બિહારના છપરા જિલ્લાની આ વાર્તા સામાજિક કુરીતિઓ અને માનવીય સંવેદનાઓ પર એક જોરદાર પ્રહાર કરે છે. તમે આપેલા લેખનો સુંદર ગુજરાતી અનુવાદ નીચે મુજબ છે:
સાધુને વિધવા મહિલાએ એક રાતનો આશરો આપ્યો… સવારે એવું સત્ય સામે આવ્યું જેણે આખા ગામને સ્તબ્ધ કરી દીધું!
બિહારના છપરા જિલ્લામાં ગંગાના શાંત કિનારે વસેલી એ નાનકડી ઝૂંપડી માત્ર માટી અને ઘાસનો ઢગલો નહોતી, પરંતુ એક સ્ત્રીના એકલવાયાપણું અને તેના સંઘર્ષની મૌન સાક્ષી હતી. છપરાની એ ભીની માટી પર બનેલી પગદંડીઓના છેલ્લા છેડે, જ્યાં ગામનો શોરબકોર ઓછો થઈ જતો અને ગંગાની લહેરોનો અવાજ સ્પષ્ટ સંભળાતો, ત્યાં રાધા નામની એક વિધવા મહિલા રહેતી હતી.
દુઃખનું ઓથાર અને સામાજિક તિરસ્કાર
રાધાની ઉંમર માંડ ૨૫ થી ૩૦ વર્ષની હશે, પરંતુ તેના ચહેરા પરની કરચલીઓ ઉંમરની નહીં પણ એ અકસ્માતોની હતી જેણે તેને સમય પહેલા જ વૃદ્ધ કરી દીધી હતી. પતિની અચાનક બીમારી અને મૃત્યુએ રાધાના અસ્તિત્વને સમાજની નજરમાં એક ‘અપશુકન’ બનાવી દીધું હતું. તે ઝૂંપડીમાં ન તો બાળકોનો કિલકિલાટ હતો, ન તો ચૂલાની એ હૂંફ જે એક ભરેલા-પૂરા પરિવારનો સંકેત આપે છે; ત્યાં માત્ર સન્નાટો હતો, જે રાતની સાથે વધુ ઊંડો થતો જતો.
સમાજનો અન્યાયી દ્રષ્ટિકોણ
સમાજની નજરમાં એક યુવાન વિધવાનું એકલા રહેવું કોઈ ગુનાથી ઓછું નહોતું, અને રાધા દરરોજ આ અદ્રશ્ય કઠેડામાં ઊભી રહેતી હતી.
* મહિલાઓનો વ્યવહાર: ગામની સ્ત્રીઓ જ્યારે કૂવા પર પાણી ભરવા જતી, ત્યારે રાધાને જોતા જ વાતો ધીમી કરી દેતી અને તેમના ચહેરા પર એક અજીબ શંકા તરવા લાગતી.
* પુરુષોની નજર: પુરુષો તેને ત્રાંસી નજરે જોતા—કોઈ સહાનુભૂતિના બહાને તો કોઈ તેની સુંદરતાને પોતાની ગંદી નજરોથી માપવા માટે.
રાધાએ પોતાને દુનિયાથી અલગ કરી લીધી હતી. સાંજ પડતાની સાથે જ તે પોતાની ઝૂંપડીનો કાચો દરવાજો અંદરથી બંધ કરી દેતી અને દીવાની ઝાંખા પ્રકાશમાં પોતાના પડછાયા સાથે વાતો કરતી. તેના માટે સુરક્ષાનો અર્થ માત્ર ચાર દીવાલો નહોતી, પણ એ સવાલોથી બચવું હતું જે સમાજની ઝેરી જીભથી નીકળતા હતા.
