Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

બોમ્બેની એક સાધારણ રેસ્ટોરન્ટમાં એક માણસે પેટ ભરીને ભોજન કર્યું અને વેઈટરે બિલ આપ્યું ત્યારે તે સીધો મેનેજર પાસે ગયો અને પ્રામાણિકપણે કબૂલ્યું કે તેની પાસે પૈસા નથી.  અને કહ્યું , છેલ્લા બે દિવસથી ખાધું ન હતું અને તે ખૂબ જ ભૂખ્યો હતો તેથી તેને આ કર્યું.

મેનેજરે ધીરજપૂર્વક તેની વાર્તા સાંભળી કારણ કે તે વ્યક્તિએ વચન આપ્યું હતું કે જે દિવસે તેને નોકરી મળશે તે દિવસે તે બિલની ચૂકવા આવશે..  મેનેજરે હસતાં હસતાં કહ્યું કે તેને નસીબની શુભેચ્છા પાઠવીને કહ્યું જાવ.  નાટક જોઈને ઊભો રહેલો વેઈટર સ્તબ્ધ હતો.  તેણે મેનેજરને પ્રશ્ન કર્યો, “સાબ તમે તેને કેમ જવા દીધો”.  મેનેજરે જવાબ આપ્યો, “જાઓ અને તમારું કામ કરો એ અવશ્ય આવશે”.

થોડા મહિનાઓ પછી તે જ માણસ રેસ્ટોરન્ટમાં આવે છે અને  બાકી બિલનું ચૂકતે કર્યું. તે વ્યક્તિએ મેનેજરનો આભાર માન્યો અને કહ્યું કે તેને અભિનયની ઓફર મળી છે.  મેનેજરે દેખીતી રીતે ખુશ થઈને તેને ચાનો કપ ઓફર કર્યો અને બંને વચ્ચે મિત્રતા ખીલી.  અભિનેતા ટૂંક સમયમાં જાણીતો ચહેરો બની ગયો અને તેણે એક સમયે અનેક ફિલ્મો કરી.

બાદમાં તેની પાસે એક બંગલો અને કાર હતી.  સમય બદલાઈ ગયો હતો પરંતુ જ્યારે પણ તે તે વિસ્તારમાંથી પસાર થતા ત્યારે તે  મેનેજર સાથે ચાના કપ માટે રેસ્ટોરન્ટની મુલાકાત લેતા જ..જ્યાં વર્ષો પહેલા અવિશ્વસનીય સહાનુભૂતિ દર્શાવી હતી.

વિશ્વાસ ક્યારેક અજાયબીઓ કરે છે.  જો તે દિવસે મેનેજરે ભૂખ્યા માણસને માર માર્યો હોત અને અપમાનિત કર્યો હોત તો કદાચ ફિલ્મ ઉદ્યોગને ઓમ પ્રકાશ નામનો પ્રતિભાશાળી અને કુદરતી અભિનેતા ન મળ્યો હોત.

પીઢ અભિનેતાને આજે તેમની જન્મજયંતિ પર યાદ કરીએ છીએ.   ભગવાન તેમના આત્માને શાશ્વત શાંતિ આપે.
_(19 ડિસેમ્બર 1919 – 21 ફેબ્રુઆરી 1998

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🇮🇳 #महर्षि #पाणिनि के बारे में जाने

पाणिनि (५०० ई पू) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं।
#संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है।

एक #शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध #जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा…

“मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि #अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके। इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है।…
#अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके।”

The M L B D #News letter (A monthly of indological bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first software man without hardware घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था “Sanskrit software for future hardware” जिसमे बताया गया प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, #वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, परआज भी दुनिया भर में #कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।

व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और #तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।

NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी। उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों #डॉलर खर्च किये गये।

महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या #तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।

पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार…

“पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है” (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।

“पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं” (कोल ब्रुक)।

“संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है… यह मानवीय #मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है” (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।

“पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा”।

(प्रो. मोनियर विलियम्स)।

#fbpost2024fb #highlights2024 #viralpost2024シ #fbpost2024 #viralpost2024 #quotes #viralpage #explorepage #History_Of_Things  #memes #history #highlight #fbpost #fbviral
#ved #virals

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🇮🇳 #महर्षि #पाणिनि के बारे में जाने

पाणिनि (५०० ई पू) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं।
#संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है।

एक #शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध #जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा…

“मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि #अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके। इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है।…
#अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके।”

The M L B D #News letter (A monthly of indological bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first software man without hardware घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था “Sanskrit software for future hardware” जिसमे बताया गया प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, #वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, परआज भी दुनिया भर में #कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।

व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और #तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।

NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी। उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों #डॉलर खर्च किये गये।

महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या #तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।

पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार…

“पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है” (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।

“पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं” (कोल ब्रुक)।

“संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है… यह मानवीय #मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है” (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।

“पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा”।

(प्रो. मोनियर विलियम्स)।

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Posted in हिन्दू पतन

ये देश जस्टिस #एमबी_सोनी का भी कर्जदार है..
अन्यथा मोदी-शाह की जोड़ी का आज पता नहीं क्या हस्र होता? गुजरात हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस एमबी सोनी ने इसका खुलासा तब किया जब उन्होंने पाया कि गुजरात दंगो से सम्बन्धित कोई भी याचिका, जो तीस्ता सेतलवाड सुप्रीम कोर्ट में दायर करती है वो सिर्फ जस्टिस आफताब आलम के बेंच में ही क्यों जाती है?

जबकि रोस्टर के अनुसार वो किसी और के बेंच में जानी चाहिए … फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि रजिस्ट्रार को ऊपर से आदेश था कि तीस्ता का केस जस्टिस आफ़ताब आलम के बेंच में ही भेजा जाए और इसके लिए रोस्टर को बदल दिया जाये फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि जस्टिस आफताब आलम की सगी बेटी अरुसा आलम, तीस्ता के एनजीओ सबरंग में पार्टनर है और उस समय के केबिनेट मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की पत्नी भी उसी NGO में  हैं, यह सब जानकर उन्होंने इसके खिलाफ चीफ जस्टिस को पत्र भेजा, और.जस्टिस आफ़ताब आलम, कांग्रेस नेता और हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की बेटी (जस्टिस अभिलाषा कुमारी) के 10 फैसलों की बकायदा आठ हजार पन्नों में विस्तृत विबेचना करके भेजा, और कहा कि इन लोगों ने खुलेआम न्यायव्यवस्था का बलात्कार किया है।
इसके बाद ही इस गैंग को गुजरात के हर एक मामले से अलग किया गया.

“अगर जस्टिस एम बी सोनी नहीं होते” तो कांग्रेस सरकार नरेंद्र मोदी को दंगों के मामलों में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर चुकी थी। कभी आपने इंडी गठबंधन नेताओं को एक दूसरे को चोर बोलते सुना है ?

जबकि इनमें से कुछ को सजा भी हो चुकी है, कोई जेल में है ,कोई बेल पर है और कुछ पर कोर्ट में मुकदमे चल रहे हैं, मगर ये लोग एक दूसरे को चोर कभी नहीं बोलते? परन्तु मोदी पर कोई भी आधिकारिक आरोप नहीं है, कोई FIR नहीं है, कोई मुकदमा भी नहीं चल रहा है और किसी कोर्ट ने किसी जाँच का आदेश भी नहीं दिया, उसे ये चोर बोलते हैं?

