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‼️🙏जय श्री हरि 🙏‼️

*🔹 आत्म संतुष्टि 🔹*

एक कौआ था जो अपनी जिंदगी से बहुत खुश और संतुष्ट था। एक बार वह एक तालाब पर पानी पीने रुका। वहां पर उसने सफ़ेद रंग के पक्षी हंस को देखा। उसने सोचा मैं बहुत काला हूँ और हंस इतना सुन्दर इसलिए शायद हंस इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा। कौआ हंस के पास गया और बोला तुम दुनिया के सबसे खुश प्राणी हो।

हंस बोला – मैं भी यही सोचा करता था कि मैं दुनिया का सबसे खुश पक्षी हूँ जब तक कि मैंने तोते को न देखा था। तोते को देखने के बाद मुझे लगता है कि तोता ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी है क्योंकि तोते के दो खूबसूरत रंग होते है इसलिए वही दुनिया का सबसे खुश पक्षी होना चाहिए।

कौआ तोते के पास गया और बोला – तुम ही इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो।
तोता ने कहा – मैं पहले बहुत खुश था और सोचा करता था कि मैं ही दुनिया का सबसे खूबसूरत पक्षी हूँ, लेकिन जब से मैंने मोर को देखा है, मुझे लगता है कि वो ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी है क्योंकि उसके कई तरह के रंग है और वह मुझसे भी खूबसूरत है।

कौआ चिड़ियाघर में मोर के पास गया और देखा कि सैकड़ों लोग मोर को देखने के लिए आए है। कौआ मोर के पास गया और बोला – तुम दुनिया के सबसे सुन्दर पक्षी हो और हजारों लोग तुम्हें देखने के लिए आते है, इसलिए तुम ही दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो।

मोर ने कहा – मैं हमेशा सोचता था कि मैं दुनिया का सबसे खूबसूरत और खुश पक्षी हूँ लेकिन मेरी खूबसूरती के कारण मुझे यहाँ पिंजरे में कैद कर लिया गया है। मैं खुश नहीं हूँ और मैं अब यह चाहता हूँ कि काश मैं भी कौआ होता तो मैं आज आसमान में आजाद उड़ता। चिड़ियाघर में आने के बाद मुझे यही लगता है कि कौआ ही सबसे खुश पक्षी होता है।

*“हम लोगों की जिंदगी भी कुछ ऐसी ही हो गयी है। हम अपनी तुलना दूसरों से करते रहते है और दूसरों को देखकर हमें लगता है कि वो शायद हम से अधिक खुश है। इस कारण हम दु:खी हो जाते हैं ।*

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बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था …इसलिए बात-बात पर अपनी माँ किशोरी से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब फाइनेसिअली इंडिपेंडेंट बेटा पिता के कई बार समझाने पर भी इग्नोर कर देता और कहता, “यही तो उम्र है शौक की,खाने पहनने की, जब आपकी तरह मुँह में दाँत और पेट में आंत ही नहीं रहेगी तो क्या करूँगा।”
बहू खुशबू भी भरे पूरे परिवार से आई थी, इसलिए बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी अच्छी थी तो फ्रेंड सर्किल उसी हिसाब से मॉडर्न थी। बहू को अक्सर वह पुराने स्टाइल के कपड़े छोड़ कर मॉडर्न बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती …..,वो कहता “कमाल करती हो तुम, आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है,मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ। तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। क्वालिटी लाइफ क्या होती है तुम्हें मालूम ही नहीं।” और बहू कहती “क्वालिटी लाइफ क्या होती है, ये मुझे जानना भी नहीं है, क्योकि लाइफ की क्वालिटी क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।”

आज अचानक पापा आई. सी. यू. में एडमिट हुए थे। हार्ट अटेक आया था। डॉक्टर ने पर्चा पकड़ाया, तीन लाख और जमा करने थे। डेढ़ लाख का बिल तो पहले ही भर दिया था मगर अब ये तीन लाख भारी लग रहे थे। वह बाहर बैठा हुआ सोच रहा था कि अब क्या करे। उसने कई दोस्तों को फ़ोन लगाया कि उसे मदद की जरुरत है, मगर किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ बहाना कर दिया। आँखों में आँसू थे और वह उदास था तभी खुशबू खाने का टिफिन लेकर आई और बोली,”अपना ख्याल रखना भी जरुरी है। ऐसे उदास होने से क्या होगा? हिम्मत से काम लो, बाबू जी को कुछ नहीं होगा आप चिन्ता मत करो। कुछ खा लो फिर पैसों का इंतजाम भी तो करना है आपको मैं यहाँ बाबूजी के पास रूकती हूँ आप खाना खाकर पैसों का इंतजाम कीजिये। पति की आँखों से टप -टप आँसू झरने लगे। कहा न आप चिन्ता मत कीजिये। जिन दोस्तों के साथ आप मॉडर्न पार्टियां करते हैं आप उनको फ़ोन कीजिये, देखिए तो सही, कौन कौन मदद को आता हैं। पति नवनीत खामोश और सूनी निगाहों से जमीन की तरफ़ देख रहा था। कि खुशबू का हाथ उसकी पीठ पर आ गया। और वह पीठ को सहलाने लगी।
सबने मना कर दिया। सबने कोई न कोई बहाना बना दिया खुशबू।आज पता चला कि ऐसी दोस्ती तब तक की है जब तक जेब में पैसा है। किसी ने भी हाँ नहीं कहा जबकि उनकी पार्टियों पर मैंने लाखों उड़ा दिये।
इसी दिन के लिए बचाने को तो माँ-बाबा कहते थे। खैर, कोई बात नहीं, आप चिंता न करो, हो जाएगा सब ठीक। कितना जमा कराना है?

