Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार एक लड़का अपना कमरा बंद करके हमेशा किताबों में डूबा रहता था…
और, कुछ-कुछ रिसर्च करता रहता था.

इस पर, उसके दूसरे मित्र ने उससे पूछा कि… अबे, तुम आखिर कर क्या रहे हो इतने दिन से ?

इस पर पहले मित्र ने कहा : यार, हम ऐसा रिसर्च करना चाहते हैं ताकि लोग दीवार के आर-पार न सिर्फ देख सकें बल्कि कुछ सामान भी इधर से उधर कर सकें.

इस पर उसके मित्र ने कहा : अरे यार, इसी के लिए बौराये हुए हो इतने दिन से ?
ये रिसर्च तो काफी पहले हो चुका है और उसका नाम “खिड़की” है.
खिड़की खोल के चाहो तो इधर से उधर देख भी लो और छोटा मोटा सामान भी इधर से उधर कर लो.

बाकी, आने जाने के लिए तो दरवाजा हैय्ये है.

ये बात उसके रिसर्चर मित्र को समझ आ गई और उसे अपनी बेवकूफी पर बहुत हंसी आई कि जो चीज आंखों के सामने मौजूद है उसके लिए वो इतने दिन से रिसर्च कर रहा था.

तो, वास्तव में हमारी सोच के साथ भी यही है कि बहुत बार हम चीजों को समझ नहीं पाते हैं..
और, उसी चीज की रिसर्च में जुटे रहते हैं जिसका आविष्कार हमारे जन्म से पहले ही हो चुका है.

जैसे कि…. हिनू-मुसरिम , हिनू-हिसाई समस्या.

कहा जाता है कि…. अगर देश में मुसरिम या हिसाई 30-40% से ज्यादा हो गए तो वे हम हिनूओं का जीना मुहाल कर देंगे.

और, इसमें कहना नहीं है बल्कि ये एक कटु सत्य है.

लेकिन, सबसे मजे की बात है कि… वे जब होंगे तब होंगे..
लेकिन, सिर्फ 40 क्या हम तो अभी ही 80% हैं..
तो, फिर हम वैसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं.

अब इसका सिंपल सा जबाब है कि…. हममें एकता नहीं है..
क्योंकि, हम जातियों में बंटे हुए हैं.

तो, इसका समाधान भी यही है कि…. आपको कटेशरों या हिसाइयों से नहीं बल्कि अपनी जातीय अभिमान से लड़ने की जरूरत है.

क्योंकि, जिस दिन हमारे अंदर की जातीय अभिमान खत्म होकर खुद के हिनू होने का अभिमान जागृत हो गया उस दिन से कटेशर और हिसाई आपको कहीं नजर नहीं आएँगे..

अब, इससे इंस्पायर होकर कुछ लोग कह सकते हैं कि…. बात तो सही है.
इसीलिए, चलो… अब हम जातीयता खत्म करने का अभियान चलाते हैं.

तो भाई… आपको इतना भी करने की जरूरत नहीं है बल्कि संघ आलरेडी पिछले 100 वर्षों से यही तो कर रहा है.

इसीलिए, जो भी लोग ये कहते हैं कि संघ मियों को ये नहीं कर रहा है… वो नहीं कर रहा है.

तो, भाई… संघ का काम मियों को ये या वो करना नहीं है.

बल्कि, संघ का काम सिर्फ अपने हिनूओं के जातीय अभिमान को खत्म कर उन्हें देशभक्त हिनू बनाने का है.

क्योंकि, अगर आप ध्यान से देखोगे तो आपको समझ आ जायेगा कि समस्या किसी और में नहीं बल्कि खुद में है.

इसीलिए, सुधार की जरूरत भी किसी और में नहीं बल्कि खुद में ही है.

और, जिस दिन हमने खुद में ये सुधार कर लिया उसी दिन हमारी और आपकी 99% समस्या सॉल्व है.

अतः… इधर उधर दिमाग खपाने एवं अपने लोगों को हतोउत्साहित करने से बेहतर है कि जिस संगठन ने हमारे अंदर की जातीयता अभिमान खत्म कर हमें स्वाभिमानी हिनू बनाने का बीड़ा उठाया हुआ है उसका हाथ मजबूत किया जाए.

