🔥 કનાઈ લાલ દત્ત: જે માત્ર 22 વર્ષની વયે ફાંસીના માંચડે ચડી ગયા, તે યુવા ક્રાંતિકારી જેણે મૃત્યુ પહેલા દુશ્મનને મોત આપી 🔥
ભારતની આઝાદીની લડાઈમાં કેટલાક નામ એવા છે, જે ઇતિહાસના પુસ્તકોમાં બહુ ઓછી જગ્યા મેળવી શક્યા, પરંતુ તેમનું સાહસ કોઈપણ મહાન ક્રાંતિકારીથી ઓછું નહોતું. કનાઈ લાલ દત્ત તે જ ગુમનામ છતાં અમર શહીદોમાંના એક હતા.
🌱 પ્રારંભિક જીવન
કનાઈ લાલ દત્તનો જન્મ 1907માં બંગાળ (વર્તમાન પશ્ચિમ બંગાળ)માં થયો હતો. તેઓ બાળપણથી જ તેજ બુદ્ધિ, દેશપ્રેમ અને અન્યાય વિરુદ્ધ વિદ્રોહી સ્વભાવના હતા. જ્યારે આખો દેશ અંગ્રેજી હુકુમતના અત્યાચારોથી પીડાઈ રહ્યો હતો, ત્યારે કનાઈ જેવા યુવાનોના મનમાં એક જ વિચાર હતો:
“આજ નહીં તો ક્યારેય નહીં, આઝાદી કોઈપણ સંજોગોમાં જોઈએ.”
✊ ક્રાંતિકારી જીવન અને સંઘર્ષ
કનાઈ લાલ દત્ત અનુશીલન સમિતિ જેવા ક્રાંતિકારી સંગઠન સાથે જોડાયા, જે સશસ્ત્ર ક્રાંતિમાં વિશ્વાસ રાખતું હતું. તેમનું માનવું હતું કે માત્ર અરજીઓ અને ભાષણોથી આઝાદી નહીં મળે, પરંતુ અત્યાચારી સત્તાને તેની જ ભાષામાં જવાબ આપવો પડશે.
અંગ્રેજ સરકાર માટે સૌથી મોટો ખતરો એન.એસ. સિમ્પસન (N.S. Simpson) નામનો એક પોલીસ અધિકારી હતો, જે ક્રાંતિકારીઓને પકડવા, યાતના આપવા અને ફાંસી અપાવવા માટે કુખ્યાત હતો. સિમ્પસનને કારણે ઘણા નિર્દોષ યુવાનો જેલોમાં સડી રહ્યા હતા.
કનાઈ લાલ દત્તે નક્કી કરી લીધું —
“કાં તો સિમ્પસન બચશે, કાં તો ભારતનો આત્મા.”
🩸 ધરપકડ અને અત્યાચાર
1928માં કનાઈ લાલ દત્તની અંગ્રેજો દ્વારા ધરપકડ કરવામાં આવી અને તેમને અલીપોર સેન્ટ્રલ જેલમાં બંધ કરી દેવામાં આવ્યા. જેલમાં તેમના પર અમાનવીય અત્યાચારો કરવામાં આવ્યા:
* ભૂખ્યા રાખવામાં આવ્યા
* ઊંઘવા દેવામાં આવ્યા નહીં
* મારપીટ અને માનસિક યાતનાઓ આપવામાં આવી
અંગ્રેજો વિચારતા હતા કે આ નવયુવાન તૂટી જશે… પણ તેઓ જાણતા નહોતા કે કનાઈનું શરીર કેદ હતું, આત્મા નહીં.
🔫 સાહસની ચરમસીમા: જેલની અંદર ક્રાંતિ
આ વાર્તા કનાઈ લાલ દત્તને અમર બનાવી દે છે.
અલીપોર જેલમાં એક દિવસ એન.એસ. સિમ્પસન પોતે પૂછપરછ માટે આવ્યો. કનાઈ જાણી ગયા હતા કે બહાર નીકળવાનો કોઈ રસ્તો નથી, પરંતુ દેશ માટે મરતા પહેલા દુશ્મનને ખતમ કરવો જરૂરી છે.
તેમણે ચાલાકીથી એક નાની રિવોલ્વર મેળવી લીધી. જ્યારે સિમ્પસન પૂછપરછ દરમિયાન નમ્યો —
👉 ધડામ!
એક નહીં, બે ગોળીઓ…
સિમ્પસન ત્યાં જ ઢળી પડ્યો.
આખી જેલમાં સન્નાટો છવાઈ ગયો. અંગ્રેજ અફસરો ફફડી ઉઠ્યા. એક કેદીએ જેલની અંદર જ અંગ્રેજી સત્તાને પડકાર ફેંકી દીધો હતો. કનાઈએ શાંત સ્વરમાં કહ્યું —
“મેં મારી ફરજ નિભાવી દીધી.”
⚖️ મુકદ્દમો અને બલિદાન
આ ઘટના પછી અંગ્રેજ સરકાર ફફડી ઉઠી. કનાઈ લાલ દત્ત પર મુકદ્દમો ચાલ્યો, પરંતુ તેમણે ન તો વકીલ માંગ્યો, ન તો માફી.
તેમના શબ્દો હતા —
“મેં જે કર્યું, ગર્વથી કર્યું. જો ફરી જન્મ મળશે, તો ફરી આ જ કરીશ.”
🕊️ 10 ઓગસ્ટ 1929
માત્ર 22 વર્ષની ઉંમરે કનાઈ લાલ દત્તને ફાંસી આપવામાં આવી. ફાંસીના ફંદાને ચૂમતી વખતે તેમના ચહેરા પર ડર નહીં, પણ સ્મિત હતું.
🇮🇳 વારસો અને પ્રેરણા
કનાઈ લાલ દત્તનું બલિદાન શીખવે છે કે:
* ઉંમર સાહસની સીમા નથી હોતી.
* જેલની દીવાલો વિચારોને રોકી શકતી નથી.
* એક એકલો યુવાન પણ સામ્રાજ્યને હલાવી શકે છે.
આજે તેઓ ભલે ઇતિહાસના મુખ્ય પ્રવાહથી દૂર હોય, પરંતુ તે દરેકના દિલમાં જીવંત છે જે અન્યાય વિરુદ્ધ ઉભા થવાની હિંમત રાખે છે.
