Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

દિલ્હી ના રાજા ગુપ્તવેશ મા રાણી સાથે ફરવા નીકળ્યા.રાજા ને તરસ લાગી.😊
રાણી એ બાજુ ની ઝુપડી ઉપર જઇ ને કિધું જરા
પાણી આપો ને મારા ઘરવાળા ને તરસ લાગી છે…
ખેડુતે પાણી આપ્યું..😏
રાણી એ રાજા જયા બેઠા હતા ત્યા જઇ પોતાના હાથે પાણી પીવડાવ્યું,મોઢું લુછવા પોતાનો પાલવ આપ્યો…🤔
ખેડુતે આ જોયું એટલે પુછયું તમે દિલ્લી ના રાણી છો ને🤔
રાણી તને કેમ ખબર પડી..😇
ખેડુતે પોતાની ઘરવાળી ને બુમ પાડી,એ પાણી લાવજે તો.
અંદર થી ખેડૂત ની પત્ની નો અવાજ .
જાતે પી લો મારે કામ છે અને તમે તે કાંઇ દિલ્લી ના રાજા નથી 🙃🤣😝

Posted in रामायण - Ramayan

રામની પાદુકા લઇ ચિત્રકુટથી અયોધ્યા પરત જતા પેહલા ભરતે રામને પૂછ્યું કે પિતાજી રહ્યા નથી.. તમે અયોધ્યામાં છો નહી મારે તમારા પ્રતિનિધિ તરીકે રાજગાદી સંભાળવાની છે.. કેવી રીતે શક્ય બનશે ?
રામે કહ્યું કે શાશન વ્યક્તિથી નહીં નીતિથી ચાલે છે. ગાદી ઉપર વ્યક્તિ બદલાય પરંતુ નીતિ ન બદલાવવી જોઈએ. ક્યારેક બહુમત એક તરફ હોય અને નીતિ બીજી તરફ હોય તો પણ બહુમત કરતાં નીતિનું પાલન કરવું. અયોધ્યા છોડતા પેહલા બહુમત પ્રજા મને રોકી લેવાના મતમાં હતી પરંતુ નીતિ કહેતી હતી કે હું પિતાના વચનનું પાલન કરું. છેવાડાનો વ્યક્તિ પણ સુરક્ષિત અનુભવે તે સાશકનો ધર્મ છે.. ભેદભાવ વગર સર્વનું કલ્યાણ કરે તે જ રાજધર્મ છે.

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माँ की मृत्यु के बाद तीसरा दिन था । घर की परंपरा के अनुसार,
मृतक के वंशज उनकी स्मृति में अपनी प्रिय वस्तु का त्याग किया करते थे।
मैं आज के बाद बैंगनी रंग नही पहनूँगा।” बड़ा बेटा बोला ।
वैसे भी जिस ऊँचे ओहदे पर वो था, उसे बैंगनी रंग शायद ही कभी पहनना पड़ता। फिर भी सभी ने तारीफें की।..
मँझला कहाँ पीछे रहता, “मैं ज़िदगी भर गुड़ नही खाऊँगा।”
ये जानते हुए भी कि उसे गुड़ की एलर्जी है, पिता ने
सांत्वना की साँस छोड़ी।
अब सबकी निगाहें छोटे पर थी। वो स्तब्ध सा माँ के चित्र को तके जा रहा था। तीनों बेटों की व्यस्तता और अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता के चलते, माँ के अंतिम समय कोई नहीं पहुँच पाया था। सब कुछ जब पिता कर चुके, तब बेटों के चरण घर से लगे।
“मेरे तीन बेटे और एक पति, चारों के कंधों पर चढ़कर श्मशान जाऊँगी मैं।” माँ की ये लाड़ भरी गर्वोक्ति कितनी ही बार सुनी थी उसने और आज उसका खोखलापन भी देख लिया ।
“बोलिये Rajuजी,” पंडितजी की आवाज़ से
उसकी तंद्रा भंग हुई।………
आप किस वस्तु का त्याग करेंगे अपनी माता की स्मृति में ?”
बिना सोचे वो बोल ही तो पड़ा था, “पंड़ितजी, मैं अपने थोड़े से काम का त्याग करूंगा, थोड़ा समय बचाऊंगा और अपने पिताजी को अपने साथ ले
जाऊंगा।”और पिता ने लोक-लाज त्यागकर बेटे की गोद में सिर दे दिया था।

