फ़िल्म ‘नाम’ के एक सीन का सबक बहुत ही गहरा है।
संजय दत्त उसे मारने आए सात आठ लोगों से घिर गया है। मृत्यु निश्चित दिख रही है। वह कहता है, “तुम लोग आज मुझे जरूर मार दोगे; लेकिन मरने से पहले, जो भी तुम में से मुझ पर पहला वार करेगा, मै भी उस एक को मार दूँगा यह पक्का समझ लेना।”
मारने आये लोग कई मिनट प्रतीक्षा करते है कि कौन पहला वार करे। कोई नहीं कर पाता क्यूँकि संजय दत्त के हाव भाव से स्पष्ट है कि उसकी धमकी खोखली नही है। अंत में वे बिना वार किए ही निकल लेते है और नायक उनके हाथ से दारू छीनकर उनके मुंह पर सिगरेट का धुआं छोड़ते हँसते हँसते सामने से निकल जाता है ।
अर्थात मौत के बदले में जब खुद की मौत दिखेगी तभी हिंसा रुकेगी।
इसका अन्य कोई उपाय नही है, कोई भी उपाय नही।
प्रतिकार नही होगा तो हिंसा नही रुकेगी।