की भाँति बुझ जाता है।
मित्रों संगठन या एक दुसरे के साथ से ही हमारी पहचान बनती है इसलिए संगठन हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिए ।
संगठन के प्रति हमारी निष्ठा और समर्पण किसी व्यक्ति के लिए नहीं उससे जुड़े विचार के प्रति होनी चाहिए।
संगठन किसी भी प्रकार का हो सकता है जैसे- पारिवारिक सामाजिक व्यापारिक सेवा संस्थान आदि।
संगठन के बिना मानव-जीवन अधूरा है ।अतः हर क्षेत्र में जहाँ भी रहें संगठित रहें !अतः हमारा संगठन बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
कर्म का फल
एक नयासर गांव था ! वह ऐसी जगह बसा था… जहाँ आने जाने के लिए एक मात्र साधन नाव थी ,क्योंकि बीच में नदी पड़ती थी और कोई रास्ता भी नहीं था.।
एक बार उस गाँव में महामारी फैल गई और बहुत सी मौते हो गयी,लगभग सभी लोग वहाँ से जा चुके थे।
अब कुछ ही गिने चुने लोग बचें थे और वो नाविक गाँव में बोल कर आ गया था कि मैं इसके बाद नहीं आऊँगा जिसको चलना है वो आ जाये।
सबसे पहले एक भिखारी आ गया और बोला मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है,मुझे अपने साथ ले चलो, ईश्वर आपका भला करेगा !
नाविक सज्जन पुरुष था। उसने कहा कि यही रुको यदि जगह बचेगी तो तुम्हें मैं ले जाऊँगा।
धीरे -धीरे करके पूरी नाव भर गई सिर्फ एक ही जगह बची !
नाविक भिखारी को बोलने ही वाला था कि एक आवाज आयी रुको मैं भी आ रहा हूँ ….।।
यह आवाज जमीदार मोती सिंह की थी,जिसका धन-दौलत से लोभ और मोह देख कर उसका परिवार भी उसे छोड़कर जा चुका था।
अब सवाल यह था कि किसे लिया जाए,
जमीदार ने नाविक से कहा – मेरे पास सोना चांदी है ,मैं तुम्हें दे दूँगा और भिखारी ने हाथ जोड़कर कहा कि भगवान के लिए मुझे ले चलो।।
नाविक समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ तो उसने फैसला नाव में बैठे सभी लोगों पर छोड़ दिया और वो सब आपस में चर्चा करने लगे।
इधर जमीदार सबको अपने धन का प्रलोभन देता रहा और उसने उस भिखारी को बोला ये सबकुछ तू ले ले, मैं तेरे हाथ पैर जोड़ता हूँ ,मुझे जाने दे !
तो भिखारी ने कहा:- मुझे भी अपनी जान बहुत प्यारी है अगर मेरी जिंदगी ही नहीं रहेगी तो मैं इस धन दौलत का क्या करूँगा? जीवन है तो जहान है !
तो सभी ने मिलकर ये फैसला किया कि ये जमीदार ने आज तक हमसे लुटा ही है ब्याज पर ब्याज लगाकर हमारी जमीन अपने नाम कर ली और माना की ये भिखारी हमसे हमेशा माँगता रहा पर उसके बदले में इसने हमें खूब दुआएं दी और इस तरह भिखारी को साथ में ले लिया गया !
बस यही फैसला है ईश्वर भी वही हमारे साथ न्याय करता है,जब अंत समय आता हैं , वो सारे कर्मों का लेखा- जोखा हमारे सामने रख देता हैं और फैसले उसी हिसाब से होते हैं , फिर रोना गिड़गिगिड़ाना काम नहीं आता !