अभी तो तनख्वाह मिलने में भी समय है, आखिर चिन्ता कैसे न करूँ खुशबू ?
“तुम्हारी ख्वाहिशों को मैंने सम्हाल रखा है।”
“क्या मतलब….?”
“तुम जो नई नई तरह के कपड़ो और दूसरी चीजों के लिए मुझे पैसे देते थे वो सब मैंने सम्हाल रखे हैं। माँ जी ने फ़ोन पर बताया था, तीन लाख जमा करने हैं। मेरे पास दो लाख थे। बाकी मैंने अपने भैया से मंगवा लिए हैं। टिफिन में सिर्फ़ एक ही डिब्बे में खाना है बाकी में पैसे हैं।” खुशबू ने थैला टिफिन सहित उसके हाथों में थमा दिया।

“खुशबू ! तुम सचमुच अर्धांगिनी हो, मैं तुम्हें मॉडर्न बनाना चाहता था, हवा में उड़ रहा था। मगर तुमने अपने संस्कार नहीं छोड़े. आज वही काम आए हैं। “

सामने बैठी माँ के आँखो में आंसू थे उसे आज खुद के नहीं बल्कि पराई माँ के संस्कारो पर नाज था और वो बहु के सर पर हाथ फेरती हुई ऊपरवाले का शुक्रिया अदा कर रही थी।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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परख


कहानी एक जौहरी की है जो राजस्थान के झुंझुनूं जिले से सम्बन्ध रखती है,,,मुझे और मेरी पत्नी को त्योहार पर गहने लेने थे लेकिन मेरी एक ही जिद्द थी कि जो भी ज्वेलरी लेनी है किसी और दुकान से लेंगे, वो गीतांजलि ज्वेलरी की दुकान से तो बिलकुल नहीं लेंगे।”
“मैं तो वही से लुंगी,पत्नी ने कहा।”
“तुम आस पड़ोस की औरतों को हुआ क्या है?
एक वही दुकान है क्या शहर में? मुझे तो बिलकुल नहीं पसंद वो, मीठी मीठी बातें करता है और तुम सब बस!”
“उसे सोने चांदी के अलावा इंसानों और उनकी भावनाओं की भी परख है।”

“ये तुम्हें कैसे पता?”

“याद है हमारी नई-नई शादी हुई थी और मुझे वो झुमका कितना पसंद था। उसने बिना ज्यादा जान पहचान के ही थोड़े पैसे में दे दिया था फिर हमने धीरे धीरे सारे पैसे चुकाय थे।”

“तो! सभी दुकान वाले दे देते हैं! और अब मेरे पास इतना है कि तुम कहीं से कुछ भी ले सकती हो।”

“नहीं जी सारे दुकान वाले कहाँ देते हैं और मैं कहीं से नही वहीं से अपने लिए एक मंगलसूत्र लूंगी आज त्योहार के साथ सुहागिनों के लिए भी बड़ा शुभ दिन है।”
बात करते करते हम दोनो उसी गीतांजली ज्वेलरी की दुकान पर आ गए जहां मैं बिलकुल नहीं आना चाहता था।

पता नहीं क्यों इतनी तारीफ सुन जलन होती है उससे।
“नमस्ते भैया.. नमस्ते भाभी! काफी दिनों बाद आये आप लोग” उसने अपने बालों पर हाथ फेरते अपने चिर परिचित अंदाज में कहा..
“हां तो रोज रोज गहने कौन लेता है? मैंने थोड़ी भड़ास निकाली तो वो मुस्कुरा दिया..
“सही कहा आपने भैया, और भाभी जी! क्या दिखाऊँ…”

  इनके अलावा कुछ और औरतें गहने देख रही थी कि तभी एक और औरत थोड़े सकुचाते हुए आई जो हाथों में कुछ लिए किनारे खड़ी थी। गीतांजली ज्वेलर्स की नजर उस पर गई....