એક રાતની પનાહ અને ચોંકાવનારું સત્ય
આ એ જ રાતની વાત છે જ્યારે એક સાધુએ તેની ઝૂંપડીનો દરવાજો ખખડાવ્યો અને એક રાત માટે આશરો માંગ્યો. રાધા માટે આ ધર્મસંકટ હતું—એકબાજુ અજાણ્યો પુરુષ અને બીજી બાજુ અતિથિ ધર્મ. પણ તેણે આશરો આપ્યો. અને જ્યારે સવાર પડી, ત્યારે ગામના લોકો સમક્ષ જે સત્ય આવ્યું તેણે દરેકના હોશ ઉડાવી દીધા.
> નોંધ: આ વાર્તાનો ઉત્તરાર્ધ એટલે કે સવારે શું સત્ય સામે આવ્યું, તે જાણવા માટે ગામના લોકોની માનસિકતા અને રાધાના ચારિત્ર્ય પરની કસોટીની આ અત્યંત ભાવુક ક્ષણ છે.
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👉😢लाखों ऐसी बहने जो सोने चाँदी के बरतनों में खाना खाती थी जिनके कोमल पैर कभी जमीं पर नहीं पड़े थे उन्हें 7 दिनों तक नंगा करके पाकिस्तान में घुमाया गया जहाँ भीड़ एक बार शुरू होती तो एक एक लड़की से 12 से 15 लोग रेप करते और 7 वे दिन सिर्फ़ 3 लड़कियां ज़िंदा बची उन्ही को काट के पकाकर उस भीड़ ने खाया तुम्हारे पूर्वजों को आजादी का ये नजराना मिला था और तुम इसे आजादी कहते हो । किसी घर में कोई मर जाता है तो उस दिन का त्योहार नहीं मनाया जाता जिस दिन लाखों लोग मर गए और लाखों के घर छिन गए उस दिन आप मनाओ आजादी का जश्न ।
अमृतसर में हिन्दुओ और सिखों की लाशों से भरी ट्रैन आती थी लिखा रहता था, “ये आज़ादी का नजराना”
पहली ट्रेन पाकिस्तान से (15.8.1947)😢
अमृतसर का लाल इंटो वाला रेलवे स्टेशन अच्छा खासा शरणार्थियों कैम्प बना हुआ था । पंजाब के पाकिस्तानी हिस्से से भागकर आये हुए हज़ारों हिन्दुओ-सिखों को यहाँ से दूसरे ठिकानों पर भेजा जाता था ! वे धर्मशालाओं में टिकट की खिड़की के पास, प्लेट फार्मों पर भीड़ लगाये अपने खोये हुए मित्रों और रिश्तेदारों को हर आने वाली गाड़ी मै खोजते थे…
15 अगस्त 1947 को तीसरे पहर के बाद स्टेशन मास्टर छैनी सिंह अपनी नीली टोपी और हाथ में सधी हुई लाल झंडी का सारा रौब दिखाते हुए पागलों की तरह रोती-बिलखती भीड़ को चीरकर आगे बढे…थोड़ी ही देर में 10 डाउन, पंजाब मेल के पहुँचने पर जो द्रश्य सामने आने वाला था,उसके लिये वे पूरी तरह तैयार थे….मर्द और औरतें थर्ड क्लास के धूल से भरे पीले रंग के डिब्बों की और झपट पडेंगे और बौखलाए हुए उस भीड़ में किसी ऐसे बच्चे को खोजेंगे, जिसे भागने की जल्दी में पीछे छोड़ आये थे !
चिल्ला चिल्ला कर लोगों के नाम पुकारेंगे और व्यथा और उन्माद से विहल होकर भीड़ में एक दूसरे को ढकेलकर-रौंदकर आगे बढ़ जाने का प्रयास करेंगे ! आँखो में आँसू भरे हुए एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे तक भाग भाग कर अपने किसी खोये हुए रिश्तेदार का नाम पुकारेंगे! अपने गाँव के किसी आदमी को खोजेंगे कि शायद कोई समाचार लाया हो ! आवश्यक सामग्री के ढेर पर बैठा कोई माँ बाप से बिछडा हुआ कोई बच्चा रो रह होगा, इस भगदड़ के दौरान पैदा होने वाले किसी बच्चे को उसकी माँ इस भीड़-भाड़ के बीच अपना ढूध पिलाने की कोशिश कर रही होगी….
