Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बहुत समय पहले, हिमालय की ऊँची-ऊँची पहाड़ियों में एक वृद्ध सन्यासी रहा करता था। वह तपस्वी बड़ा ज्ञानी और दूरदर्शी था। उसकी ख्याति इतनी फैली हुई थी कि दूर-दराज़ के लोग अपने दुख और प्रश्न लेकर उसके पास आया करते थे।

एक दिन, एक स्त्री रोते-रोते उसके आश्रम पहुँची। आँसुओं से भरी आँखों और कांपती हुई आवाज़ में उसने कहा—
“बाबा, मेरा पति पहले मुझसे बहुत प्रेम करता था। लेकिन जब से वह युद्ध से लौटा है, उसकी आँखों की चमक खो गई है। वह अब मुझसे ठीक से बात तक नहीं करता।”

सन्यासी ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“युद्ध केवल ज़मीन और लोगों को ही नहीं तोड़ता, वह इंसान के भीतर भी गहरी दरारें छोड़ जाता है।”

स्त्री ने जल्दी से कहा—
“लोग कहते हैं कि आपके पास ऐसी जड़ी-बूटी है जो इंसान के भीतर फिर से प्रेम जागृत कर देती है। कृपा करके आप मुझे वह जड़ी-बूटी दे दीजिए।”

सन्यासी ने कुछ देर ध्यान लगाया, फिर गंभीर स्वर में बोला—
“देवी, मैं तुम्हें वह जड़ी-बूटी दे सकता हूँ, लेकिन उसे बनाने के लिए मुझे एक ऐसी वस्तु चाहिए जो मेरे पास नहीं है।”

स्त्री ने तुरंत कहा—
“आप बताइए बाबा, वह वस्तु मैं लेकर आऊँगी।”

सन्यासी ने उसकी ओर गहराई से देखा और बोला—
“मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए।”

स्त्री चौंक गई, लेकिन संकल्प दृढ़ था। अगले ही दिन वह घने जंगल की ओर निकल पड़ी। नदी किनारे उसे एक विशालकाय बाघ दिखा। बाघ ने उसे देखते ही भयंकर दहाड़ लगाई। भय से उसका शरीर काँप उठा और वह भाग खड़ी हुई।

लेकिन उसने हार नहीं मानी।
दिन बीतते गए, और वह रोज़ उसी स्थान पर पहुँचने लगी। पहले-पहल वह दूर से खड़ी रहती, फिर धीरे-धीरे नज़दीक आने लगी। बाघ भी अब उसकी उपस्थिति का अभ्यस्त हो गया। स्त्री कभी-कभी उसके लिए मांस छोड़ जाती, और धीरे-धीरे बाघ उस पर विश्वास करने लगा।

महीनों बीत गए। भय की जगह अपनापन आने लगा। अब वह बाघ के पास बैठने लगी, उसके माथे पर हाथ फेरने लगी। और एक दिन, साहस जुटाकर उसने बाघ की मूंछ से धीरे से एक बाल खींच लिया।

वह बाल लेकर हर्षित मन से सन्यासी के पास पहुँची—
“देखिए बाबा! मैं बाघ की मूंछ का बाल ले आई।”

सन्यासी ने मुस्कुराते हुए बाल लिया और बिना कुछ कहे उसे जलती हुई आग में डाल दिया।

स्त्री घबरा उठी—
“अरे बाबा! यह आपने क्या किया? इस बाल को लाने के लिए मैंने न जाने कितनी रातें डर और साहस के बीच गुज़ारीं… अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी?”

सन्यासी ने गहरी मुस्कान के साथ कहा—
“देवी, अब तुम्हें किसी जड़ी-बूटी की ज़रूरत नहीं है। सोचो, तुमने एक हिंसक और डरावने पशु को धैर्य, विश्वास और प्रेम से अपना मित्र बना लिया। तो क्या तुम उसी धैर्य और प्रेम से अपने पति का हृदय नहीं जीत सकती? जब बाघ बदल सकता है, तो इंसान क्यों नहीं?”

स्त्री की आँखों से आँसू बह निकले। उसने समझ लिया कि असली जड़ी-बूटी तो उसके अपने भीतर थी—धैर्य और प्रेम।
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