एक ठेकेदार किसी राज्य में गरीबों को सस्ते दर पर भोजन सप्लाई किया करता था.
अब भोजन तो जरूरी चीज है और उसकी जरूरत सभी को होती है…
एवं, गरीबों की संख्या भी काफी रहती है…
इसीलिए, वो ठेकेदार अपने राज्य में बहुत पॉपुलर था क्योंकि वो महज 5 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से ही भोजन सप्लाई कर दिया करता था.
फिर, एक दिन उस ठेकेदार के मन में लालच आ गया और वो सोचने लगा कि यदि मैं भोजन का दाम कुछ बढ़ा दूँ तो मेरे वारे-न्यारे हो जाएंगे.
लेकिन, मुसीबत यह थी… नियमानुसार बिना राजा की आज्ञा के भोजन का दाम बढ़ाया नहीं जा सकता था.
तो, वो इसकी आज्ञा लेने हेतु राजा के पास पहुंचा और राजा को बताया कि वो भोजन का दाम बढ़ाना चाहता है और अब वो प्रति प्लेट 5 की जगह 10 रुपये प्रति प्लेट भोजन बेचना चाहता है.
राजा ने उसकी बातें ध्यान से सुनी… और, उससे कहा कि…. ठीक है, वो भोजन का दाम बढ़ा ले.
लेकिन, वो भोजन का दाम बढ़ा कर 10 रुपये नहीं बल्कि 30 रुपये करे.
5 रुपये से बढ़ाकर अचानक 30 रुपये करने के नाम से ठेकेदार घबड़ा गया और वो राजा का मुँह देखने लगा.
लेकिन, राजा ने उसे दुबारा यही कहा कि वो भोजन का दाम 30 रुपये की करे.
ठेकेदार राजा की बात सुनकर वापस लौट गया और राजा के कहे अनुसार उसने अगले दिन से भोजन का दाम 30 रुपये प्रति प्लेट कर दिया.
अचानक ऐसे दाम की घोषणा सुनकर पूरे राज्य में हंगामा हो गया एवं हर जगह इसके विरोध में धरना-प्रदर्शन होने लगे.
एवं, पत्र-पत्रिकाओं में इस अन्याय के खिलाफ लेख लिखे जाने लगे.
तब… राजा ने इस मामले में इंटरफेयर किया…
और, जनता के बीच जाकर राजा ने घोषणा की कि…. वो अपनी प्रजा की भावना का सम्मान करता है और वो एक भी प्रजा के साथ अन्याय नहीं होने देगा.
इसीलिए, वो आज्ञा देता है कि…. भोजन का दाम तत्काल प्रभाव से आधा कर दिया जाए ताकि किसी पर अनावश्यक बोझ न पड़े.
राजा की इस घोषणा के बाद प्रजा… राजा की जय जयकार करने लगी क्योंकि अब उन्हें 30 रुपये वाला भोजन 15 रुपये में ही मिल जा रहा था.
इधर… राजा भी खुश…. क्योंकि, ठेकेदार ने उसे महज 10 रुपये प्रति प्लेट की ही बात कही थी..
इस तरह… 5 रुपये प्रति प्लेट राजा के हिस्से आना था.
और, ठेकेदार भी खुश कि… उसने अपनी कीमत महज एक दिन में ही दुगुना कर दिया.
मनोज मुन्तशिर भी उसी राजा वाला खेल खेल रहा है.
पहले उसने काफी ज्यादा घटिया स्क्रिप्ट, कहानी, डायलॉग्स आदि लिख दिए..
उस बजरंगबली तक को कुम्भकर्ण से मार खाते दिखा दिया जिसके प्रहार को खुद रावण तक नहीं झेल पाया था.
साथ ही…. फिल्म के अंत में वो भगवान राम को रावण से पिटता हुआ तक दिखा दिया.
और तो और… उन्होंने ये तक साबित करने की कोशिश की कि…. रावण ने भगवान राम और लक्ष्मण के आंखों के सामने माता सीता को लेकर चला गया तथा भगवान राम और लक्ष्मण उसे ले जाते देखते रहने के सिवा और कुछ नहीं कर सके.
लेकिन, अब ये मनोज… ठीक उसी राजा के समान जनता के बीच आकर कह रहा है कि…. उसे दर्शक की भावना का सम्मान है और एक भी दर्शक की भावना आहत नहीं होने दी जाएगी…
इसीलिए, वो तत्काल प्रभाव से अपने आपत्तिजनक डायलॉग बदल रहा है.
और, ऐसा वो इसीलिए कर रहा है क्योंकि उन्हें लगता है सनातनी हिन्दू तो बेवकूफ हैं ही…
उन्हें इस तरह की भावना वाला झुनझुना पकड़ा देंगे तो वो फिर से हमारी जय-जयकार करने लगेंगे जैसे कि 15 रुपये प्रति प्लेट सुनते ही जनता ने राजा की जय-जयकार शूरू कर दी थी.
तो, भाई बात ऐसी है कि…. वो समय चला गया जब गधे भी जलेबी खाया करते थे..
अब लगभग हर सनातनी हिन्दू इन खेलों को समझता है.
और, अब किसी भी सनातनी हिन्दू को अपने आराध्यों के चरित्र से अनावश्यक छेड़छाड़ स्वीकार्य नहीं है.
इस बात को चालबाज लोग जितनी जल्दी समझ लें… उनके लिए ये उतना ही बेहतर है.
जय श्री राम…!!
जय महाकाल…!!!