Posted in संस्कृत साहित्य

क्या आपको पता है मृतक का सिर दक्षिण दिशा की ओर ही क्यों रखना चाहिए❓❓

मृत देह को दक्षिणोत्तर क्यों रखते हैं ❓❓

जीव की प्रेतवत् अवस्था, पंचप्राणों एवं उपप्राणों के स्थूल देह संबंधी कार्य की समाप्ति दर्शाती है । जिस समय जीव निष्प्राण हो जाता है, उस समय जीव के शरीर में तरंगों का वहन लगभग थम सा जाता है व उसका रूपांतर ‘कलेवर’ में होता है ।

‘कलेवर’ अर्थात स्थूल देह की किसी भी तरंग को संक्रमित करने की असमर्थता दर्शाने वाला अंश । ‘कलेवर’ अवस्था में देह से निष्कासन योग्य सूक्ष्मवायुओं का वहन बढ जाता है ।

मृत देह को दक्षिणोत्तर रखने से कलेवर की ओर दक्षिणोत्तर में भ्रमण करने वाली यम तरंगें आकर्षित होती हैं और मृत देह के चारों ओर इन तरंगों का कोष तैयार हो जाता है । इससे मृत देह की निष्कासन योग्य सूक्ष्म वायुओं का अल्प कालावधि में विघटन होता है ।

निष्कासन योग्य सूक्ष्म वायुओं का कुछ भाग मृत देह की नासिका व गुदा (मलद्वार) से वातावरण में उत्सर्जित होता है । इस प्रक्रिया के कारण, निष्कासन योग्य रज-तमात्मक दूषित वायुओं से मृत देह मुक्त हो जाता है,

जिससे वातावरण में संचार करने वाली अनिष्ट शक्तियों के लिए देह को वश में करना बहुत कठिन हो जाता है । इसीलिए मृतदेह को दक्षिणोत्तर रखा जाता है ।

व्यक्ति की मृत्यु होने के उपरांत उस की देह घर में रखते समय उसके पैर दक्षिण दिशा की ओर क्यों करते हैं ❓

👉 दक्षिण यम दिशा है । व्यक्ति का प्राणोत्क्रमण होते समय उसके प्राण यम दिशा की ओर खींचे जाते हैं ।

देह से प्राण बाहर निकलने के उपरांत अन्य निष्कासन-योग्य वायु का देह से उत्सर्जन प्रारंभ होता है । इस उत्सर्जन की तरंगों की गति तथा उनका आकर्षण/खींचाव भी अधिक मात्रा में दक्षिण दिशा की ओर होता है ।

👉 व्यक्ति की कटि के निचले भाग से (कमर के नीचे का भाग) अधिक मात्रा में वासनात्मक तरंगों का उत्सर्जन होता रहता है, वह अधिक उचित पद्धति से हो, इसके लिए यम तरंगो के वास्तव्य वाली दक्षिण दिशा की ओर ही उस व्यक्ति के पैर रखने का शास्त्र है ।

ऐसा करने से यम तरंगों की सहायता प्राप्त होकर व्यक्ति की देह से उसके पैर की दिशा से अधोगति से अधिकाधिक निष्कासन-योग्य तरंगे खिंचकर इस वायु का योग्य प्रकार से अधिकतम मात्रा में उत्सर्जन होता है।

जिससे चिता पर रखने से पूर्व देह अधिकतम मात्रा में रिक्त हो जाती है । यह दिशा अधिकाधिक स्तर पर देह से बाह्य दिशा में विसर्जित होने वाली निष्कासन-योग्य वायु के प्रक्षेपण के लिए पूरक होती है ।

👉 यम (दक्षिण) दिशा में यम देवता का अस्तित्व होता है । इसलिए उन के सान्निध्य में देह से प्रक्षेपित होने वाली निष्कासन योग्य वायु के उत्सर्जन के उपरांत विलिनीकरणात्मक प्रक्रिया अधिकाधिक प्रमाण में दोष विरहित करने का प्रयास किया जाता है,

अन्यथा निष्कासन-योग्य वायु के उत्सर्जन के लिए संबंधित दिशा पूरक न रखने पर, ये तरंगें घर में अधिक समय तक घनीभूत होने की संभावना होती है; इसलिए यमदिशा की ओर इस निष्कासन-योग्य तरंगों का वहन होने के लिए मृत व्यक्ति के पैर घर में दक्षिण दिशा की ओर रखने की पद्धति है ।

मृत देह घर में रखते समय मृतक के पैर दक्षिण दिशा में रखने का शास्त्र ज्ञात न होने के कारण वर्तमान में कुछ स्थानों पर घर में मृतदेह रखते समय मृतक के पैर उत्तर की ओर रखने का अयोग्य कृत्य किया जाता है ।

मृतदेह को श्मशान में ले जाने के उपरांत मृतदेह चिता पर रखते समय मृतक के पैर उत्तर दिशा में रखना आवश्यक होता है ।

अंतिम संस्कार के समय कपाल क्रिया का सच….