🌺 અંતિમ પંક્તિઓ
કનાઈ લાલ દત્ત મૃત્યુ પામ્યા નથી, તેઓ આઝાદીના પાયામાં અમર થઈ ગયા છે. શત-શત નમન!
જય હિન્દ 🚩
વંદે માતરમ્ 🚩
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ट्रेन 🚆 में धोती कुर्ता पहने साधारण दिखने वाले जिस भारतीय की अंग्रेज बेइज्जती कर रहे थे असल में वो कोई साधारण इंसान नहीं था.. वो इंसान थे🤵♂️
भारत के महान इंजीनियर और भारत रत्न👇👇👇
🚆🤵♂️ डिब्बा अंग्रेजों से खचाखच भरा हुआ था। वे सभी उस भारतीय का मजाक उड़ाते जा रहे थे। कोई कह रहा था, देखो कौन नमूना ट्रेन में बैठ गया, तो कोई उनकी वेश-भूषा देखकर उन्हें गंवार कहकर हँस रहा था। कोई तो इतने गुस्से में था कि ट्रेन को कोसकर चिल्ला रहा था, एक भारतीय को ट्रेन मे चढ़ने क्यों दिया ? इसे डिब्बे से उतारो।🥇🇮🇳
किँतु उस धोती-कुर्ता, काला कोट एवं सिर पर पगड़ी पहने शख्स पर इसका कोई प्रभाव नही पड़ा।वह शांत गम्भीर भाव लिये बैठा था, मानो किसी उधेड़-बुन मे लगा हो।
🚆 ट्रेन तीव्र गति से दौड़े जा रही थी औऱ अंग्रेजों का उस भारतीय का उपहास, अपमान भी उसी गति से जारी था।किन्तु यकायक वह शख्स सीट से उठा और जोर से चिल्लाया “ट्रेन रोको”। कोई कुछ समझ पाता उससे पहले ही उसने ट्रेन की जंजीर खींच दी। ट्रेन रुक गईं।🚆🤵♂️
अब तो जैसे अंग्रेजों का गुस्सा फूट पड़ा।सभी उसको गालियां दे रहे थे।गंवार, जाहिल जितने भी शब्द शब्दकोश मे थे, बौछार कर रहे थे।किंतु वह शख्स गम्भीर मुद्रा में शांत खड़ा था। मानो उसपर किसी की बात का कोई असर न पड़ रहा हो। उसकी चुप्पी अंग्रेजों का गुस्सा और बढा रही थी।🤵♂️🤮
🚆 ट्रेन का गार्ड दौड़ा-दौड़ा आया. कड़क आवाज में पूछा, “किसने ट्रेन रोकी”। कोई अंग्रेज बोलता उसके पहले ही, वह शख्स बोल उठा:- “मैंने रोकी श्रीमान”।🤵♂️😊
पागल हो क्या ? पहली बार ट्रेन में बैठे हो ? तुम्हें पता है, अकारण ट्रेन रोकना अपराध हैं:- “गार्ड गुस्से में बोला”
हाँ श्रीमान ! ज्ञात है किंतु मैं ट्रेन न रोकता तो सैकड़ो लोगो की जान चली जाती।🇮🇳🚆🤵♂️
उस शख्स की बात सुनकर सब जोर-जोर से हंसने लगे। किँतु उसने बिना विचलित हुये, पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा:- यहाँ से करीब एक फर्लांग की दूरी पर पटरी टूटी हुई हैं।आप चाहे तो चलकर देख सकते है। गार्ड के साथ वह शख्स और कुछ अंग्रेज सवारी भी साथ चल दी। रास्ते भर भी अंग्रेज उस पर फब्तियां कसने मे कोई कोर-कसर नही रख रहे थे।🤵♂️🪖
👉 किँतु सबकी आँखें उस वक्त फ़टी की फटी रह गई जब वाक़ई , बताई गई दूरी के आस-पास पटरी टूटी हुई थी।नट-बोल्ट खुले हुए थे।अब गार्ड सहित वे सभी चेहरे जो उस भारतीय को गंवार, जाहिल, पागल कह रहे थे।वे उसकी और कौतूहलवश देखने लगे, मानो पूछ रहे हो आपको ये सब इतनी दूरी से कैसे पता चला ??..🇮🇳🤵♂️
गार्ड ने पूछा:- तुम्हें कैसे पता चला , पटरी टूटी हुई हैं ??.
उसने कहा:- श्रीमान लोग ट्रेन में अपने-अपने कार्यो मे व्यस्त थे।उस वक्त मेरा ध्यान ट्रेन की गति पर केंद्रित था। ट्रेन स्वाभाविक गति से चल रही थी। किन्तु अचानक पटरी की कम्पन से उसकी गति में परिवर्तन महसूस हुआ।ऐसा तब होता हैं, जब कुछ दूरी पर पटरी टूटी हुई हो।अतः मैंने बिना क्षण गंवाए, ट्रेन रोकने हेतु जंजीर खींच दी।♥️
गार्ड औऱ वहाँ खड़े अंग्रेज दंग रह गये. गार्ड ने पूछा, इतना बारीक तकनीकी ज्ञान ! आप कोई साधारण व्यक्ति नही लगते।अपना परिचय दीजिये। शख्स ने बड़ी शालीनता से जवाब दिया:- श्रीमान मैं भारतीय इंजीनियर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया…(एम विश्वेश्वरैया)🤵♂️😊
✍️ जी हाँ ! वह असाधारण शख्स कोई और नही “डॉ विश्वेश्वरैया” थे। उनके लिए 2 शब्द!!
👉 अस्वीकरण:
👉 यह डॉ. एम. विश्वेश्वरैया से जुड़ी एक प्रेरणादायक लोककथा है। इसके ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसे तथ्यात्मक घटना के रूप में नहीं, बल्कि प्रेरणा के रूप में पढ़ें।
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साध्वी प्रज्ञा सिंह और कर्नल पुरोहित को कोर्ट ने बाइज्जत बरी किया।
“कुत्ती” , “कमीनी” , “वेश्या” , “कुलटा ” बोल इस भगवा में किसकी रखैल है तू ?
“अब तक कितनों के बिस्तर पर गई है,,,?”
“किसके इशारे पर सब कर रही है ?”