चलते-चलते एक बात और बता दूँ कि… ये कटेशर, हिसाई, वामपंथी और खान्ग्रेस वाले संघ से इसीलिए इतना नहीं चिढ़ते हैं कि संघ उन्हें कुछ करता है..

बल्कि, वे संघ से इसीलिए चिढ़ते हैं क्योंकि संघ अपने लोगों से जातीयता का भाव हटा कर उनमें हिनू स्वाभिमान का भाव भरता है.

और, इन लोगों को संघ के इसी कार्यप्रणाली से डर लगता है.

क्योंकि, आपको मालूम हो अथवा न हो लेकिन उन्हें ये बात अच्छी तरह मालूम है कि अगर संघ आधे हिनूओं में भी ये करने में सफल हो गया तो फिर इन चादर और फादर वालों का खेल उसी समय खत्म हो जाएगा.

यही कारण है कि… सोशल मीडिया के लाख विरोध के बाद भी मैं संघ और उनके संगठनों के साथ हमेशा खड़ा रहता हूँ.

जय हिन्दू राष्ट्र…!!
जय महाकाल…!!!

Posted in बॉलीवुड - Bollywood

क्रिस्टोफर नोलन की फ़िल्म ‘ओपनहाइमर’ एक लंबे मुकदमे की कहानी है. फ़िल्म के दौरान पूरे समय आप बहुत बारीकी से जांच कमेटी की कार्यवाही को देखते हैं. दूसरे विश्वयुद्ध और उसके बाद कई वर्षों तक अमेरिका और यूरेशिया भू-भाग के बीच चले शीत युद्ध ने ऐसी जाने कितनी रोमांचक कहानियों को जन्म दिया था, जिनमें पहचान बदलकर काम करने वाले जासूस थे, डबल एजेंट थे, खूफिया जानकारी पहुँचाने वाली खूबसूरत नर्तकियां थीं.

एटम बम के अविष्कारक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर का जीवन उन तमाम रोमांचक किस्सों से अलग नहीं था. शायद यही वजह रही हो कि जब नोलन ने बीसवीं शताब्दी के इस विवादास्पद वैज्ञानिक के जीवन पर फ़िल्म बनाने का फैसला किया तो उसे एक नॉयर सिनेमा की शैली दी.

‘नॉन लीनियर’ स्टोरी टेलिंग पसंद करने वाले नोलन सिनेमा के स्क्रीन पर ओपनहाइमर की इस दिलचस्प कहानी को बयान करने के लिए एक जटिल संरचना का इस्तेमाल करते हैं. फ़िल्म का कुछ हिस्सा ब्लैक एंड व्हाइट है और काफी हिस्सा कलर में.

नोलन ने एक इंटरव्यू में खुद ही यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसा उन्होंने फ़िल्म में सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव टोन के संतुलन के लिए किया है. रंगीन हिस्से की पटकथा ‘फर्स्ट परसन’ में लिखी गई है और यह हिस्सा ओपनहाइमर की निजी स्मृतियों, उसके अवसाद, उसके प्रेम संबंधों, वामपंथी राजनीति की ओर झुकाव और क्वांटम फिजिक्स के प्रति उसके ऑब्सेशन से भरा हुआ है.

रंगीन दृश्य क्योंकि ‘फर्स्ट परसन’ में हैं तो वहां पर हम नोलन की फ़िल्म मेकिंग पर उपन्यासों की चिर-परिचित शैली ‘स्ट्रीम ऑफ कांशसनेस’ का असर भी देख सकते हैं. जैसे हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराए जाने के बाद जब पहली बार ओपनहाइमर (सिलियन मर्फ़ी) स्टेज पर जाता है तो हॉल में जोश में भरे लोग खुशी से लकड़ी के फ़र्श पर अपने पैर पटक रहे होते हैं, जूतों की यह लयबद्ध आवाज़ इससे पहले भी कई बार सुनाई देती है मगर वह ध्वनि ओपनहाइमर के भीतर गूंज़ रही थी.