“जी कहिए”
“जी..कुछ पैसों की जरूरत थी..ये कुछ गहने और मंगलसूत्र रखने आयी थी” उसने बिना किसी के तरफ देखे अपनी बात कह दी।

दो छोटे कान के गहने और एक पुराना मंगलसूत्र था।

ज्वेलर्स ने उसके हाथों से उसे लेकर वजन किया….
“कितने रुपये में रखना है…”
“जी पच्चीस हजार की जरूरत थी।”
मैं मन ही मन सोच रहा था कि कैसी औरत है आज के दिन मंगलसूत्र गिरवी रख रही है कि तभी..गीतांजली ज्वेलर्स ने कहा
“भाभी जी गहने बहुत हल्के हैं मैं मुश्किल से दस हजार दे पाऊंगा।”
“जी मेरे पति का एक्सीडेंट हो गया है, हालत बहुत नाजुक है, थोड़े और ज्यादा मिल जाते तो..” उस औरत की आँखों से दो बूंद लुढ़क गए

गीतांजली ज्वेलर्स ने उस औरत का पता और फोन नम्बर के साथ एक पर्ची बना ली
“ये लीजिए भाभी जी पच्चीस हजार , बाकी के गहने मैं रख लेता हूँ पर ये मंगलसूत्र आप पहन लीजिए, आपके पति जल्दी ठीक हो जाएंगे।”
मैं अवाक रह देखता रहा, आज त्योहार है आज तो कोई दुकानदार उधार नहीं देता, बरबस ही निकल पड़ा.. “भैया तुम आज के दिन भी उधार देते हो।”
“नहीं भैया, बात सिर्फ गहनों और पैसों की हो तो बिलकुल नहीं पर आज बात किसी के ज़िंदगी की है।”

मेरी पत्नी ने ठीक कहा था। मैंने भी आज पहली बार एक जौहरी को देखा जिसे सिर्फ गहनों की नहीं भावनाओं की भी परख है..।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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स्थिति


पुराने समय मे भारत मे एक आदर्श गुरुकुल हुआ करता था,उसमे बहुत सारे छात्र शिक्षण कार्य किया करते थे,उसी गुरुकुल में एक विशेष जगह हुआ करती थी जहाँ पर सभी शिष्य प्रार्थना किया करते थे,वह जगह पूजनीय हुआ करती थी,एक दिन एक शिष्य के मन के जिज्ञासा उत्पन हुई तो उस शिष्य ने गुरु से पूछा – हम प्रार्थना करते हैं, तो होंठ हिलते हैं पर आपके होंठ नहीं हिलते ?

आप पत्थर की मूर्ति की तरह खडे़ हो जाते हैं आप कहते क्या है अन्दर से…?

क्योंकि, अगर आप अन्दर से भी कुछ कहेंगे, तो होंठो पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है, चेहरे पर बोलने का भाव आ जाता है, लेकिन वह भाव भी नहीं आता।

गुरु जी ने कहा – मैं एक बार राजधानी से गुजरा और राजमहल के सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खडे़ देखा, और एक भिखारी को भी खडे़ देखा,

वह भिखारी बस खड़ा था, फटे–चीथडे़ थे उसके शरीर पर। जीर्ण – जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनो से भोजन न मिला हो, शरीर सूख कर कांटा हो गया।

बस आंखें ही दीयों की तरह जगमगा रही थी, बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो। वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था…? लगता था अब गिरा -तब गिरा !

सम्राट उससे बोला – बोलो क्या चाहते हो ?

उस भिखारी ने कहा – अगर आपके द्वार पर खडे़ होने से मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं।

क्या कहना है ? और मै द्वार पर खड़ा हूं, मुझे देख लो मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है। “
गुरु जी ने कहा – उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी।मैं परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूं, वह देख लेगें । मैं क्या कहूं ? अगर मेरी स्थिति कुछ नहीं कह सकती, तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे ?

अगर वह मेरी स्थिति नहीं समझ सकते, तो मेरे शब्दों को क्या समझेंगे…?

अतः भाव व दृढ विश्वास ही सच्ची परमात्मा की याद के लक्षण है। यहाँ कुछ मांगना शेष नही रहता !आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है…..

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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जीवन का मूल्य


मगध सम्राट चन्द्रगुप्त ने एक बार अपनी सभा मे पूछा : देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है ?
मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल,गेहूं,ज्वार,बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !
तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा : राजन, सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है, इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया,लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे ।
तब सम्राट ने उनसे पूछा : आपका इस बारे में क्या मत है ?
चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।
प्रधानमंत्री ने कहा:शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं, इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें । यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।
प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख दीं ।
सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है ?
तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला ।राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ? जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है। लेकिन वो अपना जान बचाने मे असमर्थ है।और मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि । पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं । तो क्या बस इसी कारण उनसे जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।

शुद्ध आहार, शाकाहार !
मानव आहार, शाकाहार !