शुभ कर्म ही साथ होते है।
इसलिए अभी भी वक्त है- हमारे पास सम्भलने का और शुभ कर्म करने का , बाद में कुछ नहीं होगा।
शायद इसलिए कहा गया है.. अब पछताय होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत।
नजरिया
राजस्थान के एक सरकारी ऑफिस में किरन नाम एक महिला कार्य करती थी। उसे अपने द्वारा किये हुए कार्य के अलावा किसी का कार्य पसंद नहीं आता था। वह ऑफिस के हर सहकर्मी में और उनके द्वारा किये कार्य में कोई न कोई कमी निकाल ही लेती थी।
एक दिन जब किरन अपने ऑफिस में अपना कार्य कर रही थी तो अचानक उसने देखा कि उसकी ऑफिस बिल्डिंग के ठीक सामने वाली बिल्डिंग में एक महिला कपड़े सुखा रही है।
उसको देखते ही किरन ने अपने पास बैठे सहकर्मी से कहा, “देखो तो! यह महिला कितने गंदे कपड़े धोती है। और इसका घर तो देखो, वह भी कितना गन्दा है। और तो और जो कपड़े वह पहने हुए है वह भी कितने गंदे हैं।”
किरन के पास बैठे सहकर्मी ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलायी और अपना कार्य करने लगा।अब तो रोज जब भी वह महिला अपने बिल्डिंग की बॉलकनी में कपड़े सुखाने आती थी तो किरन रोज उसमे कोई न कोई कमी निकालती और उसको और उसके आसपास की चीजों को गन्दा कहती। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा।
एक दिन जब किरन अपने ऑफिस में बैठी उस महिला को देख रही थी कि तभी ऑफिस का बॉस किरन के केबिन में आ गया।
किरन को बॉस के आने का पता भी नहीं लगा क्योंकि वह उस महिला को बहुत ध्यान से देख रही थी और उसमे बुराइयाँ निकाले जा रही थी।
यह सभी देख बॉस ने उसे टोका, “किरन! आप कहाँ देख रही हैं? क्या आपका मन अपने कार्य में नहीं लग रहा?”
बॉस की आवाज सुनकर और उसे पास खड़ा देखकर किरन अचानक चौंक गयी और अपनी सीट से उठकर बोली, “कुछ नहीं सर! बस मैं तो उस सामने वाली बिल्डिंग की उस महिला को देख रही हूँ जो रोज गंदे कपडे सुखाने अपनी बालकनी में आ जाती है।”
बॉस ने भी उस महिला, उसकी बिल्डिंग और उसके कपड़ों पर नजर डाली।
तभी किरन फिर बोली, “देखो तो सर! अपने काम के प्रति कितने लापरवाह लोग होते हैं। वह महिला जो भी कपड़े धोकर सुखाती है वह गंदे ही होते हैं। उसके पहने हुए कपड़े भी कितने गंदे हैं और उसकी बिल्डिंग ऐसी की बरसों से उसकी धूल साफ ही नहीं की गयी है।”
बॉस उस महिला को कुछ ध्यान से देखने लगे और मुस्कुराने लगे। किरन को यह कुछ अजीब लगा।
उससे न रहा गया और अपने बॉस से पूछा, “सर आप इस महिला को देखकर मुस्कुरा रहे हैं? मेरी तो आज तक यह समझ नहीं आया कि यह महिला इतनी गन्दी कैसे रह लेती है?”
