Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मगध के दरबार में चाणक्य कोई राजा नहीं थे। एक साधारण ब्राह्मण थे, लेकिन उनका दिमाग असाधारण था। जब वे धनानंद के पास देश की सुरक्षा की चिंता लेकर पहुँचे, तो उन्हें सम्मान नहीं मिला। उल्टा उन्हें बालों से पकड़कर दरबार से बाहर फेंक दिया गया।

दरबार में लोग हँस रहे थे। चाणक्य ज़मीन पर गिर पड़े। उनकी शिखा खुल गई। उस समय यह केवल अपमान नहीं था, यह मृत्यु से भी बड़ा तिरस्कार माना जाता था।

लेकिन चाणक्य ने वहाँ रोना नहीं चुना। उन्होंने अपनी बिखरी हुई शिखा को देखा और एक भयानक प्रतिज्ञा ली। जब तक नंद वंश का विनाश नहीं कर दूँगा, तब तक अपने बाल नहीं बाँधूँगा।

उन्होंने किसी सेना का इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने किसी राजकुमार को नहीं चुना। उन्होंने एक साधारण बालक को चुना, जिसका नाम था चंद्रगुप्त।

यह कोई कहानी या फिल्म नहीं थी। यह वर्षों की कठोर साधना और प्रशिक्षण था। चाणक्य ने उस बच्चे को सिखाया कि राजनीति धर्म से नहीं, नियम से चलती है। उन्होंने उसे बताया कि शत्रु को केवल हराना काफी नहीं होता, उसे जड़ से उखाड़ना पड़ता है ताकि वह फिर सिर न उठा सके।

उन्होंने विषकन्याओं का प्रयोग किया। छल और रणनीति अपनाई। ज़हर को भी हथियार बनाया। क्योंकि वे जानते थे कि एक कमज़ोर राजा से बेहतर एक कठोर और अनुशासित व्यवस्था होती है। उनके लिए लक्ष्य भावनाओं से बड़ा था। उनका उद्देश्य था एक ऐसा राज्य खड़ा करना जो बाहरी आक्रमणों और अंदरूनी भ्रष्टाचार से बच सके।

धीरे-धीरे मगध बदलने लगा। नंद वंश गिरा और मौर्य साम्राज्य खड़ा हुआ। एक ऐसा साम्राज्य जिसने पूरे उत्तर भारत को एक ध्वज के नीचे जोड़ दिया।

लेकिन चाणक्य ने अपने लिए कोई महल नहीं माँगा। वे दरबार के बाहर एक छोटी-सी कुटिया में रहते रहे। सत्ता उनके हाथ में थी, लेकिन उन्होंने ऐश्वर्य को कभी अपना लक्ष्य नहीं बनाया।

इसी समय उन्होंने अर्थशास्त्र की रचना की।

यह पुस्तक उन लोगों के लिए नहीं थी जो महान दिखना चाहते हैं। यह उनके लिए थी जो राज्य को बचाना चाहते हैं। उन्होंने साफ लिखा कि राजा का कोई स्थायी मित्र नहीं होता। आवश्यकता पड़ने पर अपनों का भी त्याग करना पड़ता है। उन्होंने राजनीति को नैतिकता से अलग कर दिया।

उनका मानना था कि शांति तभी संभव है जब डर और अनुशासन की एक मज़बूत व्यवस्था नीचे से ऊपर तक खड़ी हो। आदर्शों से नहीं, शक्ति से स्थिरता आती है। यह उनकी कठोर लेकिन व्यावहारिक सोच थी।

चाणक्य की मृत्यु भी किसी विजय उत्सव की तरह नहीं हुई। उनके विरुद्ध साज़िश रची गई। अपने ही लोगों ने उन्हें संदेह के घेरे में ला दिया। वे नगर छोड़कर चले गए और अंत में भूख से अपने प्राण त्याग दिए।

जिस व्यक्ति ने अखंड भारत का सपना देखा, वह स्वयं अकेले मरा।

चाणक्य ने दुनिया को यह नहीं सिखाया कि अच्छा कैसे बना जाए। उन्होंने सिखाया कि प्रभावशाली कैसे बना जाए।

दुनिया उन्हीं का सम्मान करती है जो जीतना जानते हैं। कड़वी सच्चाई यह है कि लोग आपके चरित्र के बारे में तभी पूछते हैं जब आपके पास शक्ति होती है। बिना शक्ति के सच भी कमज़ोरी बन जाता है।

उन्होंने अपनी शिखा तब बाँधी, जब उनका शत्रु समाप्त हो चुका था।

यह बदला नहीं था।
यह हिसाब था।

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