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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एहसान


घर के अंदर पैर रखा, तो लगा अभी भी गाड़ी में ही बैठी हूं। इतना लंबा सफ़र बैठे-बैठे तय करना। फिर बार-बार उल्टी जैसा लगना. उस पर देवर-देवरानी और बच्चों के सामने बार-बार आलोक का टोकना,
“ये उल्टी-वुल्टी औरतों के नाटक हैं. किसी आदमी को हमने नहीं देखा कि चलती कार में फलाना दिक़्क़त हो रही, ढिकाना हो रहा…”
रास्ते में देवरानी कभी मुझे पानी पिलाती रही, कभी बच्चों को बैग से निकालकर खाना खिलाती रही। घर पहुंचते-पहुंचते सबका दम निकल चुका था. खाना खाने की इच्छा भी नहीं रही थी।

“मम्मा, हम लोग सोएंगे बस सीधे. प्लीज़ खाना पूछना भी मत.” बच्चे सीधे अपने कमरे में चले गए।
“भाभी, हम लोग भी कुछ नहीं खाएंगे, आप लेटो जाकर… भाईसाहब के लिए रास्तेवाली कचौड़ी और सब्ज़ी है, हम थाली में बढ़िया से लगाकर दे देंगे.” देवरानी ने इतने प्यार से कहा कि आंखें भर आईं‌. ये बेचारी क्या जाने कि ‘भाईसाहब’ तो रास्तेवाला खाना देखते ही बिदक जाएंगे, “दस बार वही खाना?” और अगर इन लोगों के लिहाज़ में खा भी लिया, तो दो-तीन दिन पेट पर हाथ फिराते मुझे सुनाएंगे, “बासी कचौड़ी खाई न उस दिन, तभी से दिक़्क़त हो रही.”
जी में आया, छोड़ो हटाओ, सुनाते तो वैसे भी हैं किसी-न-किसी बात पर, खाने दो वही कचौड़ी! लेकिन अंदर की अन्नपूर्णा देवी बाहर आकर मुझे उकसाती ही चली जा रही थी, ‘दो आलू काट लो, एक मुट्ठी मटर डालकर छौंक दो.. एक तरफ़ दाल रख दो, चार रोटी का आटा गूंथ लो, बस लग जाएगी ताज़ी थाली नवनीत।
मैंने घर का जायज़ा लिया, आलोक देवर-देवरानी को घर दिखाते हुए पूरे रौब में थे, “अपने को थीम से बाहर कुछ चलता नहीं. बदलता है तो सब बदलता है, सोफा बदला, तो हमने कहा हटाओ साले को पुरानी सेंटर टेबल, वो भी मैचिंग आएगी…”
वो‌ दोनों थके हुए, उबासी लेते मेहमान ‘बहुत बढ़िया’, ‘बड़ा सुंदर लग रहा है’ कहते जा रहे थे. ना उधर आलोक की आत्ममुग्धता रुक रही थी, न इधर मेरे हाथ… गैस के तीनों चूल्हे आंच धधकाते मेरा पूरा सहयोग कर रहे थे.
“भाभी दिनभर यही सब संभालती होंगी, तभी सब इतना चमक रहा है…” देवर की बात सुनकर रोटी बेलते मेरे हाथ थोड़े और तेज़ चलने लगे, तब तक आलोक की आवाज़ आई.
“घर भी संभालती हैं, अपनी क़िस्मत पर इतराती भी हैं… हर किसी के भाग्य में ऐसा घर‌ नहीं होता. वो बात अलग है कि इस बात के लिए एहसान कभी नहीं मानतीं.”
एक गंदे मज़ाक के बाद आलोक की हंसी… मेरे हाथों को किसी ने जैसे अचानक रोक दिया! मेरी गृहस्थी, मेरा घर, मेरी पहचान है… हम दोनों ने मिलकर घर बनाया है, बसाया है, इसमें आलोक का एहसान कहां से आ गया? इसका तिनका-तिनका संवारती हूं, क्या मैं भी गिनाया करूं? पता नहीं सफ़र की थकान थी या इन‌ शब्दों की सड़ांध..मन अजीब-सा हो गया. जैसे-तैसे थाली लगाकर आलोक को आवाज़ दी, देखते ही कंधे उचकाए, “ये सब क्यों बनाया, वही रास्ते वाला खा लेता मैं… अच्छा! इन लोगों को इंप्रेस कर रही थी क्या?”

फिर वही कुंठित मानसिकता से भरी बातें, कटाक्ष… मन में कुछ उमड़ने सा लगा. पूरी तन्मयता से आलोक एक के बाद एक रोटी निपटाते जा रहे थे, उनको छोड़कर सब उस भारी माहौल के प्रभाव में थे. देवर साथ देने के लिए एक रोटी जबरन खाने लगा था और देवरानी किचन साफ़ करने में लग गई थी.
“भाभी इतना अच्छा खाना बनाती हैं, तभी भइया बाहर का खाना मन से नहीं खाते…”
मेरी गुम मुस्कान वापस लाने की गरज़ से देवर ने तारीफ़ करते हुए आलोक की ओर देखा. उधर से एक डकार के सिवा कुछ नहीं मिला. मैंने एक ग्लास पानी पीकर अपने अंदर का कुछ बिखरा हुआ समेटा और हंसते हुए जवाब दिया, “हां घर का खाना ये मन से खाते हैं… साथ ही क़िस्मत पर भी इतराते हैं. हर किसी की क़िस्मत में थोड़ी होता कि भले ही बीवी बीमार हो, लेकिन थाली पसंद की मिले…”
आलोक ने मुझे अजीब ढंग से घूरा, उनकी अगली डकार शायद गले में अटक गई थी.. लेकिन मेरे शब्द मेरे गले में नहीं अटके थे, मैंने बात पूरी की,
“हां वो अलग बात है कि इस बात का कभी वो एहसान नहीं मानते!..