स्टेशन मास्टर ने प्लेट फार्म एक सिरे पर खड़े होकर लाल झंडी दिखा ट्रेन रुकवाई ….जैसे ही वह फौलादी दैत्याकार गाड़ी रुकी, छैनी सिंह ने एक विचित्र द्रश्य देखा..चार हथियार बंद सिपाही, उदास चेहरे वाले इंजन ड्राइवर के पास अपनी बंदूकें सम्भाले खड़े थे !! जब भाप की सीटी और ब्रेको के रगड़ने की कर्कश आवाज बंद हुई तो स्टेशन मास्टर को लगा की कोई बहुत बड़ी गड़बड़ है…प्लेट फार्म पर खचाखच भरी भीड़ को मानो साँप सुंघ गया हो..उनकी आँखो के सामने जो द्रश्य था उसे देखकर वह सन्नाटे में आ गये थे !
स्टेशन मास्टर छेनी सिंह आठ डिब्बों की लाहौर से आई उस गाड़ी को आँखे फाड़े घूर रहे थे! हर डिब्बे की सारी खिड़कियां खुली हुई थी, लेकिन उनमें से किसी के पास कोई चेहरा झाँकता हुआ दिखाई नहीँ दे रहा था, एक भी दरवाजा नहीँ खुला.. एक भी आदमी नीचे नहीँ उतरा,उस गाड़ी में इंसान नहीँ भूत आये थे..स्टेशन मास्टर ने आगे बढ़कर एक झटके के साथ पहले डिब्बे के द्वार खोला और अंदर गये..एक सेकिंड में उनकी समझ में आ गया कि उस रात न.10 डाउन पंजाब मेल से एक भी शरणार्थी क्यों नही उतरा था..
वह भूतों की नहीँ बल्कि लाशों की गाड़ी थी..उनके सामने डिब्बे के फर्श पर इंसानी कटे-फटे जिस्मों का ढेर लगा हुआ था..किसी का गला कटा हुआ था.किसी की खोपडी चकनाचूर थी ! किसी की आते बाहर निकल आई थी…डिब्बों के आने जाने वाले रास्ते मे कटे हुए हाथ-टांगे और धड़ इधर उधर बिखरे पड़े थे..इंसानों के उस भयानक ढेर के बीच से छैनी सिंह को अचानक किसी की घुटी.घुटी आवाज सुनाई दी !
यह सोचकर की उनमें से शायद कोई जिन्दा बच गया हो उन्होने जोर से आवाज़ लगाई.. “अमृतसर आ गया है यहाँ सब हिंदू और सिख है. पुलिस मौजूद है, डरो नहीँ”..उनके ये शब्द सुनकर कुछ मुरदे हिलने डुलने लगे..इसके बाद छैनी सिंह ने जो द्रश्य देखा वह उनके दिमाग पर एक भयानक स्वप्न की तरह हमेशा के लिये अंकित हो गया …एक स्त्री ने अपने पास पड़ा हुआ अपने पति का ‘कटा सर’ उठाया और उसे अपने सीने से दबोच कर चीखें मारकर रोने लगी…
उन्होंने बच्चों को अपनी मरी हुई माओ के सीने से चिपट्कर रोते बिलखते देखा..कोई मर्द लाशों के ढेर में से किसी बच्चे की लाश निकालकर उसे फटी फटी आँखों से देख रहा था..जब प्लेट फार्म पर जमा भीड़ को आभास हुआ कि हुआ क्या है तो उन्माद की लहर दौड़ गयी…
स्टेशन मास्टर का सारा शरीर सुन्न पड़ गया था वह लाशों की कतारो के बीच गुजर रहा था…हर डिब्बे में यही द्रश्य था अंतिम डिब्बे तक पहुँचते पहुँचते उसे मतली होने लगी और जब वह ट्रेन से उतरा तो उसका सर चकरा रहा था उनकी नाक में मौत की बदबू बसी हुई थी और वह सोच रहे थे की रब ने यह सब कुछ होने कैसे दिया ?