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।।
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।।
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो।।
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।।
साभार

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

તમે ઓફિસમાં કામ કરીને ઊભા થાવ ત્યારે તમારા ટેબલ પર પડેલા કાગળિયા, પેન-પાણીની બોટલ, એસીનું રિમોર્ટ આ બધું બરાબર પાછું એની જગ્યાએ બરાબર ગોઠવ્યા બાદ જ કેબિનમાંથી બહાર નીકળો? કે તમારો પટાવાળો બધું સરખું કરી દે?

તમે સવારે ઊંઘમાંથી ઊભા થયા હોવ ત્યારે બેડ પર આમતેમ પડેલા તકિયા-તમારું કંબલ આ બધાની ઊઠીને તરત ઘડી કરી, બેડ વ્યવસ્થિત કર્યા પછી જ રૂમની બહાર નીકળો? કે પહેલા ચા પીઓ-પછી બધા કામ?

એ છોકરો વર્લ્ડ ચેમ્પિયન બન્યો. અઢાર વર્ષની ઉંમરે તમે વર્લ્ડ ચેમ્પિયન બનો-ત્યારે ખુશીથી ઉછળી પડો, ચીસો પાડો, બૂમો પાડો, કૂદાકૂદ કરી મૂકો….અઢાર વર્ષનાં એણે આમાનું કંઇ કર્યું નહીં. એની સામેનો ખેલાડી લિરેન ડિફેન્ડિંગ ચેમ્પિયન હતો, એ હારવાની સાથે તરત ખુરશી પરથી ઊભો થઇ જતો રહ્યો-પણ માત્ર અઢાર વર્ષની ઉંમરે વર્લ્ડ ચેમ્પિયન બનેલો એ ત્યાં જ બેસી રહ્યો, રડતો રહ્યો ! એની સાથે ઘણાંએ હાથ મેળવ્યા પણ એ અભિનંદન સ્વીકારી ફરી પાછો ખુરશી પર બેસી ગયો અને ચેસ બોર્ડ પરનાં પ્યાદાને ફરી પાછા વ્યવસ્થિત ગોઠવવા માંડ્યો, એણે આખું બોર્ડ સરખી રીતે ગોઠવ્યું, ખુરશી પરથી ઊભો થયો અને ખુરશી પણ સરખી ગોઠવી ! મિટીંગ પૂરી થયા પછી ખુરશીને કોઇપણ દિશામાં ફરતી મૂકી દેનારાઓને આ વાત નહીં સમજાય.

આપણે પણ આવી એક ચેમ્પિયનશીપ રમતા હોઇએ છીએ. જમ્યા પછી થાળી ટેબલ પર જ મૂકી રાખવાની ચેમ્પિયનશીપ, અસ્તવ્યસ્ત ટેબલ-કપડાંઓ-ઘડી નહીં વળાયેલા કંબલથી બેડને અસ્તવ્યસ્ત રાખવાની ચેમ્પિયનશીપ, પટાવાળો ટેબલ સાફ કરી લેશેનાં ગુમાનની ચેમ્પિયનશીપ !!!

પણ વિશ્વ-વિજેતા એમનેમ બનાતું નથી !

અઢાર વર્ષનો દોમ્મારાજુ ગુકેશ ચેસમાં વર્લ્ડ ચેમ્પિયન બનવાની સાથે-સાથે “સંસ્કારનો વિશ્વકપ” પણ જીત્યો, “શિસ્તનો વિશ્વકપ” પણ જીત્યો !!

કોંગ્રેચ્યુલેશન્સ ગુકેશ દોમ્મારાજુ !