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सच्ची मित्रता


जबलपुर के पास नर्मदा किनारे बसे रामपुर गाँव में एक संपन्न किसान और मालगुजार, ठाकुर हरिसिंह का निवास था। बचपन से ही हरिसिंह को पेड़-पौधों और प्रकृति से बेहद लगाव था। जब वे मात्र दो वर्ष के थे, तो उन्होंने अपने घर के सामने एक पौधा लगाया था। उस नन्हें पौधे को उन्होंने स्नेह और प्रेम से सींचा। सालों बीतते गए, हरिसिंह किशोर से युवा हुए, और वह पौधा भी बड़ा होकर फल देने वाला हरा-भरा वृक्ष बन गया।

गाँव में विकास कार्य के तहत सड़क निर्माण शुरू हुआ। दुर्भाग्य से, सड़क की राह में वह वृक्ष बाधा बन रहा था। इस स्थिति में दो ही विकल्प थे—या तो वह वृक्ष कट जाता, या हरिसिंह के मकान का एक हिस्सा तोड़ना पड़ता। ठाकुर हरिसिंह ने बिना एक पल सोचे वृक्ष को बचाने का निर्णय लिया और अपने घर का हिस्सा तोड़ने दिया। गाँव के लोग उनकी पर्यावरण-प्रेमी भावना से चकित थे और इस घटना की सराहना करते हुए उनके लगाव की चर्चा करने लगे।

हरिसिंह का मानना था कि पेड़ भी जीवित प्राणी होते हैं और हमारी भावनाओं को समझते हैं। यह मान्यता समय-समय पर सत्य भी सिद्ध होती थी। जब ठाकुर साहब प्रसन्न रहते, वृक्ष भी खिला-खिला प्रतीत होता। जब वे चिंतित रहते, वृक्ष मुरझाया-सा दिखाई देता।

एक दिन दोपहर में ठाकुर हरिसिंह पेड़ की छाया में आराम कर रहे थे। वहाँ की ठंडी हवाओं और शांत वातावरण में उनकी झपकी लग गई। अचानक कहीं से एक साँप आ गया और धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगा। तभी तेज़ हवा से पेड़ के कुछ फल उनकी गोद में गिरे और उनकी नींद टूट गई। जैसे ही उनकी नज़र साँप पर पड़ी, वे सचेत हो गए और अपनी जान बचाई। गाँव के लोगों का कहना था कि उस दिन वृक्ष ने हरिसिंह का कर्ज़ चुकाया था।

समय बीतता गया। हरिसिंह बूढ़े हो गए और वृक्ष भी धीरे-धीरे कमजोर और सूखने लगा। एक दिन रात्रि में ठाकुर हरिसिंह का निधन हो गया। आश्चर्यजनक रूप से अगले दिन सुबह वह वृक्ष भी जड़ से उखड़कर गिर गया। गाँव वालों ने ठान लिया कि ठाकुर साहब का अंतिम संस्कार उसी वृक्ष की लकड़ी से किया जाएगा।

गमगीन माहौल में ठाकुर हरिसिंह का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनकी और उस वृक्ष की राख को एक साथ नर्मदा में प्रवाहित कर दिया गया। ठाकुर साहब और वृक्ष के बीच की यह सच्ची मित्रता आज भी गाँववाले भावुक होकर याद करते हैं।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

*सूर्य और सात घोडो का रहस्य*

क्यों जुते हैं सात घोड़े
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सूर्य भगवान सात घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथ पर सवार होते हैं। सूर्य भगवान जिन्हें आदित्य, भानु और रवि भी कहा जाता है, वे सात विशाल एवं मजबूत घोड़ों पर सवार होते हैं। इन घोड़ों की लगाम अरुण देव के हाथ होती है और स्वयं सूर्य देवता पीछे रथ पर विराजमान होते हैं।

सात की खास संख्या
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लेकिन सूर्य देव द्वारा सात ही घोड़ों की सवारी क्यों की जाती है? क्या इस सात संख्या का कोई अहम कारण है? या फिर यह ब्रह्मांड, मनुष्य या सृष्टि से जुड़ी कोई खास बात बताती है। इस प्रश्न का उत्तर पौराणिक तथ्यों के साथ कुछ वैज्ञानिक पहलू से भी बंधा हुआ है।