“जिंदगी प्यारी है तो जो मैं कहता हूँ कबुल कर ले बाकी जिंदगी आराम से कटेगी”
यह शब्द सुनकर आपकी त्योरियां जरुर चढ़ गई होगी
मेरी भी चढ़ गई थी,,,।
ऐसे घृणित शब्दों से किसी और को नहीं,,,,
बल्कि भगवा वस्त्र धारिणी निष्कलंक साध्वी प्रज्ञा सिंह को कलंकित “कांग्रेस” के इशारे पर मुम्बई ATS चीफ हेमंत करकरे के सामने मुम्बई पुलिस व ATS ने कहलवाया था.
जिस हेमंत करकरे को आज शहीद मान कर सम्मान दिया जाता है एक नम्बर का नी#,ch आदमी था. उस निर्दोष हिंदू साध्वी का श्राप लगा और आज हेमंत करकरे के परिवार में कोई दीपक जलाने वाला भी जीवित नहीं बचा है ।
मैं साध्वी प्रज्ञा जी का एक साक्षात्कार देख रहा था।
ऐसे घृणित शब्दों को इशारे में बताया।
बताते हुए उनके नेत्र सजल हो गये.
साक्षात्कार देखते हुए क्रोधाग्नि से धधक रहे मेरे आँखो से भी अश्रु की धारा फूट पड़ी।
“साध्वी प्रज्ञा” ने मर्माहत शब्दों में वृत्तान्त सुनाया कि
मेरे शरीर का कोई ऐसा अंग नही जिसे चोटिल ना किया गया हो।
जब पत्रकार ने पुछा कि
मारने के कारण ही आपके रीढ़ की हट्टी टूट गई थी ??
साध्वी प्रज्ञा ने कहा,
“नहीं, मारने से नहीं,
एक जन हमारा हाथ पकड़ते थे एक जन पांव और झूलाकर दीवार की तरफ फेंक देते थे,
ऐसा प्राय: रोजाना होता था दीवार से सर टकराकर सुन्न हो जाता था।
कमर में भयानक दर्द होता था। ऐसा करते करते एक दिन रीढ़ की हड्डी टूट गई तब अस्पताल में भर्ती कराया गया।”
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“एक दिन तो ऐसा हुआ कि
मारते मारते एक पुलिस वाला थक गया तो
दूसरा मारने लगा।
उस दौरान मेरे फेफड़े की झिल्ली फट गई फिर भी विधर्मी निर्दयता से मारता रहा.”.
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“रीढ़ की हड्डी टूटने के बाद मैं बेहोश हो गई थी।
जब होश आया तो देखा कि
मेरे शरीर से सारा भगवा वस्त्र उतार लिया गया गया था.
मुझे एक फ्राक पहनाया गया था।”
साध्वी दीदी ने बताया,
“मेरे साथ मेरे एक शिष्य को भी गिरफ्तार किया गया था ।
उसे मेरे सामने लाकर उसे चौड़ा वाला बेल्ट दिया और कहा मार!! अपने गुरु को इस साली को!!”
.”शिष्य, सकुचाने लगा तो मैं बोली मारो मुझे !!
शिष्य ने मजबुरी में मारा तो जरुर मुझे
लेकिन नरमी से।
तब एक पुलिस वाले ने शिष्य से बेल्ट छीन कर शिष्य को बुरी तरह पीटने लगा और बोला ऐसे मारा जाता है.
“साध्वी प्रज्ञा ने बताया कि
एक दिन कुछ पुरुष कैदियों के साथ मुझे खड़ी करके अश्लील आडियो सुनाया जा रहा था.
मेरे शरीर पर इतनी मार पड़ी थी कि
मेरे लिए खड़ी रहना मुश्किल था. मैं बोली कि बैठ जाऊँ वो बोले साली शादी मे आई है क्या कि बैठ जायेगी!!
मेरी आँख बंद होने लगी मैं अचेत हो गई।
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“मेरे दोनों हाथों को सामने फैलवाकर एक चौड़े बेल्ट से मारते थे,
मेरा दोनो हाथ सूज जाता था।
अँगुलियां भी काम नही करती थी,
तब गुनगुना पानी लाया जाता था। मैं अपने हाथ उसमें डालती,
कुछ आराम होता तब अंगलुियां हिलने डुलने लगती थी,
तो फिर से वही क्रिया मेरे पर मार पड़ती थी।
साध्वी प्रज्ञा जी ने बताया कि
मुझे तोड़ने के लिए मेरे चरित्र पर लांछन लगाया।
क्योंकि लोग जानते हैं कि
किसी औरत को तोड़ना है तो उसके चरित्र पर दाग लगाओ !
मेरे जेल जाने के बाद यह सदमा मेरे पिताजी बर्दास्त नहीं कर पाये और इस दुनियां से चल बसे. साध्वी जी राहत की सांस लेते हुए कहती हैं मेरे अन्दर रहते ही,
एक दुर्बुद्धि दुराचारी हेमंत करकरे को तो सजा मिल गई मिल गई अभी बहुत लोग बाकी है।
साध्वी ने बताया,
“नौ साल जेल में थी,
सिर्फ एक दिन एक महिला ने एक डंडा मारा था,
बाकी हर रोज पुरुष ही निर्दयता से हमें पीटते थे.”
पत्रकार ने पूछा,
“आपको समझ में तो आ गया होगा कि क्यों आपको इतने बेरहमी से तड़पाया जा रहा था?”
साध्वी जी ने कहा,
“हां, भगवा के प्रति उनका द्वेश था।
फूटी आंख भी भगवा को नही देखना चाहते थे।
भगवा को बदनाम करने का कांग्रेस ने एक सुनियोजित षडयंत्र तैयार किया था.”
साध्वी ने बताया कि
एक बार कांग्रेस का गुलाम, स्वामी अग्निवेष मुझसे मिलने जेल में आया और बोला,
“आप सब कबुल कर लो कि
हां! यह सब RSS के कहने पर हुआ है।
इसमें यूपी के सांसद योगी आदित्य नाथ और संघ के इंद्रेश कुमार का नाम ले लो ।
सरकारी गवाह बन जाओ।
चिदम्बरम और दिग्विजय हमारे मित्र हैं।
मै आपको छुड़वा दुंगा”
साध्वी जी ने कहा,
“अगर आपकी उनसे घनिष्ठता है और सच में हमें छुड़ाना चाहते हो,
तो चिदम्बरम से जाकर बोलो की इमानदारी से जांच करवा ले, क्योंकि मैंने ऐसा कुछ किया ही नही है ।”
हिन्दुओं सबसे ख़ास बात ये कि साध्वी पर ये अत्याचार किसी इस्लामिक काल में नही हुआ है
इसके आगे आपको सोचना है कि काँग्रेसियों के मन मे हिन्दुओं के लिए कितना प्रेम है।
काँग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र आपने पढ लिया होगा।
अब आपको निर्णय करना है कि आपको कैसा भारत चाहिये ,
और यदि अंतरात्मा ,स्वधर्म गौरव और स्वाभिमान नाम की कोई चीज है हिंदुओं के जेहन में तो तुम हिंदुओं को कसम है अयोध्या में विराजमान तुम्हारे आराध्य राम की, शहीद रामभक्तों और शहीदों के खून से लाल हुयी सरयू नदी की, इस सपा+ कांग्रेस को जीवन में कभी भी वोट मत देना।
हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ने का कांग्रेस ने गंदा प्रयास किया लेकिन आज कोर्ट ने इनके झूठ की पोल खोल दी है।
ऐतिहासिक फैसला,,!