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!! मित्रता की परिभाषा !!
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एक बेटे के अनेक मित्र थे जिसका उसे बहुत घमंड था। पिता का एक ही मित्र था लेकिन था सच्चा। एक दिन पिता ने बेटे को बोला कि तेरे बहुत सारे दोस्त हैं उनमें से आज रात तेरे सबसे अच्छे दोस्त की परीक्षा लेते हैं। बेटा सहर्ष तैयार हो गया। रात को 2 बजे दोनों बेटे के सबसे घनिष्ठ मित्र के घर पहुंचे, बेटे ने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा नहीं खुला, बार-बार दरवाजा ठोकने के बाद अंदर से बेटे का दोस्त उसकी माताजी को कह रहा था माँ कह दे मैं घर पर नहीं हूँ। यह सुनकर बेटा उदास हो गया, अतः निराश होकर दोनों लौट आए।

फिर पिता ने कहा कि बेटे आज तुझे मेरे दोस्त से मिलवाता हूँ। दोनों पिता के दोस्त के घर पहुंचे। पिता ने अपने मित्र को आवाज लगाई। उधर से जवाब आया कि ठहरना मित्र, दो मिनट में दरवाजा खोलता हूँ। जब दरवाजा खुला तो पिता के दोस्त के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार थी। पिता ने पूछा, यह क्या है मित्र। तब मित्र बोला… अगर मेरे मित्र ने दो बजे रात्रि को मेरा दरवाजा खटखटाया है, तो जरूर वह मुसीबत में होगा और अक्सर मुसीबत दो प्रकार की होती है, या तो रुपये पैसे की या किसी से विवाद हो गया हो। अगर तुम्हें रुपये की आवश्यकता हो तो ये रुपये की थैली ले जाओ और किसी से झगड़ा हो गया हो तो ये तलवार लेकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। तब पिता की आँखें भर आई और उन्होंने अपने मित्र से कहा कि, मित्र मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं, मैं तो बस मेरे बेटे को मित्रता की परिभाषा समझा रहा था।

शिक्षा:-
अतः बेशक मित्र, एक चुनें, लेकिन नेक चुनें।

सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
🙏🚩जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।

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एक शादीशुदा जोड़ा अपना सेकंड हनीमून मनाने के लिए क्रूज टूर पर गए। इस दौरान वे अपने बच्चों को घर पर ही छोड़ गए थे। बदनसीबी से खराब और बहुत ही तूफानी मौसम के कारण क्रूज शिप डूबने लगी

सभी लोगों की तरह वे दोनों भी अपनी जान बचाने के लिए लाइफबोट एरिया की तरफ दौड़े..लेकिन वहां भी सिर्फ एक ही व्यक्ति के लिए जगह बची हुई थी! अपनी पत्नी को डूबती शीप पर छोड़ आदमी लाइफबॉट में बैठ गया!

पत्नी उसी डूबती शीप पर खड़ी अपने पति को दूर जाते हुए देख रही थी.. वो चिल्लाकर अपने पती से बोली..

इस कहानी को यही विराम देते हुए शिक्षक ने अपने सभी विद्यार्थियों को पूछा,” क्या कोई अंदाजा लगा सकता है ,पत्नी ने पति से क्या कहां होगा?”

ज्यादातर विद्यार्थियों का एक समान उत्तर था, उन्होंने कहा ,”पत्नी बोली होगी कि मैंने तुमसे इतना प्यार किया और तुम मुझे इस तरह छोड़ कर जा रहे हो! मैं तुमसे नफरत करती हूं।”

शिक्षक की नजर एक शांत बैठे विद्यार्थी पर पड़ी। शिक्षक ने उसे जाकर यह सवाल पूछा। विद्यार्थी बोला,”मुझे लगता है वह बोली होगी हमारे बच्चों का ध्यान रखना!”

शिक्षक को आश्चर्य हुआ उन्होंने विद्यार्थी से पूछा,” क्या तुमने यह कहानी पहले भी सुनी है?”