कश्यप और अदिति की संतानें
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सूर्य भगवान से जुड़ी एक और खास बात यह है कि उनके 11 भाई हैं, जिन्हें एकत्रित रूप में आदित्य भी कहा जाता है। यही कारण है कि सूर्य देव को आदित्य के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य भगवान के अलावा 11 भाई ( अंश, आर्यमान, भाग, दक्ष, धात्री, मित्र, पुशण, सवित्र, सूर्या, वरुण, वमन, ) सभी कश्यप तथा अदिति की संतान हैं।

वर्ष के 12 माह के समान
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पौराणिक इतिहास के अनुसार कश्यप तथा अदिति की 8 या 9 संतानें बताई जाती हैं लेकिन बाद में यह संख्या 12 बताई गई। इन 12 संतानों की एक बात खास है और वो यह कि सूर्य देव तथा उनके भाई मिलकर वर्ष के 12 माह के समान हैं। यानी कि यह सभी भाई वर्ष के 12 महीनों को दर्शाते हैं।

सूर्यदेव की दो पत्नियां
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सूर्य देव की दो पत्नियां – संज्ञा एवं छाया हैं जिनसे उन्हें संतान प्राप्त हुई थी। इन संतानों में भगवान शनि और यमराज को मनुष्य जाति का न्यायाधिकारी माना जाता है। जहां मानव जीवन का सुख तथा दुख भगवान शनि पर निर्भर करता है वहीं दूसरी ओर शनि के छोटे भाई यमराज द्वारा आत्मा की मुक्ति की जाती है। इसके अलावा यमुना, तप्ति, अश्विनी तथा वैवस्वत मनु भी भगवान सूर्य की संतानें हैं। आगे चलकर मनु ही मानव जाति का पहला पूर्वज बने।

सूर्य भगवान का रथ
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सूर्य भगवान सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होते हैं। इन सात घोड़ों के संदर्भ में पुराणों तथा वास्तव में कई कहानियां प्रचलित हैं। उनसे प्रेरित होकर सूर्य मंदिरों में सूर्य देव की विभिन्न मूर्तियां भी विराजमान हैं लेकिन यह सभी उनके रथ के साथ ही बनाई जाती हैं।

कोणार्क मंदिर
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विशाल रथ और साथ में उसे चलाने वाले सात घोड़े तथा सारथी अरुण देव, यह किसी भी सूर्य मंदिर में विराजमान सूर्य देव की मूर्ति का वर्णन है। भारत में प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य मंदिर भगवान सूर्य तथा उनके रथ को काफी अच्छे से दर्शाता है।

सात से कम या ज्यादा क्यों नहीं
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लेकिन इस सब से हटकर एक सवाल काफी अहम है कि आखिरकार सूर्य भगवान द्वारा सात ही घोड़ों की सवारी क्यों की जाती हैं। यह संख्या सात से कम या ज्यादा क्यों नहीं है। यदि हम अन्य देवों की सवारी देखें तो श्री कृष्ण द्वारा चालए गए अर्जुन के रथ के भी चार ही घोड़े थे, फिर सूर्य भगवान के सात घोड़े क्यों? क्या है इन सात घोड़ों का इतिहास और ऐसा क्या है इस सात संख्या में खास जो सूर्य देव द्वारा इसका ही चुनाव किया गया।

सात घोड़े और सप्ताह के सात दिन
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सूर्य भगवान के रथ को संभालने वाले इन सात घोड़ों के नाम हैं – गायत्री, भ्राति, उस्निक, जगति, त्रिस्तप, अनुस्तप और पंक्ति। कहा जाता है कि यह सात घोड़े एक सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं। यह तो महज एक मान्यता है जो वर्षों से सूर्य देव के सात घोड़ों के संदर्भ में प्रचलित है लेकिन क्या इसके अलावा भी कोई कारण है जो सूर्य देव के इन सात घोड़ों की तस्वीर और भी साफ करता है।

सात घोड़े रोशनी को भी दर्शाते हैं
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पौराणिक दिशा से विपरीत जाकर यदि साधारण तौर पर देखा जाए तो यह सात घोड़े एक रोशनी को भी दर्शाते हैं। एक ऐसी रोशनी जो स्वयं सूर्य देवता यानी कि सूरज से ही उत्पन्न होती है। यह तो सभी जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश में सात विभिन्न रंग की रोशनी पाई जाती है जो इंद्रधनुष का निर्माण करती है।

बनता है इंद्रधनुष
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यह रोशनी एक धुर से निकलकर फैलती हुई पूरे आकाश में सात रंगों का भव्य इंद्रधनुष बनाती है जिसे देखने का आनंद दुनिया में सबसे बड़ा है।

प्रत्येक घोड़े का रंग भिन्न
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सूर्य भगवान के सात घोड़ों को भी इंद्रधनुष के इन्हीं सात रंगों से जोड़ा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम इन घोड़ों को ध्यान से देखें तो प्रत्येक घोड़े का रंग भिन्न है तथा वह एक-दूसरे से मेल नहीं खाता है। केवल यही कारण नहीं बल्कि एक और कारण है जो यह बताता है कि सूर्य भगवान के रथ को चलाने वाले सात घोड़े स्वयं सूरज की रोशनी का ही प्रतीक हैं।