16 साल बाद, #NIA कोर्ट ने 2008 के मालेगांव मामले में साध्वी प्रज्ञा, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और अन्य को क्लीन चिट दे दी है।
सभी कांग्रेस के द्वारा बनाए गए कथित आरोपीयो को बरी किया गया।
तथाकथित “भगवा आतंकवाद” का मिथक ध्वस्त हो गया है।
कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिशोध की भावना उजागर हुई है। यह सिर्फ़ एक फैसला नहीं है, बल्कि वोट बैंक की राजनीति के लिए संतों और सैनिकों को बदनाम करने वालों के मुँह पर तमाचा है।
सत्यमेव जयते,,,,
दोस्तों जानकारी अच्छी लगे तो कृपया पेज को फॉलो और पोस्ट को शेयर जरूर करें,,,,,
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वह मस्जिद से बाहर निकला था और सरदार पटेल पर हमला किया था।
हमें सिखाया गया कि महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी,
लेकिन हमें कभी नहीं सिखाया गया कि 14 मई 1939 को भावनगर में सरदार वल्लभभाई पटेल पर किसने हमला किया,
किसने उनकी हत्या करने की कोशिश की, और अदालत ने कितने आरोपियों को फांसी या आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।
भावनगर में 14 और 15 मई 1939 को भावनगर राज्य प्रजा परिषद का पाँचवाँ अधिवेशन आयोजित होना था, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल करने वाले थे।
जब सरदार पटेल भावनगर पहुँचे, तो रेलवे स्टेशन से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई।
सरदार पटेल एक खुली जीप में बैठे हुए थे, दोनों ओर खड़ी जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे।
जब जुलूस खार गेट चौक पहुँचा, तो नगीना मस्जिद में छिपे हुए 57 तथाकथित शांतिप्रिय लोग तलवारें, चाकू और भाले लेकर जीप की ओर दौड़ पड़े।
दो युवकों — बच्छुभाई पटेल और जाधवभाई मोदी — ने यह दृश्य देखा।
उन्होंने तुरंत सरदार पटेल को चारों ओर से घेर लिया ताकि उन्हें बचा सकें, और अपनी जान की परवाह किए बिना, वे उन वारों को अपने ऊपर ले लिए जो सरदार पटेल के लिए किए गए थे।
उन्होंने सरदार पटेल की ढाल बनकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।
हमलावरों ने दोनों युवकों पर तलवार से कई वार किए — बच्छुभाई पटेल वहीं शहीद हो गए, जबकि जाधवभाई मोदी ने अस्पताल में दम तोड़ दिया।
आज भी उन वीर युवकों की प्रतिमाएँ उसी स्थान पर स्थापित हैं जहाँ उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए थे।
तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इस घटना की गहन जांच की और एक विशेष न्यायालय गठित किया।
57 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से:
• आजाद अली
• रुस्तम अली सिपाही — को फांसी की सज़ा सुनाई गई।
निम्नलिखित 15 अपराधियों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई:
• कासिम दोसा घांची
• लतीफ मियां काज़ी
• मोहम्मद करीम सैनिक
• सैयद हुसैन
• चंद्र गुलाब सैनिक
• हाशिम सुमरा ताह
• लुहार मूसा अब्दुल्ला
• अली मियां अहमद मियां सैयद
• अली मामद सुलेमान
• मोहम्मद सुलेमान कुम्भार
• अबू बकर अब्दुल्ला
• लुहार अहमदिया
• मोहम्मद मियां काज़ी
उन्होंने अदालत में कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने कोलकाता में मुस्लिम लीग के खिलाफ भाषण दिया था,
जिसके कारण उनकी हत्या की साजिश रची गई।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद, नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक घटना को इतिहास की पुस्तकों से मिटा दिया,
ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह न जान सकें कि सरदार पटेल पर भी एक घातक हमला और हत्या का षड्यंत्र हुआ था।
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यह पानीपत में अंतिम हिन्दू सम्राट हेमाचन्द्र विकमादित्य (हेमू) की समाधि है। हाल ही में इसे अवैध रूप से दरगाह बना दिया गया है।
क्यों?
