क्रोध की दवा – एक प्रेरणादायक कहानी
एक गाँव में एक स्त्री रहा करती थी। उसका नाम शोभा था। शोभा स्वभाव से अत्यंत क्रोधी थी। गुस्सा तो जैसे उसकी नाक की नोक पर बैठा रहता था। छोटी-छोटी बातों पर वह भड़क उठती और सामने वाले को खरी-खोटी सुनाने में देर नहीं करती। चाहे घर का कोई सदस्य हो या बाहर का कोई पड़ोसी, वह किसी को नहीं बख्शती थी। उसके तीखे बोल और चिड़चिड़े स्वभाव से आस-पड़ोस के लोग परेशान हो चुके थे। कोई भी उससे सीधे मुंह बात करने से कतराता था।
घर का माहौल भी शोभा के गुस्से से अछूता नहीं था। पति और बच्चे उसकी आवाज़ से कांपने लगे थे। रोज़ घर में कलह का वातावरण बना रहता। शोभा को स्वयं भी यह बात खटकती थी कि उसके गुस्से के कारण लोग उससे दूर होते जा रहे हैं, और घर में प्रेम और शांति की जगह तनाव ने ले ली है।
शोभा को यह भी अनुभव होता था कि जब गुस्सा शांत हो जाता है, तब उसे बहुत पछतावा होता है। वह सोचती, “क्यों मैं इतनी बातें बोल गई? क्यों मैं खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाई?” लेकिन जब अगली बार कोई बात होती, वह फिर अपने आप पर काबू खो बैठती। वह स्वयं को लाचार महसूस करने लगी थी।
एक दिन गाँव में एक प्रसिद्ध महात्मा का आगमन हुआ। लोग उन्हें सुनने और उनसे मिलने दूर-दूर से आ रहे थे। उनके प्रवचन में आत्मसंयम, शांति और सदाचार की बातें होती थीं। जब शोभा को महात्मा की कीर्ति और उनके चमत्कारी उपायों की बात पता चली, तो उसने निश्चय किया कि वह उनसे मिलकर अपने गुस्से को शांत करने का कोई उपाय पूछेगी।
अगली सुबह वह महात्मा के पास पहुँची। उसने उनके चरणों में प्रणाम किया और विनम्रता से बोली,
“गुरुवर! मैं अपने गुस्से से बहुत पीड़ित हूँ। जब भी मुझे गुस्सा आता है, मैं अपना आपा खो देती हूँ। लोगों को बुरा-भला कह देती हूँ और बाद में बहुत पछताती हूँ। मेरे रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताइये जिससे मैं इस गुस्से पर काबू पा सकूं।”
महात्मा ने ध्यानपूर्वक उसकी बात सुनी और मुस्कराते हुए एक छोटी सी शीशी उसे दी।
उन्होंने कहा,
“पुत्री, इस शीशी में क्रोध शांत करने की दिव्य औषधि है। जब भी तुम्हें गुस्सा आये, इस शीशी को मुँह से लगाकर इसके कुछ घूंट पी लेना। लेकिन ध्यान रखना, जब तक मुंह में यह दवा हो, तब तक कुछ बोलना नहीं।”
शोभा ने शीशी को दोनों हाथों से लिया और श्रद्धा से सिर झुकाकर धन्यवाद दिया। वह घर लौटी और जैसे ही अगली बार उसे गुस्सा आया, उसने शीशी से कुछ घूंट पानी पिया और मुंह बंद कर लिया। परिणाम चौंकाने वाला था — जब उसने कुछ नहीं कहा, तो बात वैसे ही शांत हो गई। न कोई झगड़ा हुआ, न कलह। यह अनुभव उसके लिए नया था।
फिर जब भी गुस्सा आता, वह शीशी से पानी पीती और चुप हो जाती। धीरे-धीरे उसने पाया कि उसका गुस्सा कम होने लगा है। न सिर्फ बाहर के लोग, बल्कि उसके अपने घरवाले भी अब उसे नए नज़रिये से देखने लगे थे। उसके रिश्तों में सुधार आने लगा। सात दिन बाद शीशी की दवा समाप्त हो गई।
वह पुनः महात्मा के पास पहुँची और बोली,
“गुरुवर! आपने मुझे जो दवा दी, वह तो अद्भुत निकली। पीते ही मेरा गुस्सा ठंडा हो जाता है। अब वह दवा समाप्त हो गई है, कृपया मुझे उसकी एक और शीशी दें।”
महात्मा मुस्कराए और बोले,
“पुत्री, उस शीशी में कोई औषधि नहीं थी। उसमें तो केवल साधारण पानी था। जब भी तुम गुस्सा करती थी, तब तुम उस पानी को पीने में व्यस्त हो जाती थी और इस कारण कुछ बोल नहीं पाती थी। यही मौन ही असली दवा है। जब इंसान गुस्से में होता है, तो सबसे अधिक नुकसान उसकी जुबान से निकलने वाले शब्द करते हैं। यदि वह कुछ बोलने के बजाय कुछ क्षण मौन रह जाए, तो क्रोध स्वतः ही शांत हो जाता है।”
शोभा की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा,
“गुरुवर, आपने मेरी आँखें खोल दीं। मैं समझ गई कि असली दवा मेरे ही व्यवहार में छुपी है। अब मैं हर बार गुस्से के समय चुप रहूंगी और स्वयं को संभालूंगी।”
सीख:
गुस्सा आने पर यदि हम चुप रह जाएं और कुछ समय के लिए स्वयं को रोक लें, तो बड़े से बड़ा झगड़ा टल सकता है। क्रोध की सबसे सरल और कारगर दवा है — “मौन।”
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🇮🇳 #महर्षि #पाणिनि के बारे में जाने
पाणिनि (५०० ई पू) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं।
#संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है।
एक #शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध #जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा…
“मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि #अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके। इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है।…
#अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके।”
The M L B D #News letter (A monthly of indological bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first software man without hardware घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था “Sanskrit software for future hardware” जिसमे बताया गया प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, #वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, परआज भी दुनिया भर में #कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।
व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और #तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।
NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी। उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों #डॉलर खर्च किये गये।
महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या #तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।
पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार…
“पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है” (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।
“पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं” (कोल ब्रुक)।
“संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है… यह मानवीय #मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है” (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।
“पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा”।
(प्रो. मोनियर विलियम्स)।
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🇮🇳 #महर्षि #पाणिनि के बारे में जाने
पाणिनि (५०० ई पू) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं।
#संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है।
एक #शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध #जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा…
“मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि #अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके। इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है।…
#अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके।”
The M L B D #News letter (A monthly of indological bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first software man without hardware घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था “Sanskrit software for future hardware” जिसमे बताया गया प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, #वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, परआज भी दुनिया भर में #कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।
व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और #तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।
NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी। उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों #डॉलर खर्च किये गये।
महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या #तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।
पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार…
“पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है” (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।
“पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं” (कोल ब्रुक)।
“संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है… यह मानवीय #मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है” (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।
“पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा”।
(प्रो. मोनियर विलियम्स)।
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