हम सभी ने शमशान में अंत्येष्टि के समय देखा है कि मृतक व्यक्ति की चिता जलने के कुछ समय उपरांत सिर पर लकड़ी का डंडा मारा जाता है।

शव को मुखाग्नि देने के करीब आधे घंटे बाद जब शव की चमड़ी और मांस का ज्यादातर भाग जल चुका होता है, तब एक बांस में लोटा बांधकर शव के सिर वाले हिस्से में और घी डाला जाता है।

जिससे की सिर का कोई हिस्सा जलने से न बच जाए। इसे कपाल क्रिया कहते हैं। गरुड़ पुराण की मान्यता अनुसार अगर सिर या दिमाग का कोई हिस्सा जलने से रह जाए तो इंसान को अगले जन्म में पिछले जन्म की बातें याद रह जाती हैं।

इसीलिए अच्छी तरह से जलाया जाता है। अगर पिछले जन्म में इंसान की मृत्यु किसी दुखद कारण की वजह से हुई है तो नए जन्म में उसको याद रखने से मनुष्य फिर दुःखी हो जाएगा और लगातार उसके दिमाग में पूर्व जन्म की बातें और अपने करीबियों का दुःख घूमता रहेगा।

इस बात में मतभेद यह है कि कपाल क्रिया करने से इस जन्म की यादाश्त भूल कर आत्मा अगले जन्म को स्वीकार कर लेती है। दूसरा मतभेद यह है कि कपाल क्रिया करने से सहस्रार चक्र खुल जाता है, और आत्मा ज्ञान मार्ग से मोक्ष को प्राप्त होति है।

पहला मत को पूर्णतया सत्य नही कहा जा सकता है, यादाशत आत्मा के साथ रहती ही है, चाहे भले ही अगले जन्म में वह उसे भूल जाए, परंतु पिछले सभी जन्मों की याद आत्मा या अवचेत्तन मन में हमेशा रहती है। इसलिए कपाल क्रिया का इससे कोई संबंध नहीं।

जहाँ तक दुसरे मत का सवाल है, बहुत हद तक वह सत्य है। सहस्रार चक्र से आत्मा के गमन से ज्ञान मार्ग से आत्मा को मोक्ष मिल सकता है। लेकिन तभी जब आत्मा सहस्रार चक्र से निकले।

यहाँ तो आत्मा पहले ही शरीर छोड़ चुकी है, सिर्फ शव पड़ा है आपके सामने। फिर क्यों किया जाए कपाल क्रिया?

बौद्ध धर्म में ख़ास तौर से तिब्बत के कुछ लामा मंत्रो से मृत्यु शय्या पर पड़े कुछ लोगो की आत्मा सहस्रार चक्र से निकालने का दावा करते है।

यह एक बहुत बड़ा व्यवसाय भी बन गया है जिसके लिए लाखों रूपए भी लिए जाते है। सनातन धर्म में भी समाधि द्वारा मृत्यु से पूर्व आसन लगा कर आत्मा को सहस्रार चक्र से निकाला जाता है, लेकिन यह एक योगी ही कर सकता है, आम आदमी नहीं।

फिर कपाल क्रिया क्यों?

और क्या यह जरूरी है?

जी, यह जरूरी है। यह कर्म कांड का हिस्सा तो नहीं है, लेकिन इसे बाद में कर्म कांड का हिस्सा बना दिया गया। इसका कारण थे दुष्ट तांत्रिक। बहुत से दुष्ट तांत्रिक शमशान से कपाल इखट्टे कर लेते है।

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स्वार्थी दोस्त किस काम के


एक खरगोश था। उसके कई मित्र थे। घोड़ा, बैल, बकरा, भेड़ आदि। लेकिन उनकी मित्रता कितनी सच्ची है, उसे यह परखने का अवसर नहीं मिला था।