क्या हेमू एक उचित स्मारक के लायक नहीं है? खुल्दाबाद में औरंगजेब की कब्र पर करोड़ो खर्च करने वाली सरकार चुपचाप हेमू की समाधि पर ये अवैध अतिक्रमण देख रही है।
हेमू दिल्ली के सिंहासन पर चढ़ने वाले अंतिम हिंदू राजा थे और भारत के इतिहास में सबसे महान सैन्य जनरलों में से एक थे। उनका जन्म एक विनम्र किराना बेचने वाले वैश्य परिवार में हुआ था। अपनी बुद्धिमत्ता और कड़ी मेहनत से वह रैंक के माध्यम से एक वजीर बन गया।
वह 22 लड़ाइयों में लगातार जीत हासिल करके भारतीय इतिहास के सर्वश्रेष्ठ सैन्य जनरलों में से एक साबित हुए।
उनकी सबसे प्रसिद्ध जीत आगरा और दिल्ली में अकबर की मुगल सेनाओं के खिलाफ रही है। हेमू ने आगरा और दिल्ली के मुगल राज्यपालों को हराया। उन्होंने खुद को सम्राट घोषित कर दिया, “विक्रमादित्य” की उपाधि ग्रहण की और अपने ही नाम पर सिक्कों की बुनाई शुरू कर दी।
हेमू ने मुग़ल आक्रमणकारियों को भारत से स्थायी रूप से बाहर फेंकना चाहा था। दिल्ली में अपनी जीत के बाद, वह पंजाब की ओर बढ़ गया जो अभी तक अकबर के पास था। दोनों सेनाएं 5 नवंबर 1556 को पानीपत में मिली। हेमू ने मुगल सेना को हरा दिया और लगभग युद्ध जीत लिया जब उसकी आंख में गलती से तीर लग गया और बेहोश हो गया। उसकी सेना भाग गई और लड़ाई हार गई।
मुगलों ने तब “काफिर” दुश्मनों के जिस्म से खोपड़ी का पिरामिड बनाया। समाधि वह स्थान थी जहाँ पानीपत की दूसरी लड़ाई में मुगल बादशाह अकबर ने हेमू का सिर काटा था “जिहाद का इनाम पाने और गाजी की उपाधि प्राप्त करने के लिए” (काफिरों के हत्यारे) 10 एकड़ के इस पूरे हेमू समाधी स्थल को तत्कालीन सीएम ओम प्रकाश चौटाला ने 1990 में ‘वक्फ बोर्ड ऑफ हरियाणा’ में स्थानांतरित कर दिया था, जिसके अध्यक्ष, हरियाणा के मेवात क्षेत्र के एक मुस्लिम विधायक ने कुछ लोगों से पैसे वसूलने वाले अतिक्रमण की अनुमति दी थी और पक्का निर्माण की अनुमति दी थी।
स्रोत: आरसी मजूमदार का “मुग़ल एम्पायर” खंड 12, पृष्ठ 96-99
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હાલ પાકિસ્તાન ,સિયાલકોટનો પ્રાચીન ઇતિહાસ: એક સમૃદ્ધ સાંસ્કૃતિક અને ઐતિહાસિક વારસો
હાલમાં પાકિસ્તાનના પંજાબ પ્રાંતમાં સ્થિત સિયાલકોટ એક એવું શહેર છે જેનો ઇતિહાસ પ્રાચીન સમયથી આધુનિક યુગ સુધી ફેલાયેલો છે. આ શહેર ફક્ત તેની સાંસ્કૃતિક સમૃદ્ધિ અને વ્યાપારી મહત્વ માટે જ જાણીતું નથી, પરંતુ તેના પ્રાચીન ઇતિહાસને કારણે તે ઇતિહાસકારો અને પુરાતત્વવિદો માટે ખાસ રસનું કેન્દ્ર રહ્યું છે.
સિયાલકોટનો ઇતિહાસ વૈદિક કાળ, મહાજનપદો, મૌર્ય સામ્રાજ્ય, ભારત-ગ્રીક પ્રભાવ અને મધ્યયુગીન યુગમાં ફેલાયેલો છે.
પ્રાચીન કાળ અને વૈદિક યુગ:
સિયાલકોટનો ઇતિહાસ ઓછામાં ઓછો 5,000 વર્ષ જૂનો હોવાનું માનવામાં આવે છે. પુરાતત્વીય પુરાવા અને ઐતિહાસિક ગ્રંથોના આધારે, એવું માનવામાં આવે છે કે સિયાલકોટનો પ્રદેશ વૈદિક સંસ્કૃતિનો ભાગ હતો. આ પ્રદેશનો ઉલ્લેખ પ્રાચીન ગ્રંથોમાં “શકલ” અથવા “સકલ” તરીકે કરવામાં આવ્યો છે.
મહાભારતમાં સકલ નો ઉલ્લેખ એક મહત્વપૂર્ણ શહેર તરીકે કરવામાં આવ્યો છે, જે મદ્ર દેશ (આધુનિક પંજાબ અને આસપાસના વિસ્તારો) ની રાજધાની હતી. આ વિસ્તાર તે સમયે વેપાર, સંસ્કૃતિ અને ધર્મનું કેન્દ્ર હતું.
ઋગ્વેદ અને અન્ય વૈદિક ગ્રંથોમાં આ પ્રદેશને આર્ય સંસ્કૃતિના વિસ્તરણના સંદર્ભમાં મહત્વપૂર્ણ માનવામાં આવ્યો છે.
ચિનાબ નદીના કિનારે અને હિમાલયની તળેટીમાં આવેલા સિયાલકોટનું ભૌગોલિક સ્થાન, તેને પ્રાચીન વેપાર માર્ગોનું એક મહત્વપૂર્ણ કેન્દ્ર બનાવતું હતું. આ પ્રદેશ ભારત અને મધ્ય એશિયા વચ્ચે વેપાર અને સાંસ્કૃતિક આદાનપ્રદાન માટે એક મુખ્ય કોરિડોર હતો.
મહાજનપદ કાળ અને બૌદ્ધ પ્રભાવ
પ્રાચીન ભારતના ૧૬ મહાજનપદોના સમયગાળા દરમિયાન (લગભગ ૬૦૦ ઈ.પૂર્વે), સિયાલકોટનો વિસ્તાર કદાચ મદ્ર અથવા ગાંધાર મહાજનપદનો ભાગ હતો. બૌદ્ધ ગ્રંથોમાં સકલા (સિયાલકોટ)નો ઉલ્લેખ એક મહત્વપૂર્ણ શહેર તરીકે કરવામાં આવ્યો છે. બૌદ્ધ સાહિત્ય સકલાને એક સમૃદ્ધ અને સાંસ્કૃતિક રીતે જીવંત શહેર તરીકે વર્ણવે છે, જ્યાં બૌદ્ધ ધર્મ ફેલાયો હતો.
સિયાલકોટમાં બૌદ્ધ ધર્મના પ્રભાવના પુરાવા પુરાતત્વીય શોધોમાં પણ મળી શકે છે. આ પ્રદેશમાં બૌદ્ધ સ્તૂપ અને મઠોના અવશેષો મળી આવ્યા છે, જે દર્શાવે છે કે તે બૌદ્ધ શિક્ષણ અને ધર્મનું કેન્દ્ર હતું. સકલ ને પાણિનીનું જન્મસ્થળ પણ માનવામાં આવે છે, જેમણે સંસ્કૃત વ્યાકરણનો પાયાનો ગ્રંથ અષ્ટાધ્યાયી લખ્યો હતો.