जिहादी कौम इतनी निर्दयी हो सकती है कोई सोच भी नहीँ सकता था….उन्होने पीछे मुड़कर एक बार फ़िर ट्रेन पर नज़र डाली…हत्यारों ने अपना परिचय देने के लिये अंतिम डिब्बे पर मोटे मोटे सफेद अक्षरों से लिखा था…..”यह गाँधी और नेहरू को हमारी ओर से आज़ादी का नज़राना है ” !
हिन्दुओं और सिखों की लाखों लाशों पर बनी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर नेहरू ने इस देश पर शासन किया
भीष्म साहनी के उपन्यास से एक अंश…
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यह वरिष्ठ पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम है
इन्होंने ही सबसे पहले बोफोर्स घोटाले की पोल खोली थी और उनकी रिपोर्टिंग के आधार पर बोफोर्स मामले की पूरी जांच हुई
और कांग्रेस का कुकर्म और भ्रष्टाचार पूरी दुनिया ने देखा
और यही राजीव गांधी के हार का कारण भी बना और उसके बाद फिर कभी कांग्रेस पूर्ण बहुमत की सरकार भारत में नहीं बना सकी
यह बता रही है कि जब सोनिया गांधी के बचपन और जवानी के दोस्त क्वात्रोची दिल्ली में रहते थे जिन्हें सोनिया गांधी इटली से बुलाकर लाई थी तब भारत सरकार की तमाम फाइल सबसे पहले क्वात्रोची के पास जाती थी उसके बाद प्रधानमंत्री के पास जाती थी
जितने भी बड़े-बड़े टेंडर होते थे चाहे वह फर्टिलाइजर खरीद के टेंडर हो हथियार खरीद के टेंडर हो सारे टेंडर पहले क्वात्रोची को दिखाया जाता था उसके बाद वह रक्षा मंत्रालय जाता था
क्वात्रोची सोनिया गांधी के करीबी का आप देखिए कि जब यह देश छोड़कर भाग गया उस वक्त इसके बैंक अकाउंट जो कुल आठ बैंक अकाउंट थे वह भारत सरकार की रिक्वेस्ट पर ब्रिटेन ने फ्रिज कर दिए थे और उसमें 27000 करोड रुपए थे
और वह रुपए इसने भारत से दलाली करके जमा किए थे
सोनिया गांधी ने चुपके से भारत सरकार के कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज को लंदन भेजा और उसने भारत सरकार के लेटर पैड पर अंडरटेकिंग दिया की आप क्वात्रोची के बैंक अकाउंट से प्रतिबंध हटा दीजिए डीफ्रीज कर दीजिए हमें कोई आपत्ति नहीं है
और ब्रिटेन ने जब खाते डीफ्रिज किये तब तुरंत क्वात्रोची ने अपने सारे पैसे इटली के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया
और जब सीबीआई को यह पता चला तब सीबीआई हाथ मलती रह गई
इतना ही नहीं जब क्वात्रोची मलेशिया एयरपोर्ट पर गिरफ्तार हुआ फिर इंटरपोल ने सीबीआई को सूचना दिया तब देश में कांग्रेस सरकार थी तब जानबूझकर सीबीआई को तीन दिन बाद भेजा गया था और वह सिर्फ एक नौटंकी थी बल्कि दस्तावेज यह कहते हैं कि उसे वक्त सीबीआई ने इंटरपोल को कह दिया कि आप इन्हें हिरासत से रिहा कर दीजिए
कांग्रेस के कुकर्म इतने हैं कि लिखते लिखते भी कम पड़ेंगे ..
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