विद्यार्थी ने सर हिलाया और बोला ,”नहीं, लेकिन बीमारी की वजह से दम तोड़ते हुए मेरी मां ने यही शब्द आखिर में मेरे पिता से कहे थे!” शिक्षक ने उस विद्यार्थी को सही जवाब देने के लिए शाबसी दी।

कहानी को आगे बढ़ाते हुए शिक्षक ने कहा, क्रूज शिप डूब गई और साथ में पत्नी भी! पति घर वापस लौट आया और उसने अकेले ही अपने बच्चों को पाल पोस कर बड़ा किया।

कई सालों बाद उस पति की भी मौत हो गई। 1 दिन उसकी बेटी जो उसे अपनि मां की मौत की जिम्मेदार मानती थी, अपने पिता के सामान को साफ करते हुए उसे एक डायरी मिली, जिसे पढ़कर उसे सच्चाई का पता लगा।

डायरी में लिखा था..जब उसके मां बाप उस क्रूज शिप पर गए थे तब उन्हे पहले से ही पता था की उसकी मम्मी को थर्ड स्टेज कैंसर हैं और इसीलिए वो दोनो आखरी बार एकसाथ ज्यादा से ज्यादा समय बिता सके इसलिए दोनो अकेले ही उस क्रूज शिप पर गए थे।

जब उस शीप पर वह मनहूस समय आया था तब उसके पिता ने उस अकेली बची लाइफ बोट की जगह में बैठने से मना कर दिया था।

उन्होंने डायरी में लिखा था की वह भी अपनी पत्नी के साथ ही उस डूबती हुई शीप में डूब जाना चाहते थे।! लेकिन सिर्फ और सिर्फ उनके बच्चों के लिए अपनी पत्नी के कसम देने के बाद उनको उसे अकेला छोड़ कर उस लाइफ बोट में सवार होना पड़ा!”

इस डायरी को पढ़ने के बाद बेटी फूट फूट कर रो पड़ीं।

शिक्षक ने यह कहानी यहीं खत्म कि और पूरा क्लास शांति में डूब गया।

यह शांति देख शिक्षक को पता चल गया कि वह इस कहानी के जरिए जो सीख अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाना चाहते थे वह पहुंच चुकी है।

इस दुनिया में अच्छे और बुरे हर तरह के लोग हैं लेकिन कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी विकट हो जाती है कि आप बुरे या अच्छे का फैसला नहीं कर पाते।

इसीलिए कभी भी हमें कोई भी फैसला लेने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। सिर्फ बाहरी चीजों को जान लेने से किया गया फैसला कभी भी सही नहीं हो सकता। बिना किसी जांच-पड़ताल के और बिना दूसरों का पॉइंट ऑफ व्यू समझे फैसला करना छोड़ दीजिए।

वह जो होटल में आपके खाने का बिल भरते हैं इसलिए नहीं क्योंकि उन्हें अपने पैसों का घमंड है बल्कि इसलिए कि वह आपको पैसों से ज्यादा एहमियत देते हैं।

वह जो हमेशा आपकी मदद करने के लिए तैयार रहते हैं इसलिए नहीं क्योंकि उन्हें आपसे कुछ चाहिए बल्कि इसलिए क्योंकि वह आप में एक अच्छा दोस्त देखते हैं।

वह जो आपको हमेशा मैसेजेस करते हैं इसलिए नहीं क्योंकि उनके पास करने के लिए कुछ और नहीं है बल्कि इसलिए क्योंकि वह आपको बहुत याद करते हैं।

हर दिन नई कहानियां

और वह जो हर झगड़े के बाद पहले माफी मांगते हैं इसलिए नहीं कि वह गलत होते हैं बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें अपने बातो,अपने गुस्से या अपने ईगो से ज्यादा आपकी परवाह है।

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संगत बुरी असाधु की- आठों पहर उपाधि


सम्राट चमूपति ने राजपुरोहित महामंत्री और अनेक विद्वान व्यक्तियों से परामर्श किया किन्तु वे राजकुमार श्रीवत्स की उद्दण्डता न छुड़ा पाये। महामंत्री के सुझाव पर उन्होंने राजकुमार का विवाह कर दिया- सोचा यह गया था कि नये उत्तरदायित्व राजकुमार के स्वभाव में परिवर्तन ला देंगे किन्तु स्थिति में कुछ परिवर्तन के स्थान पर राजकुमार का स्वभाव और भी उग्र हो गया। जबकि दूसरे सभी राजकुमारों की- सौम्यता, सौजन्यता के घर-घर गीत गाये जाते थे श्रीवत्स का स्वभाव राज-कुल का कलंक सिद्ध हो रहा था।,*