इसी तरह ट्रायल के दौरान जब फ़िल्म के नायक पर मानसिक रूप से गहरा दबाव पड़ता है, तो उसका फ़िल्मांकन भी देखते बनता है. फ़िल्म की शुरुआत में शांत जल पर गिरती बूंदे दिखती हैं, जिसे फिर हम बिल्कुल अंत में आइंस्टीन के साथ ओपनहाइमर की मुलाकात में देखते हैं. फ़िल्म के इस रंगीन हिस्से में कई समानांतर टाइम लाइन चलती है.

बतौर पटकथा लेखक नोलन ने इतनी सफाई से ओपनहाइमर के निजी जीवन, अतीत, बंद कमरे में चल रहे आरोपों की सुनवाई जैसे तमाम हिस्सों में आवाजाही करते हैं और संपादन के दौरान इन्हें इस तरह एक-दूसरे के साथ समानांतर कट से जोड़ा है कि फ़िल्म सिर्फ एक कहानी नहीं बल्कि एक विचार या फिर कहें कि एक बहस की तरह आगे बढ़ती है.

हालांकि इस तरह की शैली में अगर एक पल के लिए आपका ध्यान स्क्रीन से हटता है तो कहानी के सूत्रों को दोबारा पकड़ने में बहुत मुश्किल हो सकती है. उदाहरण के लिए ओपनहाइमर से आइंस्टीन की मुलाकात, हवा से आइंस्टीन की कैप गिरने और उन दोनों के बीच बातचीत वाला दृश्य फ़िल्म में दो बार आता है.

शुरुआत में यह दृश्य हम लेविस (रॉबर्ट डाउनी जूनियर) के नजरिये से देख रहे होते हैं और वह सारा हिस्सा ब्लैक एंड व्हाइट में दिखाया गया है, इस दौरान दोनों के बीच क्या बातचीत होती है हम नहीं जान पाते क्योंकि लेविस खुद नहीं जानता कि आइंस्टीन और ओपनहाइमर के बीच क्या बात हुई. फ़िल्म के क्लाइमेक्स में यही दृश्य दोबारा आता है, इस बार यह दृश्य रंगीन है क्योंकि सिनेमा के नजरिये से यह ओपनहाइमर के ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ है.

यहां पर दोनों के बीच जो संवाद है, उसे एक ‘कन्क्लयूडिंग स्टेटमेंट’ की तरह देखा जा सकता है. हालांकि, खुद नोलन स्वीकार करते हैं कि उन्होंने फ़िल्म का अंत खुला छोड़ा है, यानी यह ‘ओपन एंडेड’ फ़िल्म है. इसके बावजूद ‘ओपनहाइमर’ अंतिम निष्कर्ष में यह बात बड़े साफ तरीके से कहती है कि सत्ता देश की प्रतिभाओं का इस्तेमाल ‘पॉलिटिकल प्रॉपगैंडा’ के लिए करती है, लेकिन अगर उन प्रतिभाओं में से कोई सत्ता के लिए तकलीफ का सबब बनता है तो बड़ी आसानी से उसे ठिकाने भी लगा देती हैं.

फ़िल्म बड़ी खूबसूरती से ओपनहाइमर के निजी और सार्वजनिक जीवन में आवाजाही करती है और ठीक इसी तरह से वह उसके भय, अवसाद, प्रेम और असुरक्षा को भी दिखाती चलती है. नोलन इस फ़िल्म के बहाने में हमें जिस बहस में ले जाते हैं, उसमें बहुत सारे सवाल खुलते हैं. अमेरिका को सुपर पॉवर बनाने वाला ओपनहाइमर देखते-देखते एंटीनेशनल कैसे हो गया? एटम बम का अविष्कार करने वाला व्यक्ति उस देश में चल रहे हाइड्रोजन बम प्रोजेक्ट के खिलाफ क्यों हो गया था?