पौराणिक गाथा से इतर
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यदि आप किसी मंदिर या पौराणिक गाथा को दर्शाती किसी तस्वीर को देखेंगे तो आपको एक अंतर दिखाई देगा। कई बार सूर्य भगवान के रथ के साथ बनाई गई तस्वीर या मूर्ति में सात अलग-अलग घोड़े बनाए जाते हैं, ठीक वैसा ही जैसा पौराणिक कहानियों में बताया जाता है लेकिन कई बार मूर्तियां इससे थोड़ी अलग भी बनाई जाती हैं।

अलग-अलग घोड़ों की उत्पत्ति
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कई बार सूर्य भगवान की मूर्ति में रथ के साथ केवल एक घोड़े पर सात सिर बनाकर मूर्ति बनाई जाती है। इसका मतलब है कि केवल एक शरीर से ही सात अलग-अलग घोड़ों की उत्पत्ति होती है। ठीक उसी प्रकार से जैसे सूरज की रोशनी से सात अलग रंगों की रोशनी निकलती है। इन दो कारणों से हम सूर्य भगवान के रथ पर सात ही घोड़े होने का कारण स्पष्ट कर सकते हैं।

सारथी अरुण
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पौराणिक तथ्यों के अनुसार सूर्य भगवान जिस रथ पर सवार हैं उसे अरुण देव द्वारा चलाया जाता है। एक ओर अरुण देव द्वारा रथ की कमान तो संभाली ही जाती है लेकिन रथ चलाते हुए भी वे सूर्य देव की ओर मुख कर के ही बैठते है !

केवल एक ही पहिया
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रथ के नीचे केवल एक ही पहिया लगा है जिसमें 12 तिल्लियां लगी हुई हैं। यह काफी आश्चर्यजनक है कि एक बड़े रथ को चलाने के लिए केवल एक ही पहिया मौजूद है, लेकिन इसे हम भगवान सूर्य का चमत्कार ही कह सकते हैं। कहा जाता है कि रथ में केवल एक ही पहिया होने का भी एक कारण है।

पहिया एक वर्ष को दर्शाता है
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यह अकेला पहिया एक वर्ष को दर्शाता है और उसकी 12 तिल्लियां एक वर्ष के 12 महीनों का वर्णन करती हैं। एक पौराणिक उल्लेख के अनुसार सूर्य भगवान के रथ के समस्त 60 हजार वल्खिल्या जाति के लोग जिनका आकार केवल मनुष्य के हाथ के अंगूठे जितना ही है, वे सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करते हैं। इसके साथ ही गांधर्व और पान्नग उनके सामने गाते हैं औरअप्सराएं उन्हें खुश करने के लिए नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

ऋतुओं का विभाजन
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कहा जाता है कि इन्हीं प्रतिक्रियाओं पर संसार में ऋतुओं का विभाजन किया जाता है। इस प्रकार से केवल पौराणिक रूप से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों से भी जुड़ा है भगवान सूर्य का यह विशाल रथ।

                        ॐ भास्कराय नमः
                        जय श्री सुर्यनारायण

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Posted in संस्कृत साहित्य

#मृत्यु के चौदह प्रकार 🌷

राम और रावण का युद्ध चल रहा था । तब अंगद रावण को बोले- तू तो मरा हुआ है, तुझे मारने से क्या फायदा ?

रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे ?

अंगद बोले सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते – साँस तो लुहार का भाता भी लेता है ।
तब अंगद ने 14 प्रकार की मृत्यु बतलाई l

अंगद द्वारा रावण को बतलाई गई, ये बातें आज के दौर में भी लागू होती हैं ।

यदि किसी व्यक्ति में इन 14 दुर्गुणों में से एक दुर्गुण भी आ जाता है तो वह मृतक समान हो जाता है ।

विचार करें कहीं यह दुर्गुण हमारे पास तो नहीं हैं….कि हमें मृतक समान माना जाय ।

1.कामवश-  जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नही करता है। सदैव वासना में लीन रहता है ।

2.वाम मार्गी-  जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले। जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो। नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

3.कंजूस-  अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म के कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याण कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो। दान करने से बचता हो । ऐसा आदमी भी मृत समान ही है ।

4.अति दरिद्र-  गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वो भी मृत ही है। अत्यन्त दरिद्र भी मरा हुआ है। दरिद्र व्यक्ति को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए ।

5.विमूढ़-   अत्यन्त मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ होता
है। जिसके पास विवेक, बुद्धि नहीं हो। जो खुद निर्णय ना ले सके यानि हर काम को समझने या निर्णय  को लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृत के समान ही है। मूढ़ अध्यात्म को समझता नहीं है ।

6.अजसि-   जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर, परिवार, कुटुंब, समाज, नगर या राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता है, वह व्यक्ति मृत समान ही होता है ।

