Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार एक गरीब बुढ़िया अपने हाथ में एक रुपया लेकर सेठ की दुकान पर गई और काफी देर तक आते जाते ग्राहकों को देखती रही..

जब सेठ की नजर जब उस बुढ़िया पर पड़ी तो उसने पूछा…
तुम इस तरह क्या देख रही हो ?

इस पर बुढ़िया बोली : सेठ जी, तुम कितना कमा लेते हो ?

ये सुनते ही सेठ ने चश्मा ऊपर करते हुए उसे पूरी तरह निहारा और विश्वास जम जाने पर कहा : साल में दुगने हो जाते हैं…
पर, तुम ये सब क्यों पूछ रही हो ?

बुढ़िया बोली : सेठ जी, मै बहुत गरीब हूँ.
जैसे-तैसे कर मैं ये एक रुपया बचाकर लायी हूँ…
और, सोच रही हूँ कि यदि आप इसे अपने व्यापार मे लगा लो तो मेरा भी कुछ भला हो जाए.

उसकी ऐसी करुणामयी बात सुनकर सेठ को दया आ गयी और उसने अपने मुनीम को बोला कि इस बुढ़िया का एक रुपया बही-खाते मे जमा कर लो.

बुढ़िया बहुत खुश हुई और जाते-जाते बोली :
सेठ जी, मै 25 साल बाद आऊँगी और अपनी अमानत लाभ सहित आपसे ले लूँगी.

इस पर सेठ ने भी कहा : ठीक है.

इस तरह बात आयी-गयी हो गयी.

ठीक 25 साल बाद (26वें साल में) बुढ़िया सेठ से अपने रुपए वापिस लेने आई.

बुढ़िया को देखते ही सेठ जी ने मुनीम को बोला कि… इसे 10 रूपये दे दो.

इस पर बुढ़िया बोली : नहीं सेठ जी, जो मेरा हिसाब हो सो दे दो.

इस पर सेठ ने बात को खत्म करने के अंदाज मे कहा :
मुनीम जी, इसे 100 रूपये देकर छुट्टी करो.

लेकिन, बुढ़िया इस बार भी बोली कि…
नहीं सेठ जी, जो मेरा हिसाब बना हो सो दो.

इस तरह बुढ़िया की जिद से हार कर सेठ ने मुनीम को हिसाब लगाने को कहा.

और, हिसाब लगाने के बाद मुनीम का सिर चकराने लगा और उसने सेठ जी के कान मे कुछ कहा.. जिसे सुनकर सेठ के भी होश उड़ गए.

क्या आप सोच सकते हैं कि मुनीम ने सेठ जी कितने रुपये का हिसाब बताया होगा ?

1,000… 5,000…10,000…20 या 50 हजार ???

जी नहीं…..
वो हिसाब था, कुल…
3,35,54,432 ( तीन करोड़ पैतीस लाख चौवन हजार चार सौ बत्तीस) रुपये का…!

सोचें कि…. महज 1 रुपया जब साल में दुगना होता गया तो 25 साल बाद वो 3 करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो गया.

तो, अगर हम साल को महीने में कन्वर्ट कर दें अर्थात एक साल में पैसा दुगुना होने की जगह अगर 1 महीने में पैसा दुगना होने का हिसाब लगाएँ तो महज 2 साल में ही हमारा 1 रुपया…. 3 करोड़ से ज्यादा हो जाएगा…!

अब ये शुद्ध गणित है जिसमें कहीं कोई मिलावट नहीं या मैन्युपुलेशन नहीं है.

इसीलिए, चाहे वो पैसा हो या विचार…
वो इसी अनुपात में बढ़ेगा..!

मेरा यही जबाब है उन मित्रों को … जो, अक्सर निराश होकर कहते हैं कि….
यार, हमारे अकेले के लिखने से क्या होगा ?
अकेले लिख कर हम क्या उखाड़ लेंगे.

तो, हम अकेले लिख कर क्या उखाड़ लेंगे या क्या उखाड़ सकते हैं उसका जबाब ऊपर से हिसाब में मैंने दे दिया.

कहने का मतलब कि… अगर सिर्फ मुझ अकेले के लेख से पूरे महीने भर में भी सिर्फ एक मित्र कन्विंस हो जाए (पूरे सिस्टम और उसको लूप होल्स, हम हिनूओं का अपना इकोसिस्टम आदि के कॉन्सेप्ट को ठीक से समझ ले)..
और, वो इस जानकारी (कॉन्सेप्ट) से अगले एक महीने में अपने किसी सिर्फ किसी एक और मित्र को कन्विंस कर कर दे …
तथा, ये क्रम इसी तरह आगे बढ़ता रहे तो महज दो साल में ही हम भारत के 3 करोड़ लोगों तक अपना कॉन्सेप्ट पहुंचा सकते हैं..!

और, 4-5 साल तक तो पूरे देश के एक एक सनातनी बच्चे तक को समझ आ जायेगा कि ये कतेशर और वामपंथी हमारे साथ क्या खेल खेल रहे हैं और उनसे हमें कैसे निपटना है ?

इसीलिए, हमें खुद को कभी कमजोर या असहाय बनकर…
फलाने ने ये क्यों नहीं किया…
चिलाना मौलाना काहे बन गया…
धिमकाना वजीफा काहे दे रहा है…

टाइप का रोने की जगह… अगर हम क्रिएटिव लिखेंगे और कन्विसिंग लगने पर अपने उस विचार (प्लान) को प्रसारित करने में अपने देशभक्त और धर्मप्रेमी मित्रों का समर्थन मांगेगे तो मेरा आकलन है कि महज 3 से 4 साल में ही हम देश का सिनेरियो बदल कर रख देंगे…!

एवं, उस सिनेरियो में हम सर्वशक्तिशाली होंगे तथा हमें किसी पॉलिटिकल पार्टी के आगे रोना नहीं होगा कि… हमको फलाने ने मार दिया इसीलिए आप उसको पकड़ो अथवा उसके घर पर बुलडोजर चलाओ … नहीं तो हम मरिये जाएँगे.

बल्कि, उसके बाद सभी पॉलिटिकल पार्टियाँ खुद आपके दरवाजे पर नतमस्तक होकर बोलेंगी कि….
माई-बाप, हमने आपके बिना कहे ही उस फलाने इलाके को समतल कर दिया है…
इसीलिए, आप वोट हमीं को देना.

और, इसके बाद सिर्फ एक नहीं बल्कि हर पार्टियों में ये होड़ लगी रहेगी कि कौन ज्यादा एरिया समतल कर पाती है…!

इसीलिए, भगवान के लिए रोना-कलपना छोड़ो और अपनी ताकत पहचानो..!

क्योंकि, रोने से सिर्फ भीख मिलता है जबकि पुरुषार्थ से वैभव…!

और हाँ… इसके लिए आपको न तो सड़क पर उतरने की जरूरत है…
न ही अपना काम-धंधा छोड़ने की जरूरत है.
और, न ही थाना पुल्स का कोई डर है.

करना है तो… सिर्फ एक काम कि… आपको एक टीम की तरह काम करना है और सिर्फ पोजेटिव/क्रिएटिव विचारों को अपनी अधिकतम क्षमता से प्रसारित करना है…!

बाकी का काम वो विचार खुद कर लेगा…!!

क्योंकि, यही सिस्टम है और यही सिस्टम की नियति..!!

जय महाकाल…!!!

नोट : 1 रुपये की 3 करोड़ बनने की गणित मेरे पहले कमेंट में है.
उपरोक्त बुढ़िया वाली कहानी शरद भैया की है.

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