મૌર્ય સામ્રાજ્ય અને એલેક્ઝાન્ડરનું આગમન:
મૌર્ય સામ્રાજ્ય (૩૨૧-૧૮૫ ઈ. પૂર્વે) દરમિયાન સિયાલકોટ એક મહત્વપૂર્ણ વહીવટી અને વ્યાપારી કેન્દ્ર હતું. ચંદ્રગુપ્ત મૌર્ય અને તેમના પૌત્ર અશોકના શાસનકાળ દરમિયાન આ પ્રદેશમાં બૌદ્ધ ધર્મનો વ્યાપક ફેલાવો થયો. આ વિસ્તારમાં અશોકના શિલાલેખો અને સ્તંભોનો પ્રભાવ જોઈ શકાય છે.
સિયાલકોટના વ્યૂહાત્મક મહત્વને કારણે તે મૌર્ય સામ્રાજ્યનો એક મહત્વપૂર્ણ ભાગ બન્યો, કારણ કે તે ઉત્તરપશ્ચિમ ભારતને મધ્ય એશિયા સાથે જોડતો પ્રવેશદ્વાર હતો.
ત્યારબાદ, જ્યારે 326 માં એલેક્ઝાન્ડર ધ ગ્રેટે ભારત પર આક્રમણ કર્યું, ત્યારે સિયાલકોટનો વિસ્તાર પણ તેમના અભિયાનનો ભાગ બન્યો. એલેક્ઝાંડરે જેલમ નદીના કિનારે (સિયાલકોટ નજીક) રાજા પોરસ સાથે હાઇડાસ્પીસનું પ્રખ્યાત યુદ્ધ લડ્યું હતું. આ યુદ્ધમાં સિકંદરનો વિજય થયો હોવા છતાં, સ્થાનિક શાસકોનો સિયાલકોટ અને આસપાસના વિસ્તારોમાં પ્રભાવ ચાલુ રહ્યો. એલેક્ઝાંડરના આક્રમણ પછી, જે પાછળથી ઈન્ડો-ગ્રીક રાજ્ય તરીકે જાણીતું બન્યું, આ પ્રદેશમાં ગ્રીક પ્રભાવ પણ જોવા મળ્યો.
ઇન્ડો-ગ્રીક અને કુષાણ યુગ:
એલેક્ઝાન્ડર પછી, સિયાલકોટ અને આસપાસનો પ્રદેશ ઈન્ડો-ગ્રીક શાસકોના શાસન હેઠળ આવ્યો. આ સમયગાળામાં ગ્રીક અને ભારતીય સંસ્કૃતિઓનું એક અનોખું મિશ્રણ જોવા મળ્યું, જેને ગાંધાર કલા તરીકે ઓળખવામાં આવે છે. આ સમયગાળાના સિક્કા, શિલ્પો અને અન્ય પુરાતત્વીય અવશેષો સિયાલકોટમાં મળી આવ્યા છે, જે ગ્રીક અને ભારતીય કલાના મિશ્રણને પ્રતિબિંબિત કરે છે.
પહેલી અને બીજી સદીમાં, સિયાલકોટ કુષાણ સામ્રાજ્યનો ભાગ બન્યું. કુષાણ શાસક કનિષ્કના શાસનકાળ દરમિયાન બૌદ્ધ ધર્મને વિશેષ સમર્થન મળ્યું હતું અને સિયાલકોટમાં ઘણા બૌદ્ધ મઠો અને સ્તૂપ બનાવવામાં આવ્યા હતા.
કુષાણ કાળ દરમિયાન સિયાલકોટ એક મહત્વપૂર્ણ વેપાર કેન્દ્ર હતું, જે ભારત, મધ્ય એશિયા અને રોમન સામ્રાજ્યને સિલ્ક રૂટ દ્વારા જોડતું હતું.
ગુપ્ત કાળ અને મધ્યયુગીન યુગ:
ગુપ્ત સામ્રાજ્ય (૩૨૦-૫૫૦ ) દરમિયાન સિયાલકોટ પ્રદેશ સમૃદ્ધિનું કેન્દ્ર રહ્યું. ગુપ્ત કાળમાં હિન્દુ ધર્મ અને સંસ્કૃત સાહિત્યનું પુનરુત્થાન થયું, અને સિયાલકોટમાં ઘણા મંદિરો અને મંદિરોનું નિર્માણ થયું. આ સમયગાળા દરમિયાન સિયાલકોટનું વ્યાપારી મહત્વ વધુ વધ્યું, કારણ કે તે ભારતના અન્ય ભાગો અને વિદેશી વેપારીઓ સાથે જોડાયેલું હતું.
મધ્યયુગીન સમયગાળામાં, સિયાલકોટ પર વિવિધ રાજવંશોનું શાસન હતું, જેમાં હુણ, રાજપૂત અને બાદમાં દિલ્હી સલ્તનતનો સમાવેશ થાય છે. આ સમયગાળા દરમિયાન સિયાલકોટનું વ્યૂહાત્મક મહત્વ વધ્યું, કારણ કે તે ઉત્તરપશ્ચિમ ભારતમાં એક કિલ્લેબંધીવાળા શહેર તરીકે વિકસિત થયું.
સિયાલકોટનું પુરાતત્વીય મહત્વ:
સિયાલકોટ અને તેની આસપાસના વિસ્તારોમાં પુરાતત્વીય ખોદકામમાં ઘણી મહત્વપૂર્ણ શોધો મળી છે. આમાં પ્રાચીન સિક્કા, શિલ્પો, બૌદ્ધ સ્તૂપ અને વેપારની વસ્તુઓનો સમાવેશ થાય છે. સિયાલકોટ કિલ્લો, જે શહેરનો એક મુખ્ય ઐતિહાસિક સીમાચિહ્ન છે, તે મધ્યયુગીન યુગનો એક મહત્વપૂર્ણ સ્મારક છે. વધુમાં, આ પ્રદેશમાં મળેલા પ્રાચીન અવશેષો વૈદિક, બૌદ્ધ અને ઈન્ડો-ગ્રીક સમયગાળાની સમૃદ્ધિને પ્રતિબિંબિત કરે છે.
સિયાલકોટનો પ્રાચીન ઇતિહાસ માત્ર આ પ્રદેશની સાંસ્કૃતિક અને ધાર્મિક સમૃદ્ધિને જ પ્રતિબિંબિત કરતો નથી, પરંતુ તે ભારત અને મધ્ય એશિયા વચ્ચે સાંસ્કૃતિક અને વેપાર આદાનપ્રદાનનું એક મહત્વપૂર્ણ કેન્દ્ર પણ રહ્યું છે.