7.सदा रोगवश-  जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

8.अति बूढ़ा-  अत्यन्त वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों असक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार स्वयं वह और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके ।

9.सतत क्रोधी-  24 घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृत समान ही है। हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करना, ऐसे लोगों का काम होता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि, दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता है। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरक गामी होता है ।

10.अघ खानी-  जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है। और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है ।

11.तनु पोषक-   ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना ना हो, तो ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकि किसी अन्य को मिले ना मिले, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है ।

12.निंदक-   अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नज़र आती हैं। जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है। ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी ना किसी की बुराई ही करे, वह इंसान मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बन्ध होता है ।

13.परमात्म विमुख-   जो व्यक्ति परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति ये सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं। हम जो करते हैं, वही होता है। संसार हम ही चला रहे हैं। जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता है, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है ।

14. श्रुति , संत विरोधी-  जो संत, ग्रंथ, पुराण का विरोधी है, वह भी मृत समान होता है। श्रुत और सन्त ब्रेक का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक ना हो तो वह कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को सन्त के जैसे ब्रेक की जरूरत है नहीं तो समाज में अनाचार फैलेगा ।

कुछ बातें जो कि हमारे वेद रामायण और गीता में ऐसी है कि ग्रहण कर जीवन मे उसके अनुसार चला जाए तो जीवन सार्थक हो जाता है।

पिछले वर्ष की पोस्ट

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#ज्ञानवापी मंदिर के बारे मे विस्तृत जानकारी…

पुराणों के अनुसार, ज्ञानवापी की उत्पत्ति तब हुई थी जब धरती पर गंगा नहीं थी और इंसान पानी के लिए बूंद-बूंद तरसता था तब भगवान शिव ने स्वयं अपने अभिषेक के लिए त्रिशूल चलाकर जल निकाला..यही पर भगवान शिव ने माता पार्वती को ज्ञान दिया। इसीलिए, इसका नाम ज्ञानवापी पड़ा और जहां से जल निकला उसे ज्ञानवापी कुंड कहा गया। ज्ञानवापी का उल्लेख हिंदू धर्म के पुराणों मे मिलता है तो फिर ये मस्जिद के साथ नाम कैसे जुड़ गया? वापी का अर्थ होता है तालाब। ज्ञानवापी का सम्पूर्ण अर्थ है ज्ञान का तालाब। काशी की छः वापियों का उल्लेख पुराणों मे भी मिलता है।  पहली वापी: ज्येष्ठा वापी, जिसके बारे मे कहा जाता है की ये काशीपुरा मे थी, अब लुप्त हो गई है। दूसरी वापी: ज्ञानवापी, जो काशी विश्वनाथ मंदिर के उत्तर मे है।तीसरी वापी: कर्कोटक वापी, जो नागकुंआ के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी वापी: भद्रवापी, जो भद्रकूप मोहल्ले मे है।पांचवीं वापी: शंखचूड़ा वापी, लुप्त हो गई।छठी वापी: सिद्ध वापी, जो बाबू बाज़ार मे है और अब लुप्त हो गई। अठारह (18) पुराणों मे से एक लिंग पुराण मे कहा गया है:

“देवस्य दक्षिणी भागे वापी तिष्ठति शोभना।
तस्यात वोदकं पीत्वा पुनर्जन्म ना विद्यते।”

इसका अर्थ है: प्राचीन विश्ववेश्वर मंदिर के दक्षिण भाग में जो वापी है, उसका पानी पीने से जन्म मरण से मुक्ति मिलती है। स्कंद पुराण मे कहा गया है “उपास्य संध्यां ज्ञानोदे यत्पापं काल लोपजं क्षणेन तद्पाकृत्य ज्ञानवान जायते नरः अर्थात इसके जल से संध्यावंदन करने का भी बड़ा फल है, इससे भी ज्ञान उत्पन्न होता है, पाप से मुक्ति मिलती है।

स्कंद पुराण: – योष्टमूर्तिर्महादेवः पुराणे परिपठ्यते ।।
तस्यैषांबुमयी मूर्तिर्ज्ञानदा ज्ञानवापिका।।

अर्थात ज्ञानवापी का जल भगवान शिव का ही स्वरूप है। पुराण जो ना जाने कितनी सदियों पहले लिखे गए, उसमें भी ज्ञानवापी को भगवान शिव का स्वरूप बताया गया है। सारे पुराण, कह रहे है की ज्ञानवापी हिंदुओं से जुड़ा हुआ है लेकिन ASI की मेहरबानी से आज आप सुनते है की इसका नाम है ज्ञानवापी मस्जिद। इस्लामिक आक्रांताओं के आक्रमण से पहले काशी को अविमुक्त और भगवान शिव को अविमुक्तेश्वर कहा जाता था। काशी मे अविमुक्तेश्वर के स्वयं प्रकट हुए शिवलिंग की पूजा होती थी जिसे आदिलिंग कहा जाता था…

हर-हर महादेव 🔱

#GyanvapiCase