किरन के पूछने पर बॉस मुस्कुराते हुए बोले, “आपके इन प्रश्नों का उत्तर मैं कल दूंगा। कल जब आप इस महिला को कपड़े सुखाते हुए देखें तो मुझे बुला लेना।”
इतना कहकर बॉस चले गए। किरन अब भी सोच रही थी कि बॉस आखिर मुस्कुरा क्यों रहे थे।अगला दिन आया। रोज की तरह किरन अपने ऑफिस में काम करने लगी। अब जैसे ही वह महिला कपड़े सुखाने अपनी बॉलकनी में आयी तो किरन की नजर उस पर पड़ी।
अरे यह क्या?” किरन अचानक बहुत चौंक गयी।
“यह महिला तो आज कितने साफ़ कपड़े सुखा रही है।”
तभी किरन की नजर उस महिला के पहने कपड़ों और उसकी बिल्डिंग पर गयी।
किरन के मुँह से अचानक ही निकला, “अरे! आज तो यह कितने साफ़ कपड़े पहने हुए है और उसकी बिल्डिंग भी आज कितनी साफ़ नजर आ रही है जैसे कल रात ही पेंट कराया गया हो।”
उसने तुरंत अपने बॉस को बुलाया और सभी बातें बताते हुए आश्चर्यचकित होकर पूछने लगी, “सर आप आज मेरे प्रश्न का उत्तर देने वाले थे। लेकिन सर आज तो सब कुछ साफ़ हो गया है। आखिर यह कैसे हुआ होगा?”
बॉस मुस्कुराये और बोले, “यह महिला रोज साफ कपड़े ही सुखाती है। इसके पहने कपड़े भी कभी गंदे नहीं होते। और तो और इसकी बिल्डिंग पर भी पेंट बहुत दिनों से नया ही है। बस कल शाम आपके जाने के बाद सामने का शीशा जिससे आप उसको देखती हैं, उस पर बहुत धूल लगी थी और अब उसे अच्छे से मैंने साफ करा दिया है।”
यह बात सुनकर किरन भी मुस्कुराने लगी और उसे अपनी भूल का एहसास हुआ।
दोस्तों! हो सकता है इस प्रेरक कहानी का मजेदार अंत पढ़कर आपके चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गयी हो लेकिन यह कहानी हमें बहुत कुछ सिखा देती है।
यह दुनिया, इस दुनिया के सभी लोग और इस दुनिया की सभी बस्तुएं हमें वैसी ही दिखाई देती हैं जैसे दृष्टिकोण से हम उनको देखते हैं।
अर्थात आप जिस रंग का चश्मा पहने होंगे, यह दुनिया भी आपको उसी रंग की दिखाई देगी।
यदि आप धूल लगे हुए चश्मे से देखेंगे तो यह दुनिया आपको गन्दी ही नजर आएगी।
बहुत से लोग इतने नकारात्मक दृष्टिकोण के होते हैं कि उन्हें दुनिया के हर इंसान और बस्तु में कोई न कोई कमी नजर आने ही लगती है।
सभी लोगों में कुछ अच्छाइयां जरूर होती हैं। क्यों न हम सभी लोगों की उन अच्छाइयों की तरफ अपना फोकस करें।
गरुड़ देव के आठ रहस्य…
आखिरकार भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का क्या रहस्य है? क्यों हिन्दू में उनको विशेष महत्व दिया जाता है। क्या है उनके जन्म का रहस्य और कैसे वह एक पक्षी से भगवान बन गए?
गरूड़ भगवान के बारे में सभी जानते होंगे। यह भगवान विष्णु का वाहन हैं। भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है। गरूड़ हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध धर्म में भी महत्वपूर्ण पक्षी माना गया है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गरूड़ को सुपर्ण (अच्छे पंख वाला) कहा गया है। जातक कथाओं में भी गरूड़ के बारे में कई कहानियां हैं। माना जाता है कि गरूड़ की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश और व्यक्तियों को इधर से उधर ले जाना होता था। कहते हैं कि यह इतना विशालकाय पक्षी होता था जो कि अपनी चोंच से हाथी को उठाकर उड़ जाता था। गरूढ़ जैसे ही दो पक्षी रामायण काल में भी थे जिन्हें जटायु और सम्पाती कहा जाता था। ये दोनों भी दंडकारण्य क्षेत्र में रहते विचरण करते रहते थे। इनके लिए दूरियों का कोई महत्व नहीं था। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे इसीलिए यहां एक मंदिर है। पक्षियों में गरुड़ को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यह समझदार और बुद्धिमान होने के साथ साथ तेज गति से उड़ने की क्षमता रखता है। गिद्ध और गरुड़ में फर्क होता है। संपूर्ण भारत में गरुड़ का ज्यादा प्रचार और प्रसार किसलिए है यह जानना जरूरी है। गरुड़ के बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती है। रामायण में तो गरुड़ का सबसे महत्वपूर्ण पात्र है।
आखिरकार भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का क्या रहस्य है?