बतौर निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन के पॉलीटिकल स्टेटमेंट बहुत स्पष्ट हैं. फ़िल्म दिखाती है कि कैसे दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और रशिया के बीच चल रहे शीत युद्ध के दौरान अमेरिका में उदारवादी सोच पर हमले शुरु हो गए थे. एटॉमिक विस्फोट तक सब ठीक था, मगर हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिरने के बाद ओपनहाइमर भीतर से दरकने लगता है, समय बीतता है और अमेरिका को परमाणु ऊर्जा की ताकत देने वाला व्यक्ति ही एटॉमिक एनर्जी की पॉलिसी की आलोचना शुरू कर देता है.

सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को इससे दिक्कत होने लगती है. फ़िल्म के ब्लैक एंड व्हाइट हिस्से में हम अमेरिका की एटॉमिक एनर्जी कमीशन (एईसी) के चीफ लेविस स्ट्रास और ओपनहाइमर के आरोपों की सुनवाई को देखते हैं. सन् 1954 की सुरक्षा मंजूरी की सुनवाई में ओपनहाइमर पर यह आरोप लगा कि उसका जुड़ा कम्यूनिस्ट पार्टी से था और वह देश के राजनीतिक शत्रुओं के साथ उठता-बैठता था.

ओपनहाइमर बतौर वैज्ञानिक किसी एक राजनीतिक विचारधारा पर आस्था नहीं रखते थे. लेकिन 1930 के दशक में कई युवा बुद्धिजीवियों की तरह, ओपेनहाइमर सामाजिक बदलाव के समर्थक थे. जिसे फ़िल्म उनके समाजवादी विचारों की तरफ झुकाव में देखती है. फ़िल्म में अमेरिकी सिनेटर जोसेफ मैक्कार्थी के समय की झलक बहुत बेहतरीन तरीके से दिखाई गई है, जब अमेरिकी सरकार वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों की जासूसी करती थी.

फि़ल्म में ओपनहाइमर को स्पेनिश गृहयुद्ध और वामपंथी संगठनों की मदद करते हुए दिखाया गया है. वास्तविकता यह थी कि ओपनहाइमर ने भले कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य होने से इनकार किया हो, वे साम्यवादी सिद्धांतो से सहमति रखते थे. हालांकि उन्होंने कभी किसी पार्टी के आदेशों का आँख बंद करके पालन नहीं किया.

फ़िल्म में गीता के एक श्लोक ‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः’ का भी जिक्र है. इस श्लोक का जिक्र ओपनहाइमर अपने एक साक्षात्कार में भी करते हैं, जिसे देखा जा सकता है लेकिन फ़िल्म में नायक इस श्लोक को अपनी वामपंथी प्रेमिका जीन टैटलॉक के साथ के अंतरंग पलों में पढ़ता है.

फ़िल्म का एक और बहुत ही उल्लेखनीय दृश्य है जब ओपेनहाइमर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रूमैन से मिलते हैं. बातचीत के दौरान वे कहते हैं कि उन्हें लगता है कि उनके ‘हाथों पर खून लगा है’. इस टिप्पणी से ट्रूमैन असहज हो जाते हैं और जेब से रुमाल निकालकर ओपनहाइमर की तरफ बढ़ा देते हैं. यह कई जगह दर्ज है कि ट्रूमैन ने ओपनहाइमर को ‘क्राइ बेबी साइंटिस्ट’ और ‘सन ऑफ अ बिच’ कहा था.

‘ओपेनहाइमर’ को देखते हुए डेविड लीन की ‘डॉक्टर जिवागो’ याद आती है. उसकी तरह यह एक भव्य ‘एपिक ड्रामा’ तो है, मगर इससे भी आगे यह एक वैचारिक फ़िल्म है. फिल्म देखते हुए आप बंधे तो रहते हैं मगर लगातार सोचते भी रहते हैं. नोलन ओपनहाइमर को क्लीन चिट नहीं देते. वे उसके कमजोर पलों को भी दिखाते हैं. यह फ़िल्म बुद्धिजीवी और राजनीति के रिश्तों, राष्ट्रवाद, राज्य के नियंत्रण जैसे मुद्दों पर सोचने के लिए आपको खुला छोड़ती है.