વૈદિક કાળથી મધ્યયુગીન કાળ સુધી, સિયાલકોટમાં મૌર્ય, ઈન્ડો-ગ્રીક, કુષાણ અને ગુપ્ત સહિત વિવિધ સંસ્કૃતિઓ અને સામ્રાજ્યોનો પ્રભાવ રહ્યો છે. આજે પણ, સિયાલકોટનો ઇતિહાસ તેના પુરાતત્વીય વારસા અને ઐતિહાસિક સ્મારકો દ્વારા જીવંત છે, જે ઇતિહાસ પ્રેમીઓ અને સંશોધકો માટે અમૂલ્ય ખજાનો છે.
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આ ઈરાનના રાજા શાહ અબ્બાસ છે, જે શિયા મુસ્લિમ હતા, તેની ઔરંગઝેબ સાથે લડાઈ થઈ હતી, તેણે ઔરંગઝેબને ખરાબ રીતે હરાવ્યો હતો અને તેની પાસેથી અફઘાનિસ્તાનનો 80% વિસ્તાર છીનવી લીધો હતો.
જ્યારે છત્રપતિ શિવાજી મહારાજ ઔરંગઝેબની જેલમાંથી ભાગી ગયા ત્યારે તેમણે ઔરંગઝેબને પત્ર લખ્યો હતો.
શાહ અબ્બાસે ઔરંગઝેબને કહ્યું
તમે તમારી જાતને આલમગીર કહો છો, જેનો અર્થ થાય છે વિશ્વ વિજેતા, પરંતુ કાફિર શિવ તમારા દ્વારા જીત્યા નથી.
આલમગીર, તું ઈંડાની છાલ છો..
કાફિર શિવે તમારા સૈનિકોને મારી નાખ્યા છે, તમને ગરીબ બનાવ્યા છે અને તમે એક નાલાયક વ્યક્તિ છો જે ફક્ત તમારા પોતાના પિતાને જ કેદ કરી શકો છે અને અન્ય કોઈ ને નહી.
શિવ ગઈકાલ સુધી કોઈ જાણતું ન હતું કે આજે તે પર્વત જેવો મહાન બની ગયો છે, દુનિયા તેમને સન્માનથી જોવા લાગી છે અને દુનિયા તમને નાલાયક અને ગરીબ માને છે.
જો તારે નાસ્તિક શિવથી તારો જીવ બચાવવો હોય તો મારી પાસે આવ અને હું મારી વિશાળ સેના સાથે આવીને તને બચાવીશ.
ઔરંગઝેબ, જેનું ઈરાનના રાજા દ્વારા આટલું ખરાબ અપમાન થયું હતું, તેને ભારતમાં કેટલાક લોકો મહાન રાજા બનાવવાની કોશિશ કરી રહ્યા છે.
જ્યારે સમગ્ર વિશ્વના રાજાઓમાં તે માત્ર હાસ્યનો પાત્ર હતો.
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છત્રપતિ શિવાજી મહારાજના સમયમાં ક્યારેય મહિલા ઓ ના નાચ ગાન નથી થયા. સ્ત્રીઓ દુશ્મનની પત્ની હોય તો પણ તેમનું હંમેશા સન્માન કરવામાં આવતું હતું. દરેકને તેમની માતા અને બહેન સમાન માનવામાં આવતી હતી.
તેમણે સ્પષ્ટ કહ્યું કે મહિલાઓની ગરિમા હંમેશા જળવાઈ રહેવી જોઈએ ,પછી તે સ્ત્રી કોઈપણ જાતિ કે ધર્મની ન હોઈ શકે!!
28 ફેબ્રુઆરી 1678ના રોજ સુકુજી નામના સરદારે બેલવાડી કિલ્લાને ઘેરો ઘાલ્યો હતો. આ કિલ્લાની કમાન્ડર એક મહિલા હતી.
તેમનું નામ સાવિત્રીબાઈ દેસાઈ હતું. આ બહાદુર મહિલાએ 27 દિવસ સુધી લડત આપી. પરંતુ અંતે, સુકુજી કિલ્લા પર વિજય મેળવે છે અને સાવિત્રીબાઈના અપમાનનો બદલો લે છે.
આ સમાચાર સાંભળીને રાજા ગુસ્સે થઈ ગયા. રાજાના આદેશ મુજબ સુકુજીની આંખો કાઢી નાખવામાં આવી અને તેને આજીવન કેદ કરવામાં આવ્યો.
24 ઓક્ટોબર 1657 ના રોજ, છત્રપતિ શિવાજી મહારાજના આદેશ પર, સોનદેવે કલ્યાણ કિલ્લાને ઘેરો ઘાલ્યો અને તેને જીતી લીધો. તે સમયે, મૌલાના અહમદની પુત્રવધૂ એટલે કે ઔરંગઝેબની બહેન અને શાહજહાંની પુત્રી રોશનારા, જે અભૂતપૂર્વ સુંદર હતી, તેને કિલ્લામાં કેદ કરવામાં આવી હતી. તે પછી જ્યારે સૈનિકોએ છત્રપતિ શિવાજી મહારાજની સામે તેને રજૂ કરી ત્યારે છત્રપતિ શિવાજી મહારાજે તેમના સૈનિકોને કહ્યું કે આ તમારી પહેલી અને છેલ્લી ભૂલ છે. ત્યારપછી જો કોઈ પણ જાતિ કે ધર્મની મહિલા સાથે આવું અપમાનજનક કૃત્ય કરવામાં આવશે તો તેની સજા મૃત્યુદંડ હશે. પછી પાલખીને શણગારવામાં આવી અને રોશનારાને તેમની વિનંતી પર તેના મહેલમાં મોકલવામાં આવી.
શિવરાય જીની ભૂમિકા એવી હતી કે “સ્ત્રીઓની ગરિમા હંમેશા જળવાઈ રહેવી જોઈએ. પછી ભલે તે કોઈપણ જાતિ કે ધર્મની હોય!!”
જો કોઈ દુશ્મનની પત્ની ભલે તે કોઇ પણ ધર્મ કે જાતિની હોય, લડાઈમાં ફસાઈ જાય તો તેને કોઈ પણ પ્રકાર નું નુકશાન ન કરવું જોઈએ. મહારાજાના આવા આદેશો પથ્થરમાં લખેલા હતા… અને તેનો 100% અમલ પણ થયો હતો.