पक्षी तीर्थ: चेन्नई से ६० किलोमीटर दूर एक तीर्थस्थल है जिसे ‘पक्षी तीर्थ’ कहा जाता है। यह तीर्थस्थल वेदगिरि पर्वत के ऊपर है। कई सदियों से दोपहर के वक्त गरूड़ का जोड़ा सुदूर आकाश से उतर आता है और फिर मंदिर के पुजारी द्वारा दिए गए खाद्यान्न को ग्रहण करके आकाश में लौट जाता है।
सैकड़ों लोग उनका दर्शन करने के लिए वहां पहले से ही उपस्थित रहते हैं। वहां के पुजारी के मुताबिक सतयुग में ब्रह्मा के ८ मानसपुत्र शिव के शाप से गरूड़ बन गए थे। उनमें से २ सतयुग के अंत में, २ त्रेता के अंत में, २ द्वापर के अंत में शाप से मुक्त हो चुके हैं। कहा जाता है कि अब जो २ बचे हैं, वे कलयुग के अंत में मुक्त होंगे।
गरुड़ हैं देव पक्षी: गरूड़ का जन्म सतयुग में हुआ था, लेकिन वे त्रेता और द्वापर में भी देखे गए थे। दक्ष प्रजापति की विनिता या विनता नामक कन्या का विवाह कश्यप ऋषि के साथ हुआ। विनिता ने प्रसव के दौरान दो अंडे दिए। एक से अरुण का और दूसरे से गरुढ़ का जन्म हुआ। अरुण तो सूर्य के रथ के सारथी बन गए तो गरुड़ ने भगवान विष्णु का वाहन होना स्वीकार किया।
सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे। बचपन में सम्पाती और जटायु ने सूर्य मंडल को स्पर्श करने के उद्देश्य से लंबी उड़ान भरी। सूर्य के असह्य तेज से व्याकुल होकर जटायु तो बीच से लौट आए, किंतु सम्पाती उड़ते ही गए।
सूर्य के निकट पहुंचने पर सूर्य के ताप से सम्पाती के पंख जल गए और वे समुद्र तट पर गिरकर चेतनाशून्य हो गए। चन्द्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और त्रेता में श्री सीताजी की खोज करने वाले वानरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया।
सतयुग में देवताओं से युद्ध: पुराणों में भगवान गरूड़ के पराक्रम के बारे में कई कथाओं का वर्णन मिलता है। कहते हैं कि उन्होंने देवताओं से युद्ध करके उनसे अमृत कलश छीन लिया था। दरअस्ल, ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थीं जिनमें से दो वनिता और कद्रू थी।
ये दोनों ही बहने थी, जो एक दूसरे से ईर्ष्या रखती थी। दोनों के पुत्र नहीं थे तो पति कश्यप ने दोनों को पुत्र के लिए एक वरदान दे दिया। वनिता ने दो बलशाली पुत्र मांगे जबकि कद्रू ने हजार सर्प पुत्र रूप में मांगे जो कि अंडे के रूप में जन्म लेने वाले थे। सर्प होने के कारण कद्रू के हजार बेटे अंडे से उत्पन्न हुए और अपनी मां के कहे अनुसार काम करने लगे।
दोनों बहनों में शर्त लग गई थी कि जिसके पुत्र बलशाली होंगे हारने वाले को उसकी दासता स्वीकार करनी होगी। इधर सर्प ने जो जन्म ले लिया था लेकिन वनिता के अंडों से अभी कोई पुत्र नहीं निकला था। इसी जल्दबाजी में वनिता ने एक अंडे को पकने से पहले ही फोड़ दिया। अंडे से अर्धविकसित बच्चा निकला जिसका ऊपर का शरीर तो इंसानों जैसा था लेकिन नीचे का शरीर अर्धपक्व था। इसका नाम अरुण था।
अरुण ने अपनी मां से कहा कि ‘पिता के कहने के बाद भी आपने धैर्य खो दिया और मेरे शरीर का विस्तार नहीं होने दिया। इसलिए मैं आपको श्राप देता हूं कि आपको अपना जीवन एक सेवक के तौर पर बिताना होगा। अगर दूसरे अंडे में से निकला उनका पुत्र उन्हें इस श्राप से मुक्त ना करवा सका तो वह आजीवन दासी बनकर रहेंगी।’