एक दिन उसे यह मौका तब मिला, जब वह स्वयं संकट में पड़ गया।

उस दिन कुछ शिकारी कुत्ते उसके पीछे पड़ गये। यह देखकर खरगोश जान बचाने के लिये भागने लगा। भागते-भागते दम फूलने लगा। वह थककर चूर हो गया। जब और अधिक नहीं भाग पाया तो कुत्तों को चकमा देकर वह एक घनी झाड़ी में घुस गया और वहीं छिपकर बैठ गया। पर उसे यह डर सता रहा था कि कुत्ते किसी भी क्षण वहां आ पहुंचेंगे और सूंघते-सूंघते उसे ढूंढ निकालेंगे।

वह समझ गया कि यदि समय पर उसका कोई मित्र न पहुंच सका, तो उसकी मृत्यु निश्चित है। वह अपने मित्रों को याद करने लगा। यदि घोड़ा आ गया तो वह मुझे अपनी पीठ पर बैठाकर ले भागेगा। यदि बैल आ गया तो अपने पैने सींगों से इनके पेट फाड़ देगा। यदि भेड़ आ गई तो वह टक्करें मारकर इनकी अक्ल दुरूस्त कर देगी।

तभी उसकी नजर अपने मित्र घोड़े पर पड़ी। वह उसी रास्ते पर तेजी से दौड़ता हुआ आ रहा था।

खरगोश ने घोड़े को रोका और कहा, ”घोड़े भाई! कुछ शिकारी कुत्ते मेरे पीछे पड़े हुए हैं। तुम मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर कहीं दूर ले चलो वरना ये शिकारी कुत्ते मुझे मार डालेंगे।“

घोड़े ने कहा, ”प्यारे भाई! मैं तुम्हारी मदद तो जरूर करता, पर इस समय मैं बहुत जल्दी में हूं। वह देखो, तुम्हारा मित्र बैल इधर ही आ रहा है। तुम उससे कहो, वह जरूर तुम्हारी मदद करेगा।“

यह कहकर घोड़ा सरपट दौड़ता हुआ चला गया।

खरगोश ने बैल से प्राथना की, ”बैल दादा ! कुछ शिकारी कुत्ते मेरा पीछा कर रहे हैं। कृपया आप मुझे अपनी पीठ पर बिठा लें और कहीं दूर ले चलें, नहीं तो कुत्ते मुझे मार डालेंगे।“

”भाई खरगोश! मैं तुम्हारी मदद जरूर करता, पर इस समय मेरे कुछ दोस्त बड़ी बेचैनी से मेरा इंतजार कर रहे होंगे, इसलिए मुझे वहां जल्दी पहुंचना है। देखो, तुम्हारा मित्र बकरा इधर ही आ रहा है, उससे कहो, वह जरूर तुम्हारी मदद करेगा।“

यह कहकर बैल भी चला गया।

खरगोश ने बकरे से विनती की, ”बकरे चाचा! कुछ शिकारी कुत्ते मेरा पीछा कर रहे हैं। तुम मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर कहीं दूर ले चलो, तो मेरे प्राण बच जायेंगे, वरना वे मुझे मार डालेंगे।“

बकरे ने कहा, ”बेटा! मैं तुम्हें अपनी पीठ पर दूर तो ले जाऊं, पर मेरी पीठ खुरदरी है। उस पर बैठने से तुम्हारे कोमल शरीर को बहुत तकलीफ होगी। मगर चिंता न करो, देखो, तुम्हारी दोस्त भेड़ इधर ही आ रही है, उससे कहोगे तो वह जरूर तुम्हारी मदद करेगी।“ यह कहकर बकरा भी चलता बना।

खरगोश ने भेड़ से भी मदद की याचना की, पर उसने भी खरगोश से बहाना करके अपना पिंड छुड़ा लिया।

इस तरह खरगोश के सभी मित्र वहां से गुजरे। खरगोश ने सभी से मदद करने की प्रार्थना की, पर किसी ने उसकी मदद नहीं की। सभी कोई न कोई बहाना कर चलते बने।

खरगोश ने मन ही मन कहा, ‘अच्छे दिनों में मेरे अनेक मित्र थे। पर आज संकट के समय कोई मित्र काम नहीं आ रहा। मेरे सभी मित्र केवल अच्छे दिनों के ही साथी हैं।

थोड़ी देर में उसे खोजते शिकारी कुत्ते वहां भी आ पहुंचे। उन्होंने बेचारे खरगोश को मार डाला। अफसोस की बात है कि इतने सारे मित्र होते हुए भी खरगोश बेमौत मारा गया।
ये नीति श्लोक भी इसकी पुष्टि करते हैं I

पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्यां निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति ।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ॥

भावार्थ :- पाप (अहित) कर्मो से हटा कर हित योग्य कर्मो में लगाता है , गुप्त रखने योग्य बातों को छिपाकर गुणों को प्रगट करता है , आपदा के समय जो साथ खड़ा होता है , संतो ने यही सन्मित्र के लक्षण बताये हैं |

कराविव शरीरस्य नेत्र्योरिव पक्ष्मनी।
अविचार्य प्रियं कुर्यात् तन्मित्रं मित्रमुच्यते।।

जिस प्रकार मनुष्य के दोनों हाथ किसी खतरे से स्वतः शरीर की अनवरत रक्षा करते हैं। और पलकें खतरे का आभास होते ही आँख की रक्षा के लिये तुरंत बंद हो जाती हैं ।
इसी प्रकार एक सच्चा मित्र भी बिना कुछ कहे सुने विपत्ति में मित्र की सहायता के लिये दौड़ पड़ता है ।

उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥
चाणक्य नीति अध्याय १/१२

वे ही सच्चे मित्र होते हैं जो –
“जरूरत के समय , दुःख में, अकाल के समय, युद्ध में , राजदरबार में और मरघट (श्मशान) में साथ नहीं छोड़ते हैं।”

दातुः परीक्षा दुर्भिक्षे रणे शूरस्य जायते I
आपत्काले तु मित्रस्याशक्तौस्त्रीणां कुलस्य हि II
विनतेः संकटे प्राप्ते Sवितथस्य परोक्षतःI
सुस्नेहस्य तथा तात नान्यथा सत्यमीरितम् II
शिवपुराण १७ I१२-१३

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अंधविश्वास


एक समय की बात है, एक गुरूजी अपने कुछ शिष्यों के साथ जंगल में आश्रम बनाकर रहने लगे थे। एक दिन, रास्ता भटककर एक बिल्ली का बच्चा उनके आश्रम में आ गया। गुरूजी ने उस भूखे और प्यासे बिल्ली के बच्चे को दूध-रोटी खिलाया, और उसे आश्रम में रहने दिया। धीरे-धीरे वह बच्चा वहीं रहने लगा, लेकिन उसके आने के बाद गुरूजी को एक समस्या का सामना करना पड़ा। जब वे शाम को ध्यान करने बैठते, तो वह बच्चा कभी उनकी गोद में चढ़ जाता, कभी कंधे या सिर पर बैठ जाता। यह उन्हें ध्यान में एकाग्र होने में कठिनाई पैदा करता।

तब गुरूजी ने अपने एक शिष्य को आदेश दिया, “जब तक मैं ध्यान पर बैठूं, तुम इस बच्चे को किसी पेड़ से बांध आया करो।” यह नियम बन गया और रोज़ यही होने लगा।

कुछ समय बाद गुरूजी की मृत्यु हो गई, और उनके एक प्रिय शिष्य को उनकी गद्दी पर बिठाया गया। वही शिष्य भी जब ध्यान करने बैठता, तो पहले उस बिल्ली के बच्चे को पेड़ से बांधने की आदत रखता। फिर एक दिन एक अनहोनी घटित हो गई – वह बिल्ली मर गई। अब शिष्यों में एक बड़ी समस्या आ गई, और वे तय नहीं कर पा रहे थे कि अब क्या किया जाए। उन्होंने विचार किया और निर्णय लिया कि एक नई बिल्ली लाई जाए, क्योंकि बड़े गुरूजी भी तो यही करते थे।

काफी तलाश करने के बाद एक और बिल्ली मिली, जिसे पेड़ से बांधकर ध्यान पर बैठने का सिलसिला जारी रखा गया। यह सिलसिला इस प्रकार चलता रहा। समय के साथ, कई गुरु और कई बिल्लियाँ मर चुकी थीं, लेकिन यह परंपरा जस की तस बनी रही। अगर किसी से पूछा जाता, तो वे यही कहते कि यह परंपरा हमारे पूर्वजों ने बनाई थी और वे गलत नहीं हो सकते। इसलिए, यह परंपरा हमें भी निभानी है।

यह तो था उन गुरूजी और उनके शिष्यों का हाल, लेकिन क्या हम खुद भी अंधविश्वास और बिना सोचे-समझे परंपराओं का पालन नहीं कर रहे हैं? क्या हम अपने जीवन में ऐसी “बिल्लियाँ” नहीं पालते, जिन्हें हम बिना विचार किए हर दिन निभाते हैं?

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मित्रता की परिभाषा


एक समय की बात है। एक बेटे को अपने कई मित्रों पर बहुत घमंड था। उसे विश्वास था कि उसके मित्र हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहेंगे। दूसरी ओर, उसके पिता का केवल एक ही मित्र था, लेकिन वह मित्रता की सच्ची मिसाल था।

एक दिन, पिता ने बेटे से कहा, “तुम्हारे इतने सारे मित्र हैं, तो क्यों न उनकी सच्चाई की परख की जाए?” बेटा सहर्ष तैयार हो गया।

रात को लगभग 2 बजे, पिता और बेटा, बेटे के सबसे घनिष्ठ मित्र के घर पहुंचे। बेटे ने दरवाजा खटखटाया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। काफी देर तक खटखटाने के बाद, अंदर से आवाज आई। बेटे का मित्र अपनी माँ से कह रहा था, “माँ, कह दो मैं घर पर नहीं हूँ।” यह सुनकर बेटे का मन उदास हो गया। निराश होकर वह अपने पिता के साथ घर लौट आया।

घर लौटते समय पिता ने कहा, “अब तुझे मेरे मित्र से मिलवाता हूँ।” रात के उसी समय पिता अपने एकमात्र मित्र के घर पहुंचे। पिता ने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई, “दो मिनट ठहरो मित्र, मैं अभी दरवाजा खोलता हूँ।”

जब दरवाजा खुला, तो पिता का मित्र एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार लेकर खड़ा था। यह देखकर बेटे को आश्चर्य हुआ। पिता ने पूछा, “यह क्या है मित्र?”

मित्र मुस्कुराकर बोला, “मित्र, तुमने इतनी रात को मेरा दरवाजा खटखटाया है, तो जरूर किसी परेशानी में हो। मुसीबतें दो प्रकार की होती हैं – रुपये-पैसे की या किसी झगड़े की। यदि तुम्हें धन की आवश्यकता हो तो यह थैली ले जाओ, और यदि किसी से झगड़ा हो गया हो तो यह तलवार लेकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ।”

पिता की आँखें भर आईं। उन्होंने अपने मित्र से कहा, “मित्र, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो बस अपने बेटे को सच्ची मित्रता का मतलब समझा रहा था।”

उस दिन बेटे को समझ में आ गया कि मित्रता केवल संख्या का खेल नहीं है। सच्चा मित्र वही होता है, जो हर परिस्थिति में आपके साथ खड़ा रहे।

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अभ्यास का महत्त्व


प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। वे न केवल शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करते थे, बल्कि आश्रम की देखभाल भी करते थे। यह शिक्षा जीवन को संतुलित और समग्र रूप से सिखाती थी।

इसी तरह, वरदराज भी अपने परिवार का एक सामान्य सा बच्चा था। उसे पढ़ाई में कोई खास रुचि नहीं थी, फिर भी उसे गुरुकुल भेजा गया। वह वहां अपने साथियों के साथ घुलमिल कर रहा था, लेकिन पढ़ाई में उसे कोई खास सफलता नहीं मिल रही थी।

गुरुजी ने उसे सिखाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन वरदराज के लिए कोई बात आसान नहीं थी। हर बार जब गुरुजी उसे समझाते, तो वह सिर्फ उलझन में ही पड़ता। उसके साथी, जो जल्दी सीख जाते थे, वह अगली कक्षा में चले गए, लेकिन वरदराज वहीं रुक गया।

अंत में, गुरुजी ने उसे समझाया, “बेटा वरदराज, मैंने अपनी पूरी कोशिश कर ली है, लेकिन तुम सीखने में सक्षम नहीं हो। अब तुम अपना समय यहां बर्बाद मत करो। घर जाकर अपने परिवार की मदद करो।”

वरदराज को लगा कि शायद शिक्षा उसकी किस्मत में नहीं है। उसने दुखी मन से गुरुकुल छोड़ने का फैसला किया। वह घर की ओर लौटने लगा, लेकिन रास्ते में कुछ हुआ जो उसकी सोच को बदलने वाला था।

दोपहर का समय था और उसे प्यास लग रही थी। वह पास में स्थित एक कुएं पर गया, जहां कुछ महिलाएं पानी भर रही थीं। उसने देखा कि कुएं से पानी खींचने के लिए रस्सी को बार-बार खींचने पर पत्थरों पर गहरे निशान बन गए थे। यह देखकर वरदराज ने उन महिलाओं से पूछा, “यह निशान कैसे बने?”

एक महिला मुस्कराते हुए बोली, “बेटे, ये निशान हमने नहीं बनाए। यह तो रस्सी के बार-बार खींचने से बने हैं। जब रस्सी बार-बार कठोर पत्थर से रगड़ती है, तो वह भी उस पर गहरे निशान बना देती है।”

यह सुनकर वरदराज सोच में पड़ गया। उसने मन ही मन विचार किया, “यदि एक कोमल रस्सी बार-बार रगड़ने से कठोर पत्थर पर निशान बना सकती है, तो क्या मैं भी लगातार प्रयास से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता?”

यह विचार उसके मन में गहरे रूप से बैठ गया। उसने ठान लिया कि अब वह हर हाल में प्रयास करेगा। अपनी मर्जी और मेहनत से उसने गुरुजी के पास वापस जाने का निर्णय लिया।

गुरुकुल लौटकर उसने पहले से कहीं ज्यादा मेहनत करना शुरू किया। गुरुजी ने उसकी कड़ी मेहनत देखी और उसे प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे वरदराज ने न केवल अपनी कठिनाईयों को पार किया, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में शानदार सफलता हासिल की।

कुछ सालों बाद, वही मंदबुद्धि बालक वरदराज संस्कृत व्याकरण का महान विद्वान बना। उसने लघुसिद्धान्‍तकौमुदी, मध्‍यसिद्धान्‍तकौमुदी, सारसिद्धान्‍तकौमुदी, और गीर्वाणपदमंजरी जैसी महत्वपूर्ण रचनाएं कीं। उसकी मेहनत और अभ्यास ने उसे महान बना दिया, और आज भी उसके योगदान को याद किया जाता है।

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दो परिवार


कहानी: एक शांत बस्ती में दो परिवार एक-दूसरे के पड़ोस में रहते थे। दोनों परिवारों का जीवन बिल्कुल अलग था। पहले परिवार में हर वक्त लड़ाई-झगड़े और तनाव का माहौल रहता था, जबकि दूसरा परिवार हमेशा शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण वातावरण में रहता।

पहले परिवार की पत्नी ने अक्सर पड़ोसी परिवार को देखकर ईर्ष्या महसूस की। उसे यह समझ नहीं आता था कि आखिर वे इतना खुशहाल और शांत कैसे रहते हैं। एक दिन उसने अपने पति से कहा,
“तुम जाकर पता करो कि हमारे पड़ोसी इतने अच्छे तरीके से कैसे रहते हैं। उनकी खुशहाली का राज़ क्या है?”

पति को यह विचार सही लगा। अगले दिन उसने छिपकर पड़ोसी के घर में झांकने की योजना बनाई। वह चुपके से उनके घर के पास गया और खिड़की के पास छिपकर देखने लगा।

उसने देखा कि पड़ोसी परिवार की पत्नी फर्श पर पोछा लगा रही थी। तभी किचन से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई, और वह जल्दी-जल्दी किचन की ओर चली गई। इसी दौरान उसका पति कमरे की तरफ जाने लगा। उसका ध्यान फर्श पर रखी बाल्टी पर नहीं गया, और ठोकर लगने से बाल्टी का सारा पानी फर्श पर फैल गया।

पड़ोसी की पत्नी किचन से लौटकर आई और जैसे ही उसने पानी फैला देखा, उसने तुरंत कहा,
“आई एम सॉरी, डार्लिंग। यह मेरी गलती है। मुझे बाल्टी को रास्ते से हटा देना चाहिए था।”

पति ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“नहीं डार्लिंग, गलती मेरी है। मुझे ध्यान देना चाहिए था।”

यह सुनकर झगड़ालू परिवार का पति हैरान रह गया। उसने सोचा कि अगर यह घटना उनके घर में हुई होती, तो अब तक चीख-पुकार मच चुकी होती।

वह चुपचाप घर लौट आया। उसकी पत्नी ने उत्सुकता से पूछा,
“तो पता चला उनके खुशहाल जीवन का राज़?”

पति ने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया,
“उनमें और हममें फर्क यह है कि हम हमेशा खुद को सही साबित करने में लगे रहते हैं और दूसरे को उसकी गलती के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। जबकि वे अपनी गलती मानने के लिए तैयार रहते हैं और हर चीज़ के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेते हैं। यही उनकी खुशहाली का राज़ है।”

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बाइज्जत बरी


सुबह का माहौल हमेशा की तरह व्यस्त था। घर की दीवारें हलचल से गूंज रही थीं। वह, अपने छोटे से बच्चे को सुलाकर, आज पहली बार बुटीक जाने की तैयारी में थी।

“सुनो! मैं बुटीक होकर आती हूं,” उसने दरवाजे से झांकते हुए कहा।
“हां, ठीक है,” पति ने जवाब दिया। वह अपने लैपटॉप पर झुका हुआ था, म्यूजिक सुनते हुए ऑफिस के काम में डूबा था।

उसने किचन की ओर रुख किया। दूध की बोतल प्लेटफार्म पर रखी और जल्दी से कहा, “बाबू सो रहा है। अगर रोए तो दूध की बोतल दे देना।”
पति ने कान में लगे हेडफोन के साथ बस सिर हिला दिया, जैसे उसकी बात सुनी हो।

ऑनलाइन बुक किया गया ऑटो नीचे खड़ा इंतजार कर रहा था। वह जल्दी-जल्दी लिफ्ट में दाखिल हुई और मन ही मन खुद को शांत करने की कोशिश करने लगी। लेकिन आज पहली बार बच्चा छोड़ने का गिल्ट उसे भीतर से मथ रहा था। ऑटो में बैठते ही दर्द और बढ़ गया।

“भैया, दो मिनट रुकेंगे? लगता है कुछ छूट गया है।”
“ठीक है, मैडम। जल्दी कीजिए,” ड्राइवर ने संयमित आवाज में कहा।

लिफ्ट जैसे उसके इंतजार में ही ग्राउंड फ्लोर पर रुकी हुई थी। वह अंदर गई, बटन दबाया और लिफ्ट सीधा पांचवी मंजिल की ओर बढ़ गई। जैसे ही दरवाजा खुला, बच्चे के रोने की तीखी आवाज उसके कानों में पड़ी। उसका दिल धक से रह गया।

दरवाजे को हल्के से धकेलते ही देखा कि बच्चा बेतहाशा रो रहा था। और उसका पति? कान में हेडफोन लगाए, लैपटॉप की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए, जैसे दुनिया से बेखबर हो। वह वहीं बैठा था, मानो कुछ हुआ ही न हो।

वह लगभग दौड़ती हुई बच्चे के पास गई। गोद में उठाया और सीने से चिपका लिया। उसकी छोटी-छोटी सिसकियों ने मानो मां के दिल के सारे गिल्ट को गहरी सांसों में बहा दिया। उसने प्लेटफार्म से दूध की बोतल उठाई और बैग में डाली।

इस बार वह शांत नहीं रह पाई। उसने पति के कंधे पर हाथ रखा।
“तुम तो बुटीक जा रही थी ना?”
“हां। जा रही हूं। दरवाजा बंद कर लेना,” उसने धीमी पर भावुक आवाज में कहा।

पति ने इस बार हेडफोन निकाला, जैसे कुछ गलत समझ आया हो। लेकिन वह बिना कोई और बात किए लिफ्ट की ओर बढ़ गई।

लिफ्ट से नीचे उतरते वक्त उसके मन में हजारों सवाल थे। “क्या पुरुष इतने लापरवाह होते हैं?” उसका दिल गुस्से और दुख के भावों से भर गया। लेकिन दूसरे ही पल उसने खुद को संभाला। “शायद हेडफोन की वजह से उसने सुना ही न हो।”

उसने बिना एक भी शिकवा किए, अपने मन के इल्जाम को हटा दिया। उसने पति को ‘बाइज्जत बरी’ कर दिया।

जब वह गोद में बच्चे को लिए वापस ऑटो में बैठी, तो ड्राइवर ने मन ही मन सोचा, “कैसी मां है! बच्चे को ही भूल आई।” लेकिन उसकी मुस्कान में जो सुकून और दृढ़ता थी, वह देखकर वह कुछ कह न सका।

“चलो, भैया,” उसने सहजता से कहा।

ऑटो चल पड़ी। अब उसके चेहरे पर सुकून था। उसने अपनी जिम्मेदारी और प्यार के बीच संतुलन बना लिया था।