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વર્ષ 1680 .જ્યારે ઔરંગઝેબને ખબર પડી કે છત્રપતિ શિવાજી મહારાજનું અવસાન થયું છે. તેથી તે દક્ષિણ જીતવાની ઈચ્છા સાથે આગ્રા છોડીને ઔરંગાબાદ પહોંચ્યો. ઔરંગઝેબે નિઝામશાહીને ખતમ કરવામાં એક દિવસ અને આદિલશાહીને ખતમ કરવામાં બે દિવસનો સમય લીધો હતો પરંતુ 23 વર્ષના નવા છત્રપતિ સંભાજી મહારાજ નો સામનો કરવો પડ્યો હતો. આ સમયે ઔરંગઝેબ વિશ્વનો સૌથી શક્તિશાળી રાજા હતો. તેઓ માત્ર વિશ્વના સૌથી મોટા પ્રદેશ પર જ રાજ કરતા ન હતા, તેમની પાસે પાંચ લાખની વિશ્વની સૌથી મોટી સેના પણ હતી.
પછીના 9 વર્ષોમાં, સંભાજીએ પોર્ટુગીઝ સામે 15 નાના-મોટા યુદ્ધો અને મુઘલો સામે 69 નાના-મોટા યુદ્ધો જીત્યા. તેણે મરાઠા સામ્રાજ્યની મર્યાદા તેના પિતા પાસે હતી, તેના કરતા ઘણી વખત વિશાળ કરી. ગુજરાત થી ગોવા કેસરિયા ધ્વજ .1689 માં, તેમના સાળાના વિશ્વાસઘાતને કારણે, છત્રપતિ તેમની પત્ની અને બાળક સાથે બંધક બન્યા હતા. તેને જોકર વસ્ત્રોમાં મુઘલ છાવણીમાં લાવવામાં આવ્યા. ઔરંગઝેબે જીવતા રહેવા માટે બે રસ્તા આપ્યા: પહેલું, આખું મરાઠા સામ્રાજ્ય મુઘલોને સોંપી દો અથવા ઈસ્લામ સ્વીકારી લેવો , બંધક સંભાજીનો જવાબ હતો કે ઔરંગઝેબ તેની પુત્રીના લગ્ન મારી સાથે કરે તો પણ હું ઇસ્લામ સ્વીકારીશ નહીં.
આ પછી ત્રાસ શરૂ થયો, પહેલા દિવસે તેની આંખો બહાર કાઢવામાં આવી, ત્યારબાદ તેની જીભ કાપવામાં આવી, પછી તેની ચામડી કાઢી નાખવામાં આવી અને અંતે તેના ટુકડા કરી કૂતરાઓને ખવડાવવામાં આવ્યા. આ પછી, ઔરંગઝેબ લગભગ 20 વર્ષ સુધી મરાઠાઓને ખતમ કરવાના સ્વપ્ન સાથે ઔરંગાબાદમાં રહ્યો, પરંતુ તે હિંદુ રાજા શાહીનો અંત ન લાવી શક્યા, 1684માં મરાઠાઓ અને અંગ્રેજો વચ્ચે થયેલા કરારમાં છત્રપતિ સંભાજી મહારાજે એવી શરત મૂકી હતી કે અંગ્રેજોને તેમના રાજ્યમાં ગુલામ બનાવવાની કે લોકોને ખ્રિસ્તી ધર્મમાં ફેરવવા માટે ખરીદવાની મંજૂરી આપવામાં આવશે નહીં.
देश धरम पर मिटने वाला शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी एक ही शंभू राजा था।।
तेजपुंज तेजस्वी आंखें निकल गयीं पर झुका नहीं।
दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति का दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं।।
दोनों पैर कटे शंभू के ध्येय मार्ग से हटा नहीं।
हाथ कटे तो क्या हुआ सत्कर्म कभी तो छूटा नहीं।।
जिह्वा कटी खून बहाया धरम का सौदा किया नहीं।
वर्ष तीन सौ बीत गये अब शंभू के बलिदान को।
कौन जीता कौन हारा पूछ लो संसार को।।
मातृभूमि के चरण कमल परजीवन पुष्प चढ़ाया था।
है राजा दुनिया में कोई जैसा शंभू राजा था।।’ –
શત શત વંદન🙏
છત્રપતિ સંભાજી મહારાજે ઔરંગઝેબને લખેલો પત્ર
“રાજા સલામત માત્ર મુસ્લિમોના રાજા નથી. ભારતના લોકો વિવિધ ધર્મના છે. તે બધાનો રાજા છે. તેઓ જે હેતુ સાથે ડેક્કન આવ્યા હતા તે પૂરો થયો છે. તેનાથી સંતુષ્ટ થઈને તેઓએ દિલ્હી પરત ફરવું જોઈએ. એકવાર અમે અને અમારા પિતા તમારી પકડમાંથી મુક્ત થયા હતા. પરંતુ જો તેઓ આમ જ અડગ રહેશે તો તેઓ તમે અમારી પકડમાંથી છટકી શકશો નહીં ,દિલ્હી ચાલ્યા જાવ, જો આ તેની ઈચ્છા ન હોય તો તેણે ડેક્કનમાં જ તેની કબર માટે જગ્યા શોધી લે જો.
છત્રપતિ સંભાજી મહારાજની હત્યા બાદ ઔરંગઝેબે કહ્યું હતું – “જો મારા ચાર પુત્રોમાંથી એક પણ તમારા જેવો હોત તો આખું ભારત મુઘલ સલ્તનતમાં ઘણા સમય પહેલા સામેલ થઈ ગયું હોત.”
જય શિવા સરદાર કી,જય રાણા પ્રતાપ કી.
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🇮🇳 #महर्षि #पाणिनि के बारे में जाने
पाणिनि (५०० ई पू) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं।
#संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है।
एक #शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध #जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा…
“मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि #अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके। इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है।…
#अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके।”
The M L B D #News letter (A monthly of indological bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first software man without hardware घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था “Sanskrit software for future hardware” जिसमे बताया गया प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, #वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, परआज भी दुनिया भर में #कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।
व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और #तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।
NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी। उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों #डॉलर खर्च किये गये।
महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या #तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।
पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार…
“पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है” (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।
“पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं” (कोल ब्रुक)।
“संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है… यह मानवीय #मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है” (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।
“पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा”।
(प्रो. मोनियर विलियम्स)।
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