उन्हीं दिनों महर्षि श्यावाश्व ने वाजि- मेधयज्ञ का आयोजन किया था। सम्राट चमूपति उस आयोजन के प्रमुख यजमान के रूप में आमंत्रित किये गये। आचार्य प्रवर का सन्देश पाकर एक दिन वे आश्रम की ओर चल पड़े। प्रथम विराम, उन्होंने राजधानी से 5 योजन की दूरी पर स्थित अरण्यजैत ग्राम में किया। महाराज का विराम-शिविर प्रमुख परिचारकों के साथ- ग्राम के बाहर एक देव स्थान के पास किया गया। दिनभर के थके परिचारकों को जल्दी ही नींद आ गई किन्तु सम्राट किसी विचार में खोये अब भी जाग रहे थे।

🔸 तभी किसी विलक्षण आवाज ने उन्हें चौंका दिया। आवाज एक नन्हें से तोते की थी। वह मनुष्य की बोली में अपनी स्वामी से बोला-तात! आज तो बहुत अच्छा शिकार पास आ गया। इसके पास तो सोने का मुकुट, रजत की अम्बारियाँ और मणि-मुक्ताओं से जड़ित बहुमूल्य वस्त्र भी हैं- एक ही दाव में जीवन भर का हिसाब पूरा कीजिए स्वामी- ऐसा समय फिर हाथ नहीं आयेगा।

कर्म का फल सबको लेना पड़ता है | Karm Ka Phal Sabko Lena Padta Hai

🔹 तोते का मालिक- अरण्यजीत का खूँखार दस्यु नायक- महाराज को पहचानता था। उसने तोते को चुप करना चाहा किन्तु ढीठ तोता- चुप न रहा- फिर बोला- आर्य! महाराज हैं तो क्या हुआ डरो मत सिर धड़ से अलग कर दो और चुपचाप इनका सारा सामान अपने अधिकार में ले लो।

🔸 सम्राट चमूपति- रात के अन्धकार की नीरवता से पहले ही सहमे हुए थे तोते की भयंकर मन्त्रणा ने उन्हें और डरा दिया- उन्हें नीति वचन याद आया “जहाँ मनुष्य को कुछ आशंका हो उस स्थान का तत्काल परित्याग कर देना चाहिए” सो उन्होंने अंग रक्षकों को जगाया और अविलम्ब वहाँ से चल पड़े।

🔹 प्रातःकाल होने को थी महाराज ने श्यावाश्व के आश्रम में प्रवेश किया उधर भगवान रश्मि-माल ने अपनी प्रथम किरण से उनका अभिषेक किया। आश्रम के द्वार पर महाराज पहुँचे ही थे कि एक अति मधुर ध्वनि कानों में पड़ी- आज के मंगलमूर्ति अतिथि- आइये, पधारिये आपका स्वागत है, आपका स्वागत है। आश्चर्य से महाराज श्री ने दृष्टि ऊपर उठाई। समीप के वृक्ष पर बैठा एक नन्हा सा शुक बोल रहा था।

🔸 महाराज ने ऊपर की ओर देखा और रात की घटना सजीव हो मानस पटल पर गूँज उठी- सम्राट बोले- तात! तुम्हारा स्वर कितना मधुर, कितना मोहक है और एक वह स्वर था जिसने मुझे रात में डरा ही दिया।

🔹 शुक के पूछने पर महाराज ने रात का सारा वृत्तांत कह सुनाया। वेदनासिक्त प्रच्छ्वास छोड़ते हुये शुक ने कहा- तात! अरण्यजैत का वह शुक मेरा सगा ही भाई है उसके कृत्य के लिये क्षमा याचना करता हूँ।