भय से विनता ने दूसरा अंडा नहीं फोड़ा और पुत्र के शाप देने के कारण शर्त हार गई और अपनी छोटी बहन की दासी बनकर रहने लगी।
बहुत लंबे काल के बाद दूसरा अंडा फूटा और उसमें से विशालकाय गरुड़ निकाला जिसका मुख पक्षी की तरह और बाकी शरीर इंसानों की तरह था। हालांकि उनकी पसलियों से जुड़े उनके विशालकाय पंक्ष भी थे। जब गरुड़ को यह पता चला कि उनकी माता तो उनकी ही बहन की दासी है और क्यों है यह भी पता चला, तो उन्होंने अपनी मौसी और सर्पों से इस दासत्व से मुक्ति के लिए उन्होंने शर्त पूछी।
सर्पो ने विनता की दासता की मुक्ति के लिए अमृत मंथन ने निकला अमृत मांग। अमृत लेने के लिए गरुड़ स्वर्ग लोक की तरफ तुरंत निकल पड़े। देवताओं ने अमृत की सुरक्षा के लिए तीन चरणों की सुरक्षा कर रखी थी, पहले चरण में आग की बड़े परदे बिछा ररखे थे। दूसरे में घातक हथियारों की आपस में घर्षण करती दीवार थी और अंत में दो विषैले सर्पो का पहरा।
वहां तक भी पहुंचाने से पहले देवताओं से मुकाबला करना था। गरुड़ सब से भीड़ गए और देवताओं को बिखेर दिया। तब गरुड़ ने कई नदियों का जल मुख में ले पहले चरण की आग को बुझा दिया, अगले पथ में गरुड़ ने अपना रूप इतना छोटा कर लिया के कोई भी हथियार उनका कुछ न बिगाड़ सका और सांपों को अपने दोनों पंजो में पकड़कर उन्होंने अपने मुंह से अमृत कलश उठा लिया और धरती की ओर चल पड़े।
लेकिन तभी रास्ते में भगवान विष्णु प्रकट हुए और गरुड़ के मुंह में अमृत कलश होने के बाद भी उसके प्रति मन में लालच न होने से खुश होकर गरुड़ को वरदान दिया की वो आजीवन अमर हो जाएंगे। तब गरुड़ ने भी भगवान को एक वरदान मांगने के लिए बोला तो भगवान ने उन्हें अपनी सवारी बनने का वरदान मांगा। इंद्र ने भी गरुड़ को वरदान दिया की वो सांपों को भोजन रूप में खा सकेगा इस पर गरुड़ ने भी अमृत सकुशल वापसी का वादा किया।
अंत में गरुड़ ने सर्पों को अमृत सौंप दिया और भूमि पर रख कर कहा कि यह रहा अमृत कलश। मैंने यहां इसे लाने का अपना वादा पूरी किया और अब यह आपके सुपूर्द हुआ, लेकिन इसे पीने के आप सभी स्नान करें तो अच्छा होगा।
जब वे सभी सर्प स्नान करने गए तभी वहां अचानक से भगवान इंद्र पहुंचे और अमृत कलश को वापस ले गए। लेकिन कुछ बूंदे भूमि पर गिर गई जो घांस पर ठहर गई थी। सर्प उन बूंदों पर झपट पड़े, लेकिन उनके हाथ कुछ न लगा। इस तरह गरुड़ की शर्त भी पूरी हो गई और सर्पों को अमृत भी नहीं मिला।
त्रेता युग में :जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया था।
गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं। भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए काकभुशुण्डिजी नाम के एक कौवे के पास भेज दिया। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया।
लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मुक्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने रामायण गरूड़ को सुना दी थी। इससे पूर्व हनुमानजी ने संपूर्ण रामायण पाठ लिखकर समुद्र में फेंक दी थी। वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था।