आज जब हम हम सारी दुनिया में कट्टरपंथ और राष्ट्रवाद का उभार देख रहे हैं तो यह फ़िल्म और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक नई दुनिया उभर कर सामने आई थी, जिसमें वैज्ञानिकों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने अपनी पक्षधरता तय की और यह समझा कि इस बदली हुई दुनिया में उनकी भूमिका सिर्फ अपने काम तक सीमित नहीं रहेगी. अल्बर्ट आइंस्टीन, बर्ट्रेंड रसेल, ओपनहाइमर और टीएस एलिएट जैसे लोगों ने युद्ध के खिलाफ आवाज उठाई. वे उन संभावित खतरों को लेकर भी चिंतित थे जो वैज्ञानिक आविष्कार भावी मानवता के लिए पैदा कर सकते थे.

हर तकनीक नई आशंकाएं लेकर आती है. आर्टिफीशियल इंटैलिजेंस नई चिंताओं को जन्म रहा है. आने वाली दुनिया बहुत से बदलावों से होकर गुजरेगी. ये बदलाव बहुत कुछ देकर जाएंगे और बहुत कुछ हमसे खो भी जाएगा. तीन घंटे की इस फ़िल्म को देखते हुए बार-बार मन में यह सवाल उठता है कि क्या सभ्यताएं इतिहास से कोई सबक नहीं लेतीं?

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક વાત
500 વર્ષ જૂની વાત છે. ત્યારે સંદેશા પહોંચાડવા માટે માણસોને ‘દૂત’ તરીકે મોકલાતા. સંદેશાવ્યવહારનું કોઈ સાધન ન્હોતું. ભાટ-ચારણોના મુખે ગવાયેલી લોકવાયકાઓ સત્ય બની જતી. તે સમયે વિધર્મી રાજાઓનો દબદબો હતો. મુસ્લિમ રાજાઓ હિંદુ રજવાડાં જીતવા યુદ્ધ કરતા. પણ ચાંપાનેર એક સ્વંતત્ર હિંદુ રજવાડું હતું- જયાં રાજા જયસિંહ એટલે કે પાવાગઢ રાજવી, મહાકાળીના ઉપાસક અને ભક્ત પતઇ રાજાએ સનાતન ધર્મને સાચવી રાખ્યો હતો. પાવાગઢને જીતવામાં મોહંમ્મદ બેગડાના પ્રયત્નો નિષ્ફળ રહ્યા હતા – જેનો તેને વસવસો હતો , આખરે તેને કપટનીતિ અપનાવી પતઈ રાજાના અંગત માણસને લાલચ આપી પાવાગઢના ખાનગી રસ્તા જાણી લીધા અને બેગડાનું લશ્કર પાવાગઢમાં પ્રવેશી ગયું.
પતઈ રાજાએ અંતિમશ્વાસ સુધી લડત આપી – મૃત્યુ પામ્યા પણ વિધર્મીઓની શરતો ન માની. પતઈ રાજાની ભક્તિમય લોકપ્રિયતા સદાય માટે પ્રજાના દિલોમાંથી ભૂંસાઈ જાય એટલે બેગડાએ તે સમયના ભાટ ચારણોને ધન દોલત આપી ‘ એક ખોટી લોકવાયકા ગવડાવી. પતઇરાજાએ મહાકાળીનો પાલવ પકડ્યો તે વાત પ્રજાએ ધીરે ધીરે ગરબા સ્વરૂપે લીધી અને આપણે પણ. બીજી બાજુ પતઈ રાજાના ખાસ મિત્ર સહદેવ જોશીએ મંદિર બચાવવા સદનશાહ ફકીરનો નાટકીય ઢબે વેશ લઈ મંદિર પર દરગાહ બનાવી દીધી અને તેની એક લોકવાયકા વહેતી મૂકી. મતલબ કપટની સામે કપટ . દરગાહ શબ્દના કારણે વિધર્મીઓના આક્રમણથી મંદિર બચી ગયું પણ એક ખોટી વાત લોકોના મનમાં ઘર કરી ગઈ. માતાજીના ઉપાસક પતઈ રાજાને હું પ્રણામ કરું છું અને સાચી વાત શેર કરું છું – તમે પણ કરજો…. જય ભવાની🚩
– ‘પાવાગઢ ‘