🔸 महाराज बोले- वत्स! एक ही उदर से जन्मे तुम दोनों भाइयों में यह विसंगति कैसी? नन्हे शुक ने उत्तर दिया- महाराज! सब संगति का फल है। मेरा भाई दस्युओं के गाँव में रहता है सो स्वाभाविक ही है कि उसमें वहाँ के लोगों जैसी क्रूरता हो, मुझे जो ज्ञान मिला वह महर्षि श्यावाश्व के इस संस्कार भूत आश्रम के वातावरण का प्रतिफल है। महाराज- श्री राजकुमार श्रीवत्स के बुरे होने का कारण समझ गये और उन्हें सुधारने का सूत्र भी मिल गया- सत्संगति।

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भगवान जगन्नाथ का रथ – हमारा मानव शरीर


भगवान जगन्नाथ का रथ – हमारा मानव शरीर!*

*जगन्नाथ का रथ लकड़ी के 206 टुकड़ों से बना होता है, जो मानव शरीर की 206 हड्डियों के समान होते हैं!*

*रथ के 16 पहिये = 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ और 6 रिपुर चिन्ह! रथ की रस्सी मन है। बुद्धि का रथ!*

*इस शरीर-रथ के सारथी स्वयं भगवान हैं!*

*भगवान इस शरीर को इच्छानुसार चलाते हैं! इंसान की इच्छा से कुछ नहीं होता, सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है!*

*रथयात्रा के बाद एक बार जब जगन्नाथ रथ से उतर जाते हैं तो दोबारा उस रथ पर नहीं चढ़ते! फिर रथ को तोड़ दिया गया, लकड़ियों को जलाकर खाना पकाने के काम में लाया गया!*

*उसी प्रकार, एक बार जब भगवान हमारे शरीर को छोड़ देते हैं, तो उस शरीर का कोई महत्व नहीं रह जाता है। शव को जला दिया गया है!*

*यदि आप उस ईश्वर को पा लें जो हर चीज़ का स्रोत है, तो फिर पाने के लिए कुछ भी नहीं बचता! जगत् के नाथ श्रीजगन्नाथ सबका कल्याण करें! जय जगन्नाथ*

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भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – ‘पूर्वकाल में अवन्तिपुरी (उज्जैन) में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण रहता था। वह रस, चमड़ा और कम्बल आदि का व्यापार करता था। वह वैश्यागामी और मद्यपान आदि बुरे कर्मों में लिप्त रहता था। चूंकि वह रात-दिन पाप में रत रहता था इसलिए वह व्यापार करने नगर-नगर घूमता था। एक दिन वह क्रय-विक्रय के कार्य से घूमता हुआ महिष्मतीपुरी में जा पहुँचा जो राजा महिष ने बसाई थी। वहाँ पापनाशिनी नर्मदा सदैव शोभा पाती है। उस नदी के किनारे कार्तिक का व्रत करने वाले बहुत से मनुष्य अनेक गाँवों से स्नान करने के लिए आये हुए थे। धनेश्वर ने उन सबको देखा और अपना सामान बेचता हुआ वह भी एक मास तक वहीं रहा।

वह अपने माल को बेचता हुआ नर्मदा नदी के तट पर घूमता हुआ स्नान, जप और देवार्चन में लगे हुए ब्राह्मणों को देखता और वैष्णवों के मुख से भगवान विष्णु के नामों का कीर्तन सुनता था। वह वहाँ रहकर उनको स्पर्श करता रहा, उनसे बातचीत करता रहा। वह कार्तिक के व्रत की उद्यापन विधि तथा जागरण भी देखता रहा। उसने पूर्णिमा के व्रत को भी देखा कि व्रती ब्राह्मणों तथा गऊओं को भोजन करा रहे हैं, उनको दक्षिणा आदि भी दे रहे हैं। उसने नित्य प्रति भगवान शंकर की प्रसन्नता के लिए होती दीपमाला भी देखी।