हनुमानजी ने तोड़ दिया था गरुड़ का अभिमान:
भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाता है। विष्णु ने ही राम के रूप में अवतार लिया और विष्णु ने ही श्रीकृष्ण के रूप में। श्रीकृष्ण की ८ पत्नियां थीं; रुक्मणि, जाम्बवंती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रबिंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा। इसमें से सत्यभामा को अपनी सुंदरता और महारानी होने का घमंड हो चला था तो दूसरी ओर सुदर्शन चक्र खुद को सबसे शक्तिशाली समझता था और विष्णु वाहन गरूड़ को भी अपने सबसे तेज उड़ान भरने का घमंड था।
एक दिन श्रीकृष्ण अपनी द्वारिका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे और उनके निकट ही गरूड़ और सुदर्शन चक्र भी उनकी सेवा में विराजमान थे। बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में पूछा, हे प्रभु, आपने त्रेतायुग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं?
भगवान सत्यभामा की बातों का जवाब देते उससे पहले ही गरूड़ ने कहा, भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है। तभी सुदर्शन से भी रहा नहीं गया और वह भी बोल उठा कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है। क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है? द्वारकाधीश समझ गए कि तीनों में अभिमान आ गया है। भगवान मंद मंद मुस्कुराने लगे और सोचने लगे कि इनका अहंकार कैसे नष्ट किया जाए, तभी उनको एक युक्ति सूझी…
भगवान मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट होने का समय आ गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने गरूड़ से कहा कि हे गरूड़! तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। गरूड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले गए।
इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी, आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया।
तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई भी प्रवेश न करने पाए। सुदर्शन चक्र ने कहा, जो आज्ञा भगवान और भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गया।
गरूड़ ने हनुमान के पास पहुंचकर कहा कि हे वानरश्रेष्ठ! भगवान राम, माता सीता के साथ द्वारका में आपसे मिलने के लिए पधारे हैं। आपको बुला लाने की आज्ञा है। आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा।
हनुमान ने विनयपूर्वक गरूड़ से कहा, आप चलिए बंधु, मैं आता हूं। गरूड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा। खैर मुझे क्या कभी भी पहुंचे, मेरा कार्य तो पूरा हो गया। मैं भगवान के पास चलता हूं। यह सोचकर गरूड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़ चले।
लेकिन यह क्या? महल में पहुंचकर गरूड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरूड़ का सिर लज्जा से झुक गया। तभी श्रीराम के रूप में श्रीकृष्ण ने हनुमान से कहा कि पवनपुत्र तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं?
हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु आपसे मिलने से मुझे क्या कोई रोक सकता है? इस चक्र ने रोकने का तनिक प्रयास किया था इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें। भगवान मंद मंद मुस्कुराने लगे।
अंत में हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया, हे प्रभु! मैं आपको तो पहचानता हूं आप ही श्रीकृष्ण के रूप में मेरे राम हैं, लेकिन आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है।
अब रानी सत्यभामा का अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पलभर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरूड़ तीनों का गर्व चूर चूर हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए। भगवान ने अपने भक्तों के अंहकार को अपने भक्त हनुमान द्वारा ही दूर किया। अद्भुत लीला है प्रभु की।
गरूड़ घंटी का महत्व है: मंदिर के द्वार पर और विशेष स्थानों पर घंटी या घंटे लगाने का प्रचलन प्राचीन काल से ही रहा है। यह घंटे या घंटियां ४ प्रकार की होती हैं:- १. गरूड़ घंटी, २. द्वार घंटी, ३. हाथ घंटी और ४. घंटा।
१. गरूड़ घंटी: गरूड़ घंटी छोटी सी होती है जिसे एक हाथ से बजाया जा सकता है।
२. द्वार घंटी: यह द्वार पर लटकी होती है। यह बड़ी और छोटी दोनों ही आकार की होती है।
३. हाथ घंटी: पीतल की ठोस एक गोल प्लेट की तरह होती है जिसको लकड़ी के एक गद्दे से ठोककर बजाते हैं।
४. घंटा: यह बहुत बड़ा होता है। कम से कम ५ फुट लंबा और चौड़ा। इसको बजाने के बाद आवाज कई किलोमीटर तक चली जाती है।
हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख घरों में आपको गरूढ़ घंटी मिल जाएगी। हिन्दू और जैन घरों में तो यह विशेष तौर पर गरूड़ के आकार की ही होती है। छोटी और बड़ी सभी आकार की यह घंटी मिल जाएगी।
गरूड़ ध्वज: महाभारत में गरूड़ ध्वज था। प्राचीन मंदिरों के द्वार पर एक ओर गरूड़, तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति आवेष्ठित की जाती रही है। घर में रखे मंदिर में गरूड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरूड़ ध्वज होता है।
गरुड़ भारत का धार्मिक और अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है। भारत के इतिहास में स्वर्ण युग के रूप में जाना जाने वाले गुप्त शासकों का प्रतीक चिन्ह गरुड़ ही था। कर्नाटक के होयसल शासकों का भी प्रतीक गरुड़ था। गरुड़ इंडोनेशिया, थाईलैंड और मंगोलिया आदि में भी सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में लोकप्रिय है। इंडोनेसिया का राष्ट्रिय प्रतीक गरुड़ है। वहां की राष्ट्रिय एयरलाइन्स का नाम भी गरुड़ है। इंडोनेशिया की सेनाएं संयुक्त राष्ट्र मिशन पर गरुड़ नाम से जाती है। इंडोनेशिया पहले एक हिन्दू राष्ट्र ही था। थाईलैंड का शाही परिवार भी प्रतीक के रूप में गरुड़ का प्रयोग करता है। थाईलैंड के कई बौद्ध मंदिर में गरुड़ की मूर्तियाँ और चित्र बने हैं। मंगोलिया की राजधानी उलनबटोर का प्रतीक गरुड़ है।
गरूड़ पुराण: गरूड़ नाम से एक व्रत भी है। गरूड़ नाम से एक पुराण भी है। गरुण पुराण में, मृत्यु के पहले और बाद की स्थिति के बारे में बताया गया है। हिन्दू धर्मानुसार जब किसी के घर में किसी की मौत हो जाती है तो गरूड़ पुराण का पाठ रखा जाता है। गरूड़ पुराण में उन्नीस हजार श्लोक कहे जाते हैं, किन्तु वर्तमान समय में कुल सात हजार श्लोक ही उपलब्ध हैं।
गरूड़ पुराण में ज्ञान, धर्म, नीति, रहस्य, व्यावहारिक जीवन, आत्म, स्वर्ग, नर्क और अन्य लोकों का वर्णन मिलता है। इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्म की महिमा के साथ यज्ञ, दान, तप तीर्थ आदि शुभ कर्मों में सर्व साधारणको प्रवृत्त करने के लिए अनेक लौकिक और पारलौकिक फलों का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें आयुर्वेद, नीतिसार आदि विषयों के वर्णनके साथ मृत जीव के अन्तिम समय में किए जाने वाले कृत्यों का विस्तार से निरूपण किया गया है।
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