त्रिपुर नामक राक्षस के तीनों पुरों को भगवान शिव ने इसी तिथि को जलाया था इसलिए शिवजी के भक्त इस तिथि को दीप-उत्सव मनाते हैं। जो मनुष्य मुझमें और शिवजी में भेद करता है, उसकी समस्त क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। इस प्रकार नर्मदा तट पर रहते हुए जब उसको एक माह व्यतीत हो गया तो एक दिन अचानक उसे किसी काले साँप ने डस लिया। इससे विह्वल होकर वह भूमि पर गिर पड़ा। उसकी यह दशा देखकर वहाँ के दयालु भक्तों ने उसे चारों ओर से घेर लिया और उसके मुँह पर तुलसीदल मिश्रित जल के छींटे देने लगे। जब उसके प्राण निकल गये तब यमदूतों ने आकर उसे बाँध लिया और कोड़े बरसाते हुए उसे यमपुरी ले गये। उसे देखकर चित्रगुप्त यमराज से बोले।

चित्रगुप्त ने कहा – ‘इसने बाल्यावस्था से लेकर आज तक केवल बुरे कार्य ही किये हैं, इसके जीवन में तो पुण्य का लेशमात्र भी दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि मैं पूरे एक वर्ष तक भी आपको सुनाता रहूँ तो भी इसके पापों की सूची समाप्त नहीं होगी। यह महापापी है इसलिए इसको एक कल्प तक घोर नरक में डालना चाहिए।’ चित्रगुप्त की बात सुनकर यमराज ने कुपित होकर कालनेमि के समान अपना भयंकर रूप दिखाते हुए अपने अनुचरों को आज्ञा देते हुए कहा – ‘हे प्रेत सेनापतियों! इस दुष्ट को मुगदरों से मारते हुए कुम्भीपाक नरक में डाल दो।’

सेनापतियों ने मुगदरों से उसका सिर फोड़ते हुए कुम्भीपाक नरक में ले जाकर खौलते हुए तेल के कड़ाहे में डाल दिया। प्रेत सेनापतियों ने उसे जैसे ही तेल के कड़ाहे में डाला, वैसे ही वहाँ का कुण्ड शीतल हो गया ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार पूर्वकाल में प्रह्लादजी को डालने से दैत्यों की जलाई हुई आग ठण्डी हो गई थी। यह विचित्र घटना देखकर प्रेत सेनापति यमराज के पास गये और उनसे सारा वृत्तान्त कहा।

सारी बात सुनकर यमराज भी आश्चर्यचकित हो गये और इस विषय में पूछताछ करने लगे। उसी समय नारदजी वहाँ आये और यमराज से कहने लगे – ‘सूर्यनन्दन! यह ब्राह्मण नरकों का उपभोग करने योग्य नही है। जो मनुष्य पुण्य कर्म करने वाले लोगों का दर्शन, स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप करता है, वह उनके पुण्य का छठवाँ अंश प्राप्त कर लेता है। यह धनेश्वर तो एक मास तक श्रीहरि के कार्तिक व्रत का अनुष्ठान करने वाले असंख्य मनुष्यों के सम्पर्क में रहा है। अत: यह उन सबके पुण्यांश का भागी हुआ है। इसको अनिच्छा से पुण्य प्राप्त हुआ है इसलिए यह यक्ष की योनि में रहे और पाप भोग के रुप में सब नरक का दर्शन मात्र कर के ही यम यातना से मुक्त हो जाए।’

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – ‘सत्यभामा! नारदजी के इस प्रकार कहकर चले जाने के पश्चात धनेश्वर को पुण्यात्मा समझते हुए यमराज ने दूतों को उसे नरक दिखाने की